पुस्तक अंश : एक ग्रन्थ के रूप में इसकी क्रमागत उन्नति के इतिहास के बावजूद जो सम्भावित प्रश्न इक्कीसवीं सदी के ‘महाभारत’ के श्रोता अथवा पाठक पूछ सकते हैं वह यह है कि, ‘क्या यह विभाजनकारी सामाजिक प्रथाओं को न्यायोचित ठहराता है?’ और यदि ऐसा है तो क्या हमें इसे एक राष्ट्रीय महाकाव्य का दर्जा देना चाहिए?