नई दिल्ली: 14 अगस्त को जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल असम में आई बाढ़ के विकराल रूप लेने की वजह जलवायु परिवर्तन के कारण हुई भारी बारिश नहीं, बल्कि खराब बाढ़ प्रबंधन और पर्यावरणीय क्षरण जैसे मानवीय कारक थे. इनमें नदियों के किनारे पक्के तटबंधों का निर्माण जैसे कदम शामिल हैं
इस रिपोर्ट को वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (डब्ल्यूडब्ल्यूए) से जुड़े वैज्ञानिकों ने तैयार किया है. डब्ल्यूडब्ल्यूए एक अंतरराष्ट्रीय समूह है, जो यह अध्ययन करता है कि एक्स्ट्रीम मौसम की घटनाओं में जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका है. हालांकि यह रिपोर्ट अभी पीयर-रिव्यू नहीं हुई है, लेकिन इसमें पीयर-रिव्यू की गई मौसम संबंधी एट्रिब्यूशन पद्धतियों का इस्तेमाल किया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में बाढ़ से निपटने की रणनीति में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को फिर से प्राकृतिक स्थिति में लाना, वेटलैंड का संरक्षण और स्थानीय स्तर पर शुरुआती चेतावनी प्रणाली के साथ आपदा जोखिम प्रबंधन को मजबूत करना शामिल होना चाहिए.
जलवायु परिवर्तन का कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं
इस साल जून और जुलाई में असम में आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है. अब तक करीब 100 लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 45,000 हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हुई है. बाढ़ के कारण हजारों लोग विस्थापित हुए हैं. अनुमानों के मुताबिक, बाढ़ से 1.5 लाख से लेकर 7 लाख तक लोग विस्थापित हो सकते हैं.
आज कई एक्सट्रीम मौसम की घटनाओं के होने की संभावना मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ गई है. उदाहरण के लिए, कम समय में असामान्य रूप से भारी बारिश होना जलवायु परिवर्तन का एक उदाहरण है.
यह पता लगाने के लिए कि इस साल असम में आई बाढ़ के पीछे मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की भूमिका थी या नहीं; भारत, स्वीडन, नीदरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका के डब्ल्यूडब्ल्यूए से जुड़े वैज्ञानिकों ने भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) समेत विभिन्न स्रोतों के अवलोकन संबंधी आंकड़ों, ऐतिहासिक मौसम रिकॉर्ड और जलवायु मॉडलों का विश्लेषण किया.
वैज्ञानिकों ने जून-जुलाई-अगस्त के दौरान तीन दिनों में हुई अधिकतम बारिश और जून से सितंबर के बीच 30 दिनों में हुई अधिकतम बारिश पर ध्यान केंद्रित किया.
अध्ययन में ऊपरी असम में ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों के साथ-साथ पड़ोसी नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के इलाकों को भी शामिल किया गया.

टीम ने पाया कि इन महीनों में ऊपरी असम में हुई बारिश असामान्य नहीं थी. किसी भी वर्ष इतनी बारिश होने की संभावना करीब 67% थी और इस स्तर की बारिश हर 1.5 साल में एक बार होने की उम्मीद की जा सकती है. यह बात रिपोर्ट की लेखकों में शामिल इंपीरियल कॉलेज लंदन के सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल पॉलिसी की वैज्ञानिक मरियम जकारिया ने कही.
13 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जकारिया ने कहा, ‘जब हमने अवलोकन संबंधी नतीजों को जलवायु मॉडलों के साथ मिलाकर देखा, तो दोनों तरह की घटनाओं में भी जलवायु परिवर्तन का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला. हालांकि, हम इस बात पर जोर देना चाहेंगे कि गर्म होते वातावरण में सामान्य तौर पर अधिक नमी रहने और बारिश के रूप में उसके गिरने की संभावना को देखते हुए इस क्षेत्र में अत्यधिक बारिश को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं पर और शोध की जरूरत है.’
मानवीय गतिविधियां और खराब प्रबंधन
टीम ने असम में बाढ़ के जोखिम और उसके प्रभाव को प्रभावित करने वाले कारकों पर तेजी से आकलन भी किया. इसमें लोगों की बाढ़ के प्रति संवेदनशीलता, बाढ़ की चपेट में आने का जोखिम और उससे निपटने की क्षमता को देखा गया.
रिपोर्ट की लेखकों में शामिल रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर की स्नेहा गांगुली ने कहा, ‘इस घटना के पीछे कई ऐसे कारक थे, जो बाढ़ के मौसम संबंधी कारणों से कहीं आगे थे.’
टीम ने पाया कि इस आपदा का व्यापक असर मुख्य रूप से कई अन्य मानवीय कारकों से जुड़ा था. इनमें औपनिवेशिक दौर के भूमि संबंधी नियम, विस्थापन, भूमि का क्षरण और बाढ़ से बचाव के पर्याप्त उपायों का अभाव शामिल हैं.
रिपोर्ट में कहा गया, ‘भूमि के इस्तेमाल में बदलाव से प्राकृतिक रूप से मौजूद जोखिम काफी बढ़ जाता है. 35 अध्ययनों की समीक्षा से पता चलता है कि अनियोजित शहरीकरण, वनों की कटाई, खराब जल निकासी, बाढ़ प्रबंधन के अपर्याप्त ढांचागत उपाय और मानव गतिविधियों से हुए अन्य बदलाव अब बाढ़ की आवृत्ति को समझाने में प्राकृतिक बारिश में होने वाले उतार-चढ़ाव से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. इन बदलावों के कारण वेटलैंड्स नष्ट हुई हैं, नदी के किनारों का कटाव बढ़ा है और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था बाधित हुई है. इससे बाढ़ की गंभीरता और निचले इलाकों पर उसका प्रभाव बढ़ गया है.
गांगुली ने कहा कि असम ने तटबंधों, शहरों की सुरक्षा के लिए दीवारों, सड़क-सह-तटबंधों और वेटलैंड्स के पुनरुद्धार जैसे ढांचागत बाढ़ नियंत्रण उपायों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है. हालांकि, मजबूत तटबंधों और कंक्रीट आधारित इंजीनियरिंग पर निर्भरता अकेले बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है.
‘नदियों को नियंत्रित करने के बजाय उनके साथ काम करें’
गांगुली ने कहा, ‘इसलिए भविष्य में बाढ़ से निपटने की रणनीति में नदियों को नियंत्रित करने के बजाय उनके साथ काम करने पर अधिक ध्यान देना होगा. इसके लिए लक्षित इंजीनियरिंग उपायों के साथ बाढ़ के मैदानों को प्राकृतिक स्थिति में वापस लाना, वेटलैंड्स का संरक्षण, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण को कम करना, बेहतर जल निकासी और समुदायों की तैयारियों को जोड़ना होगा.’
इंपीरियल कॉलेज लंदन के सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल पॉलिसी में जलवायु विज्ञान की प्रोफेसर फ्रीडेरिके ओटो ने एक बयान में कहा, ‘जलवायु परिवर्तन ज्यादातर भारतीयों के लिए जीवन को मुश्किल बना रहा है, लेकिन हर आपदा जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं होती. असम में हुई विनाशकारी बाढ़ के पीछे अत्यधिक मानवीय जोखिम, पर्यावरणीय क्षरण और बुनियादी ढांचे की सीमाएं प्रमुख कारण थे.’
द वायर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि नई बांध परियोजनाओं, नए जलाशयों और अवैध खनन व वनों की कटाई के कारण पहले से अस्थिर इलाकों में निर्माण ने इस साल असम में आई बाढ़ के प्रभाव को और गंभीर बना दिया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
