अधूरी आज़ादी: जाति के रहते कोई भी समाज पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकता

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला: आज़ादी एक पौधे की तरह है, जिसे हर दिन समता, न्याय, साहस और विवेक से सींचना पड़ता है. यदि हम सजग नहीं रहे, तो जातिवादी और पितृसत्तात्मक ताक़तें इस पौधे को सुखाने की कोशिश करेंगी. जब तक एक भी महिला को अपनी स्वतंत्रता की कीमत हिंसा के रूप में चुकानी पड़ती है, जब तक किसी लड़की को अपनी पसंद से जीने के लिए समाज से लड़ना पड़ता है, तब तक हमारी आज़ादी अधूरी है.

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जब दलित महिला को अपने अस्तित्व और सम्मान की रक्षा के लिए हर क्षण संघर्ष न करना पड़े और जब किसी लड़की को अपनी पसंद के कपड़े पहनने, पढ़ने, प्रेम करने, विवाह करने के लिए हिंसा का सामना न करना पड़े, तभी हम कह सकेंगे कि स्वतंत्रता वास्तव में समाज के जीवन में उतर रही है. (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है 15वीं क़िस्त.

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मेरे लिए स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों के भारत छोड़कर चले जाने या राष्ट्रीय ध्वज फहरा देने भर का नाम नहीं है. स्वतंत्रता मेरे लिए एक निरंतर चलने वाली सतत प्रक्रिया है, एक संवैधानिक मूल्य है और एक अनवरत संघर्ष है. आज, जब एक ओर हम आर्थिक समृद्धि और तकनीकी प्रगति के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे समाज की कई सामाजिक संरचनाएं पहले की तरह ही संकीर्ण, भेदभावपूर्ण, हिंसक और क्रूर बनी हुई हैं. ऐसे समय में एक दलित-स्त्रीवादी के लिए स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या वह आज़ादी, जो 1947 में मिली थी, भारत के सामाजिक पायदान के सबसे निचले स्तर पर खड़ी दलित महिला की चौखट तक वास्तव में पहुंच पाई है?

डॉ. बीआर आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में एक अत्यंत दूरदर्शी चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि 26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के एक नए जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं, राजनीतिक जीवन में हमारे पास समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी. यदि यह अंतर्विरोध लंबे समय तक कायम रहा, तो अंततः हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र को ही ख़तरे में डाल देंगे.

आज, जब हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं तो मुझे बाबा साहेब की यह चेतावनी पहले से और ज्यादा सही लगती है. केवल मतदान का अधिकार किसी व्यक्ति को वास्तविक रूप से स्वतंत्र नहीं बना देता, जब तक वह स्वतंत्रता सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी दिखाई न दे. आज भी भारत के हजारों गांवों और कस्बों में जाति की दीवारें कायम हैं. कहीं पानी के कुएं, तालाब अलग हैं, कहीं बस्तियां अलग हैं, कहीं रास्तों पर अदृश्य पहरे हैं और कहीं सम्मान की कीमत आज भी जान देकर चुकानी पड़ती है.

जब किसी दलित युवक को केवल इसलिए प्रताड़ित या मार दिया जाता है कि उसने घोड़ी पर चढ़कर शादी की, मूंछें रखीं या किसी तथाकथित ऊंची जाति के कुएं से पानी पी लिया, तब स्वतंत्रता का तिरंगा उसके परिवार के लिए केवल एक प्रतीक बनकर रह जाता है. ऐसे परिवारों से यह पूछना जरूरी है कि संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकार उनके जीवन में कहां दिखाई देते हैं?

जब हम महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, तो अक्सर सारी ‘महिलाओं’ को एक समान और एकरूप श्रेणी यानी एक वर्ग मान लिया जाता है. लेकिन भारत में स्त्री की स्थिति को केवल उसके जेंडर के आधार पर नहीं समझा जा सकता. यहां जाति, पितृसत्ता और वर्ग एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हुए हैं कि दलित महिलाओं के लिए उत्पीड़न की एक जटिल और कठोर संरचना तैयार होती है. दलित-स्त्रीवाद इसी वास्तविकता से जन्म लेता है.

वह यह स्पष्ट करता है कि दलित महिला को केवल पुरुषवादी पितृसत्ता का सामना नहीं करना पड़ता. उसे जातिगत भेदभाव, सामाजिक अपमान, आर्थिक शोषण और लैंगिक हिंसा का भी सामना करना पड़ता है. उसकी ज़िंदगी में जाति और जेंडर अलग-अलग समस्यायें नहीं हैं, बल्कि अक्सर एक-दूसरे में अटूट रूप से गुंथी हुई हैं.

इसीलिए स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मेरे मन में यह सवाल भी उठता है कि भारतीय नारीवादी विमर्श में दलित महिलाओं के अनुभवों को लंबे समय तक पर्याप्त प्राथमिकता क्यों नहीं मिली? उनके मुद्दे, सवालों और समस्याओं को क्यों सिरे से अनदेखा किया गया?

भारतीय नारीवादी आंदोलन ने महिलाओं के अनेक महत्त्वपूर्ण सवालों को सामने रखा है, लेकिन उसके भीतर भी जाति और वर्ग के प्रश्नों को लेकर गंभीर अंतर्विरोध रहे हैं.

जब समाज का एक हिस्सा कांच की छत तोड़ने, सारा आकाश हमारा है जैसे इरादे रखते हुए नेतृत्व में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात कर रहा होता है, उसी समय बड़ी संख्या में दलित महिलाएं जातिगत गरिमाहीन पेशे, खेतों, निर्माण स्थलों, घरों और असंगठित क्षेत्र में बेहद कम मजदूरी पर काम कर रही होती हैं. अनेक महिलाएं आज भी अपने श्रम के उचित मूल्य, सम्मानजनक काम और हिंसा से सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रही हैं. इसलिए दलित महिलाओं की मुक्ति को भारतीय महिला मुक्ति के व्यापक प्रश्न के केंद्र में रखना आवश्यक है. दलित महिलाओं की मुक्ति के बिना भारतीय स्त्री-मुक्ति की परियोजना अधूरी है.

यह एक असुविधाजनक लेकिन ज़रूरी सच है कि पितृसत्ता को केवल पुरुष ही कायम नहीं रखते. कई बार महिलाएं  भी, सामाजिक परिस्थितियों और अपने जातिगत विशेषाधिकारों के कारण, इस व्यवस्था की संवाहक बन जाती हैं. ख़ासकर जाति के प्रश्न पर यह बात अधिक स्पष्ट दिखाई देती है. आज भी कई अभिजात और मध्यमवर्गीय घरों में दलित सफाई कर्मचारियों और घरेलू कामगारों के साथ भेदभाव किया जाता है, उनके लिए अलग बर्तन रखे जाते हैं, उन्हें अलग बैठाया जाता है और कई बार उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो वे इंसान ही न हों. धार्मिक पूजा-पाठों और सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों में भी दलित महिलाओं की उपस्थिति को लेकर अनेक तरह की अदृश्य और प्रत्यक्ष सीमाएं कायम हैं.

दलित महिलाओं के संदर्भ में सहानुभूति और सार्वजनिक आक्रोश में भी जातिगत अंतर दिखाई देता है. जब किसी प्रभावशाली या उच्च जाति की महिला के साथ हिंसा होती है, तो मीडिया और समाज की संवेदना तीव्र हो उठती है और ऐसा होना भी चाहिए. लेकिन जब किसी दलित, आदिवासी या वंचित समुदाय की बेटी के साथ बलात्कार, हत्या या सामूहिक हिंसा जैसी भयावह घटना होती है, तो वही संवेदना अक्सर कमज़ोर पड़ जाती है. दूर-दराज के गांवों में होने वाली ऐसी घटनाएं राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा तक नहीं बन पातीं.

मेरे लिए स्वतंत्रता का अर्थ ऐसी बहनापे (Sisterhood) की स्थापना है जो केवल जैविक स्त्रीत्व पर आधारित न हो, बल्कि जातिगत विशेषाधिकारों को पहचानने और उनका प्रतिरोध करने का साहस भी रखती हो. असली बहनापा वही है जो दलित, आदिवासी और अन्य वंचित महिलाओं के संघर्षों के साथ खड़ी हो. जब तक महिलाएं स्वयं महिलाओं के बीच जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर भेदभाव करती रहेंगी, तब तक स्त्री-मुक्ति का सपना अधूरा रहेगा.

एक आंबेडकरवादी के रूप में मुझे यह साफ दिखाई देता है कि हमारी आज़ादी के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक वह परंपरावादी, रूढ़िवादी, विभाजनकारी सामाजिक व्यवस्था है, जो सदियों से असमानता को परंपरा और संस्कृति के नाम पर सही ठहराती आई है. धर्म और संस्कृति के नाम पर यहां ग़ैर-बराबरी को पवित्रता का आवरण दिया गया. ‘शुद्ध’ और ‘अशुद्ध’ की अमानवीय धारणा और सोच ने मनुष्यों के बीच ऐसी दीवारें खड़ी कीं, जिनका असर आज भी हमारे सामाजिक जीवन में दिखाई देता है. इसलिए स्वतंत्रता का सवाल केवल राजनीतिक सत्ता से मुक्ति का सवाल नहीं है, यह उन मानसिक और सामाजिक संरचनाओं से मुक्ति का भी सवाल है जो मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को नियंत्रित करती हैं.

बाबा साहेब ने उस सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की जो मनुष्य की गरिमा को उसकी जन्म-आधारित जाति से तय करती है. किसी भी परंपरा का मूल्य केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह पुरानी है. जो परंपरा मनुष्य की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता के विरुद्ध खड़ी हो, उसकी आलोचना करना ही वास्तविक लोकतांत्रिक चेतना है.

जाति व्यवस्था को बनाए रखने का एक सबसे प्रभावी माध्यम महिलाओं की पसंद और उनकी यौनिक तथा वैवाहिक स्वायत्तता पर नियंत्रण है. जब कोई स्त्री या पुरुष सामाजिक घेरे को तोड़कर अपनी पसंद से प्रेम या विवाह करने का निर्णय लेते हैं, तो परिवार, समुदाय और कभी-कभी तथाकथित खाप पंचायतें तक उनके खिलाफ़ खड़ी हो जाती हैं. जिस समाज में अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनना भी जीवन के लिए ख़तरा बन जाए, वहां हमें यह सवाल ज़रूर पूछना चाहिए कि हमारी स्वतंत्रता आखिर किसके लिए है?

इसी तरह आर्थिक स्वतंत्रता के बिना सामाजिक स्वतंत्रता भी अधूरी है. पर दलित महिला की स्वतंत्रता का अर्थ केवल हिंसा से सुरक्षा नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, संपत्ति, आय और अपने आर्थिक निर्णयों पर अधिकार भी है. जब तक किसी महिला के हाथ में अपने जीवन के फैसले लेने के लिए आवश्यक आर्थिक संसाधन नहीं होंगे, तब तक उसकी स्वतंत्रता अधूरी रहेगी.

एक आंबेडकरवादी के रूप में मेरी स्वतंत्रता की अवधारणा स्वतंत्रता, समता और बंधुता के अविभाज्य संबंध पर आधारित है. बाबा साहेब ने लोकतंत्र को केवल शासन की एक प्रणाली के रूप में नहीं देखा. उनके लिए लोकतंत्र सामाजिक जीवन की एक नैतिक पद्धति भी था. यदि स्वतंत्रता के साथ समानता नहीं है, तो स्वतंत्रता कुछ लोगों के विशेषाधिकार में बदल सकती है. यदि समानता के साथ स्वतंत्रता नहीं है, तो समानता मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को कुचल सकती है. और यदि इन दोनों के साथ बंधुता नहीं है, तो समाज में वास्तविक मानवीय संबंध विकसित नहीं हो सकते.

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है. लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है कि अलग-अलग विचारों, पहचानों और अनुभवों वाले लोग समान गरिमा के साथ-साथ रह सकें. लोकतंत्र का अर्थ असहमति के अधिकार को स्वीकार करना, दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करना और सत्ता से सवाल पूछने की नागरिक क्षमता को सुरक्षित रखना है.

आज स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा अर्थ मेरे लिए संविधान की रक्षा करना है. संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, यह उन करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं और अधिकारों का आधार है जिन्हें सदियों से सामाजिक बराबरी से वंचित रखा गया. दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित समुदायों के लिए संविधान समान नागरिकता और न्याय की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है.

स्वतंत्रता के मायने तब तक अधूरे हैं, जब तक सत्ता, संसाधनों, साहित्य, मीडिया, शिक्षा, न्याय और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अन्य वंचित समुदायों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती. आज़ादी का अर्थ केवल यह नहीं है कि हम पर शासन करने वाले का रंग या नाम बदल जाए. आज़ादी का अर्थ है कि शासन और निर्णय लेने की प्रक्रिया में समाज के सबसे हाशिए पर खड़े व्यक्ति की आवाज़ सुनी जाए और उसे बराबर का नागरिक माना जाए.

जाति के रहते हुए कोई भी समाज पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकता. इसलिए स्वतंत्रता दिवस का सच्चा अर्थ जातिगत श्रेष्ठता और हीनता की मानसिकता को चुनौती देना भी है. हमें अपनी जातिगत पहचानों के अहंकार से आगे बढ़कर ऐसी मानवीय पहचान का निर्माण करना होगा जिसमें किसी व्यक्ति की गरिमा उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके मनुष्य होने से निर्धारित हो.

और सबसे बढ़कर, एक महिला के लिए स्वतंत्रता का सबसे प्राथमिक अर्थ है, भय से मुक्ति. वह भय कि सड़क पर अकेले निकलने पर उसके साथ कुछ हो सकता है, वह भय कि अपनी पसंद का साथी चुनने पर परिवार या समाज उसके खिलाफ खड़ा हो जाएगा, वह भय कि अपनी बात कहने पर उसे चरित्रहीन कह दिया जाएगा, वह भय कि अपनी जाति की सीमाओं को लांघने पर उसकी जान तक जा सकती है.

जब कोई महिला रात के किसी भी पहर बिना भय के सड़क पर चल सके, जब दलित महिला को अपने अस्तित्व और सम्मान की रक्षा के लिए हर क्षण संघर्ष न करना पड़े और जब किसी लड़की को अपनी पसंद के कपड़े पहनने, पढ़ने, प्रेम करने, विवाह करने या जीवन का रास्ता चुनने के लिए हिंसा का सामना न करना पड़े, तभी हम कह सकेंगे कि स्वतंत्रता वास्तव में समाज के जीवन में उतर रही है.

अक्सर जब हम इन गंभीर सवालों पर बात करते हैं, तो तथाकथित बौद्धिक वर्ग उन्हें कठिन और अकादमिक भाषा में बांध देता है. लेकिन एक कार्यकर्ता और लेखक के रूप में मेरी भाषा जमीन के संघर्षों से पैदा होती है. मेरी भाषा में कबीर का बेगमपुरा है, ज्योतिराव फुले की तार्किकता है, सावित्रीबाई फुले का साहस है और डॉ. आंबेडकर का मुक्ति-संघर्ष है. यह भाषा कृत्रिम या सजावटी शब्दों की मोहताज नहीं है. यह उस मां की भाषा है जिसके बेटे को जातिगत हिंसा में मार दिया गया, यह उस लड़की की भाषा है जो अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए पितृसत्तात्मक बंदिशों को तोड़कर घर से बाहर निकलती है, यह उस महिला की भाषा है जो अपने श्रम का उचित मूल्य मांगती है, और यह उस कार्यकर्ता की भाषा है जो अन्याय के खिलाफ़ सड़क पर उतरने का साहस रखती है.

आज़ादी कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो एक बार मिल गई और हमेशा के लिए हमारी हो गई. आज़ादी एक पौधे की तरह है, जिसे हर दिन समता, न्याय, साहस और विवेक के पानी से सींचना पड़ता है. यदि हम सजग नहीं रहे, तो सत्तावादी, जातिवादी और पितृसत्तात्मक ताकतें इस पौधे को सुखाने की कोशिश करेंगी. इसलिए आज के समय में मेरे लिए स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि संघर्ष ही स्वतंत्रता का दूसरा नाम है.

जब तक इस देश में एक भी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अछूत माना जाता है, जब तक एक भी महिला को अपनी स्वतंत्रता की कीमत हिंसा के रूप में चुकानी पड़ती है, जब तक किसी लड़की को अपनी पसंद से जीवन जीने के लिए समाज से लड़ना पड़ता है, जब तक धर्म और रूढ़ियों के नाम पर मनुष्यों को बांटा जाता है और जब तक किसी नागरिक की गरिमा उसके जन्म, जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर तय होती है- तब तक हमारी आज़ादी अधूरी है.

(अनिता भारती कवि-कथाकार हैं.)

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