स्वतंत्रता दिवस: नगालैंड में छात्र और चर्च संगठनों ने ‘वंदे मातरम’ गाने का विरोध किया

नगालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल ने कहा कि वह ऐसे किसी भी निर्देश या प्रथा के ख़िलाफ़ है, जिसका उद्देश्य नागरिकों, खासकर ईसाइयों को वंदे मातरम गाने के लिए बाध्य करना हो. इससे पहले नगा छात्र संगठनों ने वंदे मातरम गायन अनिवार्य किए जाने का विरोध करते हुए स्कूलों और शिक्षण संस्थानों से कहा था कि वे 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में छात्रों को न भेजें.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: नगालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (एनबीसीसी) ने केंद्र सरकार के उस आदेश का विरोध किया है, जिसमें भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाले आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के संशोधित संस्करण को बजाने या गाने का निर्देश दिया गया है.

चर्च संगठन का यह विरोध नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) की उस अपील के बाद सामने आया है, जिसमें स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों से कहा गया था कि वे स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए अपने छात्रों को न भेजें. छात्र संगठन ने यह भी कहा था कि जो छात्र ‘अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के आधार पर’ वंदे मातरम गाने से इनकार करते हैं, उनके खिलाफ न तो अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए और न ही उनके साथ किसी तरह का भेदभाव किया जाना चाहिए.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार (13 अगस्त) की शाम जारी एक बयान में एनबीसीसी ने कहा कि वह ऐसे किसी भी निर्देश या प्रथा के खिलाफ है, जिसका उद्देश्य नागरिकों, खासकर ईसाइयों को वंदे मातरम गाने के लिए बाध्य करना हो. संगठन ने कहा कि देशभक्ति स्वेच्छा से भागीदारी और राष्ट्र के प्रति साझा प्रेम से पैदा होनी चाहिए, न कि किसी तरह की बाध्यता से.

साथ ही, चर्च संस्था ने सभी संबंधित पक्षों से शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से अपना पक्ष रखने का आह्वान किया और चेतावनी दी कि राष्ट्रीय प्रतीकों या देशभक्तिपूर्ण प्रथाओं पर असहमति सांप्रदायिक तनाव या सामाजिक विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए.

एनबीसीसी ने कहा कि वह भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों, देशभक्ति की भावनाओं और संविधान के मूल्यों का पूरी तरह सम्मान करता है. हालांकि, उसने जोर देकर कहा कि आस्था, अंतरात्मा, धार्मिक विश्वास और गहराई से जुड़ी पहचान से संबंधित मामलों में ‘अत्यंत संवेदनशीलता, विवेक और सम्मान’ बरता जाना आवश्यक है.

एनबीसीसी ने कहा, ‘नागरिकों को किसी ऐसी अभिव्यक्ति में भाग लेने के लिए मजबूर करके राष्ट्रीय एकता मजबूत नहीं की जा सकती, जिसे वे आस्था या अंतरात्मा के कारण स्वीकार करने में सक्षम न हों.’ संगठन ने केंद्र को याद दिलाया कि भारत एक बहुलतावादी और विविधतापूर्ण राष्ट्र है.

संगठन ने आगे कहा, ‘भारत की एकता तब सबसे मजबूत होगी, जब हर नागरिक – चाहे वह किसी भी आस्था, समुदाय, संस्कृति या विचारधारा से जुड़ा हो – पूरे विश्वास के साथ यह कह सके कि राष्ट्र में उसके लिए उचित स्थान है और उसकी अंतरात्मा का सम्मान किया जाएगा.’

छात्र संगठनों ने स्कूलों से अपील की थी- स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रमों में छात्रों को न भेजें

नगालैंड के प्रभावशाली छात्र संगठन नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ और आओ स्टूडेंट्स कॉन्फ्रेंस (एकेएम) ने अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले स्कूलों और शिक्षण संस्थानों से कहा है कि वे 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में छात्रों को न भेजें.

संगठनों ने सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के संशोधित संस्करण को अनिवार्य रूप से बजाने या गाने को लेकर चिंता जताई है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने कहा कि राष्ट्रगीत के पूरे संस्करण में शामिल कुछ बातें देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं.

एनएसएफ ने अपने संबद्ध संगठनों और अधीनस्थ इकाइयों को निर्देश दिया है कि जब तक संशोधित राष्ट्रगीत को गाने को अनिवार्य करने वाला आदेश वापस नहीं लिया जाता, तब तक वे शैक्षणिक संस्थानों को स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में छात्रों को भेजने से रोकें.

एक बयान में संगठन ने कहा कि उसे स्वतंत्रता दिवस मनाने या राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उचित सम्मान प्रदर्शित करने पर कोई आपत्ति नहीं है.

हालांकि, फेडरेशन ने कहा कि उसकी चिंता ‘वंदे मातरम’ में छात्रों की अनिवार्य भागीदारी को लेकर है, खासकर तब जब इसकी भक्तिपूर्ण और धार्मिक कल्पना गैर-हिंदू समुदायों के छात्रों की अंतरात्मा के साथ टकराती है.

ईसाई बहुल राज्य नगालैंड के इस संगठन ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है और संविधान हर नागरिक को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है. इसलिए किसी भी छात्र को ऐसी धार्मिक रूप से संवेदनशील अभिव्यक्ति में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, जो उसकी व्यक्तिगत मान्यताओं के विपरीत हो.

नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, आओ स्टूडेंट्स कॉन्फ्रेंस ने भी एक अलग अधिसूचना जारी किया, जो मोकोकचुंग जिले में उसके अधिकार क्षेत्र के स्कूलों और शिक्षण संस्थानों पर लागू होता है.

एकेएम ने संस्थानों से कहा कि वे 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस समारोहों में छात्रों को ‘अगले निर्देश तक’ न भेजें. संगठन ने ‘वंदे मातरम’ में अनिवार्य भागीदारी और छात्रों की अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धार्मिक विश्वास की रक्षा की आवश्यकता को लेकर ऐसी ही चिंताएं जताईं.

28 जनवरी के एक आदेश में गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगीत के गायन को लेकर पहली बार विस्तृत प्रोटोकॉल जारी किए थे. इसमें निर्देश दिया गया था कि ‘वंदे मातरम’ के छह छंद राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्रीय ध्वज फहराने और राज्यपालों के भाषण जैसे आधिकारिक कार्यक्रमों में गाए जाएंगे.

इस बीच, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार (11 अगस्त) को उस विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसके तहत राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन को जानबूझकर बाधित करने या उसे रोकने को अपराध बनाया गया है. इस कानून के बाद राष्ट्रगीत को वही कानूनी संरक्षण प्राप्त हो गया है, जो वर्तमान में राष्ट्रगान को हासिल है.