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विचार-विमर्श के नियमों का उल्लंघन कर पारित हुआ था सामान्य वर्ग आरक्षण, पीएमओ की थी बड़ी भूमिका

द वायर एक्सक्लूसिव: आरटीआई के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को आरक्षण देने वाले 124वें संविधान संशोधन विधेयक पर क़ानून मंत्रालय के अलावा किसी अन्य विभाग के साथ विचार-विमर्श नहीं किया गया था. सरकार ने 20 दिन के भीतर ही इस विधेयक की परिकल्पना कर इसे संसद के दोनों सदनों से पारित कराकर क़ानून बना दिया था.

Narendra Modi PTI

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने 124वें संविधान संशोधन विधेयक पर कानून मंत्रालय के अलावा किसी अन्य मंत्रालय या विभाग के साथ चर्चा नहीं किया था. यह विधेयक सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण देता है.

सरकार ने सिर्फ 20 दिन के भीतर ही इस विधेयक की परिकल्पना की और संसद के दोनों सदनों से पारित कराकर कानून भी बना दिया. इतना ही नहीं, इस कानून के कार्यालय ज्ञापन में एक बदलाव के लिए कैबिनेट मंजूरी के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया और केंद्रीय मंत्री ने फोन पर ही कैबिनेट नोट को मंजूरी दी थी.

इसके अलावा मंत्रालय की गुजारिश पर लोकसभा स्पीकर ने इस विधेयक को खास तरजीह देते हुए किसी बिल को सदन में पेश करने की सात दिनों की सशर्त आवश्यकता की भी छूट दी थी. द वायर  द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेजों से ये खुलासा हुआ है.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने निभाई अग्रणी भूमिका

प्राप्त की गईं फाइलों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की इसमें काफी अग्रणी भूमिका थी और पीएमओं के साथ बैठक के बाद इस विधेयक को लाने का विचार किया गया.

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प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ बैठक के बाद विधेयक लाने का निर्णय लिया गया.

20 दिसंबर 2018 को पीएमओ के संयुक्त सचिव और समाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव नीलम साहनी और संयुक्त सचिव बीएल मीणा तथा बाद में पिछड़ा वर्ग के उप-वर्गीकरण के लिए आयोग (सीइएसओबी) के सदस्य डॉ. बजाज के साथ बैठक के बाद इस विधेयक को लाने का फैसला किया गया था.

जब लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही यह विधेयक सदन में पेश किया गया था तो विपक्षी सांसदों ने सवाल उठाया कि सरकार ने किस आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला लिया है? क्या इसके लिए कोई सर्वे रिपोर्ट तैयार की गई है?

किस आधार पर आठ लाख रुपये का मापदंड तय किया गया है और किसने सलाह दी कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संवैधानिक वैधता के मापदंड पर खरा उतर पाएगा?

प्राप्त दस्तावेजों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस विधेयक को पारित कराने में सरकार ने काफी हड़बड़ी की और आनन-फानन में 20 दिन के भीतर ही पूरा काम कर लिया गया.

जल्दबाजी का आलम यह था कि कैबिनेट ने सात जनवरी 2019 को विधेयक और विधेयक के पारित होने बाद जारी होने वाला कार्यालय ज्ञापन भी पारित किया था. इस हड़बड़ी की वजह से कार्यालय ज्ञापन में कई गलतियां थीं.

जैसे कि ज्ञापन में योग्यता कुछ और थी और विधेयक में कुछ और. ज्ञापन में भूमि की इकाई यार्ड लिखी गई थी, लेकिन विधेयक में स्क्वॉयर यार्ड.

द वायर  द्वारा हासिल किए गए फाइल नोटिंग्स, पत्राचार और गोपनीय कैबिनेट नोट से ये स्पष्ट होता है कि 124वें संविधान संशोधन विधेयक पर कानून मंत्रालय के अलावा किसी अन्य संबंधित मंत्रालय या विभाग से विचार-विमर्श नहीं किया गया था.

कैबिनेट नोट के मुताबिक, ‘नोट की एक कॉपी कानून एवं न्याय मंत्रालय को टिप्पणी के लिए भेजी गई थी और उन्होंने इस पर सहमति जताई है. अन्य सभी विभाग कैबिनेट की बैठक के दौरान अपनी टिप्पणियां लेकर आएंगे.’

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कैबिनेट नोट का वह अंश, जो बताता है कि कानून मंत्रालय के अलावा अन्य विभागों को कैबिनेट बैठक के दौरान ही अपनी टिप्पणियां देने को कहा गया था.

हालांकि कानून मंत्रालय के अलावा अन्य किसी विभाग या मंत्रालय की टिप्पणी वाली फाइल सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है, जो कि 124वें संविधान संशोधन विधेयक का नोडल मंत्रालय है.

द वायर  ने एक अन्य आरटीआई आवेदन दायर कर यह जानना चाहा कि क्या कैबिनेट सचिवालय में इस संबंध में कोई फाइल मौजूद है, लेकिन सचिवालय ने जवाब देने के बजाय कुछ दिन बाद इस आवेदन को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को ट्रांसफर कर दिया.

इस पर मंत्रालय के जन सूचना अधिकारी ने जवाब दिया, ‘इस विभाग में कानून एवं न्याय मंत्रालय को छोड़कर अन्य मंत्रालयों द्वारा दी गई, यदि कोई है, टिप्पणियों का विवरण नहीं है. सूचना देने के लिए आरटीआई को कैबिनेट सचिवालय में स्थानांतरित कर दिया गया है.’ हालांकि कैबिनेट सचिवालय भी इस संबंध में कोई सूचना नहीं दे पाया.

मंत्रालय के एक ड्राफ्ट कैबिनेट नोट से पता चलता है कि इस प्रस्ताव को टिप्पणी के लिए कानून मंत्रालय के अलावा मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी), कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी), गृह मंत्रालय और व्यय विभाग के पास भेजा गया था. लेकिन इन विभागों से कहा गया कि वे अपनी टिप्पणी कैबिनेट की बैठक में लेकर आएं.

हालांकि इन विभागों द्वारा टिप्पणी देने का कोई प्रमाण मंत्रालय के रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है. बता दें कि सिविल पोस्ट और सेवाओं के संबंध में आरक्षण देने के लिए डीओपीटी और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के लिए एमएचआरडी नोडल डिपार्टमेंट होता है.

सरकार का ये कदम कानून मंत्रालय द्वारा साल 2014 में जारी किए गए पूर्व विधायी परामर्श नीति के उलट है, जिसमें ये कहा गया है कि किसी भी विधेयक को पहले संबंधित मंत्रालय या विभाग के पास भेजा जाना चाहिए और उनकी टिप्पणी को कैबिनेट नोट में शामिल किया जाना चाहिए.

मंत्रालय की एक फाइल नोटिंग के मुताबिक कानून मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव एसआर मिश्रा ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताते हुए छह जनवरी 2019 को फाइल भेजी थी. इस पर विधि सचिव और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के भी हस्ताक्षर हैं.

इसके बाद अगले ही दिन सात जनवरी को केंद्रीय कैबिनेट ने अपनी बैठक में इस विधेयक को मंजूरी दे दी. आठ जनवरी को लोकसभा में इसे पेश किया गया और विधेयक को पारित भी कर दिया गया.

इसके बाद ठीक अगले दिन नौ जनवरी को राज्यसभा से भी यह विधेयक पारित कर दिया गया और इसे राष्ट्रपति ने मंजूरी भी दे दी. 14 जनवरी को इसे लागू कर दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया को पूरी होने में अधिक से अधिक सिर्फ 20 दिन का समय लगा.

मोदी के मंत्री थावरचंद गहलोत ने फोन पर दी कैबिनेट नोट को मंजूरी

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने संसद में विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए किन्हीं खास आंकड़ों या सर्वे का उल्लेख करने के बजाय कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया और कहा कि ये विधेयक उनकी वजह से ही लाया जा सका है.

मंत्री के बयानों का काफी हद तक आधिकारिक दस्तावेजों से तालमेल है. इस विधेयक को लेकर कैबिनेट ने सात जनवरी को एक कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम या ओएम) पारित किया था, जिसे विधेयक पारित होने के बाद जारी किया जाना था. हालांकि पारित किए गए विधेयक और जारी किए गए ज्ञापन को लेकर कुछ विसंगतियां थीं.

विधेयक में यह प्रावधान है कि सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर प्राइवेट संस्थानों (चाहे सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त हों) समेत शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दिया जाएगा. हालांकि कैबिनेट द्वारा स्वीकृत ऑफिस मेमोरेंडम में केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने का प्रावधान था.

चूंकि केंद्रीय शिक्षण संस्थानों (एडमिशन में आरक्षण) एक्ट, 2006 के तहत केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में प्राइवेट गैर-सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान शामिल नहीं हैं, इसलिए इस बदलाव के लिए कैबिनेट की मंजूरी लेनी थी.

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वह फाइल नोटिंग, जिससे मालूम चलता है कि केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने टेलीफोन पर ही कैबिनेट नोट को मंजूरी दी थी.

इसके अलावा कैबिनेट द्वारा स्वीकृत कार्यालय ज्ञापन में आय का मानदंड रखा गया था और बाद में पारित विधेयक में यह प्रस्तावित किया गया कि यह आय मानदंड आवेदन के वर्ष से पहले वित्तीय वर्ष के लिए होगा. इसके अलावा ओएम में भूमि की इकाई को यार्ड लिखा गया था जबकि विधेयक में स्क्वॉयर यार्ड था.

इन सभी बदलावों को लेकर प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव के साथ एक बैठक हुई थी जिसमें सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव भी शामिल थे. आमतौर पर यह बदलाव कैबिनेट की मंजूरी के बाद होनी चाहिए.

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स के नियम 12 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए इन बदलावों को मंजूरी दी.

प्रधानमंत्री से इस तरह की मंजूरी मिलने के बाद एक महीने के भीतर औपचारिक तरीके से कैबिनेट के लिए मंजूरी लेनी होती है. खास बात यह है कि इसके लिए बनाए गए ड्राफ्ट कैबिनेट नोट को केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने फोन पर मंजूरी दी थी.

आठ लाख रुपये की आय सीमा और 10 फीसदी आरक्षण का स्पष्ट आधार नहीं

द वायर  द्वारा प्राप्त किए गए गोपनीय कैबिनेट नोट से ये स्पष्ट होता है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण प्राप्त करने के लिए तय की गई आठ लाख की सीमा और 10 फीसदी का आरक्षण तय करने का कोई विशेष आधार नहीं है.

सरकार ने इस विधेयक को लाने के लिए साल 2005 में गठित सिन्हो आयोग की सिफारिशों का सहारा लिया है लेकिन इस आयोग द्वारा दी गई आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग की परिभाषा को ही काफी अस्पष्ट कारण देकर से अस्वीकार कर दिया गया.

सरकार ने इसके लिए एक आसान रास्ता निकाल लिया. इस आयोग का एक प्रमुख कार्य आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग की परिभाषा देना था.

सिन्हो आयोग ने सिफारिश की थी कि सामान्य श्रेणी के सभी बीपीएल और ऐसे परिवार जिनकी सभी स्रोतों से आय कर योग्य आय से नीचे है, उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की श्रेणी में माना जाना चाहिए.

हालांकि सरकार ने कहा कि चूंकि बीपीएल की पहचान बहस का विषय है इसलिए ओबीसी आरक्षण के लिए तय की गई आय सीमा के आधार पर ईडब्ल्यूएस आरक्षण की आय सीमा तय की जाए.

नोट के मुताबिक केंद्र ने 1993 में एक विशेषज्ञ समिति द्वारा सामाजिक और आर्थिक पिछड़े वर्ग (एसइबीसी) के विकसित या उच्च श्रेणी के लोगों को आरक्षण न देने के लिए तय किए गए मानदंडों के आधार पर आठ लाख रुपये की आय सीमा तय की है. यही आय सीमा इस समय ओबीसी को आरक्षण देने के लिए भी लागू है. हालांकि ये सीमा सामाजिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए तय की गई थी.

कैबिनेट नोट में भी ये स्वीकार किया गया है, ‘एसइबीसी के पहचान में ज्यादा जोर सामाजिक पिछड़ेपन पर दिया जाता है लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की पहचान के लिए के लिए केवल आय मानदंड अपनाए जा सकते हैं. इसलिए जिस परिवार की आय आठ लाख रुपये से कम है उन्हें ईडब्ल्यूएस श्रेणी में माना जा सकता है.’

इसके अलावा पांच एकड़ और इससे अधिक की कृषि भूमि, 1000 स्क्वॉयर फीट और इससे ज्यादा का आवासीय फ्लैट, नोटिफाइड नगरपालिका में 100 स्क्वॉयर यार्ड या इससे अधिक का आवासीय प्लॉट और गैर-नोटिफाइड नगरपालिका में 200 स्क्वॉयर यार्ड या इससे अधिक का प्लॉट रखने वालों को इस आरक्षण से वंचित रखा गया है.

हालांकि कैबिनेट के लिए नोट में ऐसे किसी सर्वे या शोध का जिक्र नहीं है जो ये बता सके कि किस आधार पर ये मानदंड तय किए गए हैं.

इसी तरह आरक्षण का हिस्सा 10 फीसदी तय करने का भी कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है. आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक सरकार ने 2011-12 के एनएसएसओ सर्वे का हवाला देते हुए कहा है कि उन्होंने औसतन प्रति व्यक्ति मासिक व्यय के मुकाबले कम मासिक खर्च करने वालों का आकलन किया है और ये पाया है कि औसतन प्रति व्यक्ति मासिक व्यय से कम खर्च करने वालों की संख्या सिर्फ एसटी, एससी और ओबीसी में ही नहीं बल्कि सामान्य श्रेणी में भी ज्यादा है.

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हालांकि इस संबंध में कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया गया है. कैबिनेट नोट के मुताबिक, ‘2011-12 के एनएसएसओ सर्वे के आधार पर औसतन प्रति व्यक्ति मासिक व्यय से कम हर महीने खर्च करने वालों का आकलन किया गया है और इससे पता चलता है कि ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ एसटी, एससी और ओबीसी में ही नहीं बल्कि सामान्य श्रेणी में भी ज्यादा है.’

नोट में आगे लिखा गया, ‘इसलिए यह उचित होगा कि ईडब्ल्यूएस को नियुक्ति और शैक्षणिक संस्थानों में एडमिशन में कम से कम 10 फीसदी आरक्षण दिया जाए.’

नोट के मुताबिक सरकार की यह भी दलील थी कि इस संविधान संशोधन की वजह से समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को नौकरियों के मौके खुल जाएंगे, हालांकि इस संबंध में भी कोई आंकड़ा नहीं दिया गया कि आखिर कितने लोगों को इससे लाभ मिलने की उम्मीद है.

द वायर  की ओर से सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव एवं केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत के कार्यालय और कैबिनेट सचिवालय में सवालों की सूची भेजी गई है. उनका जवाब मिलने पर उसे रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.