भारत

क्यों पूरे देश में फ़सलों का एक न्यूनतम समर्थन मूल्य होने से किसानों का नुकसान है

केंद्र सरकार सभी राज्यों की फ़सल लागत का औसत मूल्य के आधार पर एमएसपी तय करती है. इसके कारण कुछ राज्यों के किसानों को तो ठीक-ठाक दाम मिल जाता है लेकिन कई सारे राज्यों के किसानों को फ़सल लागत के बराबर भी एमएसपी नहीं मिलती है.

Nadia: A farmer prepares land for cultivation during Monsoon season, in Nadia district of West Bengal, Tuesday, July 9, 2019. (PTI Photo)(PTI7_9_2019_000060B)

(प्रतीकात्मक तस्वीर: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने हाल ही में रबी सीजन 2020-21 के लिए धान, ज्वार, बाजरा, मक्का समेत विभिन्न फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय कर दिया है.

सरकार का दावा है कि उसने लागत का डेढ़ गुना एमएसपी निर्धारित किया है, हालांकि हकीकत ये है कि मोदी सरकार ने कम लागत मूल्य के आधार पर एमएसपी तय की है.

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों को सी2 लागत पर डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए, जिसमें खेती के सभी आयामों जैसे कि खाद, पानी, बीज के मूल्य के साथ-साथ परिवार की मजदूरी, स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य भी शामिल किया जाता है.

हालांकि सरकार ए2+एफएल लागत के आधार पर डेढ़ गुना एमएसपी दे रही है, जिसमें पट्टे पर ली गई भूमि का किराया मूल्य, सभी कैश लेन-देन और किसान द्वारा किए गए भुगतान समेत परिवार श्रम मूल्य तो शामिल होता है, लेकिन इसमें स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य शामिल नहीं होता है.

ए2+एफएल लागत सी2 लागत से काफी कम होता है, नतीजतन इसके आधार पर तय की गई एमएसपी भी कम होती है.

लेकिन ये समस्या यहीं पर नहीं रुकती है. कई राज्यों के किसानों के लिए ए2+एफएल लागत पर भी डेढ़ गुना एमएसपी निर्धारित नहीं की जाती है. इसकी प्रमुख वजह केंद्र सरकार की एमएसपी निर्धारण की नीति है.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन संस्था कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) फसल लागत का आकलन और न्यूनतम समर्थन मूल्य को सिफारिश करने का काम करती है. सीएसीपी सभी राज्यों की फसल लागत का औसत निकालकर उसके आधार पर एमएसपी तय करती है. इसके कारण कुछ राज्यों को लागत की तुलना में ज्यादा दाम मिलता है और कुछ को कम.

इस मामले पर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए भाजपा शासित समेत विभिन्न राज्यों ने पिछले साल रबी सीजन के फसलों की एमएसपी निर्धारित करते वक्त कृषि मंत्रालय पत्र लिखा था और राज्य-वार लागत के हिसाब से एमएसपी निर्धारित करने की मांग की थी.

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पुदुचेरी, तमिलनाडु, ओडिशा और कर्नाटक सरकार ने खरीफ सीजन 2019-20 के लिए केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी पर असहमति जताई थी.

राज्यों ने उनके यहां की उत्पादन लागत के हिसाब से समर्थन मूल्य तय करने की सिफ़ारिश की थी, लेकिन केंद्र ने सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया था.

धान के सबसे बड़े उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल ने केंद्रीय कृषि सचिव संजय अग्रवाल के पत्र का जवाब देते हुए कहा था कि राज्य सरकार के आकलन के आधार एमएसपी और अधिक होनी चाहिए. पिछले साल धान की एमएसपी 1,815 रुपये तय की गई थी, जबकि राज्य सरकार ने इसे 2,100 रुपये करने को कहा था.

राज्य के संयुक्त सचिव जितेंद्र रॉय ने आठ मई 2019 को भेजे अपने पत्र में कहा, ‘पश्चिम बंगाल के श्रम विभाग द्वारा तय की गई न्यूनतम मजदूरी को ध्यान में रखते हुए 2017-18 के दौरान धान की लागत का सी2 मूल्य 1,751 रुपये था. चूंकि अब लागत में शामिल विभिन्न चीजों और लेबर चार्ज में औसत 9 फीसदी की बढ़ोतरी आई है, इसलिए 2019-20 सीजन के दौरान राज्य में धान की सी2 लागत की अनुमानित राशि 1,909 रुपये है.’

मालूम हो कि फसल लागत में शामिल लेबर चार्ज, परिवार की मजदूरी, परिवहन खर्च, सिंचाई खर्च, खाद-बीज व्यय, ब्याज इत्यादि राज्य-वार अलग-अलग होते हैं, जिसके कारण लागत मूल्य में भी काफी अंतर रहता है.

छत्तीसगढ़ सरकार ने भी तीन मई 2019 को भेजे अपने तीन पेज के पत्र में राज्य की खरीफ फसलों की लागत का विस्तार से गणना करते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए कहा था.

राज्य ने श्रम पर व्यय, ऋणों पर ब्याज, लगान भूमि भाड़ा, रखवाली पर व्यय, परिवहन पर व्यय, बीज पर खर्च, जैविक खाद पर व्यय, दवाई उपचार पर व्यय, यंत्र औजारों पर मरम्मत पर व्यय, जुताई, सिंचाई, निराई-गुड़ाई पर पारिश्रमिक खर्च समेत कई बिंदुओं को शामिल करते हुए प्रदेश में लागत की स्थिति बयां की थी.

देवेंद्र फड़णवीस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र की तत्कालीन भाजपा-शिवसेना सरकार ने भी कहा था कि राज्य सरकार द्वारा सिफारिश की गई लागत के आधार पर एमएसपी तय नहीं की गई है और उन्होंने एमएसपी बढ़ाने की मांग की थी.

खास बात ये है कि राज्य सरकार की लागत के आधार पर सिफारिश की गई एमएसपी और केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी में बहुत ज्यादा अंतर है.

उदाहरण के तौर पर साल 2019 में केंद्र ने धान की एमएसपी 1,815 रुपये निर्धारित की थी जबकि महाराष्ट्र ने इसकी एमएसपी 3,921 रुपये तय करने के लिए कहा था. इसी तरह बाजरा की एमएसपी 2,000 रुपये तय की गई थी जबकि राज्य ने इसे 4,002 रुपये निर्धारित करने को कहा था. ज्वार की एमएसपी केंद्र ने 2,550 रुपये तय की थी जबकि राज्य सरकार ने इसे 3,628 रुपये करने को कहा था.

Nadia: Workers spread rice grain on a field for drying in the sun, at a field in Nadia district, Friday, une 12, 2020. (PTI Photo) (PTI12-06-2020_000018B)

(फोटो: पीटीआई)

हरियाणा सरकार ने कहा था कि चूंकि उनके यहां डीजल, कीटनाशक, उर्वरक, मशीन और खेती में शामिल अन्य चीजों के दाम पिछली साल की तुलना में बढ़ गए हैं, इसलिए एमएसपी बढ़ाई जाए.

कृषि विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव ज्योति अरोड़ा द्वारा 18 मई 2019 को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि मजदूरों की कमी होना, लागत में बढ़ोतरी होने का एक बहुत बड़ा कारण है. राज्य सरकार ने कहा था कि निर्धारित की गई एमएसपी राज्य की उत्पादन लागत के बराबर भी नहीं है.

हरियाणा की एक बड़ी समस्या ये है कि अंधाधुंध धान के उत्पादन की वजह से राज्य इस समय भयानक पानी के संकट से जूझ रहा है. इसलिए यहां पर ऐसी फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत है, जो कम पानी में तैयार हो जाएं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने मक्का का उत्पादन क्षेत्र बढ़ाने की योजना बना रही है.

राज्य सरकार ने कहा कि वे इस समय धान की जगह पर मक्का उगाने की कोशिश कर रही है, इसलिए किसानों को सही एमएसपी देने की जरूरत है ताकि इसके उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके. लेकिन राज्य सरकार के मुताबिक केंद्र ने इसकी एमएसपी इतनी भी नहीं रखी है जो उत्पादन लागत भी कवर कर सके.

राजस्थान सरकार ने भी केंद्र का ध्यान फसलों की लागत की ओर खींचा था और उस आधार पर एमएसपी तय करने को कहा था. राज्य सरकार ने 13 मई 2019 को लिखे अपने पत्र में कहा था कि राज्य के अधिकांश भाग में मरुस्थलीय क्षेत्र होने एवं वर्षा की विषम परिस्थितियों के कारण फसलों की लागत अन्य राज्यों की तुलना में अधिक रहती है.

राजस्थान के मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने केंद्र के कृषि सचिव संजय अग्रवाल को भेजे पत्र में लिखा था कि चूंकि राज्य में बाजरा, मक्का, सोयाबीन, उड़द और मूंग की बुवाई और उत्पादन महत्वपूर्ण है, इसलिए राज्य की विषम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इनकी एमएसपी बढ़ाई जानी चाहिए.

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने कहा था कि प्रदेश में लघु एवं सीमांत किसानों की संख्या अधिक होने, प्रदेश में जोत का आकार काफी छोटा होने और किसानों की संसाधन तथा कृषि निवेशों के उपयोग की क्षमता कम होने के कारण एमएसपी में बढ़ोतरी की जाए.

राज्य सरकार ने कृषि मंत्रालय को भेजे अपने पत्र में कहा, ‘फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों के निर्धारण का मुख्य आधार उनकी उत्पादन लागत होती है. फसलों के उत्पादन लागत मूल्य, उनकी उपज के लिए प्रयुक्त मानव श्रम, पशु श्रम, मशीन श्रम, भूमि का किराया तथा कृषि निवेश आदि पर किए गए व्यय पर निर्भर करते हैं.’

उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा था कि चूंकि राज्य की लागत अलग है, इसलिए एमएसपी बढ़ाई जानी चाहिए.

इसी तरह तमिलनाडु सरकार ने कृषि मंत्रालय को भेजे अपने पत्र में कहा था कि सिर्फ उत्पादन लागत मूल्य ही न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित नहीं करता है. किसानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति जैसे फैक्टर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए ताकि किसानों को गरिमामय जीवन दिया जा सके.

24 जून 2019 को लिखे पत्र में राज्य सरकार ने कहा था, ‘हर साल बारिश, पानी की उपलब्धता, बांध से पानी छोड़ना और इसकी लागत में उतार-चढ़ाव और पूरे साल बहने वाली नदियों का खत्म होना उत्पादन लागत में प्रमुख भूमिका निभाता है.’

वहीं ओडिशा सरकार ने कहा था कि केंद्र सरकार ए2+एफएल लागत के आधार पर एमएसपी की सिफारिश कर रही है जबकि सी2 लागत के आधार पर एमएसपी तय की जानी चाहिए, जो कि उत्पादन लागत का बेहतर आकलन है.

एक जुलाई 2019 को भेजे अपने पत्र में राज्य सरकार ने कहा था कि ओडिशा एक प्रमुख धान उत्पादक राज्य है और यहां पर भंडारण का काफी दुरुस्त सिस्टम है, इसलिए धान की एमएसपी में मामूली वृद्धि से राज्य के किसानों को शायद ही कोई लाभ मिले.

कर्नाटक सरकार ने एमएसपी बढ़ाने की पद्धति पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि निर्धारित की गई एमएसपी राज्य की उत्पादन लागत की तुलना में इतनी कम है कि किसानों के मुनाफे का अंतर या तो काफी कम है या फिर नकारात्मक है.

राज्य सरकार ने कहा था कि पूरे देश में एक जैसी एमएसपी लागू होने की बात को ध्यान में रखते हुए अगर सी2 लागत को शामिल किया जाता है तो ये भारत के राज्यों की उत्पादन लागत में असमानता की समस्या का समाधान कर देता.

राज्यवार फसल लागत में अंतर के कारण एक एमएसपी से किसानों को नुकसान

केंद्र सरकार ने इस साल के लिए धान की एमएसपी 53 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाकर 1,868 रुपये प्रति क्विंटल की है जो कि पिछले साल निर्धारित 1,815 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की तुलना में मात्र 2.92 फीसदी की बढ़ोतरी है.

सरकार ने धान की औसत ए2+एफएल लागत 1,245 रुपये प्रति क्विंटल तय की है और इसी आधार पर डेढ़ गुना एमएसपी निर्धारित की गई है. हालांकि अगर राज्य-वार लागत देखें तो काफी ज्यादा अंतर है. हकीकत ये है कि केंद्र की ये निर्धारित एमएसपी सी2 लागत से भी कम है.

Raebareli: Farmers sort wheat crops after reaping, during the nationwide lockdown to curb the spread of coronavirus, on the outskirts of Raebareli, Thursday, April 23, 2020. (PTI Photo)(PTI23-04-2020_000205B)

(फोटो: पीटीआई)

सीएसीपी की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में सर्वाधिक 14.1 फीसदी धान का उत्पादन करने वाले राज्य पश्चिम बंगाल की ए2+एफएल लागत औसत लागत से काफी ज्यादा 1,537 रुपये प्रति क्विंटल है. राज्य की सी2 लागत 1,879 रुपये है जो कि इस साल की एमएसपी से भी 11 रुपये ज्यादा है.

इस तरह यहां स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल के किसानों को सी2 लागत के जितना भी एमएसपी नहीं मिल रहा है. वहीं यदि ए2+एफएल लागत से तुलना की जाए तो निर्धारित एमएसपी में लागत का 50 फीसदी नहीं बल्कि मात्र 21.53 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

इसी तरह देश के दूसरे सबसे बड़े धान उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में ए2+एफएल लागत औसत लागत के करीब ही 1240 रुपये है, लेकिन इसका सी2 लागत 1691 रुपये है. इस तरह एमएसपी में राज्य के सी2 लागत का मात्र 10.46 फीसदी राशि अतिरिक्त जोड़कर दी जा रही है.

वहीं पंजाब के किसानों को इस एमएसपी से ज्यादा लाभ मिलने की संभावना है, क्योंकि उनके यहां ए2+एफएल लागत सिर्फ 729 रुपये है, जो कि औसत लागत का डेढ़ गुना से भी ज्यादा है. इस तरह निर्धारित एमएसपी में राज्य लागत का 150 फीसदी से ज्यादा यानी ढाई गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है.

वहीं अगर महाराष्ट्र का लागत देखें तो यहां के किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना है. राज्य में ए2+एफएल लागत 2,275 रुपये और सी2 लागत 2,760 रुपये है, जो कि इस साल के लिए धान की एमएसपी से भी काफी ज्यादा है.

इसका मतलब है कि राज्य के किसान को एक क्विंटल धान बेचने पर ए2+एफएल लागत के हिसाब से 407 रुपये और सी2 लागत के हिसाब से 892 रुपये का नुकसान होगा.

ओडिशा के धान उत्पादक किसानों को भी काफी नुकसान होने की संभावना है. राज्य में ए2+एफएल लागत 1,500 रुपये और सी2 लागत 1,831 रुपये है. इस तरह केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी किसी भी तरह से राज्य फसल लागत की तुलना में डेढ़ गुना नहीं है.

धान की तरह ही अन्य फसलों की भी एमएसपी निर्धारण में काफी असमानता है. महाराष्ट्र ज्वार का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है. देश में कुल ज्वार उत्पाद में 38.5 फीसदी हिस्सेदारी महाराष्ट्र की है. हालांकि मौजूदा एमएसपी से यहां के किसानों को नुकसान होगा.

केंद्र ने ज्वार की औसतन ए2+एफएल लागत 1746 रुपये के आधार पर इसकी एमएसपी 2,620 रुपये तय की है. जबकि महाराष्ट्र में ज्वार की ए2+एफएल लागत 1794 रुपये और सी2 लागत 2,403 रुपये है.

इस तरह किसी भी सूरत में निर्धारित एमएसपी महाराष्ट्र के किसानों के लिए लागत का डेढ़ गुना दाम नहीं दे सकेगी.

वहीं ज्वार के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक राज्य कर्नाटक के किसानों को और ज्यादा नुकसान होने की संभावना है. देश के कुल उत्पाद में राज्य का हिस्सा 24 फीसदी है. यहां ए2+एफएल लागत 2,120 रुपये और सी2 लागत 2,879 रुपये है.

इस तरह केंद्र सरकार द्वारा तय की गई ज्वार की एमएसपी कर्नाटक के सी2 लागत से भी कम है. वहीं, अगर ए2+एफएल लागत से तुलना की जाए तो एमएसपी में लागत का मात्र 23.5 फीसदी की बढ़ोतरी है.

धान और ज्वार की तरह बाजरा की एमएसपी भी राज्य-वार लागत के हिसाब से उचित नहीं है. देश में सबसे ज्यादा 48.6 फीसदी बाजरे का उत्पादन राजस्थान में होता है. लेकिन इस साल की निर्धारित एमएसपी यहां की लागत से काफी कम है.

केंद्र सरकार ने औसतन ए2+एफएल लागत 1175 रुपये के हिसाब से बाजरे की एमएसपी 2,150 रुपये तय की है. जबकि राज्य में ए2+एफएल लागत 1,199 रुपये और सी2 लागत 1,550 रुपये है.

इस साल की एमएसपी दोनों में से किसी भी लागत की तुलना में डेढ़ गुना नहीं है, उलटे इस राशि पर उत्पाद बेचने पर किसानों को नुकसान होगा.

हालांकि उत्तर प्रदेश में लागत की हिसाब से ये एमएसपी सही प्रतीत होती है. राज्य में ए2+एफएल लागत 844 रुपये और सी2 लागत 1,214 रुपये है.

इस तरह मौजूदा एमएसपी पर यदि अच्छी खरीद होती है तो यहां के किसानों को ज्यादा लाभ मिलने की उम्मीद है. देश के कुल बाजरा उत्पाद में 22 फीसदी हिस्सेदारी यूपी की है.

वहीं महाराष्ट्र के बाजरा किसानों को भी नुकसान झेलना पड़ सकता है. यहां पर ए2+एफएल लागत 2,245 रुपये और सी2 लागत 2,747 रुपये है, जो कि निर्धारित एमएसपी से भी कम है. इसका मतलब है कि यदि राज्य का किसान एक क्विंटल बाजरा बेचता है तो उसे 95 रुपये और 597 रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा.

केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के औसत ए2+एफएल लागत मूल्य 1,213 रुपये प्रति क्विंटल के आधार पर इस साल के लिए मक्के की एमएसपी 1,850 रुपये तय की है.

हालांकि महाराष्ट्र की ए2+एफएल लागत 1499 रुपये प्रति क्विंटल, राजस्थान की 1776 रुपये प्रति क्विंटल, उत्तर प्रदेश की 1,366 रुपये प्रति क्विंटल, गुजरात की 1999 रुपये प्रति क्विंटल है, जिसके कारण निर्धारित एमएसपी से राज्य के किसानों को लाभ होने के बजाय कुछ जगहों पर घाटा भी होगा.

महाराष्ट्र अरहर का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है लेकिन इस साल की निर्धारित एमएसपी राज्य की फसल लागत की तुलना में काफी कम है. केंद्र ने 3796 रुपये औसत लागत मूल्य के आधार पर अरहर की एमएसपी 6,000 रुपये तय की है. जबकि राज्य का ए2+एफएल लागत 4,078 रुपये और सी2 लागत 5,596 रुपये है.

इससे स्पष्ट है कि अरहर की एमएसपी महाराष्ट्र के किसानों के लिए किसी भी स्थिति में लागत का डेढ़ गुना नहीं है. आंध्र प्रदेश और ओडिशा में इसका लागत मूल्य और ज्यादा है.

यहां पर ए2+एफएल लागत 5,114 रुपये और 5,062 रुपये प्रति क्विंटल तथा सी2 लागत 7,544 रुपये और 7,072 रुपये प्रति क्विंटल है. यानी कि निर्धारित एमएसपी राज्य की फसल लागत से भी कम है.

कर्नाटक और मध्य प्रदेश के अरहर किसानों को एमएसपी से थोड़ा-बहुत लाभ होने की संभावना है क्योंकि यहां पर ए2+एफएल लागत 3,463 रुपये प्रति क्विंटल और 3,120 रुपये प्रति क्विंटल है. लेकिन यदि यहां पर भी सी2 लागत, जो कि 5,051 रुपये और 4,693 रुपये प्रति क्विंटल है, से तुलना किया जाए तो एमएसपी काफी कम बैठता है.

रागी, तुअर, मूंग, उड़द इत्यादि के एमएसपी निर्धारण में भी इसी तरह की असमानता है.