स्टेन स्वामी

एल्गार परिषद-भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार 16 आरोपी (फोटोः द वायर)

अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने भारत सरकार को लिखा, भीमा कोरेगांव मामले के बंदियों को फ़ौरन रिहा करें

शिक्षाविदों, यूरोपीय संघ के सांसदों, नोबेल पुरस्कार विजेताओं और अन्य अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने भारतीय जेलों में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की दयनीय स्थिति और उचित मेडिकल देखरेख न होने पर चिंता जताते हुए कहा है कि उन्हें कोरोना वायरस के नए और अधिक घातक स्ट्रेन से संक्रमित होने का गंभीर ख़तरा है.

(बार्बेल कॉफ्लर और स्टेन स्वामी)

स्टेन स्वामी को मानवीय आधार पर रिहा किया जाना चाहिएः जर्मन मानवाधिकार आयुक्त

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी उन 16 अधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और शिक्षाविदों में से हैं, जिन्हें एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार किया गया. बीते अक्टूबर में हिरासत में लिए गए स्वामी को बीते दिनों हाईकोर्ट के आदेश के बाद अस्पताल में भर्ती करवाया गया है, जहां वे कोविड संक्रमित पाए गए.

फादर स्टेन स्वामी. (फोटो: पीटीआई)

हाईकोर्ट द्वारा अस्पताल में भर्ती करने के आदेश के दो दिन बाद कोरोना संक्रमित हुए स्टेन स्वामी

स्टेन स्वामी उन 16 शिक्षाविदों, वकील और कार्यकर्ताओं में से एक हैं, जिन्हें एल्गार परिषद-भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ़्तार किया गया था. उन पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं समेत कठोर यूएपीए क़ानून के तहत मामला दर्ज किया गया है.

उमर खालिद, फादर स्टेन स्वामी और हेनी बाबू एमटी. (फोटो साभार: फेसबुक/पीटीआई/ट्विटर)

क्या अदालतें ख़ुद को अपनी ही लगाई ग़ैर ज़रूरी बंदिशों से आज़ाद कर पाएंगी

इंसान की आज़ादी सबसे ऊपर है. जो ज़मानत एक टीवी कार्यक्रम करने वाले का अधिकार है, वह अधिकार गौतम नवलखा या फादर स्टेन का क्यों नहीं, यह समझ के बाहर है. अदालत कहेगी हम क्या करें, आरोप यूएपीए क़ानून के तहत हैं. ज़मानत कैसे दें! लेकिन ख़ुद पर यह बंदिश भी खुद सर्वोच्च अदालत ने ही लगाई है.

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

एल्गार परिषद: बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देश के बाद स्टेन स्वामी इलाज के लिए निजी अस्पताल में भर्ती

एनआईए ने पिछले साल अक्टूबर में भीमा कोरेगांव हिंसा-एल्गार परिषद मामले में 84 वर्षीय स्टेन स्वामी को गिरफ़्तार किया था. मामले की पिछली सुनवाई में स्वामी ने सरकारी अस्पताल में भर्ती होने की अदालत की सलाह से इनकार करते हुए कहा था कि वह भर्ती नहीं होना चाहते, उसकी जगह कष्ट सहना पसंद करेंगे और संभवत: स्थितियां जैसी हैं, वैसी रहीं तो जल्द ही मर जाएंगे.

फादर स्टेन स्वामी. (फोटो: पीटीआई)

एल्गार परिषद: स्टेन स्वामी ने कहा- अस्पताल में भर्ती होने से बेहतर जेल में कष्ट सहेंगे

एनआईए ने पिछले साल अक्टूबर में भीमा कोरेगांव हिंसा-एल्गार परिषद मामले में 84 वर्षीय स्टेन स्वामी को गिरफ़्तार किया था.स्वामी ने सरकारी अस्पताल में भर्ती होने की सलाह से इनकार करते हुए कहा कि वह भर्ती नहीं होना चाहते, उसकी जगह कष्ट सहना पसंद करेंगे और संभवत: स्थितियां जैसी हैं, वैसी रहीं तो जल्द ही मर जाएंगे. उन्होंने कहा कि जो दवाइयां वे दे रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा मजबूत मेरी गिरती हालत है.

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

झारखंड के कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र सरकार से कहा- स्टेन स्वामी को अस्पताल में शिफ्ट करें

भीमा कोरेगांव हिंसा-एल्गार परिषद मामले में 84 वर्षीय कार्यकर्ता स्टेन स्वामी के ख़िलाफ़ आईपीसी की विभिन्न धाराओं समेत कठोर यूएपीए क़ानून के तहत मामला दर्ज किया गया है. पिछले साल एनआईए ने उन्हें गिरफ़्तार किया था. पार्किंसन जैसी बीमारी से जूझने के बावजूद उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई थी.

अक्टूबर 2020 में सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा रांची में स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन. (फोटो: पीटीआई)

2,500 से अधिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों ने की स्टेन स्वामी को ज़मानत देने की अपील

एल्गार परिषद मामले में अक्टूबर 2020 में हिरासत में लिए गए 84 वर्षीय स्टेन स्वामी पार्किंसन समेत कई बीमारियों से पीड़ित हैं. मेडिकल आधार पर उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज होने के विरोध में जारी बयान में कहा गया है कि वे उन हज़ारों विचाराधीन क़ैदियों के प्रतीक हैं जो सालों से यूएपीए के फ़र्ज़ी आरोपों में जेल में हैं.

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

एल्गार परिषद मामला: अदालत का स्टेन स्वामी को ज़मानत देने से इनकार

एनआईए जज ने मेडिकल आधार पर भी 84 वर्षीय आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी, जबकि वे पार्किंसन समेत कई अन्य बीमारियों से जूझ रहे हैं.

फादर स्टेन स्वामी. (फोटो: पीटीआई)

एनआईए ने स्टेन स्वामी की ज़मानत याचिका का विरोध किया, दो संगठनों को माओवादी बताया

विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त 83 वर्ष के फादर स्टेन स्वामी को एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार किया गया था. उनकी ज़मानत का विरोध करते हुए जिस पीसीयूएल को ‘माओवादी’ बताया गया, उसकी स्थापना समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने की थी और भाजपा के रविशंकर प्रसाद और अरुण जेटली इससे जुड़े रहे हैं.

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

भारत मानवाधिकारों के समर्थकों को उचित सुरक्षा नही देताः संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि

मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि मैरी लॉलर एक ऑनलाइन कार्यक्रम में एल्गार परिषद मामले में हुई 83 वर्षीय स्टेन स्वामी की गिरफ़्तारी पर चिंता जताते हुए कहा कि देश मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रति जवाबदेह है.

10 दिसंबर को किसान आंदोलन में गिरफ्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति समर्थन जाहिर करते प्रदर्शनकारी. (फोटो: अजॉय आशीर्वाद महाप्रशस्त/द वायर)

‘फूट डालो और राज करो’ को मानने वालों के लिए आदिवासी किसान नहीं हैं

एक ओर कॉरपोरेट्स सभी आर्थिक क्षेत्रों और राज्यों की सीमाओं में अपना काम फैलाने के लिए स्वतंत्र हैंं, वहीं देश भर के किसानों के कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ साथ आ जाने पर भाजपा उनके आंदोलन में फूट डालने का प्रयास कर रही है.

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

जेल प्रशासन का दावा- स्टेन स्वामी को गिरफ़्तारी के समय से ही सिपर-स्ट्रॉ मुहैया कराया जा रहा

एनआईए ने एल्गार परिषद मामले में माओवादियों से संबंध के आरोप में सामाजिक कार्यकर्ता स्टेन स्वामी को आठ अक्टूबर को रांची से गिरफ़्तार किया था. स्वामी ने ज़ब्त किए गए अपने स्ट्रॉ और सिपर को लौटाने के लिए अदालत में याचिका दायर की थी. पार्किंसन बीमारी की वजह से उनके हाथ हिलने से उन्हें खाने और पीने में दिक्कत होती है.

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

स्टेन स्वामी की गिरफ़्तारी सामाजिक कार्यकर्ताओं को डराने का प्रयास है

केंद्र सरकार द्वारा स्टेन स्वामी सहित देश के 16 सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करना आंदोलनरत जनसंगठनों और उनसे जुड़े नेताओं को भयभीत कर इन आंदोलनों को कमज़ोर करने की कोशिश है.

संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त मिशेल बैशलेट (फोटो: रॉयटर्स)

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने भारत में एनजीओ पर प्रतिबंध को लेकर चिंता जताई

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बैशलेट ने भारत में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की है. उनकी टिप्पणी पर भारत की ओर से कहा गया है कि मानवाधिकार के नाम पर क़ानून का उल्लंघन माफ़ नहीं किया जा सकता.