नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) ने आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित की जाने वाली एक पुस्तक चर्चा को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि कार्यक्रम से जुड़ी ‘पूरी जानकारी’ उस डीन को नहीं दी गई थी, जिन्होंने छात्रों को कार्यक्रम के लिए सभागार बुक करने की अनुमति दी थी.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, ‘कार्यक्रम के बारे में पूरी जानकारी नहीं दिए जाने के कारण एसएसएस-1 सभागार की बुकिंग रद्द की जाती है.’
अपनी पोस्ट में जेएनयू ने छात्रों द्वारा एसएसएस-1 यानी स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सभागार में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए जमा किया गया फॉर्म साझा किया गया. फॉर्म में ‘उद्देश्य’ वाले स्थान पर आवेदक ने लिखा था, ‘आदिवासी दिवस के लिए सार्वजनिक परिचर्चा (पुस्तक चर्चा).’
फॉर्म से पता चलता है कि कार्यक्रम को आदिवासी दिवस के बाद पहले कार्यदिवस, 10 अगस्त को आयोजित करने की मंजूरी दी गई थी.
विश्वविद्यालय ने एक्स पर जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) की ओर से भेजा गया निमंत्रण भी साझा किया, जिसमें पुस्तक और कार्यक्रम में शामिल होने वाले अतिथियों का विस्तृत विवरण दिया गया था. इसमें जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद की पुस्तक ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’ का कवर शामिल था.
JNU is a democratic and decentralised institution. The permission was given by Dean, SSS who has taken action as well in cancelling the event.
The booking of the auditorium SSS-1 stands cancelled because of non-disclosure of the full facts about the program which is going to… pic.twitter.com/SsEsMO3muT
— Jawaharlal Nehru University (JNU) (@JNU_official_50) August 9, 2026
उल्लेखनीय है कि 2026 में प्रकाशित इस पुस्तक पर हाल के हफ्तों में व्यापक चर्चा और समीक्षाएं हुई हैं. ख़ालिद ने 2018 में इसे अपनी पीएचडी थीसिस के रूप में विश्वविद्यालय के ही इतिहास विभाग में जमा किया था, जिसे विभाग ने स्वीकार कर लिया था. बाद में ख़ालिद ने इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया.
निमंत्रण के अनुसार, एसएसएस-1 में होने वाली इस सभा में छात्रों के अलावा इतिहासकार प्रभु महापात्र और उमा चक्रवर्ती, कलाकार शुद्धव्रत सेनगुप्ता, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और स्कॉलर बानोज्योत्स्ना लाहिड़ी शामिल होने वाले थे.
एक्स पर पोस्ट की गई दो तस्वीरों से विश्वविद्यालय प्रशासन ने संकेत दिया है कि पुस्तक चर्चा के लिए सभागार बुक करने के अनुरोध वाले फॉर्म में लेखक का नाम नहीं दिया गया था. इससे संकेत मिलता है कि यदि विश्वविद्यालय को पता होता कि चर्चा ख़ालिद की पुस्तक पर है, तो कार्यक्रम को अनुमति नहीं दी जाती.
प्रशासन ने एक्स पोस्ट के साथ एक संदेश भी जोड़ा है, जिसमें लिखा है: ‘जेएनयू एक लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत संस्थान है. अनुमति एसएसएस के डीन ने दी थी, जिन्होंने कार्यक्रम रद्द करने की कार्रवाई भी की है.’ दूसरे शब्दों में सभागार के इस्तेमाल की अनुमति उसी प्रोफेसर द्वारा वापस ली जा रही है, जिन्होंने पहले इसे मंजूरी दी थी.
वहीं, जेएनयूएसयू ने एक बयान में कहा, ‘इस कार्यक्रम के लिए जगह रद्द करके जेएनयू प्रशासन ने एक बार फिर अपने छात्र-विरोधी और बौद्धिकता-विरोधी एजेंडे को उजागर किया है, जो उस स्वतंत्र विचार-विमर्श को बढ़ावा देने के बजाय आलोचनात्मक सोच को दबाने और असहमति की आवाजों को खामोश करने की कोशिश करता है, जिसकी रक्षा करना किसी विश्वविद्यालय का दायित्व है.’
बयान में प्रशासन पर ‘दोहरा मापदंड’ अपनाने का आरोप लगाया गया है. जेएनयूएसयू ने कहा कि प्रशासन एक हिंदू संगठन इस्कॉन द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की मेजबानी करता है, जबकि ‘एक वैध अकादमिक चर्चा के लिए जगह देने से इनकार’ कर रहा है.
छात्र संघ ने कहा कि सभागार बुक करने के लिए अनुमति का फॉर्म निर्धारित नियमों के अनुसार भरा गया था. बयान में कहा गया, ‘हालांकि, यह स्पष्ट रहे: कमरा रद्द करने से बातचीत रद्द नहीं होती.’
गौरतलब है कि उमर ख़ालिद सितंबर 2020 से तिहाड़ जेल में बंद हैं. वह उस साल फरवरी-मार्च में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे में कथित भूमिका के आरोप में ‘बड़ी साजिश’ के मामले में विचाराधीन कैदी हैं.
