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कैसे गोरखपुर दंगा मामले में यूपी सरकार आदित्यनाथ को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही है

उत्तर प्रदेश में विभिन्न सरकारों ने 2007 में हुए गोरखपुर दंगों में आदित्यनाथ की भूमिका की जांच को अटकाए रखा. हालांकि ऐसे तथ्य मौजूद हैं, जिनके आधार पर कोर्ट चाहे तो मामले को दोबारा देखा जा सकता है.

Yogi Facebook

(फाइल फोटो: यूपी सीएम फेसबुक पेज)

ओह! जब हम धोखे के खेल में उतरते हैं, तो एक झूठ को छिपाने के लिए न जाने कितने झूठ बोलते हैं.

-वॉल्टर स्कॉट

दो महीने पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने योगी आदित्यनाथ पर 2007 में गोरखपुर और आस-पास के जिलों में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के आरोप में मुक़दमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था.

उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि योगी आदित्यनाथ पर मुक़दमा चलाने में देर क्यों की जा रही है? जिसके जवाब में सरकार का कहना था कि वह अनुमति नहीं दे सकती.

अब उत्तर प्रदेश सरकार अपने उस फैसले को जायज़ ठहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक काउंटर एफिडेविट प्रस्तुत किया है.

हालांकि इस महीने की शुरुआत में कोर्ट में जमा किए गए 126 पन्नों के इस दस्तावेज में 2007 के आधिकारिक रिकॉर्ड के उलट कई बातें दर्ज हैं. हालांकि इस बात का भी कोई सबूत नहीं है कि पुलिस ने कभी आदित्यनाथ से दंगे, हत्या, आगजनी के इस मामले के  बारे में कोई सवाल भी किया है, जांच या पूछताछ की तो बात ही जाने देते हैं, पर ‘काउंटर एफिडेविट’ के रूप में दिया गया ये दस्तावेज दिखाता है कि किस तरह उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अपने मुख्यमंत्री को बचाने की कोशिश की जा रही है. पर सच ये है कि इस काउंटर एफिडेविट ने उस सवाल का जवाब भी नहीं दिया है, जो कोर्ट में अप्रैल में पूछा था, ‘क्या कोई मुख्यमंत्री किसी ऐसे आपराधिक मामले में अपनी सरकार का रुख तय कर सकता है, जहां वह खुद ही ‘मुख्य अभियुक्त’ है?’

यह भी दिलचस्प है कि न ही आदित्यनाथ और न ही उनके किसी सह-आरोपी ने कभी भी इस मामले में हुई एफआईआर में दर्ज किसी आरोप से इनकार किया है. 2014 में एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में आदित्यनाथ न केवल एफआईआर में बताए गए  मुस्लिम विरोधी भाषण, जिससे क्षेत्र में हिंसा शुरू हुई थी, देने की बात गर्व से स्वीकारते दिखते हैं, बल्कि यह भी कहते हैं कि अगर ज़रूरत पड़ी तो वे फिर ऐसा करेंगे. फिर भी, ये काउंटर एफिडेविट इसे प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करता.

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मई में सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि वो आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दे सकती, जिस पर याचिकाकर्ता परवेज़ परवाज़ ने आपत्ति जताई. इस पर कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा, जिसके जवाब में सरकार ने ये काउंटर एफिडेविट दिया है, जहां कहा गया है:

  • सालों तक याचिकाकर्ता मामले को उठाने में गंभीर नहीं रहे और अब आदित्यनाथ से राजनीतिक विरोध के कारण ये मुद्दा उठा रहे हैं.
  • मामले के निपटारे के लिए याचिकाकर्ता की ओर से एक भी बार प्रयास नहीं किया गया.
  • याचिकाकर्ता परवाज़ का आपराधिक इतिहास रहा है. उनके ख़िलाफ़ 10 आपराधिक मामले दर्ज हैं.
  • याचिकाकर्ता ने सालों तक सीबी-सीआईडी द्वारा जांच जारी रखने के मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी पर अब वे ग़लत आरोप लगा रहे हैं.
  • 19 मार्च, जबसे आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने हैं, तबसे याचिकर्ताओं ने इस मुद्दे को उठाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया, जो उनका मकसद साफ दिखाता है.
  • सीबी-सीआईडी एक विशेषीकृत और स्वतंत्र जांच संस्था है, जो जांच करने के लिए पूरी तरह योग्य है.
  • राज्य सरकार सीबी-सीआईडी द्वारा अभियोजन की की किसी सिफारिश को मंजूरी देने के लिए क़ानूनी रूप से बाध्य नहीं है.
  • परवाज़ की याचिका में दर्ज हिंसा की घटनाओं पर स्थानीय पुलिस द्वारा ज़रूरी कदम उठाया जा चुका है.
  • परवाज़ द्वारा पुलिस को दी गई सीडी, जिसमें आदित्यनाथ का कथित विवादित भाषण, जिससे हिंसा भड़की थी, की रिकॉर्डिंग होने की बात कही गई थी, उसे फॉरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा ‘टैम्पर’ (छेड़छाड़ किया हुआ) बताया गया है; फॉरेंसिक रिपोर्ट की इस बात को चुनौती नहीं दी जा सकती.
  • जिस टीवी कार्यक्रम में आदित्यनाथ के यह भाषण देने की बात स्वीकारने की बात कही गई है, वह सबूत के रूप में मान्य नहीं है, जिस कारण जांच अधिकारी द्वारा इसकी जांच करने का सवाल नहीं उठता.
  • सीबी-सीआईडी की जांच उस ‘षड्यंत्र’ के बारे में कुछ नहीं बताती, जिसका ज़िक्र एफआईआर में किया गया है.

इस काउंटर एफिडेविट में बताई गई सबसे महत्वपूर्ण बात है कि उस सीडी की विश्वसनीयता पर उठे सवाल हैं, जिसमें योगी आदित्यनाथ के कथित भड़काऊ भाषण होने के प्रमाण हैं.

सीडी पर सवाल

गौरतलब है कि परवेज़ ने यह सीडी अप्रैल 2008 में कोर्ट में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को सौंपी थी. परवेज़ के अनुसार इस सीडी में 27 जनवरी 2007 की शाम को दिया योगी आदित्यनाथ का वो भाषण है, जिससे हिंसा भड़की थी.

परवेज़ के सीडी देने के तकरीबन 6 साल बाद 14 अगस्त 2014 को सीबी-सीआईडी द्वारा ये सीडी सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (सीएफएसएल) को भेजी गई. इसके 2 महीने बाद 13 अक्टूबर 2014 को सीएफएसएल द्वारा दो पन्नों की एक ‘एग्जामिनेशन’ रिपोर्ट भेजी गई, जिसमें कहा गया था कि उन्हें प्राप्त डीवीडी (गौर कीजिए सीडी नहीं) में जो वीडियो थे, वे ‘असली’ नहीं हैं बल्कि वह संपादित हैं और उससे छेड़छाड़ की गई है.

लेकिन ऐसे कई तथ्य हैं, जिससे सीएफएसएल के इस ‘एग्जामिनेशन’ पर संदेह पैदा होता है.

पहला, जिस फॉरेंसिक परीक्षक द्वारा सीडी का यह सील किया गया पार्सल खोला गया, उसका विवरण कहता है, ‘सीडी के अलावा पार्सल में 5 जून 2014 की तारीख का सिटी फोकस अख़बार का एक पन्ना भी था.’ अगर सीजेएम कोर्ट में परवेज़ ने सीडी अप्रैल 2008 में जमा की थी, तो यह कैसे संभव है?

क़ानून की मानें तो कोर्ट के अधिकारियों द्वारा जमा करने के साथ ही ये सीडी सील पैकेट में रख दी जानी चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया गया, तब ही ऐसा मुमकिन है कि सीएफएसएल में इसमें 2014 का अख़बार पाया जाए.

और अगर सीजेएम कोर्ट में सील किए गए इस पैकेट से फॉरेंसिक लैब में पहुंचने से पहले छेड़छाड़ हुई है तो सीडी कि विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाना लाज़मी है. याचिकर्ताओं ने यही बात हाईकोर्ट को बताई है.

इसके अलावा फॉरेंसिक रिपोर्ट और याचिकाकर्ता द्वारा सीडी में बताए गए तथ्यों को लेकर भी मतभेद है. सीएफएसएल की रिपोर्ट कहती है कि डीवीडी में दो फोल्डर मिले, जिनमें से एक में ‘सैफरन वॉर’ नाम की फिल्म थी.

गौर करने वाली बात है कि आदित्यनाथ की सांप्रदायिक गतिविधियों पर बनी ये फिल्म 2011 में लखनऊ के दो सामाजिक कार्यकर्ताओं राजीव यादव और शाहनवाज़ आलम ने बनाई थी. 2011 में बनी कोई फिल्म 2008 में जमा की गई किसी सीडी/डीवीडी में कैसे हो सकती है?

सीएफएसएल की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि उन्हें मिली डीवीडी ‘कोने से चटकी’ हुई थी. परवेज़ इस बात से साफ इनकार करते हैं कि उनके द्वारा सीजेएम कोर्ट में दी गई सीडी चटकी हुई थी. हालांकि इस बात को भी बहुत आसानी से सत्यापित कर सकते हैं.

सीजेएम कोर्ट में जमा किए गए सामान की फाइल में नोट किए विवरण से ये जाना जा सकता है कि जमा करते वक़्त वह किस स्थिति में थी. ये समझना मुश्किल है कि कोर्ट कोई ‘चटकी’ हुई सीडी स्वीकार करेगा और यह बात विवरण या रसीद में नहीं लिखी जाएगी.

इन सब तथ्यों के अलावा सीडी को लेकर कहा गया सबसे बड़ा झूठ इस ‘एग्जामिनेशन’ रिपोर्ट से इतर है. 11 मई 2017 से राज्य सरकार लगातार हाईकोर्ट से यह कह रही है कि उसने आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ अभियोजन की अनुमति सीडी की फॉरेंसिक रिपोर्ट के कारण नहीं दी.

लेकिन सीएफएसएल द्वारा इसकी जांच रिपोर्ट अक्टूबर 2014 में सौंपी गई थी, वहीं सीबी-सीआईडी ने अप्रैल 2015 में यह निर्णय दिया था कि उसके पास आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं. तब क्या सीबी-सीआईडी जैसी एक स्वतंत्र संस्था एक नेगेटिव फॉरेंसिक रिपोर्ट को ग़लत साबित करने के प्रमाणों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थी.

सरकार का जवाबी हलफनामा

सरकार द्वारा दायर किए गए जवाबी हलफनामे (काउंटर एफिडेविट) के बाकी दावों की पड़ताल करने से पहले, एफआईआर में तफसील से दर्ज उन घटनाओं को याद करना मुनासिब होगा, जो हिंसा भड़काने का कारण बनीं. किसी भी आरोपी ने आज तक एफआईआर में कही गई बातों से न तो कभी इनकार किया है, न ही उन्हें चुनौती दी है. आश्चर्यजनक बात ये भी है कि राज्य की विभिन्न सरकारों ने भी न तो कभी एफआईआर में किए गए दावों को नकारा है, न कभी उनकी सत्यता को ही चुनौती दी है.

इसके अलावा,  यह घटना किसी भी परिभाषा से पूरी तरह सार्वजनिक थी. राष्ट्रीय अखबारों में इसकी ख़बर पहले पन्ने पर छपी थी और राष्ट्रीय न्यूज टेलीविजन के प्राइमटाइम पर इसकी विस्तृत रिपोर्टिंग हुई थी. एफआईआर में ऐसा बहुत कम है- हमलों में आदित्यनाथ की भूमिका, घटनास्थल और पीड़ित लोग, जिसके बारे में पहले ही विस्तृत रिपोर्टिंग ही नहीं हो चुकी थी. वास्तव में, पुलिस ने बाद में खुद हाईकोर्ट में कहा था कि उसने 2007 में सिर्फ गोरखपुर जिले में सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में 28 एफआईआर दर्ज किए थे. हिंसा के एक दिन बाद आदित्यनाथ को गिरफ्तार किया गया था और दस दिन बाद जमानत पर छोड़ दिया गया था.

लेकिन फिर भी सीबीआई-सीआईडी के अलावा जवाबी हलफनामा भी एफआईआर में दर्ज आरोपों को साबित करने की ज़िम्मेदारी याचिकाकर्ता परवाज़ पर ही डालता है.

क्या हुआ था 27 जनवरी 2007 को

16वीं सदी के योद्धा राजा महाराणा प्रताप मुग़ल सम्राट अकबर का विरोध करने के लिए हिंदू दक्षिणपंथ के चहेते हैं. इसलिए यह सिर्फ संयोग नहीं था कि आदित्यनाथ ने 27 जनवरी, 2007 को रात 8 बजे एक बड़ी भीड़ को जमा करने के लिए गोरखपुर रेलवे स्टेशन के पास महाराणा प्रताप चौक का चुनाव किया. वहां एक दिन पहले हुए एक हिंदू व्यापारी के बेटे की हत्या को लेकर, जिसका आरोप मुस्लिमों पर लगाया जा रहा था, माहौल पहले से ही काफी संवेदनशील था. ख़बरों के मुताबिक जिले में सांप्रदायिक हिंसा 4 जनवरी से ही जारी थी.

उस समय समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव राज्य के मुख्यमंत्री थे. जिला-प्रशासन ने शहर के कुछ हिस्सों में कर्फ्यू लगाने के साथ ही धारा 144 भी लागू कर दिया था, जो गैरकानूनी सभा पर रोक लगाती है. लेकिन, इन उपायों ने आदित्यनाथ पर न कभी पहले अंकुश लगाया था, न ही अब ऐसा कुछ होने जा रहा था.

प्रशासन के आदेशों का मखौल बनाते हुए पुलिस की भारी मौजूदगी में ही आदित्यनाथ ने माइक्रोफोन लेकर बिना कोई समय गंवाए वहां जमा अपने सैकड़ों समर्थकों को हिंदी में संबोधित करना शुरू कर दिया.

अगर एक हिंदू का खून बहेगा, तो हम प्रशासन से एफआईआर दर्ज नहीं कराएंगे बल्कि कम से कम उनके दस लोगों को मारेंगे. बर्दाश्त की सारी सीमाएं खत्म हो चुकी हैं, अगर हिंदुओं की दुकानों और घरों को आग लगाई जाती है, तो कोई भी आपको भी उनके साथ ऐसा ही करने से नहीं रोक सकता. हिंदुओं के सम्मान को बचाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है. इस लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार रहिए.

अपनी बात को जारी रखते हुए उन्होंने कहा,

क्योंकि जो मारा गया वह एक हिंदू था, क्योंकि एक हिंदू व्यापारी को लूटा गया, हिंदू दुकान में तोड़-फोड़ की गई, इसलिए प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. 4 जनवरी से गोरखपुर में जो कुछ हो रहा है, वह राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवाद है. सिर्फ जनता ही राज्य द्वारा प्रायोजित इस आतंकवाद को कुचल सकती है. और आपको ऐसा करने के लिए आगे आना चाहिए. अगर हम हिंदुओं के कल्याण के लिए ऐसा नहीं कर सकते हैं तो आनेवाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी. आखिरी युद्ध के लिए तैयार रहिए. अगर आप सिर्फ एक बार खड़े हो जाते हैं, तो आप देखेंगे कि गोरखपुर में आनेवाले कई वर्षों के लिए शांति आ जाएगी.

प्रशासन को ‘निकम्मा’ और ‘हिजड़ा’ बताते हुए आदित्यनाथ ने कहा कि अगर प्रशासन ‘हिंदू व्यापारी की मृत्यु का ‘बदला’ लेने में नाकाम रहता है, तो हम यह काम खुद करेंगे…हम कानून को अपने हाथों में ले लेंगे और यहां कानून-व्यवस्था को ध्वस्त कर देंगे. इसके बाद मुसलमानों को सीधे निशाने पर लेते हुए उन्होंने मुहर्रम को लेकर ऐलान किया, ‘हम इस बार तज़िया नहीं निकलने देंगे.. हम तज़ियाओं के साथ होली मनाएंगे.’

उन्होंने गोरखपुर और आसपास के जिलों में बंद का आह्वान करते हुए अपनी बात समाप्त की. इसके तुरंत बाद, वह जमा आवेशित भीड़ एक मशाल जुलूस में तब्दील हो गई, जिसका आदित्यनाथ ने शहरभर में नेतृत्व किया. गोरखपुर का आसमान कटुए काटे जाएंगे, राम राम चिल्लाएंगे’, जैसे मुस्लिम विरोधी नारों से गूंज गया.

इस गुस्से को हिंसा का रूप अख्तियार करने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. उपद्रवियों के गिरोहों ने़, जिनमें से कई में आदित्यनाथ द्वारा गठित हिंदू युवा वाहिनी जैसे संगठनों के सदस्य शामिल थे, मुस्लिमों के घरों, दुकानों, गोदामों, कारों, मोटरसाइकिलों, बैलगाड़ियों पर हमला किया और उनमें आग लगा दी. इनमें गोरखनाथ मंदिर के पड़ोस में रहनेवाली मुस्लिम बस्ती भी शामिल थी. आदित्यनाथ जिस हिंदू संप्रदाय के मुखिया हैं, उसकी पीठ गोरखनाथ मंदिर में ही है. मस्जिदों और मदरसों को भी हमले का निशाना बनाया गया.

उस दिन और उसके बाद की घटनाओं का यह वर्णन एफआईआर में दर्ज है. जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, विभिन्न सरकारों, पुलिस, जिला प्रशासन और यहां तक कि मुख्य आरोपी ने भी न तो कभी इन्हें नकारा है, न इन्हें चुनौती दी है. भारी मात्रा में उपलब्ध समाचार रिपोर्टिंग भी इस विवरण को काटने की जगह इसकी तस्दीक ही करते हैं. लेकिन, फिर भी आज तक आधिकारिक हल्के से लंबे समय तक चली हिंसा के पीछे किसी साजिश की संभावना को लेकर किसी किस्म की कोई पूछताछ या जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है.

 

एफआईआर दर्ज करने की कहानी

28 जनवरी, 2007 को यानी आदित्यनाथ की सभा और उसके बाद हुई हिंसा के अगले दिन, परवाज़ ने जिला पुलिस को पहली चिट्ठी लिखकर आदित्यनाथ समेत उस रैली में मौजूद कई अन्य लोगों पर कार्रवाई करने की मांग की. यह कहते हुए कि वे उस रैलीस्थल से गुजर रहे थे इसलिए वे इसके प्रत्यक्षदर्शी हैं, परवाज़ ने विस्तार से आंखोंदेखी का बयान किया, जिसमें कुछ दृश्यों का विवरण ऊपर दिया गया है. लेकिन, पुलिस ने उनकी चिट्ठी को नजरअंदाज कर दिया. उसी दिन पुलिस ने आदित्यनाथ को गिरफ्तार कर लिया. उस समय मीडिया में आयी रपटों का कहना है कि ऐसा उन्हें हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में जाने से रोकने के लिए किया गया.

7 फरवरी को, एक स्थानीय अदालत ने आदित्यनाथ को जमानत पर छोड़ दिया. इसके अलगे दिन, परवाज़ ने पुलिस को दूसरी चिट्ठी लिखते हुए अखबारी रपटों के आधार पर 27 जनवरी से शुरू होनेवाली हिंसा की घटनाओं का ब्यौरा पेश किया. उन्होंने लिखा कि कम से कम एक मुस्लिम की हत्या की गई; एक गांव की मस्जिद के इमाम पर पेट्रोल छिड़ककर उसे मारने की नीयत से उसे लगा दिया गया; कई जगहों पर तज़ियाओं को भी आग के हवाले कर दिया गया; मस्जिदों पर हमले किए गए और उनमें तोड़-फोड़ की गई; पवित्र ग्रंथों को जला दिया गया.

परवाज़ ने लिखा कि आदित्यनाथ ने अपने भाषण में खुलेआम न सिर्फ मुसलमानों के ख़िलाफ़ बल्कि प्रशासन के ख़िलाफ़ भी हिंसा करने की धमकी दी थी. इस धमकी पर उनके कार्यकर्ताओं ने तुरंत कार्रवाई की जिसका प्रमाण ट्रेनें और रेलवे की अन्य संपत्तियों और बसों समेत सरकारी वाहनों पर किया गया हमला है. जानकारी के मुताबिक हिंदू युवा वाहिनी के सदस्यों ने जिलाधिकारी के दफ्तर में घुसकर तोड़-फोड़ की और उसे आग के हवाले कर दिया. परवाज़ ने अपनी चिट्ठी में लिखा, ‘जिला प्रशासन को इन घटनाओं की पूरी जानकारी है क्योंकि इन घटनाओं की मीडिया में भी व्यापक रिपोर्टिंग की गई है.’’ ‘‘आदित्यनाथ का भाषण इस हिंसा का कारण है और इसमें उनका संगठन शामिल है. इसलिए कृपया कानून के तरह उचित कार्रवाई कीजिए’’. परवाज़ ने भाषण की सीडी को पुलिस के सुपुर्द करने के लिए भी मिलने का समय मांगा.

लेकिन पुलिस ने इस चिट्ठी को भी नजरअंदाज कर दिया. मई, जून और जुलाई के महीने में परवाज़ ने आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करने के लिए पुलिस को कम से कम चार चिट्ठियां और भेजीं. लेकिन, इन चिट्ठियों पर पुलिस महकमे ने चुप्पी साध ली. इसी बीच, अप्रैल, 2007 के विधानसभा चुनावों में मुलायम सिंह सरकार का बोरिया-बिस्तर बंध गया और मायावती राज्य की नई मुख्यमंत्री बनीं.

यह देखकर कि पुलिस उनकी चिट्ठयों का कोई संज्ञान नहीं ले रही है, परवाज़ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और उससे इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए हस्तक्षेप करने की मांग की. अक्टूबर, 2007 को हाईकोई ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए, उन्हें आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत गोरखपुर के मजिस्ट्रेट की अदालत में जाने को कहा. सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत शिकायतकर्ता की एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास ही है.

पुलिस का जवाब

इस तरह, हाई कोर्ट के निर्देश से लैस होकर परवाज़ ने 21 नवंबर, 2007 को गोरखपुर के सीजेएम (चीफ जुडिशल मजिस्ट्रेट ) के सामने एक अर्जी लगाई. अब पुलिस के पास जवाब देने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया. 27 नवंबर, 2017 को सीजेएम की अदालत में दायर की गई पुलिस की हिंदी में लिखी गई पहली रिपोर्ट में कहा गया, ‘(परवाज़ द्वारा) लगाए गए आरोप निराधार हैं. योगी आदित्यनाथ एक सम्मानित व्यक्ति हैं. वे सांसद हैं और गोरखपुर की एक प्रसिद्ध शख्सियत हैं.’

रिपोर्ट में कहा गया कि यह ‘प्रकरण’ (आदित्यनाथ का भाषण और हिंसा) ‘पुराना’ पड़ चुका है, और अब इस मामले में एक और एफआईआर दर्ज करने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि हिंसा के बाद पुलिस ने पहले ही कई एफआईआर दर्ज किए गए थे. ‘पुलिस ने हिंसा के वक्त कार्रवाई की थी. कर्फ्यू लगाया गया था. आदित्यनाथ को गिरफ्तार भी किया गया था. अब फिर से एफआईआर दर्ज करना, गड़े मुर्दे उखाड़ने के समान होगा.’’ इसमें आगे कहा गया कि हिंदू युवा वाहिनी के सदस्यों के ख़िलाफ़ ‘गुंडा और गैंगस्टर कार्रवाई’ की शुरुआत की गई थी. साथ ही यह भी कहा गया कि मुस्मिल विरोधी नारे लगाए जाने के आरोप सत्य से परे हैं.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘मशाल जुलूस के दौरान कोई भी अप्रिय घटना नहीं घटी.’ आगे यह भी जोड़ा गया कि परवाज़ मुख्यमंत्री (जो इस समय मायावती थीं) को भी इस बारे में लिख चुके हैं. राज्य की सर्वेसर्वा द्वारा उनकी फरियाद का कोई संज्ञान नहीं लिया जाना, साबित करता है कि परवाज़ ‘सच’ नहीं बोल रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि ‘सच यह है कि आवेदक राजनीति से प्रेरित होकर पूरे मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है और पूरी घटना का आरोप सिर्फ एक व्यक्ति पर मढ़ना चाह रहा है. लेकिन यह आरोप सच्चाई की बुनियाद पर नहीं टिका है.’

इस रिपोर्ट में न तो यह बताया गया कि आखिर आदित्यनाथ को गिरफ्तार क्यों किया गया था और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी गई कि परवाज़ के आवेदन में आदित्यनाथ पर लगाए गए हिंसा भड़काने और हिंसा कराने के आरोप के लिए क्या उनके ख़िलाफ़ कोई एफआईआर दर्ज की गई थी? इसने यह भी नहीं स्पष्ट नहीं किया कि आखिर महज 10 महीने पहले हुई एक घटना, बहुत पुरानी कैसे हो गई. न ही यह बताया गया कि ‘गुंडा और गैंगस्टर कार्रवाई’ का क्या मतलब था? न इस बारे में कोई जानकारी दी गई कि उसे यह कैसे पता था कि भीड़ ने मुस्लिम विरोधी नारे नहीं लगाए थे. रिपोर्ट ने इस बात का जिक्र नहीं किया कि आदित्यनाथ ने कर्फ्यू तोड़कर वह सभा की थी.

पुलिस की चिट्ठी ने कहने के नाम पर बस यह कहा कि वास्तव में शिकायतकर्ता परवाज ही संदिग्ध है:

शिकायतकर्ता एक विवादित राजनीतिक हस्ती है और उसके आरोप राजनीतिक दुश्मनी पर आधारित हैं. वह मुस्लिम सांप्रदायिक राजनीति में शामिल रहा है. उसके आरोप राजनीति से प्रेरित हैं.

इस रिपोर्ट का कहना था कि परवाज़ की अर्ज़ी को विपक्ष के एक नेता की छवि को खराब करने की साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए. इसमें यह दावा भी किया गया कि ख़बरों के मुताबिक ‘गोरखपुर में हुई घटनाओं के दौरान आवेदनकर्ता (परवाज) की गिरफ्तारी हुई थी, इसलिए उसके द्वारा बनाई गई कहानी पर यकीन नहीं किया जा सकता है. यह आखिरी दावा, जिसके साथ पुलिस ने चतुराई दिखाते हुए ‘ख़बरों के मुताबिक’ का पुछल्ला जोड़ दिया, जाहिर है सही नहीं था. उस दौरान परवाज़ की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. निश्चित तौर पर कम से कम पुलिस को यह पता होना चाहिए था कि गिरफ्तारी किसकी हुई थी?

लेकिन पुलिस की रिपोर्ट में किए गए दो दावे अन्य दावों की तुलना में कहीं ज्यादा चैंकानेवाले थे. एक, इसमे कहा गया कि हिंसा एक हिंदू, व्यापारी के बेटे राजकुमार अग्रहारी की हत्या के प्रतिक्रियास्वरूप हुई, जिसका निहितार्थ यह था कि यह हिंसा जवाबी कार्रवाई का मामला थी. और दो, एफआईआर दर्ज करने से ‘‘कानून और व्यवस्था प्रभावित’’ होगी. एक बार फिर रिपोर्ट में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि आखिर इस आखिरी दावे का क्या अर्थ था.

अपनी एकतरफा प्रकृति के बावजूद इस रिपोर्ट को परवाज़ के आवेदन के ख़िलाफ़ कानूनी तर्क के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता था. पुलिस रिपोर्ट के जवाब में परवाज़ ने एक साधारण सवाल पूछा: क्या पुलिस मेहरबानी करके कोर्ट को यह बताएगी कि क्या उसने महाराणाप्रताप चौक की घटना, महाजुलूस और साजिश को लेकर एफआईआर दर्ज की है या नहीं?

इस मामले में चार महीने तक तारीख बढ़ाई जाती रही. फिर सीजेएम ने दूसरी पुलिस रिपोर्ट की मांग की. 16 अप्रैल, 2008 को दायर की गई यह पुलिस रिपोर्ट पूरी तरह से पलट गई. पहली रिपोर्ट में जहां यह दावा किया गया था कि आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने का कोई आधार नहीं है और उनके ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित हैं, वहीं दूसरी रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस इस मामले में पहले ही एफआईआर दर्ज कर चुकी है और इसके ऊपर एक और एफआईआर दर्ज करना गैरकानूनी होगा.

लेकिन काफी मशक्कत के बाद खोज कर निकाली गई इस दूसरी एफआईआर और परवाज़ की शिकायत के बेच शायद ही कोई समानता थी. यह एफआईआर हज़रत नामक एक मुस्लिम ने 27 जनवरी, 2007 को शाम करीब छह बजे गोरखपुर रेलवे स्टेशन के निकट एक दुकान पर जहां पर वह काम करता था अनजान व्यक्तियों द्वारा किए गए हमले को लेकर लिखवाई थी. यानी परवाज़ ने अपने आवेदन में जिन घटनाओं का जिक्र किया था, यह उससे पहले का वाकया था. इस एफआईआर में आदित्यनाथ के भाषण का कोई जिक्र नहीं था; न ही इसमें महाजुलूस; व्यापक हिंसा, जिसमें मस्जिदों, घरों, दुकानों, वाहनों पर हमले किए गए थे; न ही मौतों; और साजिश रचे जाने की संभावना का ही कोई जिक्र था.

28 अप्रैल, 2008 को परवाज़ ने पुलिस की दूसरी रिपोर्ट को चुनौती देते हुए फिर से एक पत्र लिखा. इसके साथ उन्होंने एक सीडी भी जमा कराई, जिसमें उनके मुताबिक आदित्यनाथ के उस दिन के भाषण का वीडियो था. लेकिन, तीन महीने के बाद सीजेएम ने पुलिस की दलील को स्वीकार करते हुए एफआईआर दर्ज करने की परवाज की अर्जी खारिज कर दी.

आखिरकार हाईकोर्ट को देना पड़ा एफआईआर का आदेश

इस तरह सीजेएम की अदालत से बैरंग वापस लौटाए जाने के बाद परवाज को दूसरी बार इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण में जाना पड़ा. उन्होंने दलील दी कि जो आरोप उन्होंने आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ लगाए हैं और जिन घटनाओं का उन्होंने जिक्र किया है, वे कथित दूसरी एफआईआर में दर्ज मामलों से पूरी तरह से अलग हैं. उन्होंने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट के पास इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार नहीं था कि एक ही अपराध के लिए दो एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है या नहीं. परवाज़ ने यह भी कहा कि कानून इस बारे में पूरी तरह से स्पष्ट है कि अगर शिकायत संज्ञेय अपराध से संबंधित है, तो एफआईआर लेने से इनकार नहीं किया जा सकता है.

यह जानकर हैरत हो सकती है कि मायावती सरकार ने यह दलील देते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश का बचाव करने की कोशिश की कि आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने की कोई जरूरत नहीं है. हाईकोर्ट को परवाज के पक्ष में फैसला सुनाने में सिर्फ दो महीने का वक्त लगा. कोर्ट ने कहा कि परवाज की शिकायत में लगाए गए ‘‘कुछ आरोप उल्लेखनीय हैं’. जज ने घटनाओं को दोबारा कहने के लिए शिकायत के हिस्सों को काफी विस्तार से उद्धृत किया. जस्टिस वीके वर्मा ने लिखा, ‘(सीजेएम) द्वारा वर्तमान मामले में एफआईआर दर्ज कराने से इनकार करना सही नहीं था’…इन शिकायतों से प्रथमदृष्टया बेहद गंभीर प्रकृति के संज्ञेय अपराध सामने आ रहे हैं, जिनकी पुलिस द्वारा जांच किए जाने की जरूरत है.’

जस्टिस वर्मा ने अपने आदेश में लिखा, ‘काबिल सीजेएम को वर्तमान मामले में उन लोगों के ख़िलाफ़, जिनके नाम आवेदन में हैं, एफआईआर दर्ज कराने…और पुलिस द्वारा जांच कराए जाने का आदेश देना चाहिए था, लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जरूरी कानूनी ज्ञान के अभाव में काबिल सीजेएम ने आवेदन को खारिज कर दिया. …चीफ जुडिशल मजिस्ट्रेट, गोरखपुर द्वारा पारित आदेश पूरी तरह से गैरकानूनी है और इस तरह उसे रद्द किया जाता है.’’जस्टिस वर्मा सीजेएम के फैसले से इतने नाराज थे कि उन्होंने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को अपने आदेश की एक प्रति सीजेएम को भेजने का आदेश दिया ताकि ‘यह भविष्य में उनका पथ-प्रदर्शन कर सके और उनके कानून के ज्ञान को दुरुस्त कर सके.’

भले जस्टिस वर्मा का आदेश 30 सितंबर, 2008 को ही आ गया था, लेकिन परवाज़ की शिकायत को एफआईआर के तौर पर दर्ज होने में एक महीने का वक्त और लग गया और इसे आखिरकार 2 नवंबर को दर्ज किया गया. यानी जिस दिन हिंसा शुरू हुई, उसके 21 महीने के बाद. ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि स्थानीय पुलिस में से कोई भी इस जांच में हाथ नहीं लगाना चाहता था. इसलिए, एफआईआर दर्ज करने के चंद दिनों के भीतर ही इस केस को सीबी-सीआईडी को हस्तांतरित कर दिया गया. यह देखते हुए परवाज़ को तीसरी बार हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. इस बार एक और सामाजिक कार्यकर्ता असद हयात भी उनके साथ सह-याचिकाकर्ता के तौर पर जुड़ गए.

स्वतंत्र जांच के लिए संघर्ष

परवाज़ और हयात द्वारा 28 नवंबर, 2008 को दायर की गई रिट याचिका में कहा गया, ‘जिस दिन यह घटना हुई, उस दिन से लेकर एफआईआर दर्ज करने तक पुलिस अधिकारी अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने में पूरी तरह से अक्षम साबित हुए हैं.’ याचिकाकर्ताओं के ‘हर संभव प्रयासों’ के बावजूद पुलिस न सिर्फ ‘एफआईआर दर्ज करने में बुरी तरह से नाकाम रही, बल्कि उसने अपराधियों को बचाने के लिए अपने स्तर पर हर संभव प्रयास किया.’

याचिका में 27 जनवरी, 2007 को आदित्यनाथ के भाषण के बाद गोरखपुर समेत कम से कम छह जिलों में हुए बलवे का ब्यौरा दिया. इसमें हिंसा के बाद इस क्षेत्र में पुलिस द्वारा दर्ज 21 प्राथमिकियों के बारे में भी तफसील से जानकारी दी गई. इसमें यह भी जोड़ा गया कि, ‘कई अन्य दूसरे मामले भी दर्ज किए गए, जिनकी जानकारी आसानी से राज्य के अधिकारियों से मांगी जा सकती है.’

याचिका में गोरखपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसपी) द्वारा एक अन्य मामले में हाई कोर्ट के समक्ष दिए गए दस्तखत वाले बयान का हवाला दिया गया, जिसमें वर्ष 2007 से सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में 29 एफआईआर दर्ज होने की बात स्वीकार की गई थी. इनमें से 20 मामलों में आरोपपत्र (चार्जशीट) तक दायर किए जा चुके थे. छह में पुलिस ने जांच बंद करके फाइनल रिपोर्ट दे दी थी, जिसका मतलब है कि पुलिस ने इन मामलों को मुकदमा चलाने के लिए आगे नहीं भेजा था. दो मामलों में मुकदमा चलाने की इजाज़त राज्य सरकार से मांगी गई थी. एक एफआईआर में यानी परवाज द्वारा किए गए एफआईआर में सीबी-सीआईडी की जांच चल रही थी.

याचिका में कहा गया, ‘यह स्पष्ट तौर पर स्थापित है कि ऊपर जिक्र की गई घटनाएं साजिशकर्ताओं की एक सोची-समझी योजना के कारण हुईं और इसलिए पुलिस को साजिश के पहलू की जांच शुरू से ही करनी चाहिए थी, लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रही. प्रकट तौर पर इसका कारण यह है कि वह कुछ असरदार लोगों पर हाथ नहीं डालना चाहती है, जो ऊपर बैठ कर डोर खींच रहे हैं, और जिनके साथ वास्तव में पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत है.’  इसमें यह भी कहा गया कि परवाज़ की एफआईआर में साफ तौर पर हिंसा के पीछे साजिश की संभावना का जिक्र किया गया है और आरोपी पर आईपीसी की धारा 120(बी) के तहत मुकदमा चलाने की मांग की गई है, जो साजिश से संबंधित है. मगर इसके बावजूद पुलिस ने इस अपराध के लिए जांच करने से इनकार कर दिया है.

सवाल उठ सकता है कि सीबी-सीआईडी पर संदेह करने की क्या जरूरत है, जो सामान्य पुलिस से स्वतंत्र होने का दावा करती है? इसका जवाब देने के लिए, परवाज़ ने आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ 1999 की एक दूसरी एफआईआर का हवाला दिया. यह एफआईआर आदित्यनाथ के नेतृत्व वाले एक जुलूस के भीतर से चली गोली से एक पुलिसकर्मी की मौत को लेकर दर्ज की गई थी. इस पुलिसकर्मी को एक विरोधी नेता के बॉडीगार्ड के तौर पर तैनात किया गया था. चश्मदीद गवाहों के बावजूद सीबी-सीआईडी ने अंत में यह निष्कर्ष निकाला कि आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ किसी अपराध का मामला नहीं बनता है. परवाज़ की याचिका ने कहा कि सीबी-सीआईडी का ‘आचरण साफ तौर पर यह दिखाता है कि यह बगैर रीढ़ की संस्था है, जो ज्यादा दबाव पड़ने पर झुक जाती है.’

Yogi Adityanath PTI

फोटो: पीटीआई

समाजवादी सरकार की हीलाहवाली

इस मामले के सह-अभियुक्त चौधरी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एफआईआर के ख़िलाफ़ की गई अपील ने सीबी-सीआईडी की जांच को चार सालों के लिए लटका दिया. यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिसंबर, 2013 में चौधरी की याचिका खारिज किए जाने के बावजूद जांच में कोई तेजी नहीं आई. फिर अगस्त, 2014 में जाने-माने टीवी न्यूज एंकर रजत शर्मा के साथ बात-चीत में आदित्यनाथ ने सबको चौंकाते हुए यह स्वीकार किया कि जनवरी 2007 में उन्होंने विवादित भाषण दिया था.

इसके तत्काल बाद इस मामले में हाईकोर्ट में परवाज़ के साथ दूसरे सह-याचिकाकर्ता हयात ने उत्तर प्रदेश के गृह मंत्रालय के केंद्रीय सचिव (प्रिंसिपल सेक्रेटरी) के साथ ही सीबी-सीआईडी के महानिदेशक को चिट्ठी लिखकर टीवी पर दिए गए आदित्यनाथ के बयान को एक तरह का इकबालिया बयान (एक्स्ट्रा जुडिशल कनफेशन) मानकर उन्हें गिरफ्तार करने की मांग की. जाहिर तौर पर दोनों में से किसी ने चिट्ठी की पावती की सूचना नहीं दी. जांच को लेकर पहला बयान देने में सीबी-सीईआडी को दस महीने का वक्त और लग गया. यह बयान, 24 अप्रैल, 2015 को हाईकोर्ट में जमा किए गए एक हलफनामे (एफिडेविट ऑफ कॉम्पलायंस) के तौर पर आया.

इस हलफनामे में सीबी-सीआईडी ने बतलाया कि उसने परवाज़ का बयान दर्ज कर लिया है, जिन्होंने ‘अभियोजन पक्ष की कहानी का पूरी तरह से समर्थन किया है. इस हलफनामे में यह नहीं बताया गया कि आरोपी से भी कोई बयान लिया गया है या नहीं? बहरहाल इसमें यह जरूर कहा गया कि ‘चश्मदीदों के बयानों और अकाट्य, प्रचुर और पर्याप्त सबूतों के आधार पर जांच अधिकारी ने एक अंतिम रिपोर्ट का मसौदा (ड्राफ्ट फाइनल रिपोर्ट) (डीएफआर) तैयार किया है और इसे (9 अप्रैल, 2015)… को अपने वरिष्ठ अधिकारी के पास स्वीकृति के पास भेज दिया है, और अभी इसकी प्रतीक्षा की जा रही है.’

डीएफआर को फाइनल रिपोर्ट के समान समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. वास्तव में यह इसके बिल्कुल उलट होती है. जहां फाइनल रिपोर्ट के बाद मामले को बंद कर दिया जाता है, यानी मुकदमा चलाने की जरूरत से इनकार कर दिया जाता, वहीं डीएफआर का मतलब है कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार है.

यह एक सनसनीखेज जानकारी थी. इसका यह मतलब था कि न सिर्फ सीबी-सीआईडी ने जांच पूरी कर ली थी, बल्कि इससे यह भी पता चलता था कि उसके पास आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत थे. लेकिन, एक बार फिर सीबी-सीआईडी ने 18 महीने की लंबी चुप्पी साध ली. 6 दिसंबर, 2016 को परवाज़-हयात की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की पीठ ने ‘जांच में हुई प्रगति’ के बारे में जानकारी मांगी. जिसके बाद सीबी-सीआईडी ने एक और हलफनामा (एफिडेविट ऑफ कॉम्पलायंस) दायर किया.

17 दिसंबर, 2016 को हाई कोर्ट में पेश किए गए इस हलफनामे में यह दोहराया गया कि जांच अधिकारी ने एक डीएफआर तैयार करके इसे 28 मई, 2015 को राज्य सरकार के पास ‘स्वीकृति और मुकदमा चलाने की इजाज़त’ के लिए भेज दिया है. इसमें आगे कहा गया कि राज्य सरकार ने अंतिम रिपोर्ट के मसौदे (डीएफआर) को स्वीकार कर लिया है और आगे की कार्रवाई और मुकदमे की इजाज़त देने के लिए इसे सरकार के सक्षम कानूनी अधिकारी के पास भेज दिया है. इसके बाद सरकार के केंद्रीय सचिव (लॉ) ने अंतिम निर्णय लेने के लिए गठित की गई समिति के सामने ‘मामले से जुड़े तथ्यों को’ रखने के लिए इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर (आईओ) को मुलाकात के लिए बुलाया था. सीबी-सीआईडी के इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर 28 अगस्त, 2016 को इस समिति के सामने पेश हुए और ‘इस आपराधिक मामले को लेकर अपना पक्ष रखा…इस मामले में राज्य सरकार की अनुमति का अभी तक इंतजार किया जा रहा था.’

फिर सवाल यह भी है कि, अगर समिति ने इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर का पक्ष अगस्त महीने में ही सुन लिया था, तो फिर साढ़े तीन महीने बीत जाने के बाद भी इसने मुकदमा चलाने की इजाज़त के बारे में कोई फैसला, चाहे पक्ष में या विपक्ष में, क्यों नहीं लिया था?

डेढ़ महीने के बाद हाईकोर्ट ने सरकार से यह जानकारी देने को कहा कि क्या उसने आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने की अनुमति दी है? इसको लेकर सरकार की तरफ से भले कोई जवाब नहीं आया, लेकिन इसी बीच 20 फरवरी, 2017 को सीबी-सीआईडी ने हाईकोर्ट के सामने एक और हलफनामा (एफिडेविड ऑफ  कॉम्पलायंस) दायर किया, जो इस तरह का तीसरा हलफनामा था. इसमें कहा गया कि सीबी-सीआईडी ने फिर से राज्य सरकार को मुकदमा चलाने की इजाज़त देने के लिए लिखा है और इस संदर्भ में सरकार के जवाब का इंतजार है.

इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर को समिति के सामने पेश हुए पांच महीने से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी कोई फैसला नहीं लिया गया था. यह अखिलेश सरकार के कार्यकाल के आखिरी चंद दिनों की बात है. विधानसभा चुनाव चल रहे थे. महज 19 दिन बाद, 11 मार्च को राज्य में भाजपा की जबदरस्त जीत हुई और 19 मार्च को आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन गए. राज्य सरकार ने अब तक आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने को लेकर कोई फैसला नहीं लिया था.

हाई कोर्ट को फिर देना पड़ा दखल

इस साल 17 अप्रैल को याचिकाकर्ता एक बार फिर हाईकोर्ट की शरण में गए और उससे इस मामले में दखल देने की गुजारिश की. सह-याचिकाकर्ता हयात की शिकायत थी कि सीबी-सीआईडी ने इतने सालों में उनका कोई बयान नहीं लिया है, जबकि उन्होंने बार-बार एजेंसी और आला अधिकारियो को यह लिखा है कि उनके पास साजिश के बारे में सूचना है जिसे वे आधिकारिक तौर पर साझा करना चाहते हैं.

4 मई को जब मामला सुनवाई के लिए आया, सरकारी वकील विमलेंदु त्रिपाठी को ‘इस बात की पक्की जानकारी नहीं थी’ कि सरकार ने डीएफआर को स्वीकृति दी है या नहीं! हाईकोर्ट की बेंच को ये बात काफी नागवार गुजरी. और यह बेवजह नहीं था, क्योंकि दिसंबर में जमा किए गए सीबी-सीआईडी के हलफनामे (एफिडेविट ऑफ कॉम्पलायंस) ने यह साफ तौर पर कहा था कि डीएफआर को स्वीकार कर लिया गया है.

कोर्ट ने तब राज्य के मुख्य सचिव (चीफ सेक्रेटरी) को जो राज्य का सबसे बड़ा अधिकारी होता है, सीबी-सीआईडी द्वारा की गई जांच की रिपोर्ट और इसके द्वारा तैयार किए गए डीएफआर समेत मामले के पूरे रिकॉर्ड के साथ अगली सुनवाई में व्यक्तिगत तौर पर हाईकोर्ट की पीठ के सामने पेश होने का आदेश दिया. कोर्ट ने अपने मुख्य सचिव को ‘कथित तथ्यों का स्पष्टीकरण देते हुए एक व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने को कहा ताकि इस मामले का जल्द से जल्द निबटारा किया जा सके क्योंकि संदर्भित घटना 2007 में हुई थी और इसको लेकर याचिका 2008 से विचाराधीन है.’

निश्चित तौर पर उस दिन कोर्ट के मिजाज को देखकर यह समझा जा सकता था कि राज्य सरकार उसके सब्र का इम्तिहान ले रही है. आदेश में कहा गया कि ‘यह मामला अपनी प्रकृति में गंभीर है क्योंकि मौजूदा मामले के समेत 29 आपराधिक मामले इसमें दर्ज हैं.’ साथ ही यह भी कहा गया कि ‘ये बात थोड़ी परेशान करनेवाली है कि सरकारी वकील त्रिपाठी ने ऐसे मुद्दों को उठाया है, जिन्हें इससे पहले की सुनवाइयों के दौरान नहीं उठाया गया था.’

‘इससे यह सवाल पैदा होता है कि राज्य और इसकी एजेंसियां इस गंभीर मामले को किसी अंजाम तक पहुंचाने को लेकर कितनी गंभीर हैं, जिसमें सांप्रदायिक दंगों में निर्दोष लोगों की जानें गईं, कई जख्मी हुए और निर्दोष लोगों की संपत्तियां जला दी गईं. पीड़ितों के परिवार हाईकोर्ट के दरवाजे पर न्याय के इंतजार में खड़े हैं और 9 साल बीत जाने के बाद भी यह मामला तकनीकी मुद्दों में ही फंसा हुआ है.’

आखिरकार अगली तारीख यानी 11 मई को इस मामले में बड़ा मोड़ आया.

अंतर्विरोधों की भरमार

इसे कोई छोटी विडंबना नहीं कहा जा सकता कि जिन वर्षों में यह मामला हाईकोर्ट में चलता रहा आदित्यनाथ इसे दबा कर रखने में कामयाब रहे. लेकिन इस मामले में उनकी सरकार के पहले कदम ने ही इसे सुर्खियों में ला दिया और काफी पहले भुला दिया गया सा यह मामला लोगों की निगाह में आ गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब मुख्य सचिव राहुल भटनागर 11 मई को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में पेश हुए और अपना हलफनामा (एफिडेविट ऑफ कॉम्पलायंस) दायर किया, तो उसमें एक हैरान करनेवाला राज उजागर हुआ: सरकार ने आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की इजाज़त देने से मना कर दिया था.

भटनागर के हलफनामे ने जो घटनाक्रम प्रस्तुत किया, वह दिसंबर में सीबी-सीआईडी के हलफनामे से मेल नहीं खाता था. भटनागर ने कहा कि सीबी-सीआईडी ने अपनी जांच, 10 अप्रैल, 2015 तक पूरी कर ली थी और डीएफआर को वरिष्ठ अधिकारी के पास भेज दिया था जिन्होंने 22 अप्रैल, 2015 को इसे स्वीकृति दे दी थी. उसके बाद सीबी-सीआईडी ने ‘इस मामले’ को मुकदमा चलाने की अनुमति के लिए 10 जुलाई, 2015 को गृह विभाग को भेजा. (लेकिन, सीबी-सीआईडी ने 24 अप्रैल, 2015 के अपने हलफनामे में यह दावा किया था कि डीएफआर को अभी स्वीकृति नहीं मिली है. दिसंबर, 2016 के अपने दूसरे हलफनामे में इसने दावा किया था कि उसने 28 मई, 2015 को डीएफआर तैयार किया था और उसे स्वीकृति के लिए भेजा था.)

भटनागर के हलफनामे में कहा गया कि सीबी-सीआईडी की चिट्ठी गृह मंत्रालय में अपने पते पर 20 जुलाई, 2015 को पहुंची. गृह विभाग इस पर एक कुंडली मार कर बैठा रहा. कहीं जाकर 11 जुलाई, 2016 को इस चिट्ठी को कानून विभाग को भेजा गया. उसी दिन कानून विभाग के विशेष सचिव ने इस मामले के इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर को ‘केस डायरी’ के साथ उनसे मिलने का निर्देश दिया. भटनागर के मुताबिक यह मुलाकात, 27 जुलाई, 2016 को हुई. लेकिन इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर उस दिन अपने साथ केस डायरी नहीं ले गए थे इसलिए उसे एक हफ्ते में दोबारा आने को कहा गया.

कानून विभाग ने छह दिन के बाद एक और चिट्ठी लिखी जिसमें इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर को 8 अगस्त को पेश होने के लिए कहा गया. भटनागर के हलफनामे में यह तो कहा गया है कि इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर ‘ने यह मुलाकात की और इस मामले पर चर्चा की गई’, लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया कि यह दूसरी मुलाकात कब हुई. वहीं, दिसंबर के सीबी-सीआईडी के हलफनामे में भटनागर के दावे के विपरीत 27 जुलाई को जांच अधिकारी की कानून विभाग के साथ ऐसी किसी मुलाक़ात का जिक्र नहीं था. सीबी-सीआईडी के हलफनामे ने सिर्फ यह कहा था कि इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर की विभाग के अधिकारियों से मुलाकात 28 अगस्त को हुई थी. इसमें इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने अपना पक्ष रखा. साथ ही यह कहा कि आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने के लिए अनुमति का इंतजार किया जा रहा था.

इस जगह से भटनागर का हलफनाम घटनाक्रम का बिल्कुल अलग ब्यौरा पेश करता है. इसमें कहा गया कि इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर की अधिकारियों से मुलाकात के बाद कानून विभाग ने पाया कि सौंपे गए दस्तावेज पूर्ण नहीं थे क्योंकि इसमें सीबीआई की सीएफएसएल (सेंट्रल फोरेंसिक लैबोरेटरी) से उस सीडी के संदर्भ में रिपोर्ट नहीं थी जिसे ‘शिकायतकर्ता परवाज़ ने जांच अघिकारी को सबूत के समर्थन में सौंपा था.’ इसलिए सीबी-सीआईडी को 8 अक्टूबर को एक चिट्ठी भेजी गई और फोरेंसिक रिपोर्ट जमा करने के लिए कहा गया. सीबी-सीआईडी की तरफ से कोई जवाब नहीं आने पर उन्होंने 21 दिसंबर को एक और चिट्ठी लिखी.

सीबी-सीआईडी ने 3 जनवरी को कानून विभाग को जवाब दिया और कहा कि उसे अक्टूबर वाली चिट्ठी नहीं मिली थी. इसके बाद विभाग ने 8 मार्च को एजेंसी को वह चिट्ठी दोबारा भेजी. इसके जवाब में सीबी-सीआईडी ने 24 मार्च को यानी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के 5 दिन बाद विभाग को फोरेंसिक रिपोर्ट भेजी. यह सारा खेल सीबी-सीआईडी और गृह-मंत्रालय जो कानून व्यवस्था का नोडल विभाग है, के बीच किया जा रहा था. फोरेंसिक रिपोर्ट को कानून विभाग को भेजने में गृह विभाग ने एक महीने का वक्त और लिया. इसे आखिरकार 26 अप्रैल को भेजा गया.

इस फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर, जिसका ब्यौरा नीचे दिया गया है, कानून विभाग ने यह विचार रखा कि आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए. गृह विभाग ने 1 मई को इस सलाह का समर्थन किया. 3 मई को अनुमति खारिज करने के लिए एक औपचारिक आदेश निकाला गया और उसे सीबी-सीआईडी को भेजा गया. सीबी-सीआईडी ने उसके बाद 6 मई को यह मामला बंद कर दिया और 9 मई को सरकार को इस बारे में अवगत करा दिया.

यह हैरत की बात है कि सीबी-सीआईडी का 20 फरवरी का तीसरा हलफनामा रिकॉर्ड में फोरेंसिक रिपोर्ट के न होने का कोई जिक्र नहीं करता है. इसमें गृह विभाग की तरफ से किए गए तकाजे का भी कोई जिक्र नहीं है. न ही इसमें इस बात का कोई जिक्र है कि इसने गृह-मंत्रालय को जवाब में दिसंबर महीने में कोई चिट्ठी नहीं मिलने के बारे में लिखा था. इस हलफनामे में बस इतना कहा गया है कि एजेंसी ने सरकार को 3 जनवरी को एक चिट्ठी लिखी थी (उसी दिन जिसके बारे में भटनागर का कहना है कि सीबी-सीआईडी ने चिट्ठी न मिलने के बारे में लिखा था) जिसमें आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने के लिए अनुमति मांगी गई थी.

भटनागर के हलफनामे के बाद, सरकारी वकील त्रिपाठी को एक बार फिर जजों के गुस्से का सामना करना पड़ा. कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि यह बेहद कष्टदायक और परेशान करनेवाला है कि सरकार ने 3 मई को ही (मुकदमा चलाने की) अनुमति देने से इनकार करने वाला आदेश दे दिया था, लेकिन त्रिपाठी ने 4 मई को यानी पिछली पेशी के दिन कोर्ट को इसके बारे में जानकारी नहीं दी. कोर्ट ने मामले को सीबीआई को हस्तांतरित करने के आवेदन पर विचार करने और मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार करने की वैधता की जांच करने के लिए 7 जुलाई को अगली पेशी निर्धारित कर दी.

जजों ने मुख्य सचिव को ब्यौरेबार तुलनात्मक चार्ट के माध्यम से ‘(2007 से हुए सांप्रदायिक दंगों के सभी आपराधिक मामलों) में अब तक हुई प्रगति की स्टेटस रिपोर्ट दायर करने’ का भी निर्देश दिया. जजों ने निचली अदालतों को सीबी-सीआईडी की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार न करने का भी आदेश दिया. 7 जुलाई को इस विवाद के विभिन्न पक्षों- वास्तविक याचिकाकर्ता परवाज़ और हयात, मुख्य सचिव के माध्यम से राज्य सरकार, और सीबी-सीआईडी ने अपने पक्षों को दोहराते हुए फिर से हलफनामे दायर किए.

तथ्यों की जांच और जवाबी हलफनामा

इस लेख की शुरुआत में आदित्यनाथ सरकार द्वारा 7 जुलाई, 2017 को दिए गए जवाबी हलफनामे (काउंटर एफिडेविट) के मुख्य बिंदुओं का उल्लेख किया गया था. अब हम उसकी तथ्यात्मक पड़ताल कर सकते हैं.

जवाबी हलफनामे में यह दावा किया गया है कि याचिकाकर्ता ने सालों तक इस मामले को आगे बढ़ाने के प्रति कोई गंभीरता नहीं दिखाई. इसमें यह भी कहा गया है कि याचिकाकर्ता की तरफ से एक बार भी इस केस का निबटारा कराने की कोई कोशिश नहीं की गई. ये दोनों दावों पूरी तरह से गलत हैं. इसी तरह से यह दावा भी गलत है कि याचिकाकर्ता ने सीबी-सीआईडी की जांच को लेकर वर्षों तक कोई आपत्ति दर्ज नहीं की. ऐसे में यह याद दिलाना उचित होगा कि रिट याचिका, आपत्ति नहीं थी तो और क्या थी?

जवाबी हलफनामा यह भी कहता है कि याचिकाकर्ता ने आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ही इस मामले को पूरी रफ्तार में आगे बढ़ाना शुरू किया. यह भी पूरी तरह से झूठ है. यह दावा कि सीबी-सीआईडी स्वतंत्र एजेंसी है, एजेंसी की ही इस स्वीकृति से झूठा साबित होता है कि सरकार ने मुकदमा चलाने के लिए इजाज़त देने से इनकार कर दिया है. अगर सीबी-सीआईडी पूरी तरह से स्वतंत्र होती, तो क्या यह गृह विभाग के 3 मई के उस आदेश से असहमति दर्ज नहीं करती, जिसमें अनुमति देने से इनकार किया गया था और पुनर्विचार के लिए उसके पास मौजूद सबूतों का हवाला दिया था?

जवाबी हलफनामा में यह भी कहा गया है कि सीबी-सीआईडी की पड़ताल ने ‘साजिश के किसी आयाम को उजागर नहीं किया, जैसा कि एफआईआर में आरोप लगाया गया है. लेकिन यही बात दोनों याचिकाकर्ता उसी वक्त से कह रहे हैं, जब उन्होंने पहली बार हाईकोर्ट में जांच एजेंसी को बदलने के लिए याचिका दायर की थी, जिससे पता चलता है कि एजेंसी काम के प्रति कितनी लापरवाह है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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