घुमंतू समुदाय की पीड़ा: ‘जीने को ठिकाना नहीं, मरने के बाद दो गज ज़मीन नहीं’

घुमंतू मुक्ति दिवस पर विशेष: 31 अगस्त इसलिए केवल ‘विमुक्ति’ की ऐतिहासिक तारीख नहीं, बल्कि अधूरी मुक्ति को पूरा करने का संकल्प है. क़ानून ने अपराधी होने का कलंक हटाया था. अब समाज और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उस कलंक की बची हुई छाया भी मिटाए.

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घुमंतू समुदाय की एक महिला. (फाइल फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

29 दिसंबर 2025 की सुबह बाड़मेर की सड़कों पर एक शव पड़ा था. उसके आसपास रोते-बिलखते परिजन थे, अपने लोगों के साथ खड़ा एक पूरा समुदाय था और सामने प्रशासन था. यह कोई सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं था. लोग अपने किसी अधिकार, नौकरी या मुआवजे के लिए सड़क पर नहीं आए थे. वे अपने मृतक के अंतिम संस्कार के लिए जमीन मांग रहे थे.

कुछ महीने पहले भी दमाराम कालबेलिया की मृत्यु के बाद ऐसा ही संकट खड़ा हुआ था. जिस पारंपरिक स्थान पर समुदाय अंतिम संस्कार करता रहा था, वह वन विभाग की आरक्षित भूमि होने के कारण वहां स्थायी रूप से श्मशान की व्यवस्था नहीं हो सकी. उस समय प्रशासन को विशेष अनुमति लेकर अंतिम संस्कार कराना पड़ा और समुदाय को स्थायी भूमि उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया. लेकिन जब 29 दिसंबर को फिर एक मौत हुई और श्मशान भूमि का सवाल फिर सामने खड़ा हो गया, तो समाज को शव के साथ सड़क पर उतरना पड़ा.

मैं खुद एक घुमंतू समुदाय से आता हूं. इसलिए जब मैं ऐसी घटना देखता हूं, तो उसे किसी दूसरे की कहानी मानकर आगे नहीं बढ़ सकता. मेरे मन में बस एक सवाल उठता है कि क्या इस देश में हमारे लिए जीते-जी जगह नहीं है, और मरने के बाद भी नहीं?

हम इसी मिट्टी में जन्म लेते हैं, इसी समाज के बीच बड़े होते हैं, अपनी मेहनत और अपने हुनर से जीवन चलाते हैं, अपनी कला, संगीत और परंपराओं से इस देश की संस्कृति को समृद्ध करते हैं. लेकिन जीते-जी अपने ठिकाने की गारंटी नहीं और मरने के बाद सम्मान के साथ अंतिम विदाई की भी नहीं.

घुमंतू कालबेलिया समाज के बारे में एक ऐसी पीड़ा है, जिसे बहुत कम लोग समझते हैं. कई बार किसी घर में कोई मर जाता है तो परिवार खुलकर रो भी नहीं पाता. उन्हें डर होता है कि कहीं मौत की खबर फैल गई तो अंतिम संस्कार करने से रोक न दिया जाए. इनके सामने अपने किसी प्रियजन के जाने के बाद सबसे पहला सवाल यह नहीं होता कि हम अपने दुख को कैसे संभालें; सवाल यह होता है कि अब उसका अंतिम संस्कार कहां करें? कई बार जगह नहीं मिलती तो मजबूरी में घर के आसपास ही अंतिम संस्कार करना पड़ता है. तब जिंदा और मुर्दा, दोनों एक ही बस्ती में रहने को मजबूर हो जाते हैं.

सोचिए, किसी परिवार के लिए इससे बड़ी पीड़ा क्या होगी कि अपने पिता, मां, भाई या किसी बच्चे के मरने पर वह खुलकर शोक भी न मना सके. हमारे समाज के कुछ परिवारों की यही सच्चाई है. वे मृत्यु से कम और मृत्यु के बाद की बेबसी से ज्यादा डरते हैं.

तब मेरे मन में संविधान, अधिकार और आजादी को लेकर कई सवाल उठते हैं. हमारे लिए आजादी के क्या मायने हैं? हमारे अधिकार आखिर कहां हैं? अगर एक नागरिक को जीवन भर पहचान, जमीन और सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़े और मृत्यु के बाद भी उसे दो गज जमीन न मिले, तो हम किस आजादी और अधिकार की बात कर रहे हैं?

सरकार की जिम्मेदारी तो तय है ही, क्योंकि नागरिकों को सम्मान के साथ जीने और मरने की बुनियादी व्यवस्था देना राज्य का दायित्व है. लेकिन समाज भी इस सवाल से बच नहीं सकता. जिस समाज को हमारे गीत, नृत्य, कला और संस्कृति पर गर्व है, क्या उसे हमारे जीने और मरने के अधिकार की चिंता नहीं होनी चाहिए? मुझे लगता है कि घुमंतू जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जन्म लेना आसान है, जीना मुश्किल है और कई बार मरना उससे भी ज़्यादा मुश्किल है.

घुमंतू कौन है और इनका क्या योगदान है?

घुमंतू समुदायों को समझना केवल कुछ ऐसी जातियों या समूहों की पहचान करना नहीं है, जो एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहे हैं. वे भारत के उस जीवित इतिहास का हिस्सा हैं, जिसने सदियों तक रास्तों के साथ अपना रिश्ता बनाया. बंजारा, कालबेलिया, नट, गाड़िया लोहार, सपेरा, कठपुतली कलाकार, पशुपालक और अनेक दूसरे समुदाय मौसम, काम और अपनी पारंपरिक आजीविका के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते रहे. वे केवल अपना डेरा नहीं बदलते थे; अपने साथ गीत, संगीत, लोककथाएं, भाषा, पहनावा, हुनर और जीवन का अनुभव भी लेकर चलते थे.

भारत के गांवों, कस्बों और दूर-दराज के इलाकों को जोड़ने में इन समुदायों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है. जब आज की तरह सड़कें, बाजार और परिवहन के साधन हर जगह नहीं पहुंचे थे, तब घुमंतू समुदाय ही कई क्षेत्रों के बीच संपर्क की कड़ी बने. बंजारों ने दूर-दराज तक व्यापार और जरूरी वस्तुओं के आवागमन में भूमिका निभाई. पशुपालक समुदायों ने अपने पशुधन के साथ अलग-अलग भूभागों और चरागाहों के बीच संबंध बनाए रखा. गाड़िया लोहार गांव-गांव जाकर खेती और रोजमर्रा के काम आने वाले औजार बनाते और सुधारते रहे. नट, कालबेलिया, सपेरा और कठपुतली कलाकारों ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि अपने गीतों, नृत्यों और कथाओं के माध्यम से लोकस्मृतियों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया.

इन समुदायों के पास जीवन और प्रकृति से जुड़ा एक ऐसा ज्ञान भी रहा है, जिसे अक्सर किताबों में जगह नहीं मिली. मौसम की पहचान, पशुओं की देखभाल, जंगल और वनस्पतियों की समझ, रास्तों और जलस्रोतों का ज्ञान, पारंपरिक उपचार, हस्तकला और लोककलाएं- यह सब उनकी पीढ़ियों की कमाई है.

उनके जीवन का विश्वविद्यालय कोई इमारत नहीं था; रास्ते ही उनके विद्यालय थे और अनुभव उनकी किताबें. बुजुर्गों से बच्चों तक हुनर और ज्ञान चलते रहे. पिता के हाथों से बेटों तक, मां के गीतों से बेटियों तक और गुरु से शिष्य तक एक पूरी सांस्कृतिक विरासत आगे बढ़ती रही.

घुमंतू समुदायों ने भारत की संस्कृति को केवल संभालकर नहीं रखा, बल्कि उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया भी. वे जहां गए, वहां अपने साथ अपने गीत, भाषा और परंपराएं ले गए और वहां की संस्कृति से भी कुछ सीखकर अपने जीवन में शामिल किया. इस तरह वे अलग-अलग समाजों और क्षेत्रों के बीच एक सांस्कृतिक पुल की तरह रहे. उनकी आवाजाही ने केवल रास्ते नहीं बनाए, बल्कि लोगों, भाषाओं, बाजारों और संस्कृतियों के बीच संबंध भी बनाए.

भारत से निकलकर दुनिया के अनेक हिस्सों तक पहुंचे घुमंतू समुदायों की यात्रा भी हमारे इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यूरोप सहित कई देशों में पहुंचे रोमा समुदाय, दूर देशों में रहने के बाद भी अपनी भाषा, संगीत, रीति-रिवाज और भारतीय मूल की सांस्कृतिक स्मृतियों को अपने साथ लेकर चले. पीढ़ियां बीत गईं, देश बदल गए, लेकिन संस्कृति की कई डोरियां बची रहीं. यह घुमंतू जीवन की एक बड़ी विशेषता रही है कि वे जहां गए, वहां पहुंचे, लेकिन अपनी जड़ों को पूरी तरह पीछे नहीं छोड़ा.

विडंबना यह है कि जिस समाज ने भारतीय संस्कृति को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया और भारत से बाहर दुनिया के अनेक हिस्सों तक उसकी सांस्कृतिक छाप पहुंचाई, उसी समाज को अपने ही देश में आज भी पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. वे लोग, जिनके पांवों ने इस देश की अनगिनत राहें नापीं, वे आज भी पूछ रहे हैं कि इस विशाल देश में आखिर हमारा अपना ठिकाना कहां है?

अपराधी बना दिए गए समुदाय

31 अगस्त घुमंतू, अर्द्धघुमंतू और विमुक्त समुदायों के लिए केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है. यह उस इतिहास को याद करने का दिन है, जिसमें पूरे-पूरे समुदायों को जन्म से अपराधी मान लिया गया था, और साथ ही यह सवाल पूछने का अवसर भी है कि कानून से मिली मुक्ति क्या वास्तव में जीवन में भी बराबरी, सम्मान और सुरक्षा में बदल पाई है?

घुमंतू समुदायों के वर्तमान संकट की जड़ें औपनिवेशिक इतिहास में छिपी हैं. वर्ष 1871 में ब्रिटिश शासन ने आपराधिक जनजाति अधिनियम लागू किया. इस कानून के तहत अनेक समुदायों को उनके किसी व्यक्तिगत अपराध के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी जातीय पहचान और जन्म के आधार पर ही ‘अपराधी’ घोषित कर दिया गया. उनकी आवाजाही पर निगरानी रखी गई, पुलिस में हाजिरी की व्यवस्था की गई और समुदाय के लोगों को हमेशा संदेह की निगाह से देखा गया.

स्वतंत्र भारत ने 1952 में आपराधिक जनजाति अधिनियम को समाप्त कर इन समुदायों को ‘विमुक्त’ किया. यह ऐतिहासिक कदम था, लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून खत्म होने के साथ वह मानसिकता भी खत्म हुई, जिसने इन समुदायों को पीढ़ियों तक अपराधी समझा था?

दुर्भाग्य से इसका उत्तर आज भी पूरी तरह सकारात्मक नहीं है. किसी इलाके में चोरी या आपराधिक घटना होने पर सबसे पहले घुमंतू बस्ती की ओर देखना, पुलिस की पूछताछ में समुदाय को सामूहिक संदेह के घेरे में लेना या केवल जातीय पहचान के आधार पर व्यक्ति को संदिग्ध मानना. ये घटनाएं बताती हैं कि औपनिवेशिक कानून भले खत्म हो गया हो, उसकी सामाजिक छाया अभी भी मौजूद है.

मुझे घुमंतू समुदायों के साथ काम करते हुए यह लगातार महसूस होता है कि उनकी सबसे बड़ी समस्या केवल ग़रीबी नहीं है बल्कि उसके साथ पहचान, स्थायित्व का अभाव और इनके प्रति समाज की मानसिकता उनकी अनेक समस्याओं की जड़ है. एक अधिकार दूसरे दस्तावेज पर निर्भर होता जाता है और सबसे वंचित व्यक्ति व्यवस्था के दरवाजे पर ही खड़ा रह जाता है.

अलग संवैधानिक पहचान का सवाल

घुमंतू, अर्द्धघुमंतू और विमुक्त समुदायों की सबसे बड़ी समस्याओं में एक यह है कि देश में उनकी कोई अलग संवैधानिक श्रेणी नहीं है. अलग-अलग राज्यों में ये समुदाय कहीं अनुसूचित जाति, कहीं अनुसूचित जनजाति और कहीं अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल हैं. कई समुदायों की स्थिति और पहचान राज्य बदलते ही बदल जाती है.

इस बिखरी हुई व्यवस्था का सीधा असर समुदायों के अधिकारों और योजनाओं तक पहुंच पर पड़ता है. एक ही तरह की सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों से गुजरने वाले समुदाय अलग-अलग श्रेणियों में बंटे हुए हैं, इसलिए उनके लिए एक स्पष्ट और समग्र नीति बनाना भी मुश्किल होता है.

देश में घुमंतू, अर्द्धघुमंतू और विमुक्त समुदायों की आबादी 15 फ़ीसदी से ज़्यादा है. लंबे समय से समुदाय की मांग रही है कि उनकी विशिष्ट ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें अलग पहचान और संवैधानिक दर्जा दिया जाए.

जमीन और आवास- सबसे बुनियादी सवाल

घुमंतू समाज का जीवन हमेशा चारागाह, गोचर, ओरण, जंगल और अन्य साझा प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा रहा है. पशुपालन, लोककला, व्यापार और पारंपरिक आजीविका के सहारे उन्होंने अपना जीवन चलाया. लेकिन आज हालात बदल रहे हैं. विडंबना देखिए, एक समय साझा संसाधनों की रीढ़ की हड्डी और मालिक घुमंतू समुदाय आज उसी जमीन पर ‘अतिक्रमणकारी’ कहलाता है.

समाज और सरकार भी अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही इन्हीं कमजोर घुमंतू परिवारों पर ही करता है, लेकिन बाक़ी समुदायों को कम ही छेड़ता है. घुमंतू की गांवों में यही नियति है कि उनको हमेशा बाहरी होने का अहसास कराया जाता रहता है.

इसी साल मार्च में राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के डेलाना ग्राम पंचायत के कालाभाटा गांव में घुमंतू परिवारों को हटाने के लिए नोटिस दिए गए और बुलडोजर भी पहुंच गए. विरोध और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई रुक गई, लेकिन 60 साल से अधिक समय से वहां घर बनाकर रह रहे परिवारों के मन में एक सवाल रह गया कि क्या इस देश में हमारे लिए भी कोई जगह है?

दूसरी तरफ राजसमंद जिले में तीन गांवों के 42 घुमंतू परिवारों को जिला प्रशासन और कलेक्टर के प्रयास और ओलखाण ट्रस्ट की पहल से अपने घरों की जमीन के पट्टे मिले. उनके लिए यह सिर्फ एक कागज नहीं था, बल्कि अपने अस्तित्व का दस्तावेज था. यह फर्क बहुत कुछ कहता है. एक तरफ बुलडोजर का डर और दूसरी तरफ हाथ में जमीन का पट्टा. लेकिन जिसके हाथ में जमीन का पट्टा आता है उसके भीतर सुरक्षा और भविष्य का भरोसा पैदा होता है.

राजस्थान में सरकार द्वारा आवासीय भूमि के पट्टे देने एवं दस्तावेज बनाने के काफ़ी प्रयास हुए हैं, लेकिन दस्तावेजों का अभाव और जटिल प्रक्रियाओं की बाधा के चलते सबसे वंचित घुमंतू परिवार आज भी अक्सर पीछे रह जाते हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि आदिवासी समुदायों को जिस प्रकार वन अधिकार मान्यता क़ानून बनाकर व्यक्तिगत एवं सामूहिक वन का अधिकार दिया है जिससे उनकी पहचान और आजीविका सुरक्षित हुई है उसी तर्ज़ पर घुमंतू समुदायों को होमस्टेड अधिकार जिसमें ज़मीन, आवास, शमशान भूमि और साझा शामलात संसाधनों पर सामूहिक हक़ का क़ानूनी अधिकार मिले ताकि आजीविका तथा परंपरागत संस्कृति सुरक्षित हो सके.

सरकारी नीतियों और कानून ने पारंपरिक आजीविका छिनी

घुमंतू समुदायों की जिंदगी कभी उनके अपने हुनर और परंपरागत कामों पर टिकी थी. कोई पशुपालन करता था, कोई ऊंट, बैल और दूसरे पशुओं के व्यापार से जुड़ा था, तो कोई लोककला, जड़ी-बूटी, लोहे का काम या दूसरे पारंपरिक हुनर से अपना घर चलाता था. लेकिन धीरे-धीरे ऐसे कानून और नीतियां आती गईं, जिनसे उनके जंगल, पशु और पारंपरिक कामों तक पहुंच पर रोक लगती गई.

वन्यजीव संरक्षण कानून, आदतन अपराधी कानून, ऊंट सहित पशुओं के खरीद-बिक्री पर लगी पाबंदियों ने उनकी रोज़ी-रोटी पर सीधा असर डाला. सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ रोजगार का नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा उनका ज्ञान और हुनर भी ख़त्म होने लगा. जिस काम को कभी उनकी पहचान और सम्मान माना जाता था, वही काम कानून की नजर में गलत या संदिग्ध बना दिया गया.

आज हालत यह है कि जिन समुदायों के पास कभी अपने हुनर और पशुधन की पूंजी थी, उनमें से कई परिवार रोज़गार की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर हैं. कानूनों ने उनके हाथ से काम तो छीन लिया, लेकिन उनके लिए जीने का कोई दूसरा रास्ता नहीं बनाया.

आयोग बने, रिपोर्टें आईं- पर बदलाव कितना आया?

घुमंतू और विमुक्त समुदायों की स्थिति को समझने के लिए समय-समय पर आयोग और समितियां बनाई गईं. 2008 में बालकृष्ण रेणके आयोग और बाद में 2014-15 में भिखू राम इदाते आयोग ने इन समुदायों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर विस्तार से बात की. आयोग अपनी रिपोर्ट दे देते हैं, सरकारें उस पर विचार करने की बात करती हैं, लेकिन बस्ती में रहने वाले लोगों के जीवन में कोई बदलाव हासिल नहीं हुआ.

समुदाय लंबे समय से आरक्षण, उचित प्रतिनिधित्व, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की मांग करता आ रहा है. इन मांगों को केवल राजनीतिक मांग कहकर नहीं देखा जा सकता. ये उन समुदायों की आवाज हैं, जो लंबे समय से व्यवस्था के किनारे खड़े रहे हैं. अब जरूरत है कि उनकी ऐतिहासिक वंचना को समझते हुए उन्हें समान अवसर और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का वास्तविक मौका दिया जाए.

जनगणना में दिखाई देना भी अधिकार

घुमंतू और विमुक्त समुदायों की सबसे बड़ी समस्याओं में एक यह भी है कि उनकी वास्तविक संख्या और सामाजिक स्थिति का स्पष्ट एवं विश्वसनीय सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. जब हमें यह ठीक से पता ही नहीं होगा कि समुदाय की संख्या कितनी है, वे कहां रहते हैं और उनकी शिक्षा, रोजगार, आवास तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है, तो उनके लिए सही नीति और पर्याप्त बजट कैसे बनाया जाएगा?

जो समुदाय आंकड़ों में दिखाई नहीं देता, वह अक्सर योजनाओं में भी पीछे छूट जाता है.

इसी सवाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी कि आगामी जनगणना में घुमंतू, अर्द्धघुमंतू और विमुक्त समुदायों की अलग से गणना के लिए एक अलग कॉलम रखा जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय याचिकाकर्ताओं को अपनी मांग संबंधित सरकारी प्राधिकरण के समक्ष रखने का रास्ता बताया. यह केवल आंकड़ों का मामला नहीं है. जनगणना में दिखाई देना भी एक तरह से अपने अस्तित्व को दर्ज कराना है.

विशेष गहन पुनरीक्षण और समान नागरिक संहिता: पहचान पर बढ़ता संकट

घुमंतू, अर्द्ध-घुमंतू और विमुक्त समुदायों के सामने विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया एक गंभीर चिंता बनकर उभर रही है. जिन लोगों का जीवन पीढ़ियों से एक स्थान से दूसरे स्थान तक आते-जाते बीता है, जिनके पास स्थायी घर, जमीन के कागज़, जन्म प्रमाण-पत्र या पुरानी मतदाता सूचियों से जुड़े दस्तावेज़ आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए मांगे जाने वाले प्रमाण जुटाना बेहद मुश्किल है. इसका सीधा असर उनके मताधिकार पर पड़ने का खतरा है.

वोटर सूची से नाम कटना केवल वोट देने का अधिकार खोना नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे उनकी पहचान और नागरिक होने के अधिकार पर भी सवाल खड़े कर सकता है.

दूसरी ओर, समान नागरिक संहिता को लेकर भी इन समुदायों के बीच आशंका है, क्योंकि इनके जीवन, परिवार और सामाजिक संबंधों की अपनी विविध परंपराएं रही हैं. बिना उनकी वास्तविक परिस्थितियों समझे बनाई गई कोई भी प्रक्रिया इन समुदायों को अधिकारों से जोड़ने के बजाय और अधिक हाशिये पर धकेल रही है.

शिक्षा और नई पीढ़ी का भविष्य

घुमंतू परिवारों के बच्चों की शिक्षा आज भी बड़ी चिंता है. परिवार की आर्थिक मजबूरी, जरूरी दस्तावेजों का अभाव और सामाजिक भेदभाव बच्चों की पढ़ाई में रुकावट बनते हैं. कई बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़कर परिवार के साथ काम करने लगते हैं. फिर गरीबी और वंचना का वही चक्र अगली पीढ़ी तक पहुंच जाता है.

घुमंतू समाज के बच्चों के लिए केवल स्कूल खोल देना काफी नहीं है. उनकी जीवन परिस्थितियों को समझकर शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी. छात्रावास, छात्रवृत्ति, दस्तावेज बनाने में मदद, आने-जाने की सुविधा और पढ़ाई छूट जाने पर बच्चों को फिर से शिक्षा से जोड़ने की व्यवस्था जरूरी है.

नवोदय विद्यालय की तर्ज पर घुमंतू बच्चों के लिए विशेष आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए. विद्यालय केवल पढ़ाई के केंद्र न हों, बल्कि वहां बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ उनकी अपनी भाषा, कला, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान से भी जोड़ा जाए.

लोक कलाकारों को बचाना होगा

घुमंतू समाज भारत की जीवित सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण वाहक है. बंजारा, कालबेलिया, नट, कठपुतली कलाकार, सपेरा और अनेक लोक कलाकारों ने पीढ़ियों से संगीत, नृत्य, कहानी, हस्तकला और लोक परंपराओं को जीवित रखा है. लेकिन आज पारंपरिक कला से सम्मानजनक आय प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है. परिणामस्वरूप नई पीढ़ी अपनी कला छोड़कर दूसरे कामों की ओर जा रही है.

यदि कलाकारों को इज्जत, सामाजिक सुरक्षा, प्रशिक्षण, बाजार, मंच और सम्मानजनक पारिश्रमिक नहीं मिला, तो हम केवल एक पेशा नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति का एक हिस्सा खो देंगे.

घुमंतू, अर्द्ध-घुमंतू और विमुक्त नीति का इंतज़ार

देश में घुमंतू, अर्द्ध-घुमंतू और विमुक्त समुदायों के लिए कोई भी समग्र नीति नही है. विभिन्न आयोगों ने भी पहचान, शिक्षा, आवास, सामाजिक सुरक्षा और अलग से ठोस नीतियों की जरूरत को सामने रखा है. इन्हीं सवालों से एक स्पष्ट और प्रभावी नीति की जरूरत प्रतीत होती है. राजस्थान में भी घुमंतू एवं विमुक्त समुदायों के लिए अलग नीति बनाने की घोषणा हुई. उसका ड्राफ्ट भी तैयार हुआ लेकिन पास नहीं हो सकी.

हमारे लिए ऐसी नीति की आवश्यकता है जो हमारी संस्कृति एवं पहचान को सुरक्षित रखते हुए हमारा विकास करे और वो नीति हमारे लिए कोई सरकारी दस्तावेज भर नहीं है बल्कि यह उस लंबे इंतजार का जवाब है, जिसमें हम पहचान, जमीन, आवास, शिक्षा, आजीविका, संस्कृति और सम्मान के लिए पीढ़ियों से भटक रहे हैं.

एक ऐसी नीति, जो यह सुनिश्चित करे कि किसी घुमंतू को जीते-जी अपना होने का प्रमाण न देना पड़े और मरने के बाद उसे दो गज जमीन के लिए सड़क पर संघर्ष न करना पड़े.

‘विमुक्त’ का असली अर्थ

विमुक्ति का अर्थ केवल इतना नहीं होना चाहिए कि किसी कानून से समुदाय का नाम हटा दिया गया. वास्तविक मुक्ति तब होगी जब व्यक्ति को गरिमा और सम्मान मिले, स्थायी पहचान मिले, रहने के लिए सुरक्षित जमीन मिले, बच्चे को बिना रुकावट शिक्षा मिले, आजीविका हो, परिवार को स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा मिले और उसकी जातीय पहचान उसके खिलाफ इस्तेमाल न हो.

31 अगस्त हमें अतीत की पीड़ा याद दिलाता है, लेकिन इसका उद्देश्य केवल शोक मनाना नहीं है. यह सवाल पूछने और भविष्य की दिशा तय करने का दिन है. 31 अगस्त इसलिए केवल ‘विमुक्ति’ की ऐतिहासिक तारीख नहीं, बल्कि अधूरी मुक्ति को पूरा करने का संकल्प है. कानून ने अपराधी होने का कलंक हटाया था. अब समाज और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उस कलंक की बची हुई छाया भी मिटाए. जिस दिन घुमंतू समाज को अपनी पहचान साबित करने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, जिस दिन उसका घर सुरक्षित होगा, बच्चे का भविष्य सुरक्षित होगा, पारंपरिक आजीविका सुरक्षित होगी और उसकी संस्कृति को सम्मान मिलेगा- उस दिन हम कह सकेंगे कि 31 अगस्त की मुक्ति केवल कानून में नहीं, जीवन में भी आई है.

(लेखक ओलखाण ट्रस्ट के संस्थापक है तथा सोशल अकाउंटेबिलिटी फोरम फॉर एक्शन एंड रिसर्च एवं सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान के साथ जुड़कर घुमंतू समुदायों के सामाजिक- सांस्कृतिक अधिकारों व सामाजिक जवाबदेही के मुद्दों पर कार्यरत हैं.)