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शौकत आपा ज़िंदाबाद…

वरिष्ठ कलाकार शौकत कैफ़ी को याद कर रही हैं पूर्व सांसद सुभाषिनी अली. सुभाषिनी फिल्म उमराव जान की कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर थीं, जिसमें शौकत कैफ़ी की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

Shaukat Kaifi Umrao Jaan You Tube

फिल्म उमराव जान के में शौकत कैफ़ी. (फोटो साभार: यूट्यूब)

हम सबकी शौकत आपा, शौकत कैफ़ी का बीते दिनों निधन हो गया. चारों तरफ से उनके लिए श्रद्धांजलियां आ रही हैं. वे इसकी हकदार भी हैं. लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी जिस तरह से जी, उससे काफी कुछ सीखा जा सकता है.

हो सकता है कि उनकी प्रतिभा, उनकी गर्मजोशी और मेहमाननवाजी की तारीफों के बीच यह जिंदगी कहीं आंखों से ओझल न हो जाए. आजादी से पहले के दौर में जवान होनेवाली रूढ़िवादी मुस्लिम पृष्ठभूमि वाली मुस्लिम औरतों के लिए सामान्य तौर पर आधुनिकता और स्त्रीवाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

हम सब ऐसी रूढ़ छवि निर्माण के इस तरह से शिकार रहे हैं कि हम शौकत आपा- और उनकी पीढ़ी की कुछ अन्य औरतों- के महत्व का थोड़ा-सा भी अंदाजा नहीं लगा सकते हैं, जिनमें नए रास्ते पर चलने का साहस था- इसलिए कि उन्होंने अपने चारों तरफ चल रही बदलाव की बयार को महसूस किया था और उनमें इन बदलावों को खुद महसूस करने का संकल्प था.

यह संकल्प उन्हें अनदेखी जगहों पर ले गया और उन दर्दों को सहने की क्षमता दी, जो नई सच्चाइयों से रूबरू होने की खुशी के साथ उनके हिस्से में आयी.

शौकत आपा हैदराबाद में एक रूढ़िवादी और सुशिक्षित सुन्नी मुस्लिम परिवार में बड़ी हुईं. एक जवान लड़की के तौर पर भी उन्होंने ऐसी चीजें देखीं, जिनकी ओर उनकी पृष्ठभूमि के सदस्यों की नजर नहीं जाती.

उन्हें मेलों में जाना पसंद था जहां ग्रामीण दस्तकार अपने हाथों और परंपरागत हुनर से बनाई हुई चीजें लाते थे. उन्हें उनके बनाए सामानों के रंग और उनकी स्वाभाविक सुंदरता पसंद थी और बहुत जल्दी वे इन सबकी पारखी हो गईं. वहां जो कुछ भी खास, असामान्य और अद्भुत था, उसकी पहचान उन्हें हो गई.

वे कपड़े खरीदती थीं और उनसे चोलियां, कुर्ते और दुपट्टे बनाती थीं. कहीं एप्लिक का थोड़ा सा काम कर देती थीं, कहीं अलग-अलग टुकड़ों को एक साथ जोड़ देती थीं, कहीं किनारों पर अपने ही ईजाद किए दरज का काम कर देती थीं- इससे कुछ ऐसा निकलकर आता था, जो बुनकरों और दस्तकारों के प्रति सम्मान को भी प्रकट करता था और उनके अपने सौंदर्यबोध को भी उजागर करता था.

वे कविता और भाषा से बनने वाली ध्वनियों से भी मोहब्बत करती थीं. जब वे महज 17 साल की थीं, तब वे अपने पिता के साथ एक मुशायरे में गयी थीं, जहां उन्होंने कैफी साहब को सुना था. वे एक खूबसूरत आदमी थी, जिनकी आवाज में गहराई  थी और शायरी सुनाते वक्त जिनकी लटें माथे पर लटक जाती थीं.

वे एक क्रांतिकारी थे, एक जनकवि, जो हजारों की संख्या में मौजूद श्रोताओं को बांध कर रख सकते थे. शायद वह श्रोता-समूह, शौकत जिसका हिस्सा थीं, वह भी सम्मोहित मुद्रा में था. वे अपनी नजरें शायर पर से नहीं हटा सकीं और एक बार जब उन्होंने (कैफी ने) शौकत को देख लिया, उसके बाद सिर्फ वे ही थीं जिन्हें और जिनके लिए वे अपनी कविताएं सुनाते रहे.

कैफी साहब ने शौकत को एक चिट्ठी लिखकर अपनी मोहब्बत का इजहार किया और अपनी बाकी की जिंदगी उनके साथ बिताने की तमन्ना जाहिर की.  उन्होंने उनसे यह भी बताया कि वे फक्कड़ साम्यवादी हैं, जिनका आशियाना बंबई (अब मुंबई) में पार्टी मुख्यालय है.

और असाधारण तरीके से शौकत ने उनके साथ जाने का फैसला किया. उन्होंने अपने घर की सुरक्षित चारदीवारी और अपने परिवार के लाड़-दुलार को छोड़ कर एक अजनबी के साथ जाने को चुना, जिसकी आत्मा को उन्होंने उसकी शायरी और उसकी आंखों से पढ़ा था.

वे इस अनजान शख्स के साथ एक ऐसा दुनिया में गयीं, जिसकी हर चीज उनकी पहली वाली जानी-पहचानी दुनिया से अलग थी. यह एक साहसभरी दुनिया थी जहां स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ मोहब्बत और दोस्ती कर सकते थे. आपस में कॉमरेड्स हो सकते थे.

जहां आदर्श और प्रतिबद्धता सबसे ज्यादा अहमियत रखते थे, जहां धन, दहेज, ऐशो-आराम सब कुछ को अश्लील माना जाता था और जिनका कुछ हासिल नहीं था. शौकत ने अपने पिता, जो निश्चित तौर पर एक अनूठे लोकतांत्रिक सज्जन थे, से अपने दिल की बात कही. उनके पिता ने कैफी से मुलाकात की और उन्हें भरोसे के लायक पाया.

वे इस अनजाने, गरीब कम्युनिस्ट शायर- जो न केवल एक बिल्कुल अनजानी दुनिया का हिस्सा  था, बल्कि मुस्लिमों के भी एक बिल्कुल पंथ से ताल्लुक रखता था- से अपनी लाड़ली बेटी की शादी कराने के लिए उसे बंबई लेकर गए.

Kaifi Azmi and Shaukat Kaifi Twitter

कैफ़ी आज़मी के साथ शौकत कैफ़ी. (फोटो साभार: ट्विटर/@FilmHistoryPic)

कैफी से शादी का मतलब था सेंट्रल बॉम्बे के रेड हॉल मे एक कमरे और साझे बाथरूम की जिंदगी. इस कमरे में चारपाई और किरोसिन स्टोव को एक पर्दा टांगकर अलग किया गया था.

लेकिन इसका मतलब सरदार और सुल्ताना जाफरी, पीसी जोशी और कई अन्य लोगों का साथ भी था, जो गरीबी और अभाव में रहते हुए, बच्चे पालने हुए और चूल्हा जलाने के बीच कविता, साहित्य और क्रांति की बात करते थे. सज्जाद और रजिया जहीर अलग रहते थे, लेकिन उनका घर एक आसरा था और वे मेहमाननवाजी और प्रेरणा के सतत स्रोत थे.

पीसी जोशी में प्रतिभा की पहचान करने और उसे तराशने की क्षमता थी और उन्होंने शौकत को इप्टा में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया.

काम करना और खुद से अपना पैसा कमाना, ये ऐसी चीजें हैं, जिन्हें शौकत आपा ने काफी गंभीरता के साथ लिया. वे उनके अस्तित्व का अनिवार्य हिस्सा बन गए और अपनी बाकी की जिंदगी में वे इस बात की कायल रहीं कि काम करने और अपनी जीविका कमाने से ही औरतें खुद को आजाद महसूस करना शुरू कर सकती हैं.

अपने किरदारों और अपनी लाइनों को याद करने में किसी जुनून की हद तक डूब जाया करती थीं, यह सबको पता है. यह जुनून उनके पति और बाद में उनके बच्चों के लिए किसी दुःस्वप्न सरीखा हो गया.

उमराव जान और अंजुमन के निर्माण के दौरान, वे शूटिंग शुरू होने के काफी पहले से ही खानम जान  और चुहिया बेगम  में ढल गयी थीं. चुहिया बेगम के तौर पर उन्हें धूर्त और लालची दिखना था और एक गंदा फटा हुआ बुर्का इस किरदार में उनकी पोशाक थी.

वे हर सुबह इस किरदार और इस पोशाक को अपने ऊपर ओढ़ लेतीं और कैफी साहब के पास डरावने अंदाज में आती थीं. जाहिरन कैफी साहब उनकी तरफ एक नजर डालते थे और अपनी गहरी आवाज में उन पर कुछ टिप्पणी करते!

खानम जान के तौर पर उन्होंने शानदार कपड़े (जो उन्हें काफी पसंद आए और आने वाले सालों में भी वे इसकी प्रशंसा करती रहीं, साथ ही इस तथ्य की भी कि मैंने ही उन पर औरों की सलाह के उलट उमराव जान की मां की जगह खानम का किरदार निभाने के लिए जोर डाला था) पहने और हर तरह से उस किरदार में ही ढल गईं.

उस फिल्म को देखने के बाद कैफी साहब ने कहा था, ‘अरे मोटी (वे हमेशा उन्हें यही कहकर बुलाते थे) अगर ब्याह से पहले ये फिल्म देखता, तो तुम्हारा शजरा (वंशावली) जरूर निकलवाकर देखता.’

ऐसा इसलिए था क्योंकि इस फिल्म में शौकत आपा ने अपना कोठा चलानेवाली एक सफल और काइयां तवायफ खानम जान के किरदार को जीवंत कर दिया था. यह फिल्म काफी बाद आयी थी, जब उनका परिवार रेड फ्लैग हॉल से निकलकर जुहू में जानकी कुटीर में बस गया था.

रेड फ्लैग हॉल के वर्षों में शौकत आपा ने कम से कम दो मौकों पर अपनी आजादख्याली और निडरता का प्रदर्शन किया था, जो उनकी पहचान थी. एक बच्चे को गंवा देने के बाद जब वे गर्भवती हुईं, तब मुश्किल हालात को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने मां न बनने की सलाह थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया.

और अगर मुझे ठीक से याद है तो तो वे डिलीवरी के लिए अपने घर हैदराबाद गई थीं. ऐसे ही, आजादी के ठीक बाद जब कम्युनिस्ट पार्टी ने यह फैसला लिया कि उनके कई मुस्लिम नेता पाकिस्तान जाकर वहां आंदोलन खड़ा करेंगे, कैफी साहब को भी पाकिस्तान जाने का निर्देश दिया गया.

यह एक ऐसा समय था जब पार्टी का निर्देश काफी गंभीर मसला हुआ करता था और इसे मानने से इनकार करना दूसरों के लिए काफी कठिन था और वे ऐसा सोच भी नहीं सकते थे. जब कैफी साहब ने उन्हें यह खबर सुनाई, तो उन्होंने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया.

Shaukat Kaifi Family Twitter

परिवार के साथ शौकत. (फोटो साभार: ट्विटर/शबाना आज़मी)

कोई उन्हें उनके इरादे से हिला नहीं सकता था. उनका मजहबी नियमों पर चलने वाले किसी ऐसे देश में जाकर रहने का सवाल ही नहीं उठता था. वे खुद को ऐसे कानूनों के हवाले करने के लिए कतई तैयार नहीं थीं. निश्चित तौर पर कैफी साहब ने उन्हें मनाने की पूरी कोशिश की होगी, लेकिन उनके अटल इरादे के सामने उन्हें हार माननी पड़ी.

वे कभी यह नहीं भूले कि वे शौकत आपा के कितने कर्जदार हैं. बाकी कई चीजों के अलावा इस बात के लिए कि भीषण ब्रेन स्ट्रोक के बाद उनके समर्पण के कारण ही वे महीनों के कठिन और असहनीय उपचार के बाद फिर से अपने पांवों पर चल पाए थे.

शौकत आपा का दिल काफी बड़ा था. हालांकि इसके तीन-चौथाई हिस्से पर कैफी साहब, शबाना और बाबा का कब्जा था, लेकिन बचा हुआ एक चौथाई हिस्सा भी इतना बड़ा था कि उसमें रिश्तेदारों, दोस्तों, कॉमरेड्स, मालियों, ड्राइवरों, बाइयों, डॉक्टरों और नर्सों के लिए जगह थी. मेरी खुशकिस्मती थी कि मैं इसमें भी जगह पा सकी.

शौकत आपा के जीवन से आधुनिक बनना और आत्म-अभिमानी होना सीखना चाहिए. सौभाग्य से उन्होंने अपना संस्मरण लिखा (और इसके लिए उनके पीछे पड़ने वालों में मैं भी थी). उन्हें सबसे अच्छी श्रद्धांजलि इस किताब को पढ़ना और उससे सीख लेना होगा.

(सुभाषिनी अली पूर्व सांसद और माकपा की पोलित ब्यूरो सदस्य हैं. वे उमराव जान फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइनर थीं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)