दास्तान-ए-गुरुदत्त: किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ

पुस्तक समीक्षा: महमूद फ़ारूक़ी की ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ में गुरुदत्त के द्वंद्व को समझने की कोशिश है. दास्तानगो मानो अपने रोल मॉडल के जीवन के कतरनें बटोरकर उससे बनी एक तस्वीर लोगों के सामने पेश करने की कवायद कर रहा है. और इसलिए अगर इस तस्वीर में उज्ज्वल पक्ष निखरकर सामने आया है तो कुछ स्याह पहलू भी. मगर आख़िर में गुरुदत्त को फ़क़ीर के आसन पर बिठा ही दिया गया है.

रतन थियाम का जादू: एक दर्शक की स्मृति

रतन थियाम ऐसे संस्कृतिकर्मी नहीं थे जो चुप रहकर कला में तल्लीन रहते. भीषण संकट और चुप्पी के इस दौर में भी वे सत्ता से सच कह सकते थे. जब मणिपुर जल रहा था, वे देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों से चुभते हुए प्रश्न पूछ रहे थे.

वर्ष 2024 का रंगमच: छोटे शहरों की अनकही दास्तान

हिंदी समाज हर शहर में एक नौजवान भी नहीं तैयार कर पा रहा है जो अपने शहर के रंगमंच से राब्ता रखकर उसका विश्लेषण या परिचय हिंदी के पाठक को उपलब्ध कराता रहे. शिक्षण संस्थान क्या कर रहे हैं? रंग समूह शैक्षणिक परिसर से जुड़ने के लिए क्या कोशिश कर रहे हैं? क्या हिंदी साहित्यकारों का अपने शहर के रंगमंच से कोई वास्ता है?