शायरी

साहिर लुधियानवी की याद, गौहर रज़ा के साथ

वीडियो: मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी की पुण्यतिथि पर जाने-माने वैज्ञानिक, कलमकार, फिल्म निर्माता गौहर रज़ा से दामिनी यादव की बातचीत.

राहत इंदौरी: ख़ामोश हो गए इक शाम और उसके बाद तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू हम थे

बहुत कम शायर अवाम की बेचेहरगी और अवसाद को सत्ता के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बनाने में कामयाब हुए. ऐसे में राहत ने ग़ज़ल के हाशिये में पड़ी भाषा और मुंहफट चरित्रों को सत्ता के सामने खड़ा कर दिया. उनसे पहले भी शायरोंं ने सत्ता को आईना दिखाने की कोशिश की, लेकिन उनकी ग़ज़लें ज़रा ज़्यादा मुंहफट साबित हुईं.

आईआईटी कानपुर की जांच समिति ने कहा, फ़ैज़ की नज़्म गाने का समय और स्थान सही नहीं था

आईआईटी कानपुर के छात्रों द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई दिल्ली पुलिस की बर्बर कार्रवाई और जामिया के छात्रों के समर्थन में फ़ैज अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ को सामूहिक रूप से गाए जाने पर फैकल्टी के एक सदस्य द्वारा आपत्ति दर्ज करवाई गई थी.

औरत मुंह खोलती है तो मर्दों की आंखें बाहर आ जाती हैं

वीडियो: उर्दू और पंजाबी की मशहूर लेखिका और कवियत्री सारा शगुफ़्ता सिर्फ 29 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली थी. आज भी उनकी शायरी को एक औरत के दुखों के संदर्भ में पढ़ा जाता है. उनको याद करते हुए उनके जीवन संघर्ष को बता रही हैं यासमीन रशीदी.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का ‘हम देखेंगे’ मज़हब का नहीं अवामी इंक़लाब का तराना है…

जो लोग ‘हम देखेंगे’ को हिंदू विरोधी कह रहे हैं, वो ईश्वर की पूजा करने वाले ‘बुत-परस्त’ नहीं, सियासत को पूजने वाले ‘बुत-परस्त’ हैं.

ख़य्याम की धुनें कहानी का मुकम्मल किरदार हैं…

ख़य्याम ने जितनी फिल्मों के लिए काम किया उससे कहीं ज़्यादा फिल्मों को मना किया. एक-एक गाने के लिए वो अपनी दुनिया में यूं डूबे कि जब ‘रज़िया सुल्तान’ की धुन बनाई तो समकालीन इतिहास में तुर्कों को ढूंढा और और ‘उमराव जान’ के लिए उसकी दुनिया में जाकर अपने साज़ को आवाज़ दी.

ग़ालिब और उनका ‘चिराग़-ए-दैर’ बनारस

बनारस को दुनिया के दिल का नुक़्ता कहना दुरुस्त होगा. इसकी हवा मुर्दों के बदन में रूह फूंक देती है. अगर दरिया-ए-गंगा इसके क़दमों पर अपनी पेशानी न मलता तो वह हमारी नज़रों में मोहतरम न रहता.

‘मुझ से बड़ा शायर ना होगा जामई, हिंद-ओ-पाकिस्तान में और ना क़ब्रिस्तान में’

वीडियो: किसी ज़माने में फ़ख़्र-ए-बिहार कहे जाने वाले हास्य व्यंग्य के प्रसिद्ध उर्दू शायर असरार जामई इन दिनों दयनीय स्थिति में ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं. रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया और सरकार ने अपने रिकॉर्ड में उन्हें मृत बताकर उनका पेंशन भी बंद कर दिया.

‘हुक्मरां हो गए कमीने लोग, ख़ाक में मिल गए नगीने लोग’

जनता के अधिकारों के लिए सत्ता से लोहा लेने वाले हबीब जालिब ने गांव-देहात को अपने पांव से बांध लिया था और उसी पांव के ज़ख़्म पर खड़े होकर सत्ता को आईना दिखाते रहे.

अनवर जलालपुरी ऐसी दुनिया का ख़्वाब देखते थे, जिसमें ज़ुल्म और दहशत की जगह न हो

शायर अनवर जलालपुरी ऐसे गुलाब थे जिसकी ख़ुशबू जलालपुर की सरहदों को पार कर पूरी दुनिया में फैली और दिलों को महकाया.

अनवर जलालपुरी: मुशायरे का टीचर चला गया

अनवर जलालपुरी को याद करते हुए मशहूर शायर मुनव्वर राना कहते है कि एक टीचर के बतौर वो हमेशा यही चाहते थे कि मुशायरे का स्तर ख़राब न हो. वो सांप्रदायिकता और अश्लीलता की तरफ न जाये.

‘साहिर की शख़्सियत और उनकी शायरी एक-दूसरे में हूबहू उतर गए थे’

पुण्यतिथि विशेष: यह भी एक क़िस्म की विडंबना ही है कि जिस साहिर के कलाम गुनगुनाकर अनगिनत इश्क़ परवान चढ़े, उसकी अपनी ज़िंदगी में कोई इश्क़ मुकम्मल न हुआ.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़: जैसे बीमार को बेवजह क़रार आ जाए…

फ़ैज़ ऐसे शायर हैं जो सीमाओं का अतिक्रमण करके न सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान, बल्कि पूरी दुनिया के काव्य-प्रेमियों को जोड़ते हैं. वे प्रेम, इंसानियत, संघर्ष, पीड़ा और क्रांति को एक सूत्र में पिरोने वाले अनूठे शायर हैं.