नई दिल्ली: त्रिपुरा के सिपाहीजाला ज़िले के सोनामुड़ा स्थित खेड़ाबाड़ी गांव में गुरुवार (20 अगस्त) को ओएनजीसी की ड्रिलिंग परियोजना से खेतों और जलस्रोतों में कथित रासायनिक प्रदूषण को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ. स्थानीय किसानों और मछली पालकों ने दूषित पानी के कारण हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने परियोजना स्थल के बाहर एकत्र होकर मुख्य प्रवेश द्वार को अवरुद्ध कर दिया. उनका आरोप था कि ड्रिलिंग काम से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट वाला जल रिसकर उनके खेतों और आसपास के तालाबों में पहुंच गया है.
पुलिस के अनुसार, ड्रिलिंग गतिविधियों से निकलने वाले गंदा पानी और रासायनिक अवशेष को परियोजना स्थल पर एक टैंक में जमा किया जाता है. हाल के दिनों में हुई भारी बारिश के कारण टैंक भरकर बह गया, जिससे प्रदूषित पानी खेतों और आसपास के जलस्रोतों में चला गया.
किसानों ने खड़ी फसलों को हुए नुकसान को लेकर चिंता जताई है और आशंका व्यक्त की कि प्रदूषित पानी से मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी. मछली पालकों ने बताया कि कई तालाब प्रभावित हुए हैं और संदिग्ध प्रदूषण के कारण बड़ी संख्या में मछलियां मर गई हैं.
त्रिपुरा क्रॉनिकल के अनुसार, किसानों का यह भी कहना है कि इस रासायनिक अवशेष से खेतों में खड़ी फसल भी प्रभावित हुई है.
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि प्रदूषित पानी से रसायन और ईंधन जैसी अजीब गंध आ रही है. उनका मानना है कि इससे वन्यजीवों और तालाबों में बची हुई मछलियों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता बढ़ गई है.
स्थानीय मीडिया से बात करते हुए किसान नेताओं जैनुल हुसैन और रेबती बिस्वास ने कहा कि रासायनिक कचरे के फैलने से धान के खेतों को लंबे समय तक नुकसान होगा; धान की खड़ी फसल और सब्जियों के साथ मिट्टी भी खराब हो गई है. इसके अलावा, तालाबों और टैंकों का पानी बुरी तरह प्रदूषित हो गया है; अगर उनमें नई मछलियां भी डाली जाएं, तो वे ज़िंदा नहीं बच पाएंगी, और अगर बच भी गईं, तो खाने लायक नहीं रहेंगी.
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उन्होंने पहले भी इस समस्या को लेकर ओएनजीसी के अधिकारियों से संपर्क किया था, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने तत्काल कार्रवाई और मुआवजे की मांग को लेकर परियोजना का प्रवेश द्वार बंद कर दिया.
हालांकि, सूत्रों ने बताया है कि कुछ घंटों तक रास्ता रोके रखने के बाद खेड़ाबाड़ी में ओएनजीसी के अधिकारी बाहर आकर किसानों से मिले थे और रास्ता खोलने का अनुरोध किया. बताया गया है कि उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इस मामले की जानकारी देंगे और मछुआरों समेत किसानों की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा.
इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने मुआवज़ा न मिलने पर फिर प्रदर्शन की चेतावनी देते हुए रास्ता खोल दिया था.
किसान और मछली पालक प्रभावित इलाकों का वैज्ञानिक आकलन, कृषि और मत्स्य पालन से हुए नुकसान का उचित मूल्यांकन और आसपास के खेतों और तालाबों में आगे अपशिष्ट जल के बहाव को रोकने के लिए प्रभावी उपाय किए जाने की मांग कर रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उनकी शिकायतों का जल्द समाधान नहीं किया गया तो उनका आंदोलन और तेज किया जाएगा.
इलाके के कई परिवारों के लिए खेती और मछली पालन आय के प्रमुख साधन हैं. ऐसे में कथित प्रदूषण उनके जीवन और आजीविका के लिए गंभीर खतरा बन गया है.
‘अगर केंद्र सरकार ठान ले, तो मणिपुर के किसी भी मुद्दे को हल कर सकती है’: कांग्रेस
मणिपुर कांग्रेस के अध्यक्ष ओ. इबोबी सिंह ने गुरुवार (20 अगस्त) को कहा कि अगर केंद्र सरकार ठान ले, तो वह राज्य से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान कर सकती है. उन्होंने कहा कि इसमें राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करना भी शामिल है, जिसे दो-तीन महीने में पूरा किया जा सकता है.
इसी बीच, मणिपुर में कई नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि राज्य में 2027 की जनगणना कराए जाने से पहले एनआरसी को अपडेट करने की मांग को लेकर केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं के सामने अपनी बात रखने के लिए गुरुवार को नई दिल्ली रवाना हुए.

मीडिया को संबोधित करते हुए सिंह ने कहा, ‘अगर केंद्र सरकार चाहे तो मणिपुर में एनआरसी लागू करना कोई मुद्दा नहीं है… जनगणना कराने से पहले एनआरसी को अपडेट किया जाना चाहिए. जरूरत पड़े तो संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए.’
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हमारा राज्य बहुत छोटा है. अगर केंद्र सरकार दृढ़ संकल्प और प्रतिबद्धता के साथ काम करे, तो चाहे एनआरसी हो या कोई अन्य मुद्दा, इसे हल करने में केवल दो-तीन महीने लगेंगे.’
उन्होंने कहा कि असली समस्या यह है कि केंद्र सरकार राज्य के लोगों की इच्छा की अनदेखी कर रही है.
उन्होंने सवाल किया, ‘जातीय संघर्ष के दौरान कितने घर नष्ट हुए हैं? ऐसी स्थिति में आप जनगणना के तहत घरों की सूची कैसे तैयार करेंगे? राहत शिविरों में रह रहे 60,000 आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों की गिनती कैसे करेंगे?’
इस बीच, नगा और मेईतेई संगठनों समेत 10 नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि राज्य में जनगणना कराए जाने से पहले एनआरसी को अपडेट करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय राजधानी के लिए रवाना हुए.
इन संगठनों में काबुई यूनियन, रोंगमेई नगा यूथ ऑर्गनाइजेशन मणिपुर और ऑल मणिपुर मुस्लिम ऑर्गनाइजेशंस कोऑर्डिनेटिंग कमेटी (AMMOCOC) शामिल हैं. प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने बताया कि वे विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं से मुलाकात करेंगे.
मई 2023 से इंफाल घाटी में रहने वाले मेईतेई समुदाय और पहाड़ियों इलाकों में रहने वाले कुकी समुदाय के बीच जारी हिंसा में 260 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हजारों लोग बेघर हो गए हैं.
मिज़ोरम के पूर्व मुख्यमंत्री जोरमथंगा बोले- आफस्पा खतरनाक क़ानून
मिजोरम के पूर्व मुख्यमंत्री और मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के वरिष्ठ नेता जोरमथंगा ने गुरुवार (20 अगस्त) को सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम (आफस्पा) को एक ‘खतरनाक’ कानून बताया.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने भूमिगत आंदोलन में अपने अनुभव और बाद में संवैधानिक राजनीति में शामिल होने के अपने सफर के आधार पर यह बात कही.

जोरमथंगा 1965 में एमएनएफ में शामिल हुए थे. 1966 में मिजो विद्रोह शुरू होने के बाद वह भूमिगत हो गए और करीब दो दशकों तक इस आंदोलन का हिस्सा रहे. वह उन वार्ताओं में भी शामिल थे, जिनके परिणामस्वरूप 1986 का मिजोरम समझौता हुआ. इस समझौते ने विद्रोह को समाप्त किया और एमएनएफ को मुख्यधारा की राजनीति में आने का रास्ता दिया. इसके बाद मिजोरम से आफस्पा हटा लिया गया था.
गुरुवार को गुवाहाटी विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए जोरमथंगा ने आफस्पा के पीछे सरकार के तर्क को माना. उन्हें छह दशक पहले अपनी परीक्षाएं पास करने के करीब 60 साल बाद विश्वविद्यालय से स्नातक प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ. उन्होंने कहा कि इस कानून का उद्देश्य सुरक्षा बलों को असाधारण शक्तियां देना था, ताकि वे अभियोजन के लगातार डर के बिना सशस्त्र विद्रोह का सामना कर सकें.
उन्होंने कहा, ‘यह दो देशों के बीच युद्ध नहीं है.’ उन्होंने कहा कि आंतरिक संघर्ष में युद्धकालीन शक्तियों के इस्तेमाल के नागरिकों के लिए गंभीर परिणाम हुए.
जोरमथंगा ने कहा कि आफस्पा के तहत रहने वाले लोगों के लिए इसका प्रभाव ‘भयानक’ था. उन्होंने कहा कि उन्होंने खुद इस संघर्ष को भूमिगत आंदोलन के एक सदस्य के रूप में अनुभव किया था, जो भारतीय राज्य के खिलाफ संघर्ष कर रहा था.
उन्होंने तर्क दिया कि ‘असाधारण सुरक्षा कानून राजनीतिक समाधान का विकल्प नहीं बन जाने चाहिए.’ उन्होंने कहा, ‘लंबे समय तक चलने वाले सैन्य अभियानों की तुलना में बातचीत और सुलह विद्रोह से बाहर निकलने का ज़्यादा टिकाऊ रास्ता देते हैं.’
जोरमथंगा ने कहा कि मिजोरम का अनुभव पूर्वोत्तर के अन्य विद्रोहों के लिए भी सीख प्रदान करता है. उन्होंने कहा कि बातचीत का तरीका हमेशा उस पारंपरिक मॉडल के अनुसार नहीं हो सकता, जिसमें एक सरकार दूसरी सरकार से बातचीत करती है. उन्होंने धैर्य, समझ और उदारता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सशस्त्र समूहों को दोबारा राजनीतिक और सामाजिक मुख्यधारा में लाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ‘सशस्त्र संघर्ष के दौर में सरकार को सुरक्षा उपाय जरूरी लग सकते हैं, लेकिन अंततः राजनीतिक संवाद के जरिए हासिल की गई शांति ही बेहतर समाधान है.’
37 वैश्विक संगठनों ने असम सरकार से प्रणब डोले को रिहा करने, केस वापस लेने की मांग की
दुनिया भर के 37 नागरिक समाज संगठनों, आदिवासी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने असम सरकार से आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत के आदेश को वापस लेने और उनकी तत्काल रिहाई सुनिश्चित करने की मांग की है.
18 अगस्त को जारी एक खुले पत्र में इन संगठनों ने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिजर्व के पास इंगले पाथर में प्रस्तावित पांच सितारा होटल के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किए गए चार अन्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले भी वापस लेने की मांग की.

हस्ताक्षरकर्ता संगठनों ने डोले की हिरासत को आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले रक्षकों पर गंभीर हमला बताया. उनका कहना है कि डोले और प्रभावित समुदायों ने आरोप लगाया है कि होटल परियोजना को उनकी ‘स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति’ (Free, Prior and Informed Consent—FPIC) प्राप्त किए बिना आगे बढ़ाया जा रहा है.
पत्र में कहा गया है, ‘प्रणब डोले जैसे आदिवासी पर्यावरण और मानवाधिकार रक्षक पर्यावरणीय न्याय को बढ़ावा देने, जैव-विविधता के संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता मजबूत करने व भूमि और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर होने वाले संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.’
इस खुले पत्र का समर्थन भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, फिलीपींस, नेपाल, केन्या, युगांडा, मैक्सिको, थाईलैंड, इंडोनेशिया और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के संगठनों ने किया है.
इन संगठनों ने एनएसए के तहत डोले की हिरासत के आधार में लगाए गए आरोपों पर भी सवाल उठाए हैं. इनमें उनकी अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी भागीदारी का उल्लेख भी शामिल है.
संगठनों ने कहा कि जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन और व्यवसाय एवं मानवाधिकार पर संयुक्त राष्ट्र फोरम जैसे मंचों में डोले की भागीदारी उनके अधिकारों की वकालत का हिस्सा थी.
संगठनों ने कहा, ‘आपराधिक आचरण प्रदर्शित करने के बजाय, ये गतिविधियां स्थानीय समुदायों द्वारा झेले जा रहे अधिकारों के उल्लंघन के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उनके वैध प्रयासों को दर्शाती हैं.’
संगठनों ने प्रस्तावित होटल परियोजना के लिए चिन्हित जमीन को लेकर भी चिंता जताई है. उनका आरोप है कि होटल के निर्माण के लिए 60 बीघा आदिवासी स्वामित्व वाली कृषि और चराई की जमीन निर्धारित की गई है और 2024 में 45 आदिवासी परिवारों को ‘जबरन बेदखल’ किया गया था.
पत्र में बिजनेस एंड ह्यूमन राइट्स रिसोर्स सेंटर को हयात की ओर से दिए गए जवाब का भी उल्लेख किया गया है. इसमें कंपनी ने कहा था कि हयात की कुछ सहायक कंपनियों के जूनिपर होटल्स के साथ कारोबारी संबंध हैं, लेकिन ‘हयात ने काजीरंगा के पास प्रस्तावित होटल परियोजना को अपने ब्रांड के तहत चलाने या उसका संचालन करने के लिए कोई समझौता नहीं किया है.’
हस्ताक्षरकर्ता संगठनों ने प्रणब डोले की तत्काल रिहाई, उनके खिलाफ लगाए गए एनएसए के आदेश को वापस लेने और अन्य चार कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले वापस लेने की मांग की है.
उन्होंने कथित अवैध हिरासत, प्रक्रियागत उल्लंघनों और अत्यधिक बल प्रयोग की स्वतंत्र जांच की मांग भी की है. साथ ही, अधिकारियों से प्रभावित समुदायों के भूमि अधिकारों को मान्यता देने का आग्रह किया है.
संगठनों ने परियोजना से जुड़े कंपनियों और निवेशकों से भी अपनी भूमिका स्पष्ट करने, मानवाधिकारों से जुड़ी उचित प्रक्रिया अपनाने और आदिवासी समुदायों तथा अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ सार्थक बातचीत करने की अपील की है.
ग्रेटर काजीरंगा लैंड एंड ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी के संयोजक प्रणब डोले को राजीब पेगू, ब्रिजित कुटुम, अमित नाग और भास्कर सैकिया के साथ 29 जून को हुए प्रदर्शनों के बाद गिरफ्तार किया गया था. इन पांचों को करीब तीन सप्ताह जेल में रहने के बाद 29 जुलाई को गोलाघाट सेशंस कोर्ट ने जमानत दे दी थी.
हालांकि, इसके अगले ही दिन असम सरकार ने डोले के खिलाफ एनएसए की धारा 3(2) लागू कर दी, जिसके चलते उनकी हिरासत जारी रही.
हिंसा प्रभावित मणिपुर में तीन साल बाद इंफाल-दीमापुर-गुवाहाटी बस सेवा फिर से शुरू हुई
हिंसा प्रभावित मणिपुर में संपर्क और आवागमन बहाल करने की दिशा में करीब तीन साल बाद इंफाल–दीमापुर–गुवाहाटी मार्ग पर सार्वजनिक परिवहन सेवा फिर शुरू हो गई है. शुक्रवार को दो बसों और पांच विंगर वाहनों में 125 यात्रियों ने सफर किया.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बसें कांगपोकपी, जो कुकी-जो बहुल जिला है, और सेनापति, जो नगा बहुल जिला है, को पार करने के बाद गुवाहाटी के रास्ते से नगालैंड में प्रवेश कर गईं.

मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह, उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन और सैतु के विधायक हाओखोलेट किपगेन ने 8 अगस्त को कांगपोकपी जिले के अपने पिछले दौरे के दौरान सभी समुदायों के लोगों के निर्बाध आवागमन के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों को फिर से खोलने की घोषणा की थी. उन्होंने यह भी कहा था कि इंफाल–दीमापुर–गुवाहाटी बस सेवा जल्द बहाल की जाएगी.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर सरकार को निर्देश दिया था कि 8 मार्च 2025 से मणिपुर के सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर लोगों की मुक्त आवाजाही सुनिश्चित की जाए. हालांकि, कुकी-जो समूहों ने शाह के निर्देशों का विरोध किया था और कांगपोकपी जिले में सरकार के दो बार किए गए प्रयासों को विफल कर दिया था.
यात्रियों में शामिल कियाम कुमारजीत सिंह, जो थौबल जिले के रहने वाले और मेईतेई समुदाय से हैं, ने अखबार से कहा कि यह नई यात्रा राज्य के सभी समुदायों के बीच प्रेम, शांति और सद्भाव की शुरुआत का माध्यम बननी चाहिए और लोगों को अतीत में जो कुछ हुआ, उससे आगे बढ़ने में मदद करनी चाहिए. उन्होंने कहा, ‘आइए, हम सभी अतीत को माफ कर दें और उसे भूल जाएं.’
ज्ञात हो कि मणिपुर में जातीय हिंसा की शुरुआत सबसे पहले मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच हुई थी, लेकिन बाद में इसमें लगभग हर समुदाय प्रभावित हुआ. मई 2023 में जातीय हिंसा शुरू होने के बाद से राज्य के मेईतेई और कुकी-जो समुदायों ने एक-दूसरे को अपने-अपने प्रभुत्व वाले इलाकों से बाहर कर दिया है. इस हिंसा में कम से कम 260 लोगों की मौत हुई है और 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं.
राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के करीब एक साल बाद फरवरी में नई सरकार का गठन हुआ था. जातीय संतुलन बनाए रखने के प्रयास के तहत नई सरकार में राज्य के तीन प्रमुख समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है.
