लोकतंत्र का स्थापत्य और आंबेडकर की प्रासंगिकता

पुस्तक समीक्षा: प्रोफेसर रतन लाल की ‘आंबेडकर और संसदीय लोकतंत्र’ को केवल अतीत के किसी महान विचारक के लेखन का संकलन मानना इसके महत्व को कम करके देखना होगा. आज जब लोकतंत्र को चुनावी बहुमत के साथ लगभग समानार्थी मान लेने का ख़तरा बढ़ रहा है, तब आंबेडकर हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा चुनाव के दिन नहीं, बल्कि उन दिनों में होती है जब सत्ता को अपनी ही सीमाओं का सम्मान करना होता है.

प्रोफेसर रतन लाल द्वारा संकलित ‘आंबेडकर और संसदीय लोकतंत्र.’ (फोटो साभार: राजपाल एंड संस)

बीते कुछ दिनों से हमारे विश्वविद्यालय के सहकर्मी रतन लाल जी द्वारा संकलित ‘आंबेडकर और संसदीय लोकतंत्र’ पढ़ रहा हूं. यह उन पुस्तकों में है जिन्हें पढ़ते हुए केवल उनके विषय से नहीं, बल्कि उस बौद्धिक श्रम से भी संवाद होता है जो उन्हें संभव बनाता है. अलग-अलग स्थानों पर बिखरी हुई सामग्री को एक संगति, एक वैचारिक क्रम और एक केंद्रीय प्रश्न के इर्द-गिर्द जिस तरह इस पुस्तक में पिरोया गया है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है.

पुस्तक की प्रस्तावना में आनंद तेलतुंबड़े की यह पंक्ति—‘जनतंत्र भावनाओं से नहीं बल्कि स्थापत्य से बचाया जा सकता है’—पूरी पुस्तक को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी देती है. यह वाक्य केवल लोकतंत्र की संस्थागत संरचना की ओर संकेत नहीं करता, बल्कि उस गहरी आंबेडकरवादी चिंता को भी सामने लाता है जिसमें लोकतंत्र को किसी अमूर्त नैतिक आदर्श के बजाय एक जीवित सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के रूप में देखा गया है.

ऐसी व्यवस्था, जिसे केवल अच्छे लोगों की सदिच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता; जिसे संस्थाओं, अधिकारों, प्रक्रियाओं और सत्ता पर अंकुश लगाने वाली संवैधानिक व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है. यहीं से रतन लाल का यह संकलन अपने समय से संवाद करने लगता है.

आंबेडकर को हम अक्सर संविधान-निर्माता के रूप में याद करते हैं, लेकिन उनके विचारों का एक उतना ही महत्वपूर्ण पक्ष संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली और उसकी सामाजिक पूर्वशर्तों से जुड़ा है. उनके लिए लोकतंत्र केवल सरकार बनाने की एक पद्धति नहीं था. वह जीवन जीने की एक पद्धति था, एक ऐसा सामाजिक अनुबंध जिसमें व्यक्ति की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता को बहुमत की इच्छा से ऊपर नैतिक और संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो.

आंबेडकर की चिंता इसलिए केवल यह नहीं थी कि सत्ता किसके हाथ में है; उनकी चिंता यह भी थी कि सत्ता को किस प्रकार सीमित किया गया है, संस्थाएं कितनी स्वायत्त हैं, विपक्ष के लिए कितनी जगह बची है, संसद में असहमति का कितना सम्मान है और समाज में वे कौन-सी असमानताएं मौजूद हैं जो लोकतंत्र के औपचारिक ढांचे को भीतर से खोखला कर सकती हैं.

यही कारण है कि ‘आंबेडकर और संसदीय लोकतंत्र’ को केवल अतीत के किसी महान विचारक के लेखन का संकलन मानना इस पुस्तक के महत्व को कम करके देखना होगा. यह पुस्तक हमारे वर्तमान को पढ़ने का भी एक औज़ार उपलब्ध कराती है. आज जब लोकतंत्र को चुनावी बहुमत के साथ लगभग समानार्थी मान लेने का खतरा बढ़ रहा है, तब आंबेडकर हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा चुनाव के दिन नहीं, बल्कि उन दिनों में होती है जब सत्ता को अपनी ही सीमाओं का सम्मान करना होता है.

आंबेडकर का लोकतंत्र इसलिए बहुमत का शासन भर नहीं है; वह बहुमत की शक्ति पर संवैधानिक मर्यादा का भी नाम है. संसद इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह केवल सरकार को बहुमत प्रदान करती है, बल्कि इसलिए भी कि वह सरकार से प्रश्न पूछ सकती है, उसे जवाबदेह बना सकती है और असहमति को संस्थागत रूप दे सकती है. इसी अर्थ में संसदीय लोकतंत्र का स्वास्थ्य केवल सरकार की स्थिरता से नहीं, बल्कि विपक्ष की गरिमा, बहस की गुणवत्ता और संस्थागत प्रतिरोध की क्षमता से भी मापा जाना चाहिए.

इस संदर्भ में रतन लाल का संकलन एक और महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रखता है— क्या संवैधानिक स्थापत्य अपने आप लोकतंत्र की रक्षा कर सकता है? शायद नहीं. स्थापत्य आवश्यक है, लेकिन उसके भीतर काम करने वाली लोकतांत्रिक संस्कृति भी उतनी ही आवश्यक है.

आंबेडकर स्वयं संवैधानिक नैतिकता को लेकर जिस आग्रह के साथ सामने आते हैं, उसका अर्थ यही है कि संविधान केवल संस्थाओं का नक्शा नहीं है; वह सत्ता और नागरिक के बीच व्यवहार की एक नैतिक व्याकरण भी है.

आज इस पुस्तक को पढ़ने का अर्थ इसलिए आंबेडकर को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनसे असुविधाजनक प्रश्न पूछना और अपने समय से असुविधाजनक प्रश्न पूछवाना है. लोकतंत्र की रक्षा कौन करेगा? संस्थाएं, नागरिक समाज, संसद, न्यायपालिका, विपक्ष—या इन सबके बीच निर्मित वह संवैधानिक संस्कृति, जिसके बिना सबसे सुंदर स्थापत्य भी धीरे-धीरे केवल एक इमारत में बदल सकता है?

शायद इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह आंबेडकर को स्मृति से निकालकर बहस में वापस लाती है. और ऐसे समय में जब लोकतंत्र के स्थापत्य की मजबूती को लेकर गंभीर प्रश्न हमारे सामने हैं, आंबेडकर को बहस में वापस लाना केवल बौद्धिक आवश्यकता नहीं, लोकतांत्रिक आवश्यकता भी है.

(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)