आज़ाद-ख़याली का मतलब क्या है? भाषा, वर्चस्व और हमारी गुलामी के सवाल

कैसी विडम्बना है. एक ओर तो आज़ादी की धारणा के साथ अपनी मिट्टी, हवा, पानी और इतिहास की बात जुड़ी है, वहीं जब संभ्रांत तबके अपनी ज़बान और संस्कृति हम पर थोपते हैं, हम एक गुलामी से आज़ाद होकर दूसरी गुलामी में जकड़े जाते हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है पांचवीं क़िस्त.

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मुझसे प्यार करती
ऐ पर-जात की कुड़िए
हमारे सगे मुर्दे भी
एक स्थान पर नहीं जलाते.
– (‘जात’: लाल सिंह दिल)

आज़ादी के मायने क्या? इंसान का वजूद ही ऐसा है कि दूसरे जानवरों से अलग हमारे अंदर आज़ादख़याली की लौ धधकती रहती है. हो सकता है कि और जानवरों में मौजूद आज़ादी के एहसास के बारे में हमें पूरी समझ नहीं है. इतना तो है कि हम पालतू और जंगली जानवरों में फ़र्क करते हैं. पालतू होना गुलामी है, जबकि जंगली होना आज़ादी है. ऐसे वक़्त जब फासीवादी विचारधारा के वर्चस्व में कुछेक ‘जंगली’ मीडिया संस्थान विचारों की दुनिया को ज़िंदा रखने के लिए दम-ब-दम जद्दो-ज़हद में हों, ज़ाहिर है कि आज़ाद-ख़याली को दमन-तंत्र के बरक्स रखने की कोशिश ही एकमात्र मानीख़ेज़ बात लगती है. पर क्या वाक़ई ऐसा है?

मुल्क में इस वक़्त तरक़्क़ीपसंद कहलाती बेशुमार ताकतें हैं. सैंकड़ों मजदूर संगठन हैं, दर्जनों लेखक, युवा, छात्र संगठन हैं. हर संगठन फासीवाद के खिलाफ ख़यालों की जंग में खुद को दूसरे से बेहतर मानता है. यह एक तरह की आज़ादी है कि अपने-अपने दायरे में ये सभी एक दूसरे के खिलाफ ज़हर उगलते हुए चुनाव लड़ते हैं. फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में संगठित ये लोग एक दूसरे के साथ मिलकर काम नहीं कर सकते, पर निहायत ही अनजान दो लोगों की पुकार पर वे सब साथ मुखर हो जाते हैं. जब भी दमनतंत्र के खिलाफ वंचितों को संगठित कर व्यापक प्रतिरोध हुआ है, वह तरक़्क़ीपसंद संगठनों की कोशिश से ही मुमकिन हुआ है. इसके बावजूद एक साथ न रहकर परस्पर एक दूसरे पर कीचड़ उछालना, अपने समझौतों से आंखें मूंद कर बस दूसरों की समझौता-परस्ती पर शोर मचाते रहना आज़ादी तो है, पर क्या इसे सकारात्मक या मानीख़ेज़ आज़ादी कहा जा सकता है?

जैसा कि ऊपर लाल सिंह दिल की चार लाइनों की कविता कहती है, हर किसी के तस्व्वुर में आज़ाद-ख़याल होने के मायने एक जैसे नहीं होते. कहीं मैंने भी लिखा है – ‘कहां वह प्रेरणा, जिसे उत्सर्ग करूं उत्तेजना / कहां वह महान, जिसमें आंसू नहीं, वह आख्यान/ श्लोक-मंत्र तुम्हारे, सुनकर कानों में सीसा, (यह) भाग हमारे.’ और इसी तरह दिल की एक और कविता ‘मां-भूमि’ में कवि देशभक्ति की उस धारणा पर सवाल उठाता है जिसके वर्चस्व से तरक़्क़ीपसंद तबके भी आज़ाद नहीं हैं. चाहे ‘खजानों के सांप’ जैसा भी गीत गाते रहें, यह मुल्क दरअसल ‘सोने की चिड़िया’ तो नहीं है, ज़्यादातर लोगों के लिए कभी भी नहीं रहा, पर जैसी भी है, यह मां-भूमि है.

इसलिए ज्योतिबा फुले मुल्क में बेइंतहा ज़ुल्म और नाइन्साफी के रहते भी पुर-उम्मीद भविष्य के लिए ‘गुलामगिरी’ लिखकर लोगों में जागृति फैलाते हैं. फुले जानते थे कि इंसान को आज़ादी तभी मिलेगी जब वह संज्ञान के स्तर पर गुलामी की बेड़ियां तोड़ कर कायनात को समझने की कुदरती क़ाबिलियत बढ़ा पाएगा. इसलिए उन्होंने ज़बान पर संभ्रांत तबकों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए लोगों की ज़बान में लिखा.

ज़बान से हमारा मतलब महज हिन्दुस्तानी ज़बानों से नहीं है. हर सच, और सच की खोज में लिया गया हर कदम, एक माहौल और नज़रिए से जुड़ा होता है. आज़ादी हमें सच की तलाश में आगे बढ़ाती है. यह तलाश उस माहौल में ही मुमकिन है जो दिल के शब्दों में ‘मेरी बूढ़ी मां के फीके रंग के बालों जैसे भी हो तो भी मैं तुझसे (मां-भूमि से) प्यार करता’ – यानी संज्ञान उस ज़बान में खिलता है जो अपनी ज़मीन से जुड़ी होती है, जो मां की कोख में रहते से हमें मिली होती है. मानीख़ेज़ तर्कशीलता जो हमें जीवन को समझने की राह पर ले चलती है, वह इस माहौल से अलग नहीं पनपती है. सच की ओर उठाए कदम मूर्त तजुरबों से बिल्कुल अलग सिर्फ अमूर्त चिंतन में नहीं बढ़ते. यानी अपनी ज़बान से इतर हर कहीं से ज्ञान पाना ज़रूरी है, पर अपनी ज़बान में महारत न होने से वह ज्ञान न केवल अधूरा रह जाता है, बल्कि इससे भी बदतर यह कि अक्सर यह ज्ञान नहीं, महज राय होती है, जो स्वार्थी ताकतवर तबकों के वर्चस्व के साथ हम पर हावी हो जाती है. इसलिए जंग-लड़ाई-मार में शामिल लोगों मे ‘ज़ोंबी’ जैसा जुनून दिखता है और वे रोबोट की तरह खंदकों-खाइयों में छलांगें लगाते रहते हैं.

कोई कह सकता है कि ऐसे तो हर इंसान का अलग माहौल हो सकता है, हर मां की अपनी अलग कोख है, तो क्या हर किसी का अपना अलग सच होगा? ऐसा नहीं है, बेशक हर किसी की आज़ादी अलग है. आज़ादी को भी एक हद तक परिभाषाओं से आज़ाद होना है, पर आज़ाद ज़ेहन हमें अपने और समाज के प्रति ज़िम्मेदार बनाता है. आज़ाद ज़ेहन में अपनी ज़िम्मेदारी का जो गहरा एहसास होना चाहिए, बनावटी और तथाकथित अग्रणी पर ग़ैर-ज़बानों में मिली सूचनाएं हमें उससे अलग कर देती हैं.

कैसी विडम्बना है. एक ओर तो आज़ादी की धारणा के साथ अपनी मिट्टी, हवा, पानी और इतिहास की बात जुड़ी है, वहीं जब संभ्रांत तबके अपनी ज़बान और संस्कृति हम पर थोपते हैं, हम एक गुलामी से आज़ाद होकर दूसरी गुलामी में जकड़े जाते हैं. आज़ादी की लड़ाई के दौरान हिन्दुस्तानी ज़बानों की बात बढ़-चढ़ कर की गई, पर कहीं संस्कृतनिष्ठ तो कहीं अरबी-फारसी वाली ज़बान को बढ़ाया गया और ज़िंदा ज़बानों में सदियों से मौजूद ज्ञान को हाशिए पर धकेल कर बनावटी अल्फ़ाज़ गढ़े गए, जिन्हें कोई नहीं बोलता. यह किंवदंती नहीं है कि धरती पर दीगर इलाक़ों की तरह हमारे मुल्क में भी लोगों ने तरह-तरह की खोजें कीं, ज्ञान-विज्ञान के अनगिनत पड़ाव पार किए. आज हमारे लेखक संगठनों में इतनी ऊर्जा होनी चाहिए कि बनावटी गढ़ी ज़बानों की जगह लोगों के बीच से उन ज़बानों को वापस लाएं, जिनमें जीवन छलकता है. जो कामगारों और कारीगरों की, औरतों और बच्चों की ज़बानें हैं. लोग तो अपने ढंग से लड़ते रहे हैं, संस्कृत के वर्चस्व के बरक्स भक्ति साहित्य के लंबे इतिहास में ज़मीनी ज़िन्दा ज़बानों में कायनात और कुदरत के रहस्यों पर बातचीत होती रही है. ‘पोथी पढ़-पढ़’ या ‘पढ़-पढ़ इल्म हज़ार किताबां’ का आक्षेप ज्ञान पर चोट नहीं, बल्कि उस बनावटी ज़बान पर हमला था, जिसमें प्रेम तक शास्त्रीय और बेजान है.

क्या यह मुमकिन है कि इस मुल्क में जहां सिर्फ अंग्रेज़ी पढ़ने-लिखने वालों की एक बड़ी जमात तैयार हो चुकी है, जहां किसी भी इलाक़े में आम लोगों की ज़बान जाने बिना ज़िंदगी भर अच्छी कमाई वाली नौकरी पर क़ायम रहा जा सकता है, और साथ ही ज़मीनी ज़बानों को दरकिनार कर बनावटी राजभाषा गढ़ी गई, वहां आज़ाद-ख़याली या किसी भी और जीवन-मूल्य पर कोई मतलब की बात हो भी सकती हो?

क्या महज अंग्रेज़ी में मुक्तिकामी साहित्य पढ़कर, या संस्कृत श्लोकों का मंत्रोच्चार कर, बार-बार उनका संदर्भ देते हुए बात करने भर से आज़ाद-ख़याल हुआ जा सकता है? मसलन आंतोनिओ ग्रामशी की कुछ बातें इंग्लिश-वालों की चर्चाओं में अक्सर सुनने में आती हैं – शासक वर्ग अपने खास नज़रिए को कुदरती, सार्वभौमिक और कॉमन सेंस के तौर पर पेश कर वंचित वर्गों की सहमति हासिल करते हैं. ठीक वैसे ही, जैसे आज कोई भी हमें ज़बरन भारत माता की जय से लेकर जय श्री राम कहने या वंदे मातरम गाने को मजबूर कर देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांट सकता है. शिक्षा, मीडिया और धर्म जैसी संस्थाओं के ज़रिए, हुक़ूमत कुछ खास मूल्यों- जैसे मेरिट, उपभोक्तावाद या तथाकथित संस्कारी मूल्यों को- सामान्य बनाती है, और दूसरे विकल्प हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं. इससे ताकतवर तबकों के हितों को सामूहिक भलाई मान लिया जाता है, और दमन के बिना ही सामाजिक व्यवस्था और गैर-बराबरी बनी रहती है. जब ये मूल्य कुदरती शक़्ल अख्तियार कर लेते हैं, तो असहमति को अतार्किक या आतंकवाद कह दिया जाता है, जिससे मौजूदा सत्ता की स्थिरता और मज़बूत होती है.

स्कूलों, मीडिया और धर्म के ज़रिए सहमति तैयार की जाती है, जिससे मौजूदा हालात स्वाभाविक और ज़रूरी लगने लगते हैं. ये बातें वाजिब ही नहीं, सही जगह पर और सटीक चोट करती हैं. पर यह शासक वर्ग कौन है, जिसके नज़रिए को थोपा जा रहा है? किसके ऊपर थोपा जा रहा है? जिस पर भी यह ज़बर होता है, कुदरती तौर पर उसके अंदर आज़ादी की जंग छिड़ चुकी होती है – यह शाश्वत और कुदरती क़ायदा है.

ग्राम्शी या अमेरिका के काले (ब्लैक) लोगों की कहानी-कविताएं पढ़कर फासीवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ बेहतर समझ ज़रूर बनती है, पर ये बातें इंग्लिशवालों के वर्चस्व के खिलाफ भी एक जैसी ही लागू होती हैं. कुछ ऐसी ही पीर कभी मुझे यह सोचने को मजबूर कर गई थी कि अंग्रेज़ी पढ़ना-लिखना और इंग्लिश-वाला होना दो अलग बातें हैं :

‘टोनी मॉरिसन इंग्लिशवालों के खिलाफ लिखती है/
इंग्लिशवाला होता हूं जब जाति-संघर्ष की बात करते हुए मैं ‘बड़े कवियों की कविताएं पढ़ता हूं;/
अंग्रेज़ी बोलना और इंग्लिशवाला होना दो अलग बातें होती हैं/
इंग्लिशवाले चिल्लाते हैं कि टोनी मॉरिसन अंग्रेज़ी में लिखती है, पर सचमुच वह इंग्लिशवालों के खिलाफ लिखती है/
मसलन दुनिया के तमाम मुल्कों में इंग्लिशवालों के खिलाफ जिहाद छिड़ा है/
इंग्लिशवाले हिंदी, स्वाहिली, कोंकणी या इस्पानी ही नहीं, अंग्रेज़ी में भी बेताबी से इस कोशिश में हैं कि हम उनकी इंग्लिशवाला होने की पहचान कर लें/
वे दुनिया की हर भाषा में हमें सीख देते हैं/
कि हमारी भाषा में हम कुछ पढ़े न पढ़ें/
पर उनकी अंग्रेज़ी हम ज़रूर पढ़ें ….

अंग्रेज़ी में ही लोकप्रिय एक गीत के शब्दों में कहें तो सवाल यह है कि आप किस ओर खड़े हैं (ह्विच साइड आर यू ऑन?) या और संजीदा लहजे में मुक्तिबोध को पढ़ें कि ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ इंग्लिशवालों के वर्चस्व में हमारे हिटलर के खिलाफ ढूंढकर ऐसा नायक खड़ा किया गया है जिसकी सरकार ने सचेत रूप से आज़ादी के सालों बाद मुल्क की ज़बानों को हाशिए पर रखा, और आम लोगों के साथ खड़ी एक लोकतांत्रिक चुनावों से बनी प्रांतीय सरकार का तख्ता पलटा. यह केवल मौलिकता का अभाव मात्र नहीं है, यह ‘पार्टनर’ की अपने ढंग की ‘पॉलिटिक्स’ है.

जर्मन दार्शनिक हाना आरेंट की एक किताब के एक शीर्षक से एक मुहावरा दुनिया भर में मशहूर हुआ है- ‘बनालिटी ऑफ ईविल’. आरेंट ने देखा कि नात्सी अपराधी चुपचाप, बिना किसी जज़्बाती दिक़्क़त के यहूदी लोगों पर हो रहे ज़ुल्मों को मानते रहे, जैसे कि यह एक आम-सी बात थी, सोचने या परेशान होने लायक कोई बात नहीं थी. इस को उसने ईविल यानी बुराई का आमफ़हम होना कहा. उसने समझाया कि चुप्पी को तटस्थता नहीं बल्कि मिलीभगत माना जाना चाहिए. इसलिए रघुवीर सहाय के साथ पूछना तो पड़ेगा कि ‘कौन वह भारत-भाग्य-विधाता है/ फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है’ या अली सरदार जाफ़री के साथ गाना होगा ‘कौन आज़ाद हुआ? किस के माथे से सियाही छूटी’.

आज की तानाशाही से लड़ते हुए हम कैसे भूल सकते हैं कि आज़ादी पर हमेशा से ही वाजिब सवाल उठते रहे हैं. ख़ास तौर पर खुद को वैज्ञानिक सोच से लैस मानने वाले ऐसी भूल कैसे कर सकते हैं?

आज़ादख़याली हमें उस वर्चस्व को चुनौती देने का साहस देती है, जिसकी बात ग्रामशी ने की थी. इस चुनौती के साथ हम आगे बढ़ते हैं तो सरहदें मिट जाती हैं और हम समझने लगते हैं कि दरअसल पूरी दुनिया में इंसानियत गुलामी के पंजों में जकड़ी हुई है. यानी खुद को आज़ाद राहों पर ले चलना अपने साथ पूरी दुनिया को उन राहों पर ले चलना है. इसी आज़ादी की तड़प और हसरत हर किसी में है. अगर यह साफ दिखती नहीं है, उसकी वजह यह है कि लोग दूसरे तरीकों से इसे पेश करते हैं. वह फ़िल्मी परदों से उतरकर प्रतिरोध के मैदान में समवेत गालियों में दिखती है, जिससे जूझने के लिए तानाशाह को कैसे-कैसे नाटक खेलने पड़ते हैं.

अचानक ही हम जानने लगते हैं कि अब तक आम बोलचाल में अंग्रेज़ी में दी जा रही गालियां वही हैं जिनको हिन्दुस्तानी में कहना हमें अश्लील लगता था. जब हम अपनी गुलामी को लेकर खुद से झूठ बोलना बंद कर देते हैं और एक मजबूर ज़िन्दगी जीते हैं, तो निराशा ही बचती है. हम मायूस तक होना भूल जाते हैं. लफ्ज़ ‘हैरानी’ विलुप्त हो जाता है और ‘अचरज’ कायनात के छोर पर होता है कि छलांग लगाए. उदासीन और बेस्वाद गुलाम ज़िंदगी में आगे बढ़ने का यही तरीका रह जाता है कि मौक़ा मिलते ही तानाशाह को गालियां निकालें.

आज़ादखयाल ज़ेहन प्रेम-भाव से भरा होता है. यह प्रेम आखिरी और भरपूर सच बन कर सामने आता है, जैसे कबीर ने ढाई आखर की बात कही है. जैसा हमने ऊपर लिखा है, यह आज़ादी सब की आज़ादी होती है. अपने में सब को और सब में अपने को ढूंढना ही इसका सबब रहता है. फिर रूमी और बुल्ले की तरह हम भी जान लेते हैं कि दरअसल हमारी कोई जातीय या राष्ट्रीय पहचान की सीमा नहीं है. प्यार ही हमारी एकमात्र पहचान होती है.

(लेखक कवि और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं.)

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