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जम्मू कश्मीर: क्या है रोशनी क़ानून और इसे लेकर विवाद क्यों मचा हुआ है

साल 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला सरकार सरकारी ज़मीन पर काबिज़ लोगों को उसका मालिकाना हक़ दिलाने के लिए रोशनी क़ानून लेकर आई थी. साल 2014 में कैग ने इसे 25 हज़ार करोड़ का घोटाला क़रार दिया. अब जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने रोशनी क़ानून को असंवैधानिक बताते हुए सीबीआई जांच के आदेश दे दिए हैं.

Srinagar: Security personnel stand guard during restrictions and strike called by separatists against Prime Minister Narendra Modi's visit to the state, at Lal Chowk, in Srinagar, on Saturday. (PTI Photo/S Irfan) (PTI5_19_2018_000049B)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: बीते नौ अक्टूबर को जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने जम्मू कश्मीर राज्य भूमि (धारकों को मालिकाना हक देना) कानून, 2001 या रोशनी कानून को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार देते हुए इसके तहत भूमि आवंटन के मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दिया है.

रोशनी कानून में 25 हजार करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है. सतर्कता ब्यूरो से जांच सीबीआई को सौंपे जाने का आदेश दिए जाने के बाद जांच एजेंसी ने इस विषय में नौ प्राथमिकी दर्ज की है.

हाईकोर्ट के आदेश के बाद केंद्र शासित प्रशासन ने इस कानून को पूरी तरह से खत्म कर दिया और एक नवंबर को रोशनी कानून के तहत सभी जमीन हस्तांतरण को रद्द कर दिया.

इससे पहले नवंबर 2018 में हाईकोर्ट ने रोशनी कानून के लाभार्थियों को उन्हें हस्तांतरित जमीन को बेचने या कोई अन्य ट्रांजेक्शन करने से रोक दिया था. इसके बाद तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने नवंबर 2018 में ही इसे निरस्त कर दिया था.

हालांकि, 4 दिसंबर को राजस्व विभाग में विशेष सचिव नजीर अहमद ठाकुर ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर हाईकोर्ट से फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है.

याचिका में कहा गया कि इससे बड़ी संख्या में आम लोग अनायास ही पीड़ित हो जाएंगे जिनमें भूमिहीन कृषक और ऐसे व्यक्ति भी शामिल हैं जोकि स्वयं छोटे से टुकडे पर घर बनाकर रह रहे हैं.

क्या है रोशनी कानून?

जम्मू कश्मीर राज्य भूमि (धारकों को मालिकाना हक देना) कानून, 2001 सरकारी जमीन पर काबिज लोगों को मालिकाना हक देने के लिए लाया गया था और कहा गया था कि इससे होने वाली आय का इस्तेमाल विद्युत परियोजनाओं में निवेश के लिए किया जाएगा.

रोशनी कानून तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार लेकर आई थी. उन्होंने इसके लिए साल 1990 को आधार वर्ष माना था. इसका मतलब था कि 1990 से पहले जो लोग सरकारी जमीन पर काबिज थे, वे ही इसका लाभ उठा सकेंगे.

इसके साथ ही भूमि का मालिकाना हक उसके अनधिकृत कब्जेदारों को इस शर्त पर दिया जाना था कि वे बाजार भाव पर सरकार को भूमि की कीमत का भुगतान करेंगे.

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हालांकि, इसके बाद पीडीपी-कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार में दो बार संशोधन किए गए और 1990 को आधार वर्ष बनाने के प्रावधान को हटा दिया गया.

साल 2005 में जब मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व वाली पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन की सरकार ने नियमों में ढील देते हुए आधार वर्ष को 2004 कर दिया.

इसके बाद जब पीडीपी के साथ गठबंधन में कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने कानून में संशोधन करते हुए आधार वर्ष को 2007 कर दिया और जमीन के लिए भुगतान की जाने वाली कीमत को बाजार भाव का 25 फीसदी निर्धारित कर दिया गया.

इसके साथ ही सरकार ने किसानों को कृषि भूमि का मालिकाना हक मुफ्त में देना शुरू कर दिया, जिसके तहत उन्हें डॉक्यूमेंटेशन फीस के रूप में केवल 100 रुपये प्रति कनाल की कीमत देनी थी.

कब और क्यों उठा रोशनी कानून पर सवाल?

मार्च 2014 में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर विधानसभा में एक रिपोर्ट पेश की और साल 2007 से 2013 के बीच कब्जे वाली जमीनों के हस्तांतरण में अनियमितता का आरोप लगाया. सीएजी ने कहा कि नेताओं और नौकरशाहों को फायदा पहुंचाने के लिए मनमाने तरीके से कीमत में कटौती की गई.

सीएजी ने कहा कि विद्युत क्षेत्र में निवेश के लिए संसाधन जुटाने के लिए लाए गए इस कानून का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ क्योंकि कानून के तहत निर्धारित लक्ष्य 25,448 करोड़ रुपये की जगह केवल 76 करोड़ रुपये राज्य सरकार को मिले.

साल 2001 में जब कानून पास हुआ, तब करीब 20.55 लाख कनाल (102,750 हेक्टेयर, एक हेक्टेयर में करीब 20 कनाल होते हैं.) भूमि पर बसे लोगों को मालिकाना हक देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जिससे सरकार ने लगभग 25,448 करोड़ रुपये प्राप्ति का लक्ष्य रखा था. इसमें से 16.02 कनाल भूमि जम्मू क्षेत्र और 4.44 कनाल भूमि कश्मीर क्षेत्र में थी.

हालांकि, उसमें से सिर्फ 15.85 प्रतिशत (6.04 कनाल) भूमि ही मालिकाना हक के लिए मंजूर की गई थी. इसमें 5.71 लाख कनाल जम्मू और 33,392 कनाल भूमि कश्मीर में थी.

इसके बाद सरकार ने अपना लक्ष्य घटाकर 317.55 करोड़ कर दिया और उसे 76.46 करोड़ रुपये (24 फीसदी) की आय हुई. इसमें 54.05 करोड़ रुपये कश्मीर क्षेत्र (लक्ष्य 123.49 करोड़ रुपये) और जम्मू क्षेत्र में 22.40 करोड़ रुपये (लक्ष्य 194.06 करोड़ रुपये) की आय हुई.

रिपोर्ट में कहा गया कि कानून की धाराओं का उल्लंघन करते हुए एक बड़े हिस्से करीब 340,091 कनाल को कृषि भूमि घोषित कर मुफ्त में हस्तांतरित कर दिया गया. कश्मीर में अधिकतर जमीनें व्यापारिक घरानों और रिहायशी उद्देश्य से दी गईं.

सीएजी ने यह भी कहा कि रोशनी कानून के तहत 348,160 कनाल के हस्तांतरण के बाद भी जमीनों पर कब्जा जमाने के नए मामले बेरोकटोक सामने आते रहे, क्योंकि नवंबर 2006 में 2,064,972 कनाल की तुलना में मार्च 2013 में 2,046,436 कनाल पर अतिक्रमण था.

तब तत्कालीन राजस्व मंत्री एजाज अहमद खान ने सीएजी की रिपोर्ट को खास उद्देश्य से प्रेरित करार दिया था लेकिन कहा था कि सरकार इसका विश्लेषण करेगी और दोषी लोगों पर कार्रवाई करेगी.

हाईकोर्ट ने आदेश में क्या कहा

जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और जस्टिस राजेश बिंदल की खंडपीठ ने नौ अक्टूबर को अपने आदेश में रोशनी कानून को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार देते हुए इस कानून के तहत भूमि आवंटन के मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दे दिया.

इसके साथ ही जांच एजेंसी को हर आठ सप्ताह में प्रगति रिपोर्ट दायर करने का निर्देश भी दिया गया है.

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि राजस्व विभाग एक जनवरी 2001 के आधार पर सरकारी जमीन का ब्योरा एकत्र कर उसे वेबसाइट पर दर्ज करे. सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करने वालों के नाम भी सार्वजनिक किए जाएं. इसमें रोशनी कानून के तहत आवेदन प्राप्त होने, जमीन का मूल्यांकन, लाभार्थी की ओर से जमा धनराशि, कानून के तहत पारित आदेश का भी ब्योरा देना होगा.

सीबीआई ने जांच शुरू की

जम्मू कश्मीर में रोशनी घोटाला मामलों में अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए सीबीआई ने 4 दिसंबर, 2020 को चार प्रारंभिक जांच शुरू की है.

पहली जांच जम्मू तहसील के गोल में 784 कनाल (पांच कनाल, एक बीघा के बराबर होता है), 17 मारला (करीब 430 वर्ग मीटर) जमीन की है, जो जेडीए (जम्मू विकास प्राधिकरण) को हस्तांतरित की गई थी.

अदालत ने सीबीआई को जांच सौंपते हुए कहा था कि जांच में सहायता के लिए जम्मू विकास प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारियों ने अनिच्छा दिखाई है और सच्चाई का खुलासा करने में बाधा डाली है. इन अधिकारियों की यह हरकत अवैध गतिविधियों में मिलीभगत के समान है.

सीबीआई द्वारा दर्ज की गई दूसरी प्रारंभिक जांच 154 कनाल जमीन के कथित अतिक्रमण और बंसी लाल गुप्ता नाम के एक कारोबारी द्वारा जेडीए के अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर वाणिज्यिक उपयोग के लिए भूमि उपयोग परिवर्तन करने से जुड़ी है. गुप्ता ने इस जमीन पर रोशनी अधिनियम के तहत अधिकार हासिल किया था.

इस मामले में अपनी टिप्पणी में कहा था, ‘हमें इस बात से सख्त ऐतराज है कि जेडीए और राजस्व अधिकारियों ने अब इस मामले को ढंकने का कार्य बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है.’

सीबीआई ने तीसरी प्रारंभिक जांच सरकार द्वारा जेडीए को हस्तांतरित 66,436 कनाल जमीन के सीमांकन संबंधी अदालती आदेश का अनुपालन करने से प्राधिकरण के इनकार करने के मामले में दर्ज की है.

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि उसके आदेशों का जेडीए द्वारा अनुपालन नहीं किया जाना अतिक्रमणकारियों के साथ अधिकारियों की गहरी संलिप्तिता को प्रदर्शित करता है.

चौथी प्रारंभिक जांच जम्मू कश्मीर राज्य भूमि (कब्जा धारकों को मालिकाना हक सौंपने), नियम, 2007 के प्रकाशन से संबद्ध है. पांच मई 2007 को एक आधिकारिक गजट के जरिये रोशनी अधिनियम की धारा 18 का उपयोग करते हुए ऐसा किया गया था.

हाईकोर्ट ने कहा था, ‘ऐसा लगता है कि विधायिका से इन नियमों की मंजूरी नहीं ली गई और उन्हें सरकारी गजट में अनधिकृत रूप से प्रकाशित कर दिया गया.’

गुलमर्ग घोटाले में कई नौकरशाहों पर दर्ज हुए थे मामले

साल 2009 में राज्य सतर्कता संगठन ने रोशनी कानून का दुरुपयोग कर गुलमर्ग विकास प्राधिकरण की जमीनों को अवैध रूप से निजी लोगों को हस्तांतरित करने के संबंध में मामला दर्ज किया था.

गुलमर्ग जमीन घोटाला मामले में राज्य के कई नौकरशाहों पर आरोप लगा कि कानून के मानकों को पूरा न करने के बावजूद उन्होंने कानून के तहत जमीन का मालिकाना हक हासिल कर लिया.

इस मामले में एक मुख्य आरोपी आईएएस अधिकारी बशीर अहमद खान थे, जिन्हें इस साल मार्च में तत्कालीन उप-राज्यपाल जीसी मुर्मू का सलाहकार नियुक्त किया गया था.

इस मामले में जम्मू क्षेत्र में भी आरोपी शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. दर्ज 17 एफआईआर के आधार पर उल्लंघन के मामलों की जांच के लिए हाईकोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की गई थी.

वहीं, 2014 में रोशनी जमीन घोटाले के संबंध में जम्मू विकास प्राधिकरण की प्रमुख जमीनों पर रजिस्ट्रेशन को लेकर राज्य सतर्कता अधिकारियों ने कारोबारी बंशीलाल गुप्ता और राजस्व विभाग के कुछ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

सतर्कता संगठन ने मार्च 2015 तक पांच मामलों में जांच पूरी की थी और 20 से अधिक लोगों पर मामला दर्ज किया था जिसमें तीन पूर्व उपायुक्त शामिल थे.

लाभार्थियों की सूची जारी कर रहा प्रशासन

जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के आदेश के बाद केंद्र शासित क्षेत्र के प्रशासन ने विवादित रोशनी भूमि योजना के तहत जमीन हासिल करने वालों की सूची सार्वजनिक करनी शुरू कर दी है.

एक के बाद एक कई सूची जारी कर जम्मू कश्मीर प्रशासन ने रोशनी योजना के हजारों लाभार्थियों की सूची कर रही है जिसमें राजनेता, पूर्व नौकरशाह, कारोबारी, सेवानिवृत्त न्यायाधीश और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी शामिल हैं.

इसमें पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू, उनके कुछ रिश्तेदार और शीर्ष होटल व्यवसायी तथा एक पूर्व नौकरशाह, कांग्रेस नेता केके अमला और मुश्ताक अहमद चाया के अलावा पूर्व नौकरशाह मोहम्मद शफी पंडित और उनकी पत्नी शामिल हैं.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के साथ पीडीपी और कांग्रेस के भी कई नेताओं पर रोशनी योजना के लाभार्थी होने का आरोप लगाया जा रहा है.

सूची में उल्लेख किया गया है कि विवादित रोशनी कानून के तहत नेशनल कॉन्फ्रेंस के श्रीनगर और जम्मू के मुख्यालयों को भी वैध बनाया गया.

अपनी वेबसाइट पर सूचियों को प्रदर्शित करते हुए जम्मू के संभागीय प्रशासन ने खुलासा किया है कि सुजवां में करीब एक एकड़ क्षेत्र में बना फारूक और उमर का आवास अतिक्रमण वाली सरकारी जमीन पर बना है. राजस्व रिकॉर्ड में तो इसे नहीं दिखाया गया, लेकिन इस पर अतिक्रमण किया गया.

फ़ारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला (फाइल फोटो: पीटीआई)

फ़ारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला (फाइल फोटो: पीटीआई)

इसके साथ ही लाभार्थियों में फारूक अब्दुल्ला की बहन सुरैया अब्दुल्ला का नाम भी शामिल है, जिन्हें तीन कनाल से अधिक के प्लॉट का मालिकाना हक आवासीय इस्तेमाल के तहत प्राप्त हुआ.

सूची के मुताबिक, अधिकारियों ने जमीन को मंजूरी दी लेकिन सूरिया ने अभी तक एक करोड़ रुपये के शुल्क का भुगतान नहीं किया है. उनके नाम से जमीन को मंजूरी देने के बाद से उन्हें कोई नोटिस भी जारी नहीं किया गया.

इसी तरह पीडीपी के पूर्व मंत्री काजी मोहम्मद अफजल के पुत्र और कांट्रैक्टर टीपू सुल्तान के भी नाम लाभार्थियों में शामिल है. आरोप है कि सुल्तान ने रोशनी कानून के तहत 600 रुपये का भुगतान करके अपने पांच कनाल से अधिक की जमीन को वैध करवा लिया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा, ‘सूत्रों के आधार पर खबर आयी है कि डॉ. फारूक अब्दुल्ला रोशनी कानून के लाभार्थी हैं. यह बिल्कुल झूठी खबर है और गलत मंशा से इस खबर का प्रसार किया जा रहा. जम्मू और श्रीनगर में बने उनके मकानों का उक्त कानून से कोई लेना-देना नहीं है.’

हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 26 याचिकाएं दायर

रोशनी कानून निरस्त करने के जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पूर्व नौकरशाहों, कारोबारियों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों आदि ने सुप्रीम कोर्ट में 26 याचिकाएं दायर की हैं.

इनमें पूर्व मुख्य वन संरक्षक आरके मट्टू, पूर्व न्यायाधीश खालिक-उल-जमां, पूर्व मुख्य सचिव मोहम्मद शाई पंडित, पूर्व ऊर्जा विकास आयुक्त निसार हुसैन, कारोबारी भरत मल्होत्रा और विकास खन्ना तथा सेवानिवृत्त आयुक्त बशीर अहमद भी शामिल हैं.

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने कभी भी सरकारी जमीन का अतिक्रमण नहीं किया और इस मामले में उन्हें कभी पक्षकार नहीं बनाया गया.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनके खिलाफ किसी भी तरह के कथित गैरकानूनी कृत्य का आरोप नहीं है और उन्होंने किसी भी सार्वजनिक जमीन का अतिक्रमण नहीं किया है.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे इस जमीन के अधिकृत बाशिंदे हैं और हाईकोर्ट ने बगैर किसी आधार या औचित्य के ही सभी के लिए एक आदेश पारित कर दिया है.

याचिका में दावा किया गया है कि वे सामान्य नागरिक हैं और उन्होंने पैसा देकर इसे खरीदा है. यही नहीं, विधिवत निर्वाचित विधान मंडल द्वारा बनाए गए और कार्यपालिका द्वारा इस पर किए गए अमल में उनकी कोई भूमिका नहीं है.

क्या कहते हैं रोशनी कानून का विरोध करने वाले संगठन

जम्मू स्थित दक्षिणपंथी संगठन इक्कजुट लंबे समय से इस कानून का विरोध कर रहा है और वह इसे जम्मू की जनसांख्यिकी में बदलाव करने की साजिश करार देता है.

द वायर  से बात करते हुए ‘एकजुट जम्मू’ के प्रमुख और रोशनी कानून मामले में जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता अंकुर शर्मा कहते हैं, ‘साल 2014 में सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट के बाद उन्होंने इस मामले में दो याचिकाएं डालीं. पहली याचिका मामले की जांच को लेकर थी जबकि दूसरी जनहित याचिका कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग को लेकर थी.’

इस कानून को जम्मू की जनसांख्यिकी में बदलाव करने का हथियार होने का आरोप लगाते हुए शर्मा कहते हैं, ‘जम्मू की हिंदू बहुल जनसांख्यिकी में बदलाव लाने के लिए रोशनी कानून एक हथियार था, जिसके तहत सरकारी जमीनों पर मुस्लिमों को बसाना था. वह इसे सत्ता समर्थित प्रयास बताते हैं.’

जनवरी 2018 में कठुआ में आठ साल की बकरवाल समुदाय की बच्ची के बलात्कार और हत्या मामले में आरोपियों का समर्थन करने के लिए हिंदू एकता मंच का गठन करने वाले शर्मा कहते हैं, ‘जम्मू क्षेत्र में जितनी भी नदी घाटी हैं, उन पर कब्जा करवाया गया है. हाईकोर्ट में दाखिल एक सूची के अनुसार 668 अतिक्रमण करने वाले लोगों में से 667 मुसलमान थे और सिर्फ एक हिंदू.’

वह कहते हैं, ‘महबूबा मुफ्ती एक कानून लेकर आई थीं, जिसके तहत गुज्जर-बकरवाल समुदाय (मुस्लिम) के खिलाफ जमीन कब्जा करने या गोहत्या के मामले में कोई सजा नहीं होगी.’

पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक पर लाभार्थियों को बचाने का आरोप लगाते हुए वह कहते हैं कि जो कानून 2014 में ही व्यावहारिक तौर पर निरस्त हो चुका था उसे साल 2018 में जब उन्होंने निरस्त किया तब उन्होंने सिर्फ नए आवेदनों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया, जबकि पुराने लाभार्थियों को उन्होंने बचाने का प्रयास किया. इस मामले में उनकी भूमिका सकारात्मक नहीं, बल्कि नकारात्मक रही है.

शर्मा भाजपा और आरएसएस पर जम्मू विरोधी और देशविरोधी होने का भी आरोप लगाते हैं. वह कहते हैं कि जम्मू में जिन जमीनों पर मुस्लिमों को बसाया गया था भाजपा ने पीडीपी के साथ एजेंडा ऑफ अलायंस में उन्हें ही नियमित करने का वादा किया था.

वह भाजपा के पूर्व मंत्री अब्दुल गनी कोहली पर भी रोशनी कानून का लाभार्थी होने का भी आरोप लगाते हैं.

इससे पहले साल 2011 में एसके भल्ला ने अपने वकील शेख शकील के माध्यम से एक जनहित याचिका दाखिल की थी. इन दोनों याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं को मिलाकर हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए हालिया फैसला दिया.

आरोप-प्रत्यारोप

रोशनी घोटाले में नेशनल कॉन्फ्रेंस के शीर्ष नेताओं के साथ पीडीपी और कांग्रेस के नेताओं और उनके रिश्तेदारों के नाम आने के साथ ही भाजपा और मुख्यधारा के क्षेत्रीय दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक प्रवक्ता ने दावा किया कि जम्मू कश्मीर के सभी क्षेत्रों में फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व में गुपकर घोषणा-पत्र गठबंधन (पीएजीडी) को मिल रहे समर्थन के कारण भाजपा चिढ़ गई है. उन्होंने दावा किया कि अब्दुल्ला परिवार रोशनी कार्यक्रम का लाभार्थी नहीं है.

प्रवक्ता ने कहा, ‘भाजपा के सभी दावे खारिज किए जा चुके हैं. भाजपा जान-बूझकर इस संबंध में झूठ फैला रही है. अनुच्छेद 370 और 35-ए को लेकर आवाज उठाने के कारण फारूक अब्दुल्ला को निशाना बनाया जा रहा है.’

जहां जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली के लिए गुपकर घोषणा-पत्र गठबंधन बनाने के कारण मुख्यधारा के क्षेत्रीय दल पहले से ही भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे के निशाने पर थे, वहीं रोशनी घोटाले के सामने आने से भाजपा अधिक आक्रामक हो गई है. डीडीसी चुनाव के बीच कई केंद्रीय मंत्री एनसी, पीडीपी और कांग्रेस पर लगातार हमले कर रहे हैं.

वहीं, द वायर  से बात करते हुए स्थानीय भाजपा नेता अजय भारती जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव के दौरान हो रही कार्रवाई पर कहते हैं, ‘यह पूरी कार्रवाई हाईकोर्ट के आदेश पर हो रही है. इसमें भाजपा या केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है.’ बता दें कि इस बीच डीडीसी चुनाव 28 नवंबर से 22 दिसंबर तक आठ चरणों में हो रहे हैं.