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Ajit Anjum Mrinal Pande

मृणाल पांडे के बचाव में ‘गधा विमर्श’ क्यों?

वैशाखनंदन शब्द की उत्पति पर दर्जनों पोस्ट लिखकर ‘गधा विमर्श’ का ऐसा माहौल बना दिया गया है गोया जो वैशाखनंदन न समझ पाए वो भी उन्हीं के उत्तराधिकारी हैं.

मृणाल पांडे. (फोटो साभार: फेसबुक/आॅक्सफोर्ड बुक स्टोर)

मर्यादा की मारी चिंता और अफ़सोस का कर्मकांड

मृणाल पांडे में बाकी जो भी दुर्गुण हों, वे असभ्य और अशालीन होने के लिए नहीं जानी जातीं. वे किसी रूप में वामपंथी भी नहीं हैं. उन पर बीजेपी विरोधी होने का भी वैसा इल्ज़ाम नहीं रहा है, जैसा दूसरों पर है.

मेहुल चौकसी (फोटो साभार: डीएनए) और नरेंद्र मोदी (फोटो: रायटर्स)

जब देश का प्रधानमंत्री ही गाली-गलौज करने वालों को फॉलो करेगा तो उन पर लगाम कौन लगाएगा

आॅनलाइन गुंडागर्दी: ट्रोलिंग पर द वायर हिंदी की विशेष सीरीज़ की पहली कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार विद्या सुब्रमण्यम अपना अनुभव साझा कर रही हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

अब सोशल मीडिया के ज़रिये कालाधन पकड़ेगी सरकार

सोशल नेटवर्किंग साइटों को खंगालेंगे आयकर अधिकारी, डेटा विश्लेषण और सूचनाओं से पता लगाएंगे किसी व्यक्ति के खर्च और आमदनी के बीच का अंतर.

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‘जब भी कोई दल बहुमत से सत्ता में होता है, तब प्रेस की आज़ादी पर हमले होते हैं’

वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन ने प्रेस की आज़ादी और लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा समर्थित प्रेस और मीडिया को ही एकमात्र उपाय बताया.

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वो मीडिया को उस कुत्ते में बदल रहे हैं जिसके मुंह में विज्ञापन की हड्डी है, ताकि वह उन पर न भौंके

शुक्रवार, 9 जून को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने मीडिया के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार रखे. पढ़ें उनका पूरा भाषण…

(फोटो: रॉयटर्स)

उच्चतम न्यायालय ने वॉट्सऐप निजता नीति मामले को संविधान पीठ के पास भेजा

उच्चतम न्यायालय ने सोशल मीडिया साइट वॉट्सऐप की निजता नीति के मामले को एक संविधान पीठ के पास भेज दिया जो 18 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई करेगी.

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फेसबुकियों ने भी पेश किया एक्ज़िट पोलडांस

चुनाव संपन्न होने के बाद चैनलों और एजेंसियों ने एक्ज़िट पोल सर्वे पेश किए तो फेस​बुकिए क्यों पीछे रहते, उन्होंने भी गहन मंथन किया.

ससुरा बड़ा पइसावाला का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

भोजपुरी फिल्म फेस्टिवल : अपने ही जाल में उलझा भोजपुरी सिनेमा

बदलते दौर के भौतिक चमक-दमक को तो भोजपुरी सिनेमा खूब दिखाता है, पर सामाजिक -सांस्कृतिक मूल्यों की जड़ता से नहीं भिड़ता. वह एक बड़े विभ्रम का शिकार है.