मणिपुर में एनआरसी की मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शनों के बीच जनगणना टाली गई

मणिपुर में एनआरसी लागू करने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच राज्य में एक सितंबर से शुरू होने वाली जनगणना को टाल दिया गया है. प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि जनगणना से पहले एनआरसी की कवायद कराई जाए. कई मेईतेई लोगों का आरोप है कि राज्य में बड़ी संख्या में रहने वाले कुकी-ज़ो समुदाय के लोग म्यांमार से आए ऐसे प्रवासी हैं जिनके पास आवश्यक दस्तावेज़ नहीं हैं.

इंफाल घाटी में जनगणना से पहले एनआरसी लागू करने की मांग को लेकर एक मशाल रैली. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मणिपुर में मंगलवार (1 सितंबर) से शुरू होने वाली जनगणना को अब टाल दिया गया है. मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने सोमवार को यह जानकारी दी. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और मांग की जा रही है कि पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की कवायद कराई जाए.

सोमवार शाम सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने ‘मणिपुर में जनगणना स्थगित करके राज्य के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा किया है.’

उन्होंने नागरिक समाज संगठनों और मणिपुर के भाजपा विधायकों की भी सराहना की. उन्होंने कहा कि ‘केंद्रीय नेताओं और अधिकारियों के साथ उनका लगातार संवाद आज के इस फैसले का कारण बना है.’

इंफाल में मणिपुर हाईकोर्ट ने भी कहा कि राज्य सरकार ने रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के निर्देश के बाद राज्य में जनगणना स्थगित करने का फैसला किया है.

हाईकोर्ट ने डिप्टी सॉलिसिटर जनरल के. समरजीत के हवाले से कहा कि अब केंद्र सरकार 7 जनवरी को जारी अपनी अधिसूचना में संशोधन करते हुए नई अधिसूचना जारी करेगी. 7 जनवरी की अधिसूचना में कहा गया था कि जनगणना का मकान सूचीकरण (House-listing) चरण 1 अप्रैल से 30 सितंबर के बीच कराया जाएगा. नतीजतन, राज्य सरकार ने कहा कि वह मंगलवार से शुरू होने वाली हाउस-लिस्टिंग जनगणना नहीं कराएगी.

मुख्य न्यायाधीश एम. सुंदर और जस्टिस ए. गुनेश्वर शर्मा की पीठ ने मणिपुर सरकार को राज्य में हाउस-लिस्टिंग की जनगणना अगली सुनवाई की तारीख, यानी 12 अक्टूबर तक स्थगित रखने का भी आदेश दिया.

ज्ञात हो कि देश के बाकी हिस्सों में जनगणना छह साल की देरी के बाद कराई जा रही है. ऐसे में मणिपुर में इसे और आगे टालने का मतलब होगा कि राज्य में पिछली 2010-11 की जनगणना और मौजूदा कवायद के बीच का अंतर और भी लंबा व अभूतपूर्व हो जाएगा.

सोमवार के घटनाक्रम से पहले इंफाल घाटी में विरोध-प्रदर्शन तेज हो गए थे. प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि जनगणना से पहले एनआरसी की कवायद कराई जाए. इसके लिए उन्होंने प्रशिक्षण गतिविधियों को बाधित किया और बंद भी लागू करवाए.

नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पिछले सप्ताह केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, गृह मंत्रालय के अधिकारियों और नितिन नबीन से मुलाकात की थी. प्रतिनिधिमंडल ने मांग रखी थी कि जनगणना से पहले एनआरसी कराया जाए, ताकि ‘मूल भारतीय नागरिकों’ की पहचान की जा सके. प्रतिनिधिमंडल ने अपनी मांग के पीछे मणिपुर में जारी जातीय हिंसा के कारण हुए बड़े पैमाने के विस्थापन को भी आधार बनाया.

मेईतेई संगठनों और नगा समुदाय के एक वर्ग समेत कई समूह जनगणना से पहले एनआरसी कराने की मांग कर रहे हैं. कई मेईतेई लोगों का आरोप है कि राज्य में बड़ी संख्या में रहने वाले कुकी-जो समुदाय के लोग म्यांमार से आए ऐसे प्रवासी हैं जिनके पास आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं.

इस बीच, राज्य अभी भी जातीय हिंसा की चपेट में है. इस वर्ष फरवरी से कुकी और नगा समुदायों के बीच – मई 2023 से मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच संघर्ष जारी है. आरटीआई के जरिए प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल तक 43,000 से अधिक विस्थापित लोग राहत शिविरों में रह रहे थे.

मालूम हो कि अब तक एनआरसी की कवायद केवल असम में की गई है. असम के नागरिकों की तैयार अंतिम सूची यानी अपडेटेड एनआरसी 31 अगस्त, 2019 को जारी की गई थी, जिसमें 31,121,004 लोगों को शामिल किया गया था, जबकि 1,906,657 लोगों को इसके योग्य नहीं माना गया था. यानी कुल आबादी के करीब 6 प्रतिशत लोग अंतिम एनआरसी सूची से बाहर कर दिए गए. हालांकि, भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने इसे अधिसूचित नहीं किया है.

हालांकि, इसके बाद यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई. भाजपा ने भी उस समय तक एनआरसी का समर्थन किया था, लेकिन बाद में उसने इसके नतीजे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. पार्टी का कहना था कि इसमें ‘संदिग्ध तरीकों से कई अवांछित और अज्ञात लोगों के नाम शामिल कर दिए गए’ हैं.