नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई) को मतदाता सूचियों का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) करने के चुनाव आयोग (ईसी) के अधिकार को सही ठहराते हुए कहा कि एसआईआर का सीधा संबंध निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने से है.
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह चार हफ़्तों के भीतर संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूचियों से हटाए गए लोगों के नाम केंद्र सरकार को भेजे.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनाया, जिनमें पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर कराने के लिए चुनाव आयोग की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी.
पीठ ने इस साल की शुरुआत में 29 जनवरी को लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे बुधवार को सुनाया गया.
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात की जांच की कि क्या संविधान के अनुच्छेद 326, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ और उसके तहत बनाए गए नियमों के अंतर्गत चुनाव आयोग के पास एसआईआर को उसके मौजूदा स्वरूप में लागू करने की शक्तियां हैं.
इस संबंध में सीजेआई सूर्यकांत ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘कानून खुद कहता है कि चुनाव आयोग किसी भी समय कारण दर्ज कर वोटर लिस्ट में बदलाव कर सकता है. इस कारण इसे गलत नहीं कहा जा सकता, वह भी सिर्फ इसलिए कि यह सामान्य संशोधन की प्रक्रिया से अलग है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हमारे हिसाब से विवादित एसआईआर ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ और उसके नियमों की जगह नहीं लेता. बल्कि, यह धारा 21(3) द्वारा निर्धारित सटीक वैधानिक सीमाओं के भीतर, अनुच्छेद 324 के तहत मिले संवैधानिक जनादेश में जान डालता है, उसे और मज़बूत करता है. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपने अधिकार से बाहर जाकर काम किया है.’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईआर का ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के संवैधानिक लक्ष्य से सीधा संबंध’ है.
बेंच ने यह भी कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का मतलब सिर्फ वोट डालने की प्रक्रिया ही नहीं है, बल्कि यह मूल रूप से ‘मतदाता सूचियों की सत्यनिष्ठा, सटीकता और विश्वसनीयता’ पर निर्भर करता है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव हैं.
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चुनाव आयोग द्वारा बताए गए कारण- जैसे कि पिछले एसआईआर को हुए चार दशक से ज़्यादा का समय बीत जाना, पिछले कुछ सालों में बड़े पैमाने पर नाम जोड़े और हटाए जाना, और तेज़ी से शहरीकरण और पलायन के कारण वोटर लिस्ट में नामों के दोहराव और गलतियों की संभावना होना- ये सभी ‘उस बुनियादी अखंडता को बनाए रखने’ के मकसद से हैं.
गौरतलब है कि ज़्यादातर याचिकाएं पिछले साल जून में दायर हुई थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर कराने का निर्णय लिया था. याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स, स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, राजद के सांसद मनोज झा, कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल, एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले शामिल हैं.
खास बात यह है कि एसआईआर के पहले दो चरण विवादों से घिरे रहे. पश्चिम बंगाल में 27 लाख मतदाताओं को चुनाव से दो हफ़्ते से भी कम समय पहले 19 न्यायिक ट्रिब्यूनलों द्वारा अपने भविष्य का फैसला किए जाने का इंतज़ार करना पड़ा; यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया. आख़िरकार, मतदान के दिन से पहले ट्रिब्यूनलों ने बहुत ही कम मामलों पर फैसला सुनाया.
एसआईआर प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने 4 मई को ‘द वायर’ से कहा था, ‘एसआईआर ने वोटर लिस्ट को छांटने का एक मॉडल पेश किया है. इस देश में हम जानते थे कि वोटर ही सरकार चुनते हैं. एसआईआर ने इस प्रक्रिया को ही उलट दिया है. अब सरकार यह तय कर सकती है कि वोटर कौन होंगे. एक बार जब यह बात मान ली जाती है, तो यह लोकतंत्र की मूल धारणा को पूरी तरह से पलट देती है.’
14 मई को चुनाव आयोग ने एसआईआर के तीसरे चरण का आदेश दिया है. इसमें 16 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं – आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, त्रिपुरा, तेलंगाना, उत्तराखंड.
इस प्रक्रिया में 3.94 लाख ज़मीनी स्तर के अधिकारी करीब 36 करोड़ वोटरों की जांच करेंगे.
