नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जज प्रसन्ना वराले ने शनिवार (22 अगस्त) को मराठी मीडियम स्कूलों की लगातार खराब होती स्थिति और शिक्षा के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं पर चिंता जताई.
उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से समय पर सहायता और पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई जाती तो कई स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, नासिक जिले के शिरपुर में अपने पूर्व स्कूल के दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर होने वाले खर्च के साथ-साथ शिक्षा में भी पर्याप्त निवेश किया जाना चाहिए.
मराठी में बोलते हुए उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कुंभ मेले पर 32,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. उन्होंने कहा, ‘हाल ही में मुख्यमंत्री ने कहा था कि सरकार कुंभ के बुनियादी ढांचे पर 34,000 करोड़ रुपये और एक कॉरिडोर परियोजना पर 11,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. मुझे इस तरह के खर्च पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन अगर कुंभ के करीब 32,000 करोड़ रुपये के बजट का सिर्फ 0.1 फीसदी, यानी लगभग 32 करोड़ रुपये, शिक्षा पर खर्च किया जाता, तो 100-150 से अधिक मराठी मीडियम स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था.’
नासिक में सिंहस्थ कुंभ मेला इस साल अक्टूबर में शुरू होने वाला है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार को जानकारी दी है कि राज्य के मुख्यमंत्री ने 13 मार्च, 2026 को हुई शीर्ष समिति की बैठक में 22,425.39 करोड़ रुपये की व्यापक कुंभ मेला विकास योजना को मंज़ूरी दी है.
वराले ने आवासीय स्कूलों की खराब स्थिति पर भी चिंता जताई और हाल में एक आश्रमशाला में छात्राओं की मौत का उल्लेख किया. ‘मैंने पढ़ा कि एक आश्रमशाला में फर्श पर सो रही तीन छात्राओं की सांप के काटने से मौत हो गई, जबकि एक अन्य छात्रा का इलाज चल रहा है. कई आवासीय स्कूलों की हालत बहुत खराब है.’
उन्होंने कहा कि छात्रों की बढ़ती जरूरतों के अनुरूप शिक्षा पर होने वाला खर्च नहीं बढ़ पाया है और स्कूलों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया.
उन्होंने कहा, ‘यह स्थिति तब है जब छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है. हर छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में ढांचागत सुधार, इंटरैक्टिव कक्षाओं, डिजिटल स्क्रीन, कम उम्र से ही कंप्यूटर तक पहुंच और आधुनिक प्रयोगशालाओं की तत्काल आवश्यकता है.’
वराले ने यह भी कहा कि शिक्षा के लिए बजटीय आवंटन, जो पहले 8 से 12 प्रतिशत के बीच हुआ करता था, छात्रों की बढ़ती संख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए बढ़ने के बजाय कम हो गया है.
