1993 में अलीपुरद्वार में एकाएक आई बाढ़ ने सब कुछ बदलकर रख दिया था. देर से पहुंची राहत, अन्न की लूटपाट व दंगे स्थिति को और भयावह बना रहे थे. ऐसे में सबडिवीज़न के प्रशासन को सेना का ही सहारा था, पर क्या सेना के लिए यह मदद करना संभव था? पढ़िए बंगनामा की पैंतीसवीं क़िस्त.
योगी आदित्यनाथ एसआईआर में गड़बड़ियों को लेकर बोलने वाले देश के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बनने को कुछ लोगों ने इसे पहले से अन्य सीएम द्वारा एसआईआर संबंधी गड़बड़ियों की शिकायतों की पुष्टि के रूप में देखा है. हालांकि कई हलकों में यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या यूपी में एसआईआर में 'खेल' करने के अरमानों के विपरीत उलटे भाजपा को ही बड़े नुकसान का अंदेशा सताने लगा है?
नीतीश कुमार द्वारा की गई असभ्यता के पक्ष में दलीलें दी जा रही हैं कि मुख्यमंत्री को महिला विरोधी नहीं कहा जा सकता और न मुसलमान विरोधी क्योंकि इन दोनों के हित के लिए उन्होंने कई काम किए हैं. तो क्या इसका यह अर्थ समझें कि अगर आपने मेरी कोई मदद की है तो मैं आपको अपने साथ बदतमीज़ी करने का हक़ दे दूं?
नितिन नबीन को भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फैसला नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की उसी कड़ी का हिस्सा है जिसके तहत पार्टी अध्यक्ष के पद को लगातार कमज़ोर किया गया है. नए अध्यक्ष का अपना राजनीतिक वज़न बहुत कम है. हालांकि यह कदम बिहार में एक बड़ा चुनावी दांव भी है.
दिसंबर 2025 का इंडिगो संकट अनियंत्रित पूंजीवाद, डुओपॉली और नियामक विफलता का प्रतीक बन गया. उड़ान रद्द होने से लेकर 400 प्रतिशत तक किराया बढ़ने तक, इस संकट ने दिखाया कि भारतीय विमानन में नागरिक नहीं, मुनाफ़ा केंद्र में है, और सरकार कॉरपोरेट हितों की साझेदार बन चुकी है.
विश्व हिंदू परिषद ने ‘सांस्कृतिक सजगता’ के नाम पर हिंदुओं से क्रिसमस न मनाने की अपील की है. क़ानून के जानकारों का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान की प्रस्तावना में निहित बंधुत्व के सिद्धांत के विरुद्ध है.
माकपा की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा की पूर्व सांसद वृंदा करात ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2015 में मोहम्मद अख़लाक़ की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने के मामले में आरोपियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा वापस लेने के क़दम पर हस्तक्षेप की मांग की है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य का आज यह आपद्कार्य है कि वह खुली आंखों से साहस को पहचाने और उसकी भी निगरानी करे कि वह कहां-कब ग़ायब हो जाता है. साहित्य का, इस समय, यह भी कर्तव्य है कि वह स्वयं निर्भय हो, भयोत्पादक व्यवस्थाओं में शामिल या उनके बारे में चुप्पी साधने से इनकार करे और हमें निर्भयता की ओर ले जाए.
भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान (एफटीआईआई), ईटानगर का पहला बैच अधूरे कैंपस, बुनियादी ढांचे की कमी और प्रशासनिक अव्यवस्था के खिलाफ तीसरी बार शैक्षणिक हड़ताल पर है. छात्रों का कहना है कि संस्थान वादों पर खरा नहीं उतरा और वे तब तक कक्षाओं में नहीं लौटेंगे, जब तक सभी आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं.
लोकसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ई20 ईंधन को पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित बताया, लेकिन विशेषज्ञों ने इंजन क्षति, माइलेज गिरावट, भूमि-जल संकट और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए हैं. वहीं राजस्थान में निर्माणाधीन इथेनॉल संयंत्र के ख़िलाफ़ किसानों का ज़ोरदार विरोध जारी है.
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा 100% दोषसिद्धि दर का दावा करने के एक साल बाद द वायर की एक पड़ताल में सामने आया है कि लंबे समय तक हिरासत, ज़मानत न मिलने और जांचकर्ताओं के दबाव के कारण दर्जनों आरोपी, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम हैं, अपने मुक़दमे शुरू होने से पहले ही ख़ुद को दोषी मान लेने के लिए मजबूर हो रहे हैं.
भाजपा पर कुछ वर्ष पहले स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और किसान सेवा जैसी सरकारी योजनाओं के नाम पर जनता से ‘अवैध रूप से’ चंदा इकट्ठा करने का आरोप लगा है. पत्रकार बीआर अरविंदाक्षन को आरटीआई के ज़रिये पता चला है कि भाजपा को इन योजनाओं के लिए चंदा जुटाने की कोई विशेष अनुमति या स्वीकृति न तो केंद्र सरकार के किसी मंत्रालय से मिली थी, न ही पीएमओ से.
सितंबर 2024 में यूपी के कुशीनगर ज़िले में मुसहर समुदाय से आने वाले शैलेश की संदिग्ध मौत हो गई थी. बाद में सामने आया था कि वे माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के क़र्ज़ जाल में फंसे थे. इस घटना पर द वायर में छपी एक रिपोर्ट के आधार पर मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. लेनिन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत की थी. अब आयोग ने ज़िला प्रशासन को शैलेश के परिवार को आर्थिक सहायता देने का आदेश दिया है.
देश में माओवाद के ख़त्म होने की चर्चाएं तेज़ हैं, और दावा किया जा रहा है कि यह विकास की शुरुआत है. लेकिन माओवाद प्रभावित क्षेत्रों का आदिवासी समाज अपने जल-जंगल-ज़मीन को लेकर चिंतित है. खनन, सैन्य कैंपों के विस्तार और संसाधनों पर बढ़ते कॉरपोरेट दावों के बीच उनके अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हैं.
'सुधार' और 'सरलीकरण' के नाम पर एक ऐसा तंत्र खड़ा किया गया है, जो दशकों पुराने श्रमिक संघर्षों और उनकी सुरक्षा के अधिकारों को ताक में रखकर पूंजीपतियों की सुविधाओं को प्राथमिकता देता है. श्रम सुधारों का यह स्वरूप कारोबार के ऐसे माहौल का निर्माण कर रहा है जहां कॉरपोरेट हित सर्वोपरि हैं, और श्रमिकों की जायज़ मांगों की अनदेखी की जा रही है.