प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया आंध्र प्रदेश दौरे में आदिवासी समुदाय के पारंपरिक ढिमसा नृत्य को बड़े पैमाने पर पेश किया गया; 13 हजार से ज़्यादा आदिवासी महिलाओं और स्कूली छात्राओं ने इस नृत्य में भाग लिया और इसे गिनीज़ बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिलने की बात भी हो रही है. इन कलाकारों का इतना बड़ा जमावड़ा आदिवासियों के मुद्दों से जुड़े किसी कार्यक्रम में नहीं, बल्कि विशाखापट्टनम के नज़दीक बने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के उद्घाटन के मौक़े पर किया गया.
सरकारी आयोजनों में आदिवासी कला और संस्कृति का प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है, पर पिछले कुछ सालों में यह चलन बढ़ता जा रहा है. चुनावी रैलियों, सरकारी समारोहों, प्रधानमंत्री-मंत्रियों के दौरों और बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों में आदिवासी लोकनृत्य अब लगभग एक अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं.
छत्तीसगढ़ का गौर, मादर और रेला, झारखंड का झूमर और पाइका, आंध्र प्रदेश और ओडिशा का ढिमसा, संथाल नृत्य, पूर्वोत्तर के पारंपरिक नृत्य या मध्य भारत के अन्य आदिवासी लोकनृत्य- ये अक्सर किसी बड़े राजनीतिक कार्यक्रम की शुरुआत का हिस्सा बन जाते हैं. लेकिन हर बार यही सवाल सामने आता है- क्या आदिवासी संस्कृति को उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ के साथ सम्मान मिल रहा है, या उसका इस्तेमाल केवल ‘दूसरों’ के मनोरंजन करने वाली ‘अनोखी’ वस्तु के रूप में किया जा रहा है?
इसका सीधा जवाब है कि सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के सामने आदिवासी नृत्य के प्रदर्शन का सीधा नाता औपनिवेशिक मानसिकता से जुड़ता है.
ब्रिटिश काल में आदिवासी समुदायों को ‘मुख्यधारा’ से अलग, आदिम और ‘अनोखी वस्तु’ के रूप में देखा जाता था. उनके पहनावे और कला को एक ‘प्रदर्शनी’ की तरह पेश किया जाता था. और आज भी बड़े सरकारी आयोजनों में मंत्रियों और वीआईपी के स्वागत के लिए हजारों आदिवासियों को एक जैसी पोशाक पहनाकर नचाना, उसी औपनिवेशिक मानसिकता का विस्तार भर है. यह एक सांस्कृतिक प्रदर्शन से ज्यादा शासक वर्ग के मनोरंजन का कार्यक्रम है.

संस्कृति का हिस्सा
ढिमसा नृत्य आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू, पार्वतीपुरम मन्यम और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों के साथ-साथ ओडिशा के मलकानगिरी, कोरापुट जिलों में रहने वाले आदिवासी समुदायों – खासकर भगता, कोंध, वाल्मीकि, पोरजा और अन्य समुदायों की सामुदायिक पहचान का हिस्सा है. यह केवल उनके मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि उनका इतिहास, कृषि चक्र, प्रकृति, सामूहिक जीवन और सामाजिक संबंधों से जुड़ी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है. ढिमसा के गीत और लय उस जीवन-दर्शन को व्यक्त करते हैं, जिसमें समुदाय और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं.
प्रधानमंत्री मोदी के कार्यक्रम में ढिमसा नृत्य के प्रदर्शन की ओडिशा और आंध्र प्रदेश के कई लोगों ने आलोचना की. सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी पीवी रमेश ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि एक सम्मानित सांस्कृतिक परंपरा को राजनीतिक तमाशा बनाना अनुचित है. उन्होंने आरोप लगाया कि इस परंपरा को राजनीतिक नेताओं के औपचारिक स्वागत में बदलना आदिवासी संस्कृति का अपमान है.
दरअसल आदिवासी किसी भी नृत्य का प्रदर्शन अपने गांवों में और अपने ही लोगों के बीच, स्वेच्छा से और सहज रूप से करना पसंद करते हैं. प्रकृति, समाज और अपने जीवन के सभी पहलुओं के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना से करना पसंद करते हैं. लेकिन अब उसका व्यापारीकरण इस कदर हुआ है कि चंद पैसों से ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन बहुत आसानी से किया जा सकता है.
करीब तीन साल पहले, 2023 में मुझे ओडिशा-आंध्र प्रदेश की सीमा में स्थित अरकू घाटी जाने का अवसर मिला था. तब वहां देखा कि पर्यटकों के मनोरंजन के लिए आदिवासी महिलाएं महज कुछ रुपये लेकर ढिमसा नृत्य कर रही थीं. पर्यटक भी उनके साथ थिरक रहे थे, और फोटो-वीडियो खिंचवा रहे थे. लेकिन उस प्रस्तुति में यह समझ कहीं से भी दिखाई नहीं दे रही थी कि यह नृत्य उनके लिए केवल कला नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक और सामुदायिक जीवन का हिस्सा है.
यह केवल हमारे ही देश की बात नहीं है, शायद दुनिया में ही आदिवासी संस्कृति का प्रदर्शन इसी तरह होता है. पिछले साल जब मैं फ़िलीपींस गई थी, तो देखा प्यूर्टो प्रिंसेसा शहर में बटरफ्लाई ईको गार्डन-ट्राइबल विलेज नामक प्रदर्शनी में कुछ बच्चे, महिलाएं और पुरुष पलावन आदिवासी वेषभूषा में पर्यटकों का मनोरंजन कर रहे थे.
अरकू का आदिवासी संग्रहालय भी इसी अनुभव का एक दूसरा पहलू सामने लाता है. यहां आदिवासी जीवन, परंपराओं और संस्कृति को प्रदर्शित किया गया है, जिसे देखने देश-विदेश से लोग आते हैं.
इसी तरह मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित 250 एकड़ में फैले विशाल आदिवासी संग्रहालय में भी आदिवासी मिथकों, लोककथाओं, कला और जीवन-दर्शन को प्रदर्शित किया गया है. ऐसे देश में कई संग्रहालय हैं जहां आदिवासी समाज को तीर-कमान, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी की मूर्तियों, पारंपरिक वेशभूषा, नृत्य और उनके आस्था के अनुष्ठानों के साथ प्रदशित किया जाता है.

अधिकांश संग्रहालयों की कहानियां क्यूरेटर, इतिहासकार या सरकारी संस्थान लिखते हैं. प्रसिद्ध अफ्रीकी लेखक और विचारक न्गूगी वा थियोंगो ने सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व को सत्ता से जोड़ते हुए उनकी किताब ‘डीकोलॉनाइजिंग द माइंड’ में लिखा है कि जब किसी समुदाय की कहानी दूसरे लोग लिखते हैं, तो अक्सर उस समुदाय की अपनी आवाज़ कमजोर पड़ जाती है.
यही सवाल आदिवासी संस्कृति के सरकारी प्रदर्शन पर भी लागू होता है- क्या आदिवासी खुद अपनी संस्कृति का प्रतिनिधि है, या सत्ता तंत्र के मनोरंजन के लिए नाचने वाला कलाकार भर है?
वहीं, अफ़्रीकी-अमेरिकी कवि करीम वफा-अल हुसैनी लिखते हैं, ‘साम्राज्य को संग्रहालय पसंद हैं, क्योंकि किसी संस्कृति को शीशे के पीछे से काबू करने के लिए इससे आसान कुछ नहीं होता.’
परंपरा को तमाशे में तब्दील करना

छत्तीसगढ़ सरकार ने 2025 में बस्तर पंडुम (गोंडी भाषा का शब्द ‘पंडुम’ का अर्थ है त्यौहार या उत्सव) शुरू किया है, जिसके तहत सरकार आदिवासी लोकनृत्य, लोकगीत, लोकवाद्य, पारंपरिक हस्तशिल्प, वेशभूषा, खान-पान की नुमाइश की जाती है. सवाल उठता है कि बस्तर की ऐतिहासिक और समृद्ध आदिवासी संस्कृति को किसी सरकारी कार्यक्रम के जरिए केवल रंग-बिरंगे नृत्यों और पारंपरिक वेशभूषा तक सीमित करना कहां तक उचित है?
‘पंडुम’ आदिवासी समाज की खुशियों से जुड़ी हुई परंपरा का हिस्सा है, ‘पंडुम’ वास्तव में ग्राम देवताओं की पूजा से जुड़ी एक विशिष्ट आस्था और पूजा-पद्धति का नाम है. जिसमें अपने पुरखों, जंगलों और पहाड़ों को पूजते हैं और खुशियां मनाते हैं- जैसे जब नई फसल आती है तो ‘पुनांग पंडुम’, आम की फसल आने पर ‘मरका पंडुम’, बोवाई के समय ‘विज्जा पंडुम’ आदि से आदिवासी खुशियां मनाते हैं.
सर्व आदिवासी समाज और आदिवासी कार्यकर्ताओं ने सरकारी और निजी आयोजनों, मेलों, कार्यक्रमों और प्रचार अभियानों में गोंडी शब्द ‘पंडुम’ के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई थी. उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि इसका इस्तेमाल आदिवासी आस्था के मूल तत्व को तोड़-मरोड़कर पेश करता है. इसे सरकारी और सार्वजनिक आयोजनों का शीर्षक बना देना आदिवासी आस्था, परंपराओं और जीवन-पद्धति के खिलाफ है.

संरक्षण की चिंता नहीं
बस्तर की संस्कृति केवल नृत्य या वेशभूषा नहीं है. यह सदियों से जल, जंगल, जमीन और सामुदायिक जीवन के साथ विकसित हुई जीवन-पद्धति है. गोटूल जैसी सामाजिक संस्थाएं, सामूहिक खेती, बीज संरक्षण, लोककथाएं, देवी-देवताओं की परंपराएं और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व उसकी सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार द्वारा प्रायोजित ऐसे सांस्कृतिक आयोजन से इस विरासत का संरक्षण कैसे संभव है?
विडंबना यह है कि जिन समुदायों के नृत्य बड़े-बड़े मंचों की शोभा बनते हैं, वही समुदाय कई जगहों पर भूमि अधिग्रहण, अवैध खनन, वन अधिकारों का हनन, विस्थापन, कुपोषण, शिक्षा का अभाव और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी गंभीर और बुनियादी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
और इन मुद्दों पर बेरुखी रखने वाले या इन्हें उठाने वालों पर तरह-तरह के लांछन लगाकर उनकी आवाज़ को दबाने वाले उनके नाच-गानों का आनंद ले रहे हैं और उनके हितैषी होने का ढोंग कर रहे हैं.

भाषा से बेरुखी
एक और विडंबना यह है कि आदिवासी नृत्य की नुमाइश को तवज्जो देने वाले लोग उनकी भाषाओं के संरक्षण में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं है.
मध्य भारत के विशाल आदिवासी भूभाग- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में बोली जाने वाली गोंडी, हल्बी, कुड़ुख, कुड़माली, कोरकू, भीली, भतरी, परजी, माड़िया, दोरला, कुईं, सोरा और दर्जनों अन्य भाषाएं आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही हैं. जिन समुदायों की संस्कृति को सरकारी मंचों पर उत्सव की तरह प्रस्तुत किया जाता है, उनकी भाषाएं सार्वजनिक जीवन से लगातार बाहर होती जा रही हैं.
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, ज्ञान, प्रकृति की समझ और दुनिया को देखने का तरीका भी है. जब कोई भाषा विलुप्त होती है, तो उसके साथ ही उस समाज का पारंपरिक ज्ञान, लोककथाएं, गीत, चिकित्सा पद्धतियां, कृषि संबंधी अनुभव और प्रकृति के साथ उसके रिश्ते और किस्से भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं.
मध्य भारत की सबसे बड़ी आदिवासी भाषाओं में गोंडी/कोया प्रमुख है. गोंड समुदाय के लोग करोड़ों में होने के बावजूद गोंडी भाषा आज भी प्रशासन, न्यायालय, विश्वविद्यालय और सरकारी कामकाज की भाषा नहीं बन सकी है और न ही उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह मिल पाई है. अलग-अलग क्षेत्रों में इसके अनेक रूप विकसित हुए हैं, लेकिन राज्य स्तर पर इसके संरक्षण और मानकीकरण के प्रयास अभी भी न के बराबर हुए हैं.
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में मोहगांव ग्रामसभा द्वारा चलाया जा रहा ‘पारंपरिक कोया ज्ञानबोध संस्कार गोटूल स्कूल’, जो राज्य की एक मात्र गोंडी मीडियम स्कूल है, को सरकार अवैध घोषित कर बंद कराने पर तुली हुई है.
आदिवासी संस्कृति का सम्मान तभी सार्थक माना जा सकता है जब उसके साथ जुड़े समुदायों की गरिमा, भाषा, परंपराएं और अधिकार भी समान रूप से सुरक्षित हों. यही वह कसौटी है, जिस पर किसी भी सरकार के सांस्कृतिक दावों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए.
