स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है 14वीं क़िस्त.
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आज़ादी को किसी एक रंग और एहसास में तसव्वुर नहीं किया जा सकता, इसलिए हिंदुस्तान जैसे जम्हूरी मुल्क में आज़ादी का मतलब ‘हम भारत के लोग…’ का वो संवैधानिक वादा है, जिसमें इंसाफ़, बराबरी और भाईचारे के साथ सबको गरिमा से जीने का अधिकार देने की बात कही गई है. यहां ‘हम भारत के लोग…’ कौन हैं, तो कह सकते हैं कि हम जो अलग-अलग धर्मों के हैं, हम जो आस्तिक हैं, हम जो नास्तिक हैं, हमारी जातियां भिन्न हैं, हमारी लैंगिक पहचान एक सी नहीं हैं… गोया ये ‘मैं’ भी हूं और ‘आप’ भी हैं, जो ‘हम भारत के लोग’ की इस मज़बूत और बड़ी पहचान को मुकम्मल करते हैं.
दरअसल, हमारी भिन्नताओं और विविध पहचानों के साथ समान अधिकार, समानता और गरिमा सुनिश्चित करने का वादा ही हमारी आज़ादी का मानवीय पक्ष और इंसानी पहलू है, और यही वादा हमें एक राष्ट्र के रूप में एक दूसरे से जोड़ता है. ऐसे में, एक भारतीय के तौर पर हमारी आज़ादी सिर्फ़ व्यक्तिगत अभिलाषा या सामाजिक अस्मिता तक महदूद नहीं रह सकती, इसलिए वो उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की मज़बूती से भी जुड़ी हुई है, जिसमें हर नागरिक को बराबरी से जीने का संवैधानिक भरोसा दिया गया है.
यूं देखें तो हमारी आज़ादी सिर्फ़ हमारी नहीं है, वो इस बात से भी तय होती है कि हमारे दूसरे हम-वतन कितने आज़ाद है और उनके नागरिक अधिकार किस हद तक सुरक्षित हैं.
और जब हम इस संवैधानिक वादे के साथ अपने आस-पास देखते हैं, तो अंदाज़ा होता है कि हमारी आज़ादी को महदूद किया जा रहा है, हमें वोट-बैंक के सियासी तराज़ू में तोला जा रहा है. कभी एसआईआर के नाम पर मताधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है, और कभी हिंदू राष्ट्र के सियासी शोर में अपने हम-वतनों के साथ हिंसा की खुली छूट दी जा रही है. वर्चस्व की इस सियासत में कभी हमें किसी की नमाज़ बुरी लगती है, तो कभी चर्च में धर्मांतरण की साज़िश नज़र आती है; और कहीं किसी मंदिर में वंचित समुदाय को आज भी बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है.
भेदभाव, नफ़रत और दुश्मनी की आग धधक रही है, हम इसमें झुलस रहे हैं और हमारी सत्ता बड़ी तेज़ी से एक निरंकुश शासन का पर्याय बनती जा रही है. कहना चाहिए कि ये सत्ता असल में किसी शैतान की सियाह आंखें हैं, जो नफ़रत के अंधेरों से सुर्ख़ हुई जाती हैं. ये ओझल सच्चाईयां नहीं हैं, बस सामने की चंद बातें हैं, वरना आज के हिंदुस्तान में छात्र अधिकारों से लेकर किसान अधिकारों तक की बात कर लें या फिर बहुसंख्यकवाद की उदंडता को ही समझ लें, ये सब हमारी आज़ादी को कुचलने के तानाशाही हरबे हैं.
यहां इस सियासत पर ज़्यादा बात नहीं करना चाहता, लेकिन ये सब जानते हैं कि अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले छात्र हों, किसान हों, दलित हों, ईसाई हों, महिलाएं हों, आदिवासी हों, मुसलमान हों, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लोग हों या इस मुल्क का कोई और शहरी – उन्हें अपने संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई में ‘दहशतगर्द’, ‘गद्दार’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘दिमाग़ी नक्सल’, ‘एंटी-नेशनल’ और जाने कैसे-कैसे तम्ग़े से नवाज़ा जा चुका है.
याद रखा जाना चाहिए कि हमारे कई हम-वतन वर्षों से जेल में हैं, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया को ही सज़ा बना दिया गया है, ऐसे में मेरे लिए इस समय आज़ादी का मतलब है लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली और सत्ता की तानशाही के ख़िलाफ़ बोलने और सवाल करने की आज़ादी हासिल करने के संघर्ष में अपनी बे-बसी के बावजूद ख़ुद को खड़ा रखने की कोशिश करते रहना.
सब जानते हैं कि आज के हिंदुस्तान में सवाल करने वालों के साथ सत्ता का सुलूक क्या है. हां, जब भी मैं अपनी आज़ादी के बारे में सोचता हूं तो सबसे पहले यही ख़याल ज़ेहन में आता है कि एक नागरिक सत्ता से सवाल पूछ सकता है? और सवाल पूछने के बाद भी उसके अधिकार सुरक्षित रहेंगे? और शायद इस सवाल के जवाब में हमारी आज़ादी का मतलब उस भारत के सपने देखना है, जिसके लिए अलग-अलग पहचान रखने वालों ने साथ मिलकर अपनी कुर्बानियां दी थीं.
ऐसा नहीं है कि मैं यहां आज़ादी की कोई नई परिभाषा गढ़ना चाहता हूं. अलबत्ता, इतना ज़रूर है कि जब आज़ादी के पन्ने खोलता हूं, तो नफ़रत की मोरियों से बहता हुआ ख़ून भी मेरी आंखों से टपकने लगता है, और उस ख़ून में आज़ादी का अर्थ, एक सत्ता की ग़ुलामी से निकलकर किसी और तरह के पागलपन में तब्दील होता हुआ नज़र आता है. ये पागलपन अब तक ज़िंदा है, और इसको ज़िंदा रखने के लिए जाने कितनों को वहशी बना दिया गया है. शायद इसलिए भी बहुत सारे टोबा टेक सिंह अपने-अपने घरों और मोहल्लों में चुप हैं, और उन्हें नहीं मालूम कि सत्ता की कौन सी सनक कब उन्हें किसी बुलडोज़र के सामने खड़ा कर देगी, उनका चेहरा नोच लेगी और शायद लिंच भी कर देगी.
हां, आज़ादी ने हमें अपना देश दिया,
और कई सरहदें खड़ी कर दीं.
कुछ सरहदें ज़मीन पर हैं,
और कुछ हमारे दिलों में…
बहरहाल, इतिहास के कांटे ज़हरीले हैं, लेकिन उसी इतिहास में हमारी एकता की कहानी है, हमारी ख़ुश-रंग विविधता है, हमारा प्रतिरोध है और हमारी शहादतें हैं- जो हमें याद दिलाते हैं कि अपनी आज़ादी को ज़्यादा से ज़्यादा इंसानी और सामाजिक बनाए रखने की ज़िम्मेदारी ही शायद सच्ची और सबसे बड़ी देशभक्ति है.
यूं अपनी आज़ादी के पन्ने पलटकर देखता हूं, तो लगता है कि आज़ादी कोई ठहरी हुई मंज़िल नहीं है, बल्कि ये उस जज़्बे का नाम है जो लगातार इंसाफ़ और बराबरी के लिए संघर्ष करता है और सत्ता को लोकतांत्रिक मूल्यों की तरफ़ लौटने को मजबूर करता है और कई दफ़ा दमनकारी सत्ता को उखाड़ भी फेंकता है. हां, आज़ादी से हर निरंकुश सत्ता को डर लगता है, इसलिए वो अवाम को अपनी रीढ़ की हड्डी के साथ खड़े होने देना नहीं चाहती. वो असहमति की आवाज़ को दबा देना चाहती है और इसके लिए वो नफ़रत के सारे कारोबार करती है.
वो आदाब बजा लाने वाला मीडिया पैदा करती है, लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर करती है और हर तरह से अपनी ताक़त का भ्रम पैदा करती है. ये और बात है कि नागरिक को प्रजा में बदलने की कोशिश करने वाली ऐसी कोई भी सत्ता कई बार ‘हू हू आहा…’ जैसी रील के प्रतिरोध के सामने घुटने टेक देती है.
यूं देखें तो हमारी आज़ादी के सामने सत्ता और उसकी पैदा की हुई नफ़रत खड़ी है, और वो नहीं चाहती कि हम अपनी आज़ादी का मतलब जानें, बराबरी की बातें करें, इंसाफ़ के लिए आवाज़ बुलंद करें और अपने संवैधानिक वादों के साथ खड़े होने का हौसला पैदा करें.
याद कीजिए, अभी-अभी जंतर-मंतर पर क्या-कुछ हुआ. हां, हमने वहां देखा कि जेन-ज़ी ने ‘56 इंच का छोटा बंदर…’ के तंज़ में इस सत्ता के प्रधान की कथित करिश्माई छवि का मुखौटा ही नहीं उतारा, बल्कि सत्ता के अहंकार को भी चकनाचूर कर दिया. सच पूछिए तो जेन-ज़ी ने अपने इस मज़ाक़ से पूरे मुल्क को याद दिलाया कि ज़ेहनी आज़ादी का मतलब है – राजा जैसा व्यवहार करने वाले हुक्मरानों के कान में जवाबदेही का बिगुल बजाना.
हुक्मरानों की यही जवाबदेही हमारी अपनी आज़ादी का परवाना है.
ऐसे में आज़ादी कई बार हमारा इनकार है, अपने इनकार का ऐलान है, मुनादी है, इंक़लाब है और बग़ावत भी. यूं देखें तो आज़ादी बड़ी ख़ूबसूरत और ख़तरनाक चीज़ है.
एक सहाफ़ी और क़लमकार के तौर पर मेरी लड़ाई भी ऐसी ही आज़ादी के लिए है, जहां मेरे होंठों पर मेरा इनकार ज़िंदा रहे. मेरा ‘क्यों’ कहना कोई गुनाह न हो और मेरा ‘कैसे’ पूछना कोई जुर्म न हो.
एक मैथिल उर्दूभाषी के तौर पर भी मेरी लड़ाई यही है कि मेरे हाथों में उर्दू की कोई किताब किसी की नज़र में मेरे लिए शक की वजह न बने. मेरे नाम का मोहम्मद और अहमद मुझे अपनी ही मिट्टी पर बे-गाना न करे.
हां, एक मुसलमान के तौर पर भी यही आरज़ू है कि मेरे मज़हब को किसी इलज़ाम की तरह न देखा जाए और एक ‘अल्पसंख्यक’ के तौर पर मुझे कोई सफ़ाई देना न देनी पड़े. किसी वंदेमातरम् से मेरी देशभक्ति को न परखा जाए और और ‘जय श्री राम’ के नाम पर पैदा की जाने वाली वहशत से न डराया जाए. और एक इंसान के तौर पर ऐसी ही आज़ादी अपने दूसरे तमाम हम-वतनों के लिए भी चाहता हूं कि उन्हें अपनी पहचान और अपनी आस्था के साथ जीने का हक़ हर तरह से इस आज़ाद मुल्क में हासिल हो.
यूं हमारे समान अधिकार, स्वतंत्रता, समानता और हमारी गरिमा को इस समय सत्ता के नापाक इरादों से बचाने की कोशिश करना ही हमारी उस आज़ादी को मज़बूत करना है जिसकी याद में हम 15 अगस्त का जश्न मानते हैं. और अपने तिरंगे को सलामी पेश करते हैं.
आज़ादी का मतलब तलाश करते हुए ये सब बातें क्यों लिख रहा हूं, तो इसका कोई एक जवाब नहीं है. हां, लेकिन जब भी घर से निकलता हूं, एक अनजाने ख़ौफ़ से भर जाता हूं. ये डर ये ख़ौफ़ कहां से आया; तो मुझे कहने दीजिए कि खान-पान को लेकर होने वाली हिंसा से लेकर ट्रेन में सफ़र करने तक, हिजाब से लेकर ‘लव जिहाद’ तक, मुझे मार देने के अनेकों बहाने इस सियासत के पास हैं. हालांकि, मेरी ऐसी किसी मौत से न मेरा मज़हब ख़त्म होगा न किसी और धर्म की जय जयकार होगी. अलबत्ता, इस नफ़रत में ‘हम भारत के लोग…’ का बुनियादी वादा क़त्ल हो जाएगा.
इसलिए नफ़रत की सियासत से आज़ादी मेरे लिए और मेरे हम-वतनों के लिए ऐसी ही है, जैसे खुली फ़ज़ा में बे-ख़ौफ़ सांस लेना और नूर-ए-सहर की जुस्तुजू करना. जैसा कि मेरे शायर ओवेस अहमद दौरां कह गए हैं;
मफ़्हूम-ए-आज़ादी है क्या?
नूर-ए-सहर की जुस्तुजू!
क्या है मता-ए-हुर्रियत?
इंसां के दिल की आरज़ू!
सो तमन्ना है कि हम सब के दिलों की ये आरज़ू सलामत रहे!
(लेखक द वायर उर्दू के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं.)
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