ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए ‘मोदी मंदिर’ बनाना असल मुद्दों से भटकाने वाला क्यों है?

आखिर ट्रांसजेंडर नागरिकों को एक अलग मंदिर की ज़रूरत ही क्यों है? और सबसे बढ़कर, कोई चुना हुआ राष्ट्राध्यक्ष अगर अपना बुनियादी संवैधानिक कर्तव्य पूरा कर रहा है, तो उसे भगवान का दर्जा देकर उसकी पूजा करने की शुरुआत कब से होने लगी?

(फोटो साभार: flickr)

जब यह खबर सामने आई कि बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड के कुछ सदस्यों ने पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित एक मंदिर बनाने का प्रस्ताव रखा है, तो इसके समर्थकों ने इसे एक बड़े आभार के रूप में पेश किया. उनका कहना था कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 जैसे केंद्रीय पहलों के तहत समुदाय को जो कानूनी पहचान और संस्थागत जगह मिली है, यह मंदिर उसी के प्रति धन्यवाद जताने का तरीका है.

बोर्ड के सदस्यों का यह भी तर्क था कि चूंकि ट्रांसजेंडर समुदाय के पास अपना कोई समर्पित धार्मिक स्थान नहीं है, इसलिए देश के मौजूदा प्रधान को यह जगह समर्पित करना समाज में उनकी मौजूदगी और नए अधिकारों का एक सार्वजनिक ऐलान होगा.

लेकिन जब हम इस राजनीतिक दिखावे से परे देखते हैं, तो एक परेशान करने वाला सवाल उठता है: आखिर ट्रांसजेंडर नागरिकों को एक अलग मंदिर की ज़रूरत ही क्यों है? और सबसे बढ़कर, कोई चुना हुआ राष्ट्राध्यक्ष अगर अपना बुनियादी संवैधानिक कर्तव्य पूरा कर रहा है, तो उसे भगवान का दर्जा देकर उसकी पूजा करने की शुरुआत कब से होने लगी?

अलग-थलग करने का जाल

अलग मंदिर की वकालत करते हुए यह कहना कि जेंडर-डायवर्स (लैंगिक विविधता वाले) लोगों का ‘अपना कोई देवी-देवता नहीं है’, इस उपमहाद्वीप परंपराओं को पूरी तरह से नकारना है. हिंदू पौराणिक कथाओं में क्वीर, नॉन-बाइनरी और अलग-अलग लैंगिक पहचानों का ताना-बाना बहुत गहराई से बुना गया है. शिव का ‘अर्ध नारीश्वर’ रूप पुरुष और स्त्री ऊर्जा के मिलन को दर्शाता है, विष्णु ‘मोहिनी’ का रूप धारण करते हैं, महाभारत में ‘शिखंडी’ की भूमिका बेहद अहम है; और रामायण की कहानियां बताती हैं कि सरयू के तट पर राम ने किन्नर और हिजड़ा समुदाय को एक खास आध्यात्मिक सम्मान का वरदान दिया था.

ये कहानियां कोई मामूली या भूली-बिसरी बातें नहीं हैं. ये उन मुख्य धार्मिक परंपराओं के केंद्र में हैं जिन्हें वाराणसी से लेकर अयोध्या तक के बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों में पूजा जाता है, वही शहर जिनका प्रचार मौजूदा सत्ताधारी दल अपने सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में जोर-शोर से करता है.

जब मुख्यधारा की परंपराओं में पहले से ही यह परंपराएं मौजूद हैं, तो एक अलग मंदिर बनाना कोई बराबरी या समावेश नहीं लाता. यह तो बिल्कुल उल्टा काम करता है. यह एक अलग ‘घेरा’ या ‘गेटो’ बना देता है. जैसा कि समाजशास्त्री और कार्यकर्ता डॉ. दाशने स्टोक्स ने सुरक्षा के नाम पर अलग-थलग करने के ढोंग पर कहा था, ‘जब हम भेदभाव को सुरक्षा या धार्मिक आजादी के नाम पर छिपाते हैं, तो हम मानवाधिकारों का मज़ाक उड़ाते हैं.’

एक अलग मंदिर बनाना ठीक यही करता है. यह ‘सुरक्षा’ और ‘अपनी जगह’ देने के बहाने सालों से चले आ रहे लैंगिक भेदभाव को छिपाता है. यह प्रस्ताव हाशिए पर पड़े लोगों को एक कोने में धकेल देता है. मानो उनसे चुपचाप कहा जा रहा हो कि वे जाकर अपनी अलग इमारत में रहें.

यह एक बेहद खतरनाक बदलाव है जब नागरिक अपने बुनियादी नीतिगत और कानूनी अधिकारों को किसी कृपालु राजा के ‘दैवीय वरदान’ के रूप में देखने लगते हैं. एक संवैधानिक लोकतंत्र में, किसी चुने हुए नेता का कानून बनाना, कल्याणकारी योजनाएं चलाना या अपनी सरकारी जिम्मेदारियां निभाना सिर्फ अपना काम करना है, वह काम जिसकी उन्होंने कसम खाई थी. वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं, कानून के दायरे में बंधे हैं और सभी सार्वजनिक जगहों पर हर किसी की पहुंच तय करने के लिए मजबूर हैं.

एक नेता को ‘भगवान’ का दर्जा देना इन बुनियादी अधिकारों को राजनीतिक मेहरबानी में बदल देता है. यह उन अधिकारों को, जिन्हें अदालतों और सड़कों पर दशकों के कड़े संघर्षों के बाद जीता गया था, एक अकेले नेता की शाही मेहरबानी और पीआर (जनसंपर्क) की जीत में बदल देता है. जब लोकतांत्रिक जवाबदेही की जगह अंधभक्ति ले लेती है, तो नेता आलोचना से ऊपर उठ जाते हैं, और आम नागरिक बुनियादी अधिकारों के बजाय राजनीतिक मेहरबानी पर निर्भर होकर रह जाते हैं.

इतिहास और पवित्र स्थानों का गलत इस्तेमाल

अगर हम इतिहास को देखें, तो आम इंसानों को भगवान का दर्जा रातों-रात प्रशासनिक घोषणाओं या राजनीतिक बोर्डों के फैसलों से नहीं मिला. यह एक लंबे समय तक चले गहरे संघर्षों से अपने आप उभरा, जो खास जगहों और दौर से जुड़े थे.

छोटा नागपुर के पठार में बिरसा मुंडा का उदाहरण लीजिए. उन्हें ‘धरती आबा’ (धरती के पिता) के रूप में इसलिए पूजा गया क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक अत्याचार और सामंती शोषण के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया, और आदिवासी समुदायों के अस्तित्व तथा ज़मीन के अधिकारों के लिए सीधे लड़ाई लड़ी.

इसकी तुलना पटना में एक मौजूदा नेता का मंदिर बनाने से कीजिए. पटना ही क्यों, उनका गृह राज्य गुजरात या उनका संसदीय क्षेत्र वाराणसी क्यों नहीं? इस जगह का चुनाव समुदाय की किसी साझी, आध्यात्मिक चेतना से नहीं जुड़ा है, यह तो स्थानीय प्रशासनिक संरक्षण और राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है.

इस बात में भी बड़ा कड़वा विरोधाभास है कि राज्य कागजों पर एक आम ट्रांसजेंडर नागरिक के साथ कैसा बर्ताव करता है और दूसरी तरफ राजनीतिक सत्ता को कैसे आसमान पर बैठा देता है.

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में आधिकारिक तौर पर लगभग 4.88 लाख ट्रांसजेंडर लोग थे. लेकिन एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी, सामाजिक न्याय मंत्रालय के प्रशासनिक आंकड़े बताते हैं कि इस आबादी के केवल एक छोटे से हिस्से, लगभग तीन प्रतिशत, को ही आधिकारिक ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र और पहचान पत्र मिल पाए हैं. सरकार किसी नागरिक की अपनी पहचान को मानने से पहले उससे लगातार सबूत, मेडिकल जांच और अंतहीन कागजी कार्रवाई मांगती है.

यह प्रशासनिक नाकामी सीधे न्याय व्यवस्था में भी झलकती है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों ने 2020 में पूरे देश में केवल 236 ट्रांसजेंडर अपराध पीड़ितों को दर्ज किया. अधिकार संगठनों का कहना है कि यह हंसी उड़ाने लायक कम संख्या सुरक्षा का सबूत नहीं है, बल्कि इस बात का सबूत है कि इस समुदाय को तंत्र देखना ही नहीं चाहता. चूंकि पुलिस स्टेशन सही पहचान पत्र न होने के कारण आज भी पुरानी सोच के तहत सिर्फ पुरुष या महिला के रूप में शिकायत दर्ज करते हैं, इसलिए ट्रांस लोगों के खिलाफ होने वाले अपराध और अत्याचार सरकारी आंकड़ों से पूरी तरह गायब हो जाते हैं.

जात-पात और पुजारी व्यवस्था की अनदेखी दीवार

चूंकि एक असली मंदिर बनाने की योजना है, तो यह केवल हवा में नहीं रह सकता. इसके लिए एक गर्भगृह, रोज़ की पूजा-पाठ और एक पुजारी की ज़रूरत होगी. यहीं आकर यह प्रस्ताव हिंदू धर्म के सदियों पुराने छुआछूत और शुद्धता-अशुद्धता के नियमों से सीधे टकराता है. भारत में मंदिर कभी भी सिर्फ आम सार्वजनिक हॉल नहीं रहे हैं, वे ऐसी जगहें रहे हैं जहां गर्भगृह में जाने और भगवान को छूने के अधिकार पर जाति के आधार पर कड़ा कब्ज़ा रहा है.

ज़रा उस दिन का नज़ारा सोचिए जब मंदिर का उद्घाटन होगा, अगरबत्तियां जलेंगी और पहली घंटी बजेगी, उस ‘देवता’ (इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) की आरती उतारने के लिए गर्भगृह में कौन खड़ा होगा?

अगर बोर्ड मंदिर को पारंपरिक मान्यता देने के लिए किसी पारंपरिक ब्राह्मण पुजारी को रखता है, तो वह मंदिर तुरंत उसी ब्राह्मणवादी सोच के आगे घुटने टेक देगा जिसने ऐतिहासिक रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय के भीतर भी दलित, बहुजन और आदिवासी समाज का अपमान किया है और उन्हें अलग रखा है. इसका मतलब यह होगा कि एक ऐसी जगह बनाई गई जो ट्रांस समाज की आज़ादी के नाम पर थी, लेकिन उसकी चाबी वापस उन्हीं पुराने ठेकेदारों के हाथ में सौंप दी गई.

दूसरी तरफ, अगर कोई गैर-ब्राह्मण या दलित ट्रांस व्यक्ति पूजा-पाठ कराने के लिए आगे आता है, तो एक नई दीवार खड़ी हो जाएगी. वाराणसी से लेकर पुरी तक के बड़े तीर्थस्थलों को नियंत्रित करने वाला कट्टरपंथी ढांचा उस गर्भगृह को तुरंत ‘अशुद्ध’ घोषित कर देगा और उसकी धार्मिक मान्यता को मानने से इनकार कर देगा. वे इस मंदिर को सिर्फ एक राजनीतिक नौटंकी ही नहीं, बल्कि धर्म-विरुद्ध मानकर खारिज कर देंगे.

यह उलझन इस बात को साफ कर देती है कि पुरानी जातियों और व्यवस्थाओं को नज़रअंदाज़ करके कोई नई शुरुआत नहीं की जा सकती, एक नई दीवार बना देने से पुरानी दीवारें ढह नहीं जातीं.

जब 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय की साक्षरता दर मुश्किल से 46% है (जो राष्ट्रीय औसत 74% से बहुत नीचे है) और काम-धंधे में उनकी भागीदारी बेहद खराब स्तर पर है, तो यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि इस समुदाय को असल में क्या चाहिए. उन्हें चालू हालत में सरकारी अस्पताल चाहिए, बिना भेदभाव के मकान चाहिए, रोज़गार के बराबर मौके चाहिए, सुरक्षित सड़कें चाहिए और उनके संवैधानिक अधिकारों का पालन चाहिए. किसी राजनीतिक सत्ता को खुश करने के लिए बनाया गया एक अलग मंदिर इनमें से एक भी काम नहीं करता.

आखिरकार, यह प्रस्ताव हमें अपने संवैधानिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की स्थिति को लेकर कुछ कड़वे सवालों के सामने ला खड़ा करता है. क्या किसी चुने हुए नेता को सिर्फ इसलिए भगवान बना देना चाहिए क्योंकि उसने संविधान के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाई? अगर हम अलग-अलग लैंगिक पहचानों के लिए अलग मंदिर स्वीकार कर लेते हैं, तो क्या हम सच में समाज में बराबरी मांग रहे हैं, या फिर हम सदियों से चली आ रही अलग-थलग करने की व्यवस्था को चुपचाप स्वीकार कर रहे हैं?

ऐसे मंदिर के गर्भगृह में कौन बैठेगा, क्या यह जाति की कठोर दीवारों को तोड़ेगा, या फिर उन्हीं पुरानी पाबंदियों को एक नए रूप में लागू कर देगा? और जब सरकारी तंत्र ट्रांसजेंडर नागरिकों से उनकी कानूनी पहचान के लिए इतने सबूत मांगता है, तो राजनीतिक सत्ता को बिना किसी सवाल के भगवान का दर्जा क्यों दे दिया जाता है?

लोकतांत्रिक जवाबदेही से उठकर नेता की भक्ति में डूबने का यह खतरनाक रास्ता हमें वापस बाबा साहेब अंबेडकर की उस ऐतिहासिक चेतावनी की याद दिलाता है जो उन्होंने देश को दी थी, ‘भारत में राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा (हीरो-वर्शिप) जिस पैमाने पर चलती है, वैसी दुनिया के किसी भी अन्य देश की राजनीति में नहीं देखी जाती… धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है. लेकिन राजनीति में, भक्ति या व्यक्ति-पूजा सीधे तौर पर अवनति और तानाशाही की ओर ले जाने वाला पक्का रास्ता है.’

(संस्कृति पांडे, जेएनयू में शोधार्थी हैं.)