बहरा गणतंत्र: एक क्रूर सैनिक शासन की कहानी

पुस्तक समीक्षा: इल्या कामिंस्की का काव्यसंग्रह डेफ रिपब्लिक, बहरा गणतंत्र (हिंदी) एक ऐसे गणतंत्र की कहानी है जिसमें एक क्रूर एवं हिंसक सैनिक शासन सामान्य नागरिकों पर अत्याचार करता है. वहां के लोग उस शासन का विरोध करते हैं. हिंसा का शिकार होते हैं पर एक लम्बे समय तक विरोध में डटे रहते हैं. 2019 में छपे इस काव्य संग्रह की झलकियां आजकल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई पड़ रही हैं.

मेरी मां मेरी गैंगस्टर: जब एक आर्किटेक्ट ने बदल दी अरुंधति रॉय की ज़िंदगी की दिशा

पुस्तक अंश: उन दिनों कोट्टयम की किसी लड़की के लिए आर्किटेक्चर की पढ़ाई कोई मामूली ख़्वाहिश नहीं थी. ग़ुस्से के अपने दौरों और बढ़ती मार-पीट के बीच, मिसेज़ रॉय ने अपनी बेटी से कहा कि अगर वह ठान ले, तो वह जो चाहे, बन सकती है. वे शब्द उनकी बेटी के लिए लाइफ़राफ़्ट बन गए, जो उसे गाढ़े अंधेरों, तूफ़ानी लहरों और जानलेवा भंवर से बचाकर ले आए.

लोकतंत्र के साथ सामंजस्य को भी प्रतिपल बचाना-बढ़ाना होता है

कभी-कभी | अशोक वाजपेयी: दक्षिण अफ्रीका के जननायक नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनकी पहल पर वहां की संसद ने एक ‘सच और सामंजस्य आयोग’ गठित किया था. यह सच को जानने, कुबूल करने, मानवीय अधिकारों के उल्लंघन को समझने, याद करने और क्षमा करने का अनूठा उपक्रम था. यह एक अफ्रीकी अवधारणा ‘उबन्तू’ से प्रेरित माना गया, जिसमें मानवीय अधिकार और सामंजस्य आदि के तत्व शामिल होते हैं.

ग़ज़ा से ख़त: भूख और अपमान के बीच इंसानियत की कहानी ‘चुराई हुई क़मीज़’

पुस्तक अंश : एकाएक उसके नाक के नथनों में कहीं से धुआं आता महसूस हुआ. ओह, वाह! उसकी बीवी ने रोटी पकाने के लिए आग जलाई थी. लेकिन वह डरता है, वह उस ख़ौफ़नाक सवाल का सामना करने से डरता है, जो उसकी बीवी के हल्क में लंबे समय से कुंडली मारे बैठा है. ख़ेमे के अंदर जाते ही आटा गूंथ रही उसकी बीवी की नज़रें उसके पूरे वजूद को छलनी कर देगी, कोई काम मिला? खाएंगे क्या? हर रात

बंगनामा: कहीं रोगी का भोजन, कहीं भोग प्रसाद बनी खिचुड़ी

गांव हो या शहर खिचुड़ी वर्षा काल में पश्चिम बंगाल का ‘कंफर्ट फूड’ है. हालांकि कुछ लोगों के हिसाब से वर्षा ऋतु में खिचुड़ी की लोकप्रियता का कारण रूमानी भोजन प्रेम नहीं स्थितिपरक विवशता है. यहां खिचुड़ी किसी एक निश्चित नुस्खे तक सीमित नहीं है. यह मौसम, क्षेत्र, धार्मिक अवसर, समुदाय के हिसाब से, और यहां तक कि जाति या वर्ग के अनुसार भी बदलती रहती है.

रज़ा का उत्तर जीवन: ‘वे अपने चित्रों पर अर्थ का बोझ नहीं डालते थे’

साक्षात्कार: 23 जुलाई को सैयद हैदर रज़ा को गुज़रे दस बरस पूरे हुए हैं. इन वर्षों में रज़ा फाउंडेशन ने उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए अनेकों कार्यक्रम और आयोजन किए हैं. रज़ा की उत्तरजीविता पर वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी, जो इस फाउंडेशन के प्रबंधक और आजीवन ट्रस्टी हैं, से संवाद.

युवाओं के आंदोलन पर बोलीं गीतांजलि श्री- मंत्री, नौकरशाह और पुलिस भगवान नहीं, जनता के सेवक हैं

अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतने वाली मशहूर लेखक गीतांजलि श्री ने 20 जुलाई को आंदोलनरत छात्रों और युवाओं के ख़िलाफ़ पुलिस द्वारा की गई बर्बर कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शीर्ष बैठे ये लोग- मंत्री, नौकरशाह और पुलिस- जनता के प्रतिनिधि और जनता के सेवक हैं. वे भगवान नहीं हैं.

स्त्रीशतक: स्त्री-इच्छा के आयाम

पुस्तक समीक्षा: 'स्त्रीशतक' के माध्यम से पवन करण ने पौराणिक पात्रों को पारंपरिक श्रेणियों में स्थिर करने के बजाय उनके भीतर के उन प्रश्नों को मुखरित किया है, जिन्हें सदियों तक वृत्तांतों का अंग तो बनाया गया किंतु उनका अर्थ निर्धारित करने का अधिकार कभी नहीं दिया गया.

चोरी का भूगोल: चोरी करने में अब किसी को शर्म नहीं आती

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हबीब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक ‘चरणदास चोर’ में एक उक्ति है ‘एक चोर ने रंग जमाया सच बोलके.’ हमारे समय में बहुत सारे बड़े चोर रंग जमा रहे हैं, झूठ बोलकर. वह समय जा चुका जिसमें चरणदास जैसा अकिंचन चोर सच बोलकर रंग जमा सकता था. अब तो असली रंग झूठ से ही आता है.

फिल्म पर प्रतिबंध के बाद पहली बार बोले हनी त्रेहन- ‘सतलुज’ को बहने से नहीं रोका जा सकता

साक्षात्कार: 'सतलुज' फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने के बाद पहली बार बात करते हुए फिल्मकार हनी त्रेहन ने कहा कि 'सतलुज' पर रोक लग सकती है पर जसवंत सिंह खालरा को ख़त्म नहीं किया जा सकता. त्रेहन जोड़ते हैं कि 'सतलुज' पंजाब के ज़ख्मों पर मलहम की तरह है, लेकिन इसे बैन किया गया क्योंकि यह फूट डालो और राज करो की राजनीति को बढ़ावा नहीं देती.

‘अगर आप इतने सशक्त हैं कि कला रच सकते हैं, तो इसके ज़रिये सामाजिक टिप्पणी करने की कोशिश करनी चाहिए’

साक्षात्कार: फिल्मकार-लेखक और पॉडकास्टर की पहचान रखने वाले आशीष साहनी मशहूर कहानीकार इस्मत चुगताई के नाती हैं. कुछ बरस पहले आशीष ने ट्रांसजेंडर और सिस जेंडर महिला फिल्मकारों को प्रोत्साहन तथा समर्थन देने के लिए इस्मत चुगताई पुरस्कार की स्थापना की थी. उनकी नई फिल्म, इस्मत आपा पर उनकी नई किताब और भारत की समकालीन क्वीर राजनीति जैसे विषयों पर उनसे बातचीत.

तीजन बाई: स्त्री की अदम्यता का लोक-रूपक

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: तीजन बाई की कला उस सर्जनात्मकता का साक्ष्य थी कि एक सजग स्त्री महाकाव्य के परिसर में और लोकव्यवहार के आयाम में कितना कुछ अप्रत्याशित तात्कालिकता और सुघर संयम से कर सकती थी. वे शास्त्र और लोक की लगभग रूढ़ हो गई दूरी और द्वैत को रौंद देती थीं.

‘सतलुज’ विवाद के बीच ओटीटी की फिल्मों के लिए प्रमाणन अनिवार्य करने पर विचार कर रही सरकार

मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्मकार हनी त्रेहन की फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी पर रिलीज़ किए जाने के दो दिन के भीतर ही हटा दिया गया था. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अब केंद्र सरकार आईटी एक्ट में संशोधन पर विचार कर रही है, जिसके तहत सीधे ओटीटी पर रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए भी प्रमाणन अनिवार्य बनाया जा सकता है.

बंगनामा: …जहां पान अब भी बरज में ही उपजता है

पश्चिम बंगाल में पान चबाना आम, स्वीकृत शग़ल है. पूर्व मेदिनीपुर ज़िला पश्चिम बंगाल में पान उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है. यहां बांग्ला, मीठा, सांची, काली बांग्ला तथा सिमुराली बांग्ला जैसी अनेक लोकप्रिय किस्मों की खेती की जाती है. चार दशकों में पान की खेती में व्यापक परिवर्तन हुआ है मगर तामलुक के किसानों ने पान के बरज की मूल संरचना को नहीं त्यागा है.

मैथिली सिनेमाक इतिहास: मैथिली मनोरंजन संसार का दृश्यावलोकन

पुस्तक समीक्षा: मैथिली में भले ही कम फिल्में बनी हों, गुणवत्ता के लिहाज़ से उनमें उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है और कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में मैथिली फिल्मों को सराहना और पुरस्कार भी मिले हैं. हालांकि, किसी भी तरह के दस्तावेज़ीकरण के अभाव में इन फिल्मों से संबंधित जानकारी करना मुश्किल था. किसलय कृष्ण की पुस्तक 'मैथिली सिनेमाक इतिहास' इस रिक्तता को भरती है.

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