पुस्तक समीक्षा: 'मैं बरबाद होना चाहती हूं' मलिका अमर शेख की आत्मकथा है, जो अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश ज़रूर देती दिखती है कि भारतीय समाज में बेटियों को इस लायक ज़रूर बनाया जाए कि वह अपने सिर पर बनी रहने वाली छत ज़रूर खरीद सकें, ताकि उन्हें खदेड़े जाने पर उलटकर पति के ही यहां अथवा अन्य किसी के यहां शरण न लेनी पड़े.
पुस्तक समीक्षा: अशोक पांडे द्वारा अनूदित इरविंग स्टोन की ‘लस्ट फॉर लाइफ’ महज विन्सेंट वॉन गॉग की जीवनी नहीं, बल्कि एक कलाकार के भीतर टूटते, जलते और सृजन में ख़ुद को खपा देने वाले मनुष्य की कथा है. यह किताब बताती है कि महान कला के पीछे कई बार गहरा अकेलापन, अस्वीकार का दर्द और आत्मक्षय की लंबी यातना छिपी होती है.
पुस्तक समीक्षा: मुश्ताक ख़ान ने 'भारत की आदिवासी-लोक चित्रकला' में लिखते हैं ये लोक-कलाचित्र मात्र प्रदर्शन की वस्तु नहीं आदिवासी लोक जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं. परंपरा का सबसे प्रमुख कार्य यही है. वह लोककला को केवल प्रदर्शनीय वस्तु न रहने देकर उसे जीवन का अंग बना देती है. इस प्रकार कलाकृति उस समाज की मान्यताओं का दर्पण बन जाती है.
पुस्तक समीक्षा: स्वामीनाथन की जीवनी का अद्भुत आकर्षण यह भी है कि इससे गुज़रते हुए आप स्वयं को स्वामीनाथन के पास बैठा, उन्हें काम करता देखना शुरु कर देते हैं. जिन्हें स्वामीनाथन की समकालीनता मिली उसे तो सराहा ही जा सकता है. मगर जिनका समय स्वामीनाथन के समय के साथ नहीं था, वे इस जीवनी में स्वामीनाथन की सघन उपस्थिति को अपनी उपस्थिति में घोल सकते हैं.
रीति साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ. बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रजभाषा के बजाय नई संस्कृतनिष्ठ हिंदी को राष्ट्र-निर्माण की कार्रवाई के तौर पर देखा गया. ब्रज के ग्रंथ संदिग्ध बन गए. ब्रजभाषा को कठघरे में खड़ाकर इस हिंदी ने अपनी जगह बना ली.
राही डूमरचीर की कविता इस भेद को मिटा देती है कि स्त्री से प्रेम करने और प्रकृति से प्रेम करने में कोई अंतर है. क्या स्त्री के प्रेम में जान देने और एक पेड़ की रक्षा के लिये अपना हासिल दांव पर लगा देने में कोई फ़र्क है?