शिक्षा का अधिकार

हमारे घरों के बच्चे जेएनयू आकर ‘देशद्रोही’ क्यों हो जाते हैं?

ऐसा क्यों है कि अलग-अलग जगहों से आने वाले बच्चे यहां आकर लड़ने वाले बच्चे बन जाते हैं? बढ़ी हुई फीस का मसला सिर्फ जेएनयू का नहीं है. घटी हुई आज़ादी का मसला भी सिर्फ जेएनयू का नहीं है.

जेएनयू बराबरी के समाज की सबसे ख़ूबसूरत संभावना है…

ऐसे सामाजिक पारिवारिक परिवेश, जिसमें उच्च शिक्षा की कल्पना डॉक्टरी-इंजीनियरिंग के दायरे से पार नहीं गई और नौकरी से परे शिक्षा को देखना एक तरह से अय्याशी और दूर की कौड़ी समझा जाता था, जेएनयू ने समझाया कि ये एक साज़िश है- समाज के बड़े तबके को बराबरी महसूस न होने देने की.

Allahabad: Children attend a class at a Government school on the occasion of 'World Literacy Day', in Allahabad, Saturday, Sept 8, 2018. (PTI Photo) (PTI9_8_2018_000090B)

बिहार के स्कूलों में सबसे खराब शिक्षक-छात्र अनुपातः एचआरडी मंत्रालय

बिहार में 38 छात्रों के मुकाबले एक शिक्षक है जबकि दूसरे स्थान पर दिल्ली है, यहां 35 छात्रों पर एक शिक्षक है. सबसे बेहतर स्थिति सिक्किम की है, जहां चार छात्रों पर एक शिक्षक है.

दिल्ली में 80 प्रतिशत से अधिक निजी स्कूल नहीं लागू कर रहे शिक्षा का अधिकार कानून: रिपोर्ट

यह सर्वेक्षण शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले एक एनजीओ इंडस एक्शन ने किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास आरटीई के तहत स्कूलों में दाखिला प्राप्त छात्रों की संख्या के बारे में सूचना उपलब्ध नहीं है.

सरकार उच्च शिक्षण संस्थाओं को ज्ञान के स्रोत के बजाय ‘प्रेशर कुकर’ में तब्दील कर रही है

जिस प्रकार कृषि क्षेत्र में ऋण से बढ़ते तनाव ने किसान आत्महत्या की समस्या पैदा की, स्कूल शिक्षा में परीक्षाओं और मेरिट के दबाव ने स्कूली विद्यार्थियों में आत्महत्याओं को जन्म दिया, तनाव निर्माण की उसी कड़ी में सरकार ने कॉलेज और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और शिक्षकों को झोंकने की तैयारी कर ली है.

बस्तर: जहां नागरिकों की सुध लेने वाला कोई नहीं

बस्तर के लिए लोकतंत्र क्या है? सरकार, मीडिया और कुछ एनजीओ के दावों से लगता है कि यहां विकास की ऐसी बयार आई हैं, जिसमें नागरिकों को ज़मीन पर ही मोक्ष मिल गया है.

कांग्रेस ने कहा- अर्थव्यवस्था की हालत बदतर, भाजपा बोली- दुनिया भर में तारीफ़ हुई

वीरप्पा मोइली ने कहा, आधारभूत संरचना क्षेत्र की परियोजनाएं रुकीं, इनकी संख्या बढ़ रही है. ऐसे में विकास दर में बढ़ोत्तरी कैसे होगी?

क्या स्कूल में फेल करने से बच्चे ज़िंदगी में ‘पास’ हो जाएंगे?

शिक्षा के अधिकार अधिनियम को पिछले सात साल में ठीक ढंग से लागू किया गया या नहीं, इसका आकलन किसी ने नहीं किया. सभी ने अपनी नाकामी को बच्चों पर थोप दिया और बच्चों की किसी ने पैरवी तक नहीं की.