ज़्यादातर लोगों को लगता है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इतना ताक़तवर हो जाएगा कि हमारी नौकरियां खा जाएगा, क्योंकि वह इंसान का काम इंसान से ज़्यादा तेज़ और सस्ता कर देगा. जबकि यह आधी सच्चाई है, और आधा प्रोपगैंडा है, जो एआई के असली आर्थिक ख़तरे को छिपाने में मदद करता है.
पुस्तक अंश: 'दुनिया में जितना अनाज सड़ता है या जितना भोजन रोज़ फेंक दिया जाता है, उसको सही से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो समस्या काफ़ी हद तक हल हो जाएगी, मगर ऐसा होता नहीं है. सत्ता ख़ुद को पक्ष विपक्ष में बांट लेती है और सत्ता की भूख पेट भरने से नहीं सामने वाले पक्ष को भूखा रखने से मिटती है.' पढ़िए अनिमेष मुखर्जी की 'इतिहास की थाली' का यह हिस्सा.
पूंजीवाद ने गरीबों से उनकी तमाम अच्छी चीज़ें एक-एक कर छीनी है, इसमें अगला नंबर किताबों का है. कुछ समय बाद किताबें अमीरों का प्रिविलेज बन जाएंगी. वैसे ही, जैसे अब मोटा अनाज खाना, पैदल 10,000 क़दम चलना या साइकिल से दफ्तर जाना संभ्रांत तबके का शौक बना चला है.