भारत

ख़रीफ की एमएसपी को कई राज्यों ने अपर्याप्त बताया था, केंद्र ने नहीं स्वीकारी दाम बढ़ाने की मांग

विशेष रिपोर्ट: ख़रीफ फसलों के लिए केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी और इस बारे में राज्यों के प्रस्ताव में बड़ा अंतर है. द वायर द्वारा प्राप्त आधिकारिक दस्तावेज़ दिखाते हैं कि भाजपा शासित राज्यों समेत विभिन्न राज्य सरकारों ने केंद्र से बढ़ी उत्पादन लागत के हिसाब से एमएसपी घोषित करने की मांग की थी, जिसे माना नहीं गया.

Farmers Paddy PTI

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन विवादित कृषि कानूनों के बीच देश भर में इस समय धान, ज्वार, बाजरा, अरहर समेत अन्य खरीफ फसलों की खरीदी चल रही है.

एक तरफ जहां केंद्र सरकार पिछले साल की तुलना में अधिक धान खरीदने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ किसानों एवं कृषि कार्यकर्ताओं का कहना है कि रबी फसलों में से सिर्फ धान की खरीदी हो रही है और वो भी केवल पंजाब एवं हरियाणा में.

सरकारी आंकड़े भी इन दावों की तस्दीक करते हैं. केंद्र सरकार द्वारा इस साल खरीदे गए कुल धान में से करीब 90 फीसदी खरीदी पंजाब और हरियाणा से हुई है.

सरकारी खरीद न होने और इसके परिणामस्वरूप बाजार मूल्य कम रहने के कारण किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम पर अपने उत्पाद को बेचना पड़ता है.

ये स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब हम केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी और विभिन्न राज्यों के उत्पादन लागत की तुलना करते है, जो ये दर्शाता है कि भारत सरकार की एमएसपी कई राज्यों की उत्पादन लागत से भी कम है.

इसी के चलते भाजपा शामित समेत कई राज्यों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर साल 2020 की खरीफ फसलों के लिए घोषित एमएसपी को अपर्याप्त बताया था और इसे राज्यवार उत्पादन लागत के हिसाब से घोषित करने की मांग की थी.

द वायर  द्वारा प्राप्त किए गए आधिकारिक पत्राचारों से पता चलता है कि झारखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, आंध्र प्रदेश और ओडिशा ने केंद्र सरकार द्वारा तय की गई खरीफ फसलों (धान, ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का, अरहर, मूंग, उड़द , मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन, कपास) की एमएसपी पर सहमति नहीं जताई थी और इसमें बदलाव करने की मांग की थी.

इन राज्यों ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को लिखे अपने पत्र में उनके यहां के उत्पादन लागत के आधार पर एमएसपी निर्धारित करने की मांग की थी. हालांकि केंद्र सरकार ने इन सभी मांगों को ठुकरा दिया.

दस्तावेजों से पता चलता है कि राज्यों द्वारा प्रस्तावित और केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी में करीब 7,800 रुपये प्रति क्विंटल तक का अंतर है.

इसका अर्थ है कि राज्य सरकार के एमएसपी आकलन के हिसाब से एक किसान द्वारा केंद्र की मौजूदा एमएसपी पर अपने एक क्विंटल उत्पादन बेचने पर 7,800 रुपये का घाटा होगा.

झारखंड

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली झारखंड सरकार ने केंद्र को भेजे अपने पत्र में कहा था कि कोरोना महामारी के चलते राज्य में लौटे किसानों की मदद के लिए एमएसपी बढ़ाने की जरूरत है, ताकि उनकी समस्याओं का समाधान किया जा सके.

राज्य के कृषि सचिव अबूबकर सिद्दीकी द्वारा केंद्रीय कृषि मंत्रालय में अपर सचिव डॉली चक्रवर्ती को लिखे गए पत्र में भारत सरकार द्वारा घोषित और राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित एमएसपी में अंतर का वर्णन किया गया है.

इसके मुताबिक झारखंड सरकार ने धान की एमएसपी 2,784 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित करने की मांग की थी. हालांकि भारत सरकार ने इस सीजन के लिए धान की एमएसपी 1,868 रुपये प्रति क्विंटल तय कर रखा है.

इस तरह केंद्र द्वारा घोषित धान की एमएसपी झारखंड द्वारा प्रस्तावित एमएसपी के मुकाबले 916 रुपये कम है. देश में कुल धान उत्पादन में 3.3 फीसदी हिस्सेदारी झारखंड की होती है.

इसी तरह झारखंड सरकार ने मक्का की एमएसपी 3,526 रुपये प्रति क्विंटल तय करने के लिए कहा था. हालांकि भारत सरकार ने इसे 1,850 रुपये प्रति क्विंटल घोषित कर रखा है, जो झारखंड के प्रस्ताव के मुकाबले 1,676 रुपये कम है.

हालांकि केंद्र द्वारा घोषित रागी, अरहर, मूंग और उड़द की एमएसपी झारखंड राज्य द्वारा प्रस्तावित एमएसपी से ज्यादा है.

झारखंड सरकार ने मूंगफली की एमएसपी 7,594 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की थी. लेकिन भारत सरकार ने इसे 5,275 रुपये प्रति क्विंटल तय कर रहा है, जो राज्य के प्रस्ताव की तुलना में 2,319 रुपये कम है.

इसी तरह राज्य ने सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 9,037 रुपये प्रति क्विंटल और सूरजमुखी का 11,331 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की थी.


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हालांकि केंद्र ने सोयाबीन की एमएसपी 3,880 रुपये प्रति क्विंटल और सूरजमुखी की एमएसपी 5,885 रुपये प्रति क्विंटल तय कर रखी है.

इस तरह यह झारखंड राज्य के प्रस्ताव के मुकाबले 5,157 रुपये प्रति क्विंटल और 5,446 रुपये प्रति क्विंटल कम है.

छह मई 2020 को लिखे पत्र में सिद्दीकी ने कहा था, ‘कृषि झारखंड की अर्थव्यवस्था का रीढ़ है. करीब 70 फीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोविड-19 के कारण कई किसान राज्य में लौट आए हैं इसलिए बढ़ी हुई एमएसपी किसानों को राहत पहुंचाएगी.’

झारखंड कृषि सचिव ने यह भी कहा कि चूंकि राज्य को सूखा झेलना पड़ा है, इसलिए भी एमएसपी बढ़ाई जानी चाहिए क्योंकि किसान संकट में हैं.

उन्होंने कहा, ‘राज्य में कई किसानों ने कृषि लोन ले रखा है, लेकिन खराब मौसम के कारण वे कर्ज लौटाने में असमर्थ हैं और गंभीर संकट में हैं.’

हालांकि केंद्र सरकार ने झारखंड राज्य के प्रस्ताव को खारिज कर दिया. 

राजस्थान

राजस्थान सरकार ने केंद्रीय कृषि मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा था कि चूंकि राज्य के अधिकांश भाग में मरुस्थलीय क्षेत्र होने एवं बारिश की विषम परिस्थितियों के कारण फसलों की लागत अन्य राज्यों की तुलना में अधिक होती है, इसलिए रबी फसलों की एमएसपी बढ़ाई जानी चाहिए.

राज्य के मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने छह मई 2020 की तारीख में लिखे अपने पत्र में बाजरा, मक्का, सोयाबीन और मूंग के न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग की थी.

पत्र के मुताबिक राजस्थान सरकार ने बाजरा की एमएसपी 2,210 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की थी, जबकि केंद्र ने इसकी एमएसपी 2,150 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है.

इसी तरह राज्य ने मक्का की एमएसपी 3,200 रुपये प्रति क्विंटल तय करने के लिए कहा था. लेकिन भारत सरकार ने इसकी एमएसपी 1,850 रुपये प्रति क्विंटल घोषित की है, जो राज्य के प्रस्ताव की तुलना में 1,350 रुपये कम है.

राजस्थान सरकार ने सोयाबीन की एमएसपी 4,200 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की थी, जबकि केंद्र ने इसे 3,880 रुपये प्रति क्विंटल तय की हुई है.

इसी तरह राज्य ने मूंग की एमएसपी 8,470 रुपये प्रति क्विंटल करने के लिए कहा था, लेकिन केंद्र ने इसे सिर्फ 7,196 रुपये प्रति क्विंटल घोषित की है.

Rajasthan MSP

गुप्ता ने अपने पत्र में कहा था, ‘क्योंकि उपरोक्त फसलों हेतु बुवाई एवं उत्पादन दोनों ही दृष्टि से राजस्थान राज्य का देश में महत्वपूर्ण स्थान है, अत: इन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण में राज्य द्वारा प्रेषित न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रस्तावों को और अधिक प्रमुखता व महत्व प्रदान करवाने का श्रम करावें.’

राजस्थान बाजरा उत्पादन के मामले में पहले नंबर पर है. देश के कुल बाजरा उत्पादन में 48.6 फीसदी हिस्सेदारी राजस्थान की होती है. इसी तरह देश के कुल मक्का उत्पादन में 7.1 फीसदी और सोयाबीन उत्पादन में 9.2 फीसदी हिस्सा राजस्थान का होता है.

राजस्थान देश का सबसे बड़ा मूंग उत्पादक राज्य है. देश के कुल मूंग उत्पादन का 58.9 फीसदी हिस्सा यहां उगता है.

महाराष्ट्र

कृषि मंत्रालय के दस्तावेजों से पता चलता है कि महाराष्ट्र सरकार की सिफारिश की तुलना में केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी 53 फीसदी तक कम है.

राज्य ने धान की एमएसपी 3,968 रुपये प्रति क्विंटल, ज्वार की 3,745 रुपये प्रति क्विंटल, बाजरा की 4,182 रुपये प्रति क्विंटल, मक्का की 2,163 रुपये प्रति क्विंटल, तुअर (अरहर) की 6211 रुपये प्रति क्विंटल, मूंग की 10,444 रुपये प्रति क्विंटल, उड़द की 8,900 रुपये प्रति क्विंटल, मूंगफली की 9,511 रुपये प्रति क्विंटल, सोयाबीन की 6,070 रुपये और कपास की 8,215 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की सिफारिश की थी.

हालांकि केंद्र द्वारा निर्धारित धान की एमएसपी, जो 1,868 रुपये प्रति क्विंटल है, राज्य सरकार के प्रस्ताव की तुलना में 53 फीसदी कम है.

इसी तरह ज्वार की एमएसपी महाराष्ट्र सरकार के प्रस्ताव की तुलना में 30 फीसदी, बाजरा की 49 फीसदी, मक्के की 14 फीसदी, तुअर की तीन फीसदी, मूंग की 31 फीसदी, उड़द की 33 फीसदी, मूंगफली 45 फीसदी, सोयाबीन की 36 फीसदी और कपास की 29 फीसदी कम है.

यदि मूल्यों में अंतर देखें, तो धान की एमएसपी राज्य के प्रस्ताव की तुलना में 2,300 रुपये प्रति क्विंटल कम है.


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इसी तरह महाराष्ट्र सरकार की सिफारिशों की तुलना में ज्वार की एमएसपी 1,125 रुपये, बाजरा की एमएसपी 2,032 रुपये, मक्का की 313 रुपये, तुअर की 211 रुपये, मूंग की 3,248 रुपये, उड़द की 2,900 रुपये, मूंगफली की 4,236 रुपये, सोयाबीन की 2,190 रुपये और कपास की एमएसपी 2,390 रुपये प्रति क्विंटल कम है.

14 मई 2020 को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को लिखे पत्र में राज्य के कृषि सचिव एकनाथ दावले ने कहा, ‘महाराष्ट्र राज्य में मजदूरी समेत कृषि लागत मूल्य ज्यादा है और वर्षा आधारित खेती होने के कारण ज्यादातर फसलों का उत्पादन कम है. कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) द्वारा सिफारिश की गई एमएसपी राज्य कृषि लागत आयोग द्वारा प्रस्तावित एमएसपी से काफी कम है.’

उन्होंने कहा, ‘राज्य के किसानों को उचित दाम नहीं मिल रहा है, इसलिए भारत सरकार एमएसपी निर्धारित करते वक्त राज्य सरकार की सिफारिशों पर विचार करे.’

हर सीजन में न्यूनतन समर्थन मूल्य की सिफारिश करने वाली केंद्रीय कृषि मंत्रालय की संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी सीएसीपी ने इस बार की अपनी खरीफ रिपोर्ट में दावा किया है कि महाराष्ट्र राज्य ने उत्पादन लागत के संबंध में उन्हें कोई रिपोर्ट नहीं भेजी थी.

हालांकि, राज्य कृषि सचिव ने इस दावे को खारिज करते हुए कृषि मंत्रालय को भेजे पत्र में सीएसीपी को 13 मार्च 2020 को भेजे उस पत्र को भी संलग्न किया है, जिसमें राज्य की विभिन्न खरीफ फसलों की उत्पादन लागत और राज्य सरकार द्वारा सिफारिश एमएसपी का विवरण है.

इसमें राज्य सरकार ने सभी फसलों की उत्पादन लागत का लेखा-जोखा पेश किया था और उसके आधार पर एमएसपी तय करने की मांग की थी. हालांकि केंद्र ने इस मांग को भी खारिज कर दिया.

कर्नाटक

इसी तरह भाजपा शासित कर्नाटक के कृषि विभाग ने भारत सरकार को भेजे अपने पत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि केंद्र द्वारा निर्धारित की जाने वाली एमएसपी राज्य की उत्पादन लागत से भी कम रहती है.

उन्होंने कहा कि इसकी प्रमुख वजह ये है कि सीएसीपी उत्पादन लागत की गणना करते वक्त राज्य की खेती में शामिल कई प्रकार के लागतों को शामिल नहीं करती है, जिसके चलते कुल लागत कम रहती है और इसके परिणामस्वरूप एमएसपी काफी कम रहती है.

राज्य के कृषि आयुक्त ने अपने पत्र में कहा, ‘राज्य सरकार बार-बार इस कमी की ओर केंद्र का ध्यान खींचती रही है. कर्नाटक के किसानों से एमएसपी बढ़ाने की लगातार मांग उठ रही है, ताकि उन्हें लाभ मिल सके.’

अपने प्रस्ताव में कर्नाटक सरकार ने धान की एमएसपी 2,272 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की थी, जो केंद्र द्वारा निर्धारित 1,868 रुपये प्रति क्विंटल से काफी ज्यादा है.


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इसी तरह उन्होंने सफेद ज्वार (मालदंडी) की एमएसपी 4,671 रुपये, बाजरा की 4,932 रुपये, रागी की 5,698 रुपये, मक्का की 4,704 रुपये, तुअर की 2,025 रुपये, मूंग की 8,999 रुपये, उड़द 13,881 रुपये, मूंगफली की 8,395 रुपये, सूरजमुखी की 9,613 रुपये, सोयाबीन की 9,293 रुपये और कपास की 5,665 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की थी.

इसमें से कपास और तुअर को छोड़कर बाकी सभी फसलों के लिए केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी राज्य की सिफारिश की तुलना में काफी कम है.

उड़द की एमएसपी राज्य के प्रस्ताव की तुलना में 7,881 रुपये प्रति क्विंटल कम है. इसका मतलब है कि राज्य की सिफारिश के आधार पर किसी किसान द्वारा एक क्विंटल उड़द बेचने पर उसे 7,881 रुपये का घाटा होगा.

इसी तरह मक्का की एमएसपी राज्य की सिफारिश की तुलना में 2,854 रुपये प्रति क्विंटल, ज्वार की एमएसपी 2,031 रुपये, रागी की एमएसपी 2,403 रुपये, मूंगफली 3,120 रुपये प्रति क्विंटल कम है.

कर्नाटक सरकार ने किसानों को लाभकारी मूल्य देने के लिए लागत में इसका 75 फीसदी जोड़कर [लागत+(लागतx75/100)}] एमएसपी निर्धारित करने की मांग की है.

इसके अलावा उन्होंने लागत में प्रबंधन, मार्केटिंग और फसल बीमा प्रीमियम को भी जोड़ने की सिफारिश की है.

बिहार

बिहार की भाजपा समर्थित नीतीश सरकार ने भी केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी पर सहमति नहीं जताई थी और इसे बढ़ाने की मांग की थी.

राज्य के कृषि सचिव डॉ. एन. सरवना कुमार ने 22 मई 2020 को भेजे अपने पत्र में कहा था कि राज्य के उत्पादन लागत को ध्यान में रखते हुए धान की एमएसपी 2,532 रुपये प्रति क्विंटल और मक्का की एमएसपी 2,526 रुपये प्रति क्विंटल तय की जानी चाहिए.

हालांकि केंद्र ने धान की एमएसपी 1,868 रुपये और मक्का की एमएसपी 1,850 रुपये प्रति क्विंटल तय की है, जो बिहार सरकार के प्रस्ताव से काफी कम है.

कुमार ने कहा, ‘बिहार प्रमुख मक्का उत्पादक राज्य है और धान यहां की प्रमुख खरीफ फसल है. लेकिन मार्केटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, गोदाम और खरीद सुविधाएं न होने के कारण किसानों को कम मूल्य पर अपने उत्पाद बेचना पड़ता है और उन्हें लाभ नहीं मिलता है.’

संभवत: यह पहला ऐसा मौका है जब बिहार सरकार ने ये स्वीकार किया है कि उनके यहां कि खरीद व्यवस्था सही नहीं है, जिसके कारण किसानों को औने-पौने दाम पर अपने उत्पाद को बेचना पड़ता है.

Bihar MSP

बिहार का अधिकतर भू-भाग लंबे समय के लिए बाढ़ से भी प्रभावित रहता है, जिसके कारण उत्पादन लागत बढ़ती है और उत्पादन में कमी आती है.

इसका हवाला देते हुए बिहार कृषि सचिव ने अपने पत्र में कहा कि चूंकि राज्य में बड़ी संख्या में छोटे व मझोले किसान हैं, नई तकनीक अपनाने की रफ्तार काफी धीमी है, सामाजिक-आर्थिक स्थिति काफी खराब है, दक्षिणी बिहार वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है और दक्षिण-पश्चिम मानसून अनियमित रहता है, इसलिए इन पहलुओं को भी ध्यान में रखते हुए एमएसपी बढ़ाई जानी चाहिए ताकि किसानों को लाभ हो.

हालांकि ने केंद्र ने बिहार राज्य के भी प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

आंध्र प्रदेश

अन्य राज्यों की तरह आंध्र प्रदेश सरकार ने भी बढ़े हुए उत्पादन लागत को ध्यान में रखते हुए खरीफ फसलों की एमएसपी बढ़ाने की मांग की थी. राज्य ने A2+FL लागत के आधार पर नहीं, बल्कि C2 लागत के आधार पर एमएसपी तय करने को कहा था.

राज्य के कृषि आयुक्त एच. अरुण कुमार ने मई, 2020 में भेजे अपने पत्र में कहा, ‘उत्पादन लागत में वृद्धि हुई है क्योंकि मजदूरी, अन्य लागतों में बढ़ोतरी हुई है इसलिए अन्य क्षेत्रों की तुलना में कृषि कम लाभकारी हुआ है और कृषि कार्यों के लिए मजदूरों की उपलब्धता में कमी आई है. इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं के कारण भी कुल कृषि आय में कमी आती है.’


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उन्होंने आगे कहा, ‘भारत सरकार हर साल सीएसीपी की सिफारिश पर एमएसपी तय करती है. ऐसा करते हुए सरकार A2+FL लागत को संज्ञान में लेती है, जबकि हमारी मांग C2 लागत के आधार पर एमएसपी तय करने की थी.’

इस तरह राज्य ने C2+50 फॉर्मूला के आधार पर एमएसपी तय करने की सिफारिश की थी. हालांकि केंद्र ने (A2+FL)+50 फॉर्मूला के आधार पर एमएसपी तय की है, जो C2 लागत से काफी कम है.

ओडिशा

आंध्र प्रदेश की तरह ही ओडिशा सरकार ने भी C2 उत्पादन लागत के आधार पर एमएसपी निर्धारित करने की मांग की थी.

वैसे तो राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित कई फसलों की एमएसपी की तुलना में केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी ज्यादा ही है, लेकिन धान के मामले में काफी अंतर है.

राज्य के अवर सचिव मनमठ कुमार पाणी ने 14 मई 2020 को केंद्रीय कृषि मंत्रालय को लिखे पत्र में कहा कि ओडिशा एक प्रमुख धान उत्पादक राज्य है और यहां एक मजबूत खरीद तंत्र है, इसलिए धान की एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी से किसानों को फायदा नहीं होगा.

ओडिशा ने धान की एमएसपी 2,930 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की थी, जबकि केंद्र ने इसकी एमएसपी 1,868 रुपये तय की है.

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पाणी ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में अपर सचिव डॉली चक्रबर्ती को लिखे पत्र में कहा था, ‘वैसे तो आयोग ने राज्य के सुझावों की तुलना में अधिक एमएसपी की सिफारिश की है, लेकिन धान की एमएसपी राज्य की सिफारिशों के मुकाबले काफी कम है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘उत्पादन लागत आकलन एवं राज्य विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किए गए प्रस्ताव के आधार पर धान की एमएसपी 2,930 रुपये प्रति क्विंटल तय करने का निर्णय किया गया है.’

हालांकि केंद्र ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया.

केंद्र कैसे तय करता है एमएसपी

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों को सी2 (C2) लागत पर डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए, जिसमें खेती के सभी आयामों जैसे कि खाद, पानी, बीज के मूल्य के साथ-साथ परिवार की मजदूरी, स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य भी शामिल किया जाता है.

हालांकि सरकार ए2+एफएल (A2+FL) लागत के आधार पर डेढ़ गुना एमएसपी दे रही है, जिसमें पट्टे पर ली गई भूमि का किराया मूल्य, सभी कैश लेन-देन और किसान द्वारा किए गए भुगतान समेत परिवार श्रम मूल्य तो शामिल होता है, लेकिन इसमें स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य शामिल नहीं होता है.

ए2+एफएल लागत सी2 लागत से काफी कम होती है, नतीजतन इसके आधार पर तय की गई एमएसपी भी कम होती है.

सीएसीपी की सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार सभी राज्यों की फसल लागत का औसत मूल्य के आधार पर एमएसपी तय करती है.

इसके कारण कुछ राज्यों के किसानों को तो ठीक-ठाक दाम मिल जाता है लेकिन कई सारे राज्यों के किसानों को फसल लागत के बराबर भी एमएसपी नहीं मिलती है.

द वायर  ने पूर्व में एक रिपोर्ट में बताया है कि किस तरह पूरे देश में फसलों का एक न्यूनतम समर्थन मूल्य होने से किसानों को नुकसान है और किस तरह भाजपा शासित राज्यों समेत प्रदेश की सरकारों ने भारत सरकार से राज्य आधारित एमएसपी की घोषणा करने की मांग की थी.