स्वतंत्रता की असली सीमा मनुष्यता और नैतिकता से तय होती है

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की ग्यारहवीं क़िस्त: किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता हमेशा मनुष्यता के पक्ष में होनी चाहिए. किसी भी व्यक्ति की वह स्वतंत्रता जो मनुष्यता विरोधी है- एक तरह की अराजक-स्वतंत्रता है. एक तानाशाह की स्वतंत्रता दूसरों के लिए परतंत्रता का सृजन करती है, इसलिए स्वतंत्रता की सीमा का होना ज़रूरी है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है ग्यारहवीं क़िस्त.

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स्वतंत्रता कभी भी स्थूल और इकहरी नहीं होती है. वह हमेशा बहुआयामी होती है. इसलिए एक व्यक्ति की स्वतंत्रता विभिन्न रूपों और विभिन्न अर्थों को ग्रहण करती है. इसके बावजूद कि उसका वजूद एक व्यक्ति के उसे महसूस करने पर टिका होता है, वह एक सीमा तक ही व्यक्ति आधारित होती है और उस व्यक्ति को उसकी निजता में एक सीमा तक ही प्रभावित करती है.

स्वतंत्रता की निजता हमेशा भंग होती है और वह अपने आस-पास को प्रभावित करने लगती है. यह जरूर है कि स्वतंत्रता की मांग सामूहिक और वैयक्तिक दोनों रूपों में हो सकती है, पर स्वतंत्रता हासिल होते ही बस व्यक्ति-आधारित हो जाती है. उसे सहेजने, संभालने और उसके उपयोग का सारा दारोमदार उस स्वतंत्र व्यक्ति पर आता है जिसने उसे हासिल किया है. क्योंकि हासिल होने के बाद वह स्वतंत्रता जिसके पास है, उसके लिए वह जिस रूप में है, ज़रूरी नहीं दूसरे के लिए उसकी स्वतंत्रता उन्हीं अर्थों में वैसी ही ठीक उनके पास हो.

स्वतंत्रता व्यक्ति से व्यक्ति तक जाते हुए बदलती जाती है. इसलिए स्वतंत्रता के पास सीमा उल्लंघन की गुंजाइश होती है. क्योंकि अपनी स्वतंत्रता की सीमा मनुष्य स्वयं तय करता है. वह अपने लाभ के लिए उसे इस्तेमाल करता है और स्वतंत्रता के उन नैतिक मूल्यों को नज़रअंदाज करता जाता है जो स्वतंत्रता को अर्थवान बनाते हैं. स्वतंत्रता की आदर्श स्थिति तो यह है वह एक नैतिक सीमा के भीतर स्पंदित होती रहे. क्योंकि स्वतंत्रता जैसे ही नैतिक सीमा का उल्लंघन करती है, वह दूसरों के लिए परतंत्रता का सृजन करने लगती है.

इसे इस तरह समझें की आसमान में गौरैया की उड़ान की स्वतंत्रता ठीक वैसी नहीं है, जैसी किसी बाज या गिद्ध के उड़ान की स्वतंत्रता है. जंगल में शेर के विचरण की स्वतंत्रता वह नहीं है जो उसी जंगल में विचरित हो रहे हिरण के पैरों में सिमटी स्वतंत्रता है. दोनों में फर्क है. पशु-पक्षी, जीव-जन्तु स्वतंत्रता को अर्जित नहीं करते हैं. उनके पास जो स्वतंत्रता है वह प्राकृतिक स्वतंत्रता है. मनुष्य अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता के अलावा अपने लिए स्वतंत्रता को अर्जित भी करता है. उसके पास उसे अर्जित करने के प्रयत्न का विवेक है.

मनुष्य का अपनी स्वतंत्रता को अर्जित करना और उसे सहेजना दोनों अलग-अलग बातें हैं. स्वतंत्रता का होना और उसका दूसरों के लिए उपयोग हर व्यक्ति की सामर्थ्य और विचार के अनुरूप पृथक-पृथक होता है. यही वह जगह है, जो स्वतंत्रता के उपयोग की व्याख्या की जगह है. इस जगह से देखें तो गांधी के यहां स्वतंत्रता का जो अर्थ रहा है, वह हिटलर, मुसोलिनी, ईदी अमीन, किम जोंग, ट्रम्प आदि के पास जो स्वतंत्रता रही है या है-वह नहीं है. स्वतंत्रता मनुष्य की वैचारिकता से स्पंदित और संचालित होती है. इसीलिए उसके पास उसके टूटने-बिखरने और अपनी सीमा को तोड़कर उसके अराजक इस्तेमाल की हमेशा गुंजाइश रहती है.

किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता हमेशा मनुष्यता के पक्ष में होनी चाहिए. किसी भी व्यक्ति की वह स्वतंत्रता जो मनुष्यता विरोधी है- एक तरह की अराजक-स्वतंत्रता है. वह अपनी अराजकता में ना सिर्फ मनुष्य को क्षति पहुंचाती है बल्कि उसके द्वारा सृजित कलाओं को भी क्षति पहुंचाती है. स्वतंत्रता की इस अराजकता का विस्तार पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, पेड़-पौधों, खनिज, वनस्पतियों की क्षति तक जाता है.

साफ़ कहा जाए तो एक अराजक-स्वतंत्रता मनुष्य के साथ-साथ पृथ्वी को भी क्षतिग्रस्त करती है. इसे हम तानाशाह-स्वतंत्रता भी कह सकते है जो आदिकाल से राजा-महाराजाओं और शासकों के पास रहती आई थी. एक तानाशाह की स्वतंत्रता दूसरों के लिए परतंत्रता का सृजन करती है. इसलिए स्वतंत्रता की सीमा का होना ज़रूरी है. वरना ऐसी स्वतंत्रता अपने भीतर एक तरह की घातक स्वेच्छाचारिता का सृजन करती है. इसीलिए किसी एक व्यक्ति की ऐसी तानाशाह स्वतंत्रता के खिलाफ़ एक समूह की स्वतंत्रता की मांग उठती है. यह मांग स्वतंत्रता को अर्जित करने तक स्वतंत्रता के महत्त्व और ज़रूरत को समझती हुई एक ऐसी मांग होती है जो समूह से बलिदान तक की आशाओं तक जाती है. पर बात यहां खत्म नहीं होती.

बात स्वतंत्रता को अर्जित करने के बाद उसको मनुष्य के पक्ष में उच्च आदर्शों के साथ बनाए रखने के प्रयत्नों से फिर प्रारंभ हो जाती है.

गांधी स्वतंत्रता के महत्व को समझने की बात लगातार करते रहे हैं. जब वे कहते हैं कि स्वराज तब है, जब हम अपने ऊपर शासन करना सीख जाते है. यहां साफ़ है कि गांधी स्वतंत्रता का अर्थ यह ले रहे हैं कि आदमी अपने को नियंत्रित करना सीखे, तभी वह स्वतंत्रता का सही उपयोग कर सकता है. गांधी के यहां स्वतंत्रता का यह अर्थ कतई नहीं है कि मनुष्य, मनुष्य पर शासन करने के लिए उसका उपयोग करे. जब हम अपनी स्वतंत्रता पर अपना नैतिक नियंत्रण खो देते है, तब हम उसका दुरुपयोग करना प्रारंभ कर देते हैं.

गांधी ने अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में ‘अपने ऊपर शासन’ का अर्थ बहुत स्पष्ट रूप में रेखांकित किया है. उनका मानना था कि स्वतंत्रता को राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से आगे ले जाकर, आत्म शासन, नैतिकता, कर्तव्य, स्वदेशी, अहिंसा और सभ्यता की पुनर्व्याख्या तक जाना चाहिए.

‘हिंद स्वराज’ में गांधी एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं कि अगर अंग्रेज भारत से चले जाएं और भारतीय लोग उन्हीं संस्थाओं, उन्हीं मूल्यों और उसी शोषणकारी व्यवस्था को चला दें तो क्या यह वास्तविक स्वतंत्रता होगी?

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के परिदृश्य में महात्मा गांधी के योगदान का हम आकलन करें तो वह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध बस एक राजनीतिक संघर्ष की सीमा तक सीमित स्वतंत्रता आंदोलन नहीं था. दरअसल गांधी ने ‘स्वतंत्रता’ को एक व्यापक नैतिक, सामाजिक और सभ्यतागत प्रश्न के रूप में देखा था. उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी सत्ता और उसके अत्याचारों से मुक्ति और भारतीयों के हाथों में सत्ता की बागडोर बस आ जाना मात्र नहीं था. गांधी के सामने यह बिल्कुल स्पष्ट था कि वास्तविक स्वतंत्रता-व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के आत्मशासन, आत्मसंयम, आत्मनिर्भरता, कर्तव्यबोध और मनुष्य की नैतिक स्वायत्तता में निहित है.

गांधी ब्रिटिश शासन से भारत की मुक्ति के प्रबल समर्थक थे, लेकिन वे सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता को स्वतंत्रता का अंतिम रूप नहीं मानते थे. उनके लिए किसी भी प्रकार की राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अनंतिम थी, जब तक उसमें एक तरह का नैतिकता से संचालित व्यक्ति-स्वातंत्र्य शामिल ना हो. गांधी के यहां केंद्र राज्य नहीं व्यक्ति है. वे मानते थे की स्वतंत्रता का केंद्र राज्य के भीतर नहीं बल्कि व्यक्ति के भीतर होता है. उनका विश्वास था कि एक स्वतंत्र समाज स्वतंत्र व्यक्तियों से बनता है. यही वह जगह है जहां गांधी की स्वतंत्रता-दृष्टि का वह महत्त्वपूर्ण तत्त्व भी शामिल है, जिसे हम आत्मसंयम कहते हैं.

यदि व्यक्ति अपने लोभ का गुलाम है, वह भय से संचालित है, अपने भीतर उठ रही अनियंत्रित इच्छाओं से संचालित है, वह अपने लिए या दूसरों के लिए उचित निर्णय लेने में असमर्थ है तो उसकी ऐसी स्वतंत्रता को वास्तविक स्वतंत्रता के रूप में देखना मुश्किल है. इसलिए गांधी के यहां स्वतंत्रता की प्रक्रिया भीतर से बाहर की ओर जाती है. वह व्यक्ति से शुरू होती है, फिर परिवार, समाज, ग्राम से होते हुए राष्ट्र तक जाती है.

इसका अर्थ यह हुआ कि किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता, व्यक्ति की स्वतंत्रता से शुरू होती है. व्यक्ति की स्वतंत्रता में गांधी आत्मसंयम की उपस्थिति को महत्वपूर्ण मानते थे. जाहिर है वे जानते थे कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य में अगर आत्मसंयम का तत्व शामिल नहीं होगा तो व्यक्ति- स्वातंत्र्य अराजक हो सकता है. गांधी के लिए स्वतंत्रता का अर्थ एक व्यक्ति के इच्छाओं की असीमित पूर्ति नहीं, बल्कि इच्छाओं का विवेकपूर्ण नियंत्रण है.

गांधी के विचारों के बिल्कुल विपरीत हमारे समय में अब स्वतंत्रता का अर्थ ‘जो चाहे वह करने की स्वतंत्रता’ तक सिमट चुका है. यह और ध्यातव्य अब है, जब यह अराजक-स्वतंत्रता हमारे समय के शासकों के क्रियाकलापों और राजनीतिक निर्णयों में परिलक्षित हो रही है. जनता की स्वतंत्रता वोट की एक इकाई में बदल चुकी है, जिसे जनता के कल्याण की चिंता से बाहर, ‘लोभ’ देकर खरीदा जा सकता है. जनता को धर्म का झुनझुना पकड़ाकर, उसे जीवन के तमाम अभावों और पीड़ाओं से मुंह मोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है. जनता की आवाज़ अगर कहीं से उठ रही हो–जो चाहे किसान या युवा वर्गों से आ रही हो, उस आवाज़ को पूरी तरह बेअसर करने के सारे अनैतिक बेशर्म-उपाय अब मौजूद हैं.

हमारे देश का दुर्भाग्य यह है कि ‘हिंद स्वराज’ को लिखते समय 1919 में गांधी ने जो प्रश्न उठाए थे, वे अब भी वैसे ही हमारे सामने खड़े हैं. सच यह है कि महात्मा गांधी द्वारा उठाई गई उन चिंताओं का हमारे पास आज भी कोई जवाब नहीं है, जो स्वतंत्रता की सीमा और उसकी नैतिकता को परिभाषित करते हैं. हमने अंग्रेजों से मुक्ति के साथ-साथ गांधी के विचारों से भी मुक्ति पा ली है. स्वतंत्र होते ही हमारी ‘स्वतंत्रता’ की जो मूल भंगिमा थी वह अंग्रेजों की स्वतंत्रता-सी बनी रही. हमने ब्रिटिश राज से स्वतंत्र होते ही गांधी जैसे मौलिक विचारक से भी मुक्ति पा ली.

जबकि होना यह था कि स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्रता के उस रूप को अपनाना था, जिसकी स्पष्ट व्याख्या गांधी लगातार करते आए थे. हमने स्वतंत्रता के गांधी-मॉडल को अपनाया ही नहीं. हमने उसी शासन पद्धति को अपनाया जो अंग्रेज छोड़ कर गए थे. हमने गांधी के सिद्धांतों के अनुरूप अपनी शासन पद्धति को ढालने का प्रयास ही नहीं किया. दुर्भाग्य से हमारे शासकों ने इसकी थोड़ी-सी भी कोशिश नहीं की. हमने गांधी और उनके विचारों को गांधी प्रतिष्ठानों में सजा कर दूर से देखने की चीज़ बना दी.

स्वतंत्रता के इतने सालों के बाद आज हम कहां हैं, इसका आकलन करें तो हम पाएंगे कि हम एक ऐसी जगह पर खड़े हैं जो मनुष्यता को सबसे अधिक शर्मिंदा करती जगह है. इधर आकर हम और ज़्यादा हास्यास्पद रूप से स्वतंत्रता के एक विचित्र बोध से ग्रसित हो रहे है या यह कहें कि हमें उस बोध की ओर ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर धकेलने की कोशिश की जा रही. यह जनता की विवेकहीनता का अचरज भरा दौर है, जिसमें उसकी स्वतंत्रता को राष्ट्रवाद के तराजू पर चढ़ा दिया गया है.

यहां ‘हिंद स्वराज’ का यह अंश दृष्टव्य है:

हिंदुस्तान में चाहे जिस धर्म के लोग रह सकते हैं, उसमें वह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है. जो नए लोग उसमें दाखिल होते हैं, वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजा में घुल-मिल जाते हैं. ऐसा हो तभी कोई मुल्क एक राष्ट्र माना जाएगा. ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों के समावेश करने का गुण होना चाहिए. हिंदुस्तान ऐसा था और आज भी है. यों तो जितने आदमी उतने धर्म ऐसा मान सकते हैं. एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते हैं,अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं है.

अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान हिंदुओं से भरा होना चाहिए तो यह एक निरा सपना है. मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहना चाहिए तो उसे भी सपना ही समझिए. फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक मुलकी हैं, वे देशी भाई हैं और उन्हें एकदूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा. दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है, हिंदुस्तान में तो ऐसा था ही नहीं..

यहां यह समझने की ज़रूरत है कि राष्ट्रवाद का उग्र और यांत्रिक रूप मनुष्यता विरोधी है. गांधी का राष्ट्रवाद मनुष्यता विरोधी राष्ट्रवाद नहीं था. वे ऐसे राष्ट्रवाद से सावधान थे जो दूसरे राष्ट्रों के प्रति घृणा पैदा करे. रवींद्रनाथ टैगोर ने भी राष्ट्रवाद के उग्र और यांत्रिक रूप की आलोचना की थी. उनकी चिंता यह थी की राष्ट्रवाद अगर मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को दबाने लगे और दूसरे राष्ट्रों के प्रति शत्रुता पैदा कने लगे तो वह स्वतंत्रता के उद्देश्य के भी विरुद्ध जाता है. राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता की इस संधि को समझने की आज सबसे अधिक ज़रूरत है कि यह कितनी और कैसी होनी चाहिए.

(लेखक साहित्यकार हैं.)

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