वही पुराना विभाजनकारी राग, स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण छोड़ गया निराश

अपने देश में जातीय-राष्ट्रवादी नेता और वैश्विक मंच पर उदार राजनेता की दोहरी भूमिका निभाना नरेंद्र मोदी के लिए संभव नहीं है. जब प्रधानमंत्री देश के बाहर मूल्यों के पैरोकार के रूप में खुद को प्रस्तुत करते हैं, जबकि घर में संस्थानों की स्वायत्तता पर अंकुश लगाते हैं, तो वैश्विक नेता इस विरोधाभास को न सिर्फ़ पहचानते हैं बल्कि उसे भारत के विरुद्ध इस्तेमाल भी करते हैं.

आपातकाल के पचास साल: जेपी आज भाजपा और संघ का स्थायी प्रतिपक्ष होते

जयप्रकाश नारायण पर आरोप लगता है कि उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ़ अपने आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से समर्थन लेकर हिंदुत्व को वैधानिकता दे दी, और उसके नेताओं का मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश सुनिश्चित कर दिया. राजद सांसद मनोज कुमार झा इसका ज़ोरदार प्रत्युत्तर देते हैं कि अगर आज जेपी होते तो मोदी सरकार का स्थायी प्रतिपक्ष होते.

आपातकाल के पचास साल: रामनाथ गोयनका का संपादकों को पत्र

अगर रामनाथ गोयनका जीवित होते और आज के 'अघोषित आपातकाल' पर अख़बारों के मालिकों और संपादकों को पत्र लिखते, तो शायद यह दर्ज करते कि वह प्रेस जो स्वतंत्र होने की अनुमति का इंतज़ार करती है, उसने अपनी मर्ज़ी से आजीवन क़ैदी बनना चुना है. और वह संपादक जो सत्य से मुंह मोड़ता है, उसे उस कुर्सी पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है.

50 साल बाद: आपातकाल का अघोषित, और कहीं तीखा संस्करण

1975 का आपातकाल इतिहास में स्याह अध्याय के रूप में दर्ज है. लेकिन आज का अघोषित आपातकाल और भी अधिक गंभीर है, क्योंकि यह लोकतंत्र का चोला पहन कर उसका गला घोंटता है. चुनाव अब केवल वोट डालने की प्रक्रिया तक सीमित हो गए हैं, और यह प्रक्रिया भी कई स्तरों पर कलुषित है.

महात्मा गांधी का मोदी को पत्र: तुम गाजा पर चुप क्यों रहे?

अगर आज महात्मा गांधी होते, तो वे फिलिस्तीनियों जैसे पीड़ित समुदायों के प्रति भारत की चुप्पी पर क्या कहते? राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा मानो गांधी की आत्मा को शब्द दे रहे हैं.

देश को चाहिये एक नया स्वतंत्रता आंदोलन

भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई केवल ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिये नहीं थी. यह सम्मान को पुनः प्राप्त करने, शक्तिहीनों को सशक्त बनाने और एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज बनाने के लिए एक सभ्यतागत आह्वान था. भारत को फिर से उन भावनाओं की आवश्यकता है..

‘बापू! आज की सरकार जिन्ना को सच्चा और आपकी धारणाओं को मिथ्या क़रार देने पर आमादा है’

भारत जैसे समृद्ध देश में जहां सभी धर्मों के लोग सम्मान से रहते हैं और आपके द्वारा प्रेरित हमारा संविधान सबको बराबरी का हक़ देता हैं. यहां धर्म के आधार पर शरणार्थियों में विभेद हो रहा है और नागरिकता प्रदान करने में संकीर्ण दायरे से धार्मिक आधार को देखा जाने लगा है बापू! इस नए क़ानून के बाद आपके सहयात्रियों द्वारा गढ़ी गई संविधान की प्रस्तावना बेगानी सी लग रही है.

बापू के नाम: आज आप जैसा कोई नहीं, जो भरोसा दिला सके कि सब ठीक हो जाएगा

जयंती विशेष: जिस दौर में गांधी को ‘चतुर बनिया’ की उपाधि से नवाज़ा जाए, उस दौर में ये लाज़िम हो जाता है कि उनकी कही बातों को फिर समझने की कोशिश की जाए और उससे जो हासिल हो, वो सबके साथ बांटा जाए.