यूपीआई लेनदेन पर बैंकों को शुल्क लगाने की अनुमति देने वाला विधेयक लोकसभा से पारित

लोकसभा ने बिना बहस के एक विधेयक पारित किया है, जिससे केंद्र सरकार भविष्य में बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं को यूपीआई व अन्य डिजिटल भुगतान सेवाओं पर शुल्क लगाने की अनुमति दे सकेगी. कांग्रेस और माकपा ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे मुफ्त यूपीआई लेनदेन की वैधानिक गारंटी खत्म हो जाएगी.

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 6 अगस्त, 2026 को संसद के मॉनसून सत्र के दौरान राज्यसभा में अपनी बात रखती हुईं. (फोटो: संसद टीवी वाया पीटीआई)

नई दिल्ली: लोकसभा ने गुरुवार (6 अगस्त) को एक विधेयक पारित किया, जिससे केंद्र सरकार बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं को यूपीआई और अन्य डिजिटल भुगतान लेनदेन पर शुल्क लगाने की अनुमति दे सकेगी.

कराधान तथा अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026, जिसके जरिए सरकार ने भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में भी संशोधन किया, लोकसभा में बिना किसी बहस के ध्वनिमत से पारित हो गया.

रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को दोपहर 2 बजे सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू होने के बाद यह विधेयक पेश किया था. विपक्ष के हंगामे के बीच बिना किसी चर्चा के इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया.

इस दौरान विपक्षी सांसद अयोध्या के राम मंदिर में हुई चोरी और युवा प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के दो सप्ताह से अधिक समय बाद भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सदन में मौजूद न होने को लेकर नारेबाजी करते रहे.

यूपीआई पर शुल्क से जुड़ी रोक हटाई गई

उल्लेखनीय है कि अब तक पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A के तहत बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 269SU के तहत निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों के इस्तेमाल पर किसी भी तरह का शुल्क लेने से रोका गया था.

इसको साथ ही आयकर अधिनियम की धारा 269SU के अनुसार 50 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक कारोबार वाले व्यवसायों के लिए रुपेय डेबिट कार्ड और भीम-यूपीआई क्यूआर कोड समेत कुछ इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम स्वीकार करना अनिवार्य था.

संशोधन के तहत धारा 10A में यह प्रावधान बदल दिया गया है. अब कानून में ‘आयकर अधिनियम की धारा 269SU के तहत निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों’ की जगह ‘केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना के जरिए निर्दिष्ट एक या अधिक इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम’ शब्द शामिल किए गए हैं.

इस बदलाव के साथ वह कानूनी प्रावधान भी हट गया है, जो बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को व्यापारी छूट दर (एमडीआर) या अन्य शुल्क लगाने से रोकता था. अब केंद्र सरकार चाहे तो अधिसूचना जारी कर बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और भुगतान अवसंरचना (पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर) कंपनियों को डिजिटल भुगतान सेवाओं पर उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों से शुल्क लेने की अनुमति दे सकती है.

काफी समय से बैंक और उद्योग जगत यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर लागू करने की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि यूपीआई के लगातार बढ़ते उपयोग के कारण भुगतान अवसंरचना की लागत भी बढ़ रही है.

हालांकि, संजय मल्होत्रा ने बुधवार को समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा था कि डिजिटल भुगतान पर एमडीआर लागू करने पर चर्चा करना फिलहाल ‘जल्दबाज़ी’ होगी. उन्होंने कहा कि भुगतान जैसी सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना में निवेश आवश्यक है और इसकी लागत किसी न किसी को वहन करनी होगी.

विदेशी निवेशकों और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को भी राहत

इस विधेयक के जरिए 5 जून को जारी उस अध्यादेश का भी स्थान ले लिया गया है, जिसमें सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को मिलने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर राहत दी गई थी.

इसके अलावा भारत में अपने संचालन स्थानांतरित करने वाले फंड मैनेजरों के लिए भी नियमों में ढील दी गई है, ताकि उनकी वैश्विक आय पर भारत में कर लगाने की आशंका कम हो.

घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि भारत में मोबाइल फोन, लैपटॉप, पर्सनल कंप्यूटर, टैबलेट, सर्वर और उनके पुर्जों के निर्माण के लिए भारतीय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स के साथ काम करने वाली विदेशी कंपनियों को मिलने वाली आयकर छूट को वित्त वर्ष 2040-41 तक बढ़ा दिया गया है.

इस बीच डिजिटल भुगतान पर लेनदेन शुल्क का रास्ता खोलने वाले विधेयक का कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने किया विरोध है.

कांग्रेस के संचार विभाग प्रमुख और सांसद जयराम रमेश ने कहा कि इस विधेयक के पारित होने से यूपीआई लेनदेन को मुफ्त बनाए रखने वाली वैधानिक गारंटी समाप्त हो जाती है.

उन्होंने कहा, ‘यह व्यापारी छूट दर (एमडीआर) शुल्क लगाए जाने का रास्ता खोलता है, जिसे भविष्य में सभी प्रकार के भुगतानों तक आसानी से बढ़ाया जा सकता है. इसका बोझ अंततः आम लोगों पर पड़ेगा, जिन्हें अब यूपीआई के जरिए भुगतान करने के लिए शुल्क देना होगा. मोदी सरकार का यह दावा कि यूपीआई को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखने का यही एकमात्र तरीका है, झूठ है.’

उनके अनुसार, ‘ 2025-26 में भारतीय रिजर्व बैंक ने मोदी सरकार को 2.86 लाख करोड़ रुपये का अधिशेष हस्तांतरित किया था. इस महत्वपूर्ण डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को समर्थन देने के लिए उस अधिशेष का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही पर्याप्त होगा.’

जयराम रमेश ने यह भी कहा कि अमेरिका द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत पर युद्धविराम स्वीकार करने का दबाव बनाने के दावों, रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करने और चिंताओं के बावजूद ‘अनुचित’ मसौदा व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद यह संशोधन लाया गया है.

उन्होंने आगे कहा, ‘यह संशोधन अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें यूपीआई और RuPay के मुफ्त होने की आलोचना की गई है और आरोप लगाया गया है कि उन्होंने Visa और MasterCard जैसे अमेरिकी भुगतान मंचों को बाजार से बाहर कर दिया है. क्या प्रधानमंत्री अपने ‘अच्छे मित्र’ डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में यूपीआई को कमजोर कर डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलना चाहते हैं?’

वहीं, इस विधेयक को वापस लेने की मांग करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पोलित ब्यूरो की ओर से कहा गया, ‘जब आम नागरिकों ने इसे भुगतान और लेनदेन का प्रमुख माध्यम बना लिया है, तब सरकार लेनदेन शुल्क लगाने का प्रस्ताव लाकर इसी सार्वजनिक अवसंरचना को राजस्व का स्रोत बनाने की कोशिश कर रही है….’