बाकी तो सब माया है: हर सच झूठ की उजली छाया, हर झूठ पर सच का धुंधला साया

पुस्तक समीक्षा: पराग मांदले अपने कहानी-संग्रह 'बाकी तो सब माया है' में किसी एक विषय अथवा विचार या भावभूमि को कहानियों की शक्ल में नहीं रखते बल्कि विषयगत वैविध्य को कहानी में प्रस्तुत करते हैं. घटनाक्रम इसे कहीं और अधिक नव्यता प्रदान करते तो कहीं वैसा-का-वैसा बने रहने देते हैं. कई बार तो वे अपनी कहानियों में इतने मग्न होते हैं कि उनसे साधारण, असाधारण होते-होते रह जाता है.

शाम-ए-फ़िराक़: छन रहा है नूर सा

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ़िराक़ की कविता का वितान कॉस्मिक से लेकर निपट स्थानीय तक फैला हुआ है. उसमें प्रेम, विरह, लगाव-अलगाव, सौन्दर्य और संघर्ष, हिंदी और संस्कृत की अंतर्ध्‍वनियां, परंपरा की अनेक दुर्लभ स्मृतियां सब समायी हुई हैं. वे बरसों स्वतंत्रता-संग्राम और राजनीति में सक्रिय रहे. इस अनुभव ने उनकी कविता की अनुभव-संपदा में इज़ाफ़ा तो किया मगर उसके सौष्ठव और परिष्कार को रुखा-खुरदरा नहीं किया.

क्या आज़ादी के बिना कोई कला संभव है?

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला: आज रंगकर्मी व्यापक तौर पर आलोचना को अपनी प्रस्तुति से बाहर कर रहे हैं. बहुत से लोग सेल्फ़ सेंसरशिप में चले गए हैं. इस नज़रिये से हम आज़ादी के किस मायने की तलाश कर रहे हैं. क्या आज़ादी के बिना कोई कला संभव हो सकती है?

क्या हिंदी फिल्म गीतों ने देश में अलग-अलग भारतों के बीच कोई भावनात्मक पुल बनाया है

किसी देश के लोगों को केवल अधिकार और मत ही एक-दूसरे के क़रीब नहीं लाते. उन्हें कुछ साझी स्मृतियां भी चाहिए होती हैं. कुछ साझा सपने. कुछ ऐसे शब्द और धुनें, जिनमें वे अपने सुख-दुख को पहचान सकें. हिंदी फिल्म गीतों ने कई दशकों तक यही काम किया.

स्त्री की आज़ादी और पितृसत्ता की दीवारें

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला: हमारी पीढ़ी के सामने चुनौती यही है कि हम स्त्री को अबला कहकर उसकी रक्षा करने वाली व्यवस्था न बनाएं, बल्कि उसे इतना सक्षम और स्वतंत्र बनाएं कि उसे किसी संरक्षक की आवश्यकता ही न पड़े. क्योंकि पितृसत्ता का सबसे उदार चेहरा भी अंततः संरक्षण देता है, बराबरी नहीं.

सरकशी: उन्हें जुनून कि हर एक ज़बां पे ताला हो, हमें ये फ़िक्र कि कोई बेज़बां ना रहे

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: गौहर रज़ा की कुछ रचनाओं का एक संचयन ‘सरकशी’नाम से प्रकाशित हुआ है, जो अपने समय के बारे में बेहद चौकन्ने कवि की अवज्ञा-पत्रिका है.

अधूरी आज़ादी: जाति के रहते कोई भी समाज पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकता

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला: आज़ादी एक पौधे की तरह है, जिसे हर दिन समता, न्याय, साहस और विवेक से सींचना पड़ता है. यदि हम सजग नहीं रहे, तो जातिवादी और पितृसत्तात्मक ताक़तें इस पौधे को सुखाने की कोशिश करेंगी. जब तक एक भी महिला को अपनी स्वतंत्रता की कीमत हिंसा के रूप में चुकानी पड़ती है, जब तक किसी लड़की को अपनी पसंद से जीने के लिए समाज से लड़ना पड़ता है, तब तक हमारी आज़ादी अधूरी है.

आज़ादी कोई ठहरी हुई मंज़िल नहीं, लगातार इंसाफ़ और बराबरी के लिए संघर्ष का नाम है

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की 14वीं क़िस्त: हमारी आज़ादी सिर्फ़ हमारी नहीं है, वो इस बात से भी तय होती है कि हमारे दूसरे हम-वतन कितने आज़ाद है और उनके नागरिक अधिकार किस हद तक सुरक्षित हैं.

स्वतंत्रता को आदत बनाने की ज़रूरत क्यों है?

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की 13वीं क़िस्त: स्वतंत्रता व्यक्तिगत चीज़ नहीं है, वह एक सामाजिक चीज़ है - वह एक पूरे पर्यावरण से पैदा होती है और उसी में बची रहती है. इसी तरह उसका ख़ात्मा भी सामाजिक पर्यावरण के प्रदूषण से होता है.

आज़ादी के इतने साल बाद भी सवाल है: सूरज की दिशा कौन मोड़ेगा?

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की बारहवीं क़िस्त: सबको एक नए सूर्योदय की उम्मीद है. लेकिन रात के अंधेरे का कोई सामना नहीं करना चाहता. हम सब एक स्वप्न में हैं कि जैसे ही हम नींद से उठेंगे, नया सूर्योदय हमारे दरवाजे पर स्वागत के लिए खड़ा होगा. लेकिन सूरज की दिशा कौन मोड़ेगा? हम, आप, वे या हम सब मिलकर?

स्वतंत्रता की असली सीमा मनुष्यता और नैतिकता से तय होती है

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की ग्यारहवीं क़िस्त: किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता हमेशा मनुष्यता के पक्ष में होनी चाहिए. किसी भी व्यक्ति की वह स्वतंत्रता जो मनुष्यता विरोधी है- एक तरह की अराजक-स्वतंत्रता है. एक तानाशाह की स्वतंत्रता दूसरों के लिए परतंत्रता का सृजन करती है, इसलिए स्वतंत्रता की सीमा का होना ज़रूरी है.

मेरे लिए आज़ादी का अर्थ मनुवाद से आज़ादी है

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की दसवीं क़िस्त: मनुवाद जिस तरह औरतों का नियंत्रण करता है, उसी तरह वह अन्य समुदायों को भी नियंत्रित करने का प्रयास करता है. और यदि सत्ता बहुसंख्यावादी हो तो ऊपर से नीचे तक कभी धार्मिक सिद्धांतों का आह्वान कर तो कभी छल, बल लगाकर तो कभी उलाहना देकर मनुवाद आधुनिक फ़ासीवाद की तरह अपने नागरिकों को नियंत्रित करता है.

आज़ादी: जब तक मन स्वतंत्र न हो, मुक्ति अधूरी है

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की नौवीं क़िस्त: आज़ादी के प्रसंग में मुझे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का गीतांजलि वाला वह गीत कभी नहीं भूलता जिसका बुनियादी भाव है - जहां मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊंचा हो. मनुष्य की सच्ची आज़ादी का स्वप्न देखते गुरुदेव के इस गीत की संवेदनशील और उत्साहवर्धक सार्थक पहुंच देश की सीमाओं के बाहर तक थी.

निडर युवाओं ने समाज के अनेक तबकों को डर से मुक्त रहने का सबक सिखाया है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस बार जब हमें स्वतंत्र हुए 79 वर्ष और कुछ ही महीनों में लोकतंत्र बने 77 वर्ष होने वाले हैं, तो एक बड़ा फ़र्क यह पड़ा है कि अब हमने डर से मुक्त होने की शुरुआत कर दी है. यह रास्ता हमें निडर होकर आंदोलन करने वाले युवाओं ने दिखाया है.

जीवन संगीत: एक कलाकार स्त्री की ज़िंदगी का पन्ना

पुस्तक समीक्षा: एक कलाकार की हैसियत से गंगूबाई हंगल के संगीत को सब सुनते हैं, सराहते हैं, मगर उनके निजी जीवन के संघर्षों को नहीं जानते हैं. 'जीवन संगीत' नाम से हिंदी में अनूदित उनकी आत्मकथा उसी अनकहे जीवन को कहती है.

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