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दैनिक जागरण ने जानबूझ कर कानून का उल्लंघन क्यों किया?

यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती को पश्चिमी यूपी में जो समर्थन मिल रहा है, क्या दैनिक जागरण एक्जिट पोल प्रकाशित करके उसे बेअसर करने की कोशिश कर रहा है?

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उत्तर प्रदेश के पहले चरण के चुनाव के बाद भारत के सबसे बड़े अखबार दैनिक जागरण ने एक्जिट पोल सर्वे प्रकाशित करके सियासी तूफान को हवा दे दी है. इस सर्वे में कहा गया था कि भाजपा 2014 में हुए लोकसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन दोहराने जा रही है. जैसा कि पूर्व चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने कहा, यह उल्लंघन उन्हें आपराधिक अभियोग के लिए जवाबदेह बनाएगा, इसके बावजूद कौन सी बात ने दैनिक जागरण के मालिकान को प्रेरित किया होगा कि वे लिखित कानून के उल्लंघन का ऐसा खतरा उठा रहे हैं?

इस सवाल का जवाब देना फिलहाल अटकलों के दायरे में प्रवेश करना है, लेकिन फिर भी इसका प्रयास करना उपयोगी होगा. एक बात एकदम स्पष्ट है कि दैनिक जागरण के मालिकान ने इसके कानूनी परिणामों को ध्यान में रखकर ही यह खतरा उठाया होगा. संभवत: उन्होंने बेहतर वकीलों से सलाह ली होगी और इंतजार कर रहे होंगे कि चुनाव आयोग कार्रवाई करे.

दैनिक जागरण निसंदेह मोदी समर्थक माना जाता है जो पश्चिम उत्तर प्रदेश के एग्जिट पोल को छापकर कहीं न कहीं भाजपा की ‘हवा’ साबित कर फायदा पहुंचाने का काम कर रहा है. दैनिक जागरण बेहद विशाल समूह है, जिसके लगभग 4.5 करोड़ पाठक हैं. जागरण के ज्यादातर पाठक पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के रहने वाले लोग हैं, जहां अभी मतदान होना बाकी है. एग्जिट पोल उभरती हुई आम सहमति है जिसके सहारे भाजपा चुनाव लड़ रही है. जिसमें उसके परंपरागत मतदाता जाट और बनिया काफी हद तक दूसरी तरफ हो रहे हैं.

क्या यह एग्जिट पोल अमित शाह और मोदी को फायदा पंहुचा रहा है? राजनीतिक प्रेक्षक यह मानते हैं कि जो पार्टी पहले चरण में बढ़त हासिल करेगी, उस पार्टी को ज्यादा सीट मिलेगी. जिस प्रकार बिहार विधानसभा चुनाव में हुआ था. क्या दैनिक जागरण द्वारा यह एग्जिट पोल प्रकाशित करना मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मायावती का पश्चिम उत्तर प्रदेश में असर काम करने का प्रयास है, जबकि पूरा माहौल भाजपा के खिलाफ था? यह बहुत मुश्किल है, कि चुनाव आयोग, केंद्रीय विरोधी दल और मीडिया आने वाले समय में इसकी जांच करेगा.

दैनिक जागरण को यह काम करने और इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए कुछ करोड़ रुपये नहीं बल्कि इसके मालिक बहुत बड़े खेल में अहम भूमिका निभा रहे हैं. जागरण द्वारा किए गए इस काम में पैसे से ज्यादा ताकत मायने रखती है. जागरण समूह मोदी के एजेंडे के साथ जुड़कर पिछले 3 साल से काम कर रहा है. यह कोई नई बात नहीं कि जागरण ने पहले भी सत्ताधारी और विपक्षी दल के लिए काम किया है.

पिछले कुछ सालों में जागरण समूह के मालिकों के यादव परिवार से रिश्तों में खटास आई है. जागरण ने 2014 में सैफई महोत्सव में 750 करोड़ खर्च करने का दावा किया था. यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जागरण समूह के मालिकों पर बेबुनियादी हमला करने का आरोप लगाया और यह भी कहा कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि जागरण समूह के मालिक महेंद्र मोहन गुप्ता की राज्यसभा सदस्यता को आगे नहीं बढ़ाया गया, इसीलिए यह सब हो रहा है. सैफई महोत्सव पर बाद में यह खुलासा भी हुआ कि जितना जागरण ने बताया था उससे कहीं कम खर्च हुए थे. यह बेहद समझने वाली बात है कि किसी गांव के उत्सव में 750 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो सकते. यह साबित करता है कि जागरण द्वारा यह खबर छापना किसी विशेष मंशा से प्रेरित घटना थी.

उसी प्रकार पहले चरण में पश्चिम उत्तर प्रदेश में हुए मतदान के बाद जागरण द्वारा एग्जिट पोल का प्रकाशन साबित करता है कि किस प्रकार अखबार के मालिक राजनीतिक रूप से उत्तर प्रदेश में अपनी भूमिका साबित कर रहे हैं. दांव और भी बड़ा हो रहा है क्योंकि यह राज्य चुनाव के नतीजे बताएंगे कि मोदी सरकार किस प्रकार 2019 तक बच पाएगी. यह सच है कि उत्तर प्रदेश चुनाव मोदी और शाह की ताकत का विष्लेषण करेगा. यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगले वर्ष राष्ट्रपति का चुनाव होना है. राष्ट्रपति चुनाव में उत्तरप्रदेश प्रमुख भूमिका निभाएगा क्योंकि सबसे ज्यादा वोट यहीं से होंगे. इस बात से आप समझ सकते हैं कि क्यों दैनिक जागरण ने खुले तौर पर आचार सहिंता का उल्लंघन किया है. जिसके लिए चुनाव आयोग द्वारा उसपर आपराधिक मामला दर्ज हुआ है.

दैनिक जागरण द्वारा प्रकाशित एग्जिट पोल सुबह 11.30 बजे वेबसाइट से हटा लिया गया. वेबसाइट से हटाने के बावजूद यह आचार सहिंता का उल्लंघन है. वेबसाइट से हटाना शातिर चाल है, क्योंकि मतदाता को प्रभावित करने की मंशा पूरी हो चुकी है.