अब कूटनीति का दायरा केवल देशों तक सीमित नहीं रहा, अब उसमें 'छवि-सुरक्षा' का नया आयाम जुड़ गया था. विदेश नीति को अनौपचारिक रूप से दो भागों में बांट दिया गया था, पहला, दुनिया के देशों से संबंध बेहतर बनाए रखना. दूसरा, दुनिया को यह विश्वास दिलाते रहना कि कोई असुविधाजनक प्रश्न वास्तव में असुविधाजनक था ही नहीं.