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चुनाव आयुक्त बनने के बाद भी एके जोती ने गुजरात सरकार से मिला बंगला क्यों नहीं छोड़ा?

चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोती एक बेहद अहम संवैधानिक पद पर नियुक्त होने के बाद भी गुजरात सरकार के बंगले में रहते रहे, जबकि यह पद राजनीतिक पार्टियों और सरकारों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करता है.

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अहमदाबाद का दफनाला क्षेत्र जहां जोती को बंगला मिला था (ऊपर), मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोती (नीचे बाएं), प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी (नीचे दाएं) (फोटो साभार: Google Maps/पीटीआई)

नई दिल्ली: सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) की गुवाहाटी बेंच में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा दायर एक मुक़दमे से जुड़े दस्तावेजों से ये बात सामने आई है कि भारत के वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोती ने गुजरात सरकार द्वारा अहमदाबाद में आवंटित किया गया बंगला साल 2016 के आखिरी महीनों तक खाली नहीं किया था.

यह बंगला उन्हें सरकारी सेवा में रहते हुए आवंटित किया गया था. इसका मतलब है कि एक बेहद अहम संवैधानिक पद पर नियुक्त होने के एक साल से ज्यादा समय बाद तक वे गुजरात सरकार के बंगले में रहते रहे, जबकि यह पद राजनीतिक पार्टियों और सरकारों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करता है.

यह जानकारी खासकर इसलिए अहम हो जाती है क्योंकि भारत के चुनाव आयोग ने 12 अक्टूबर को अपनी ही परंपरा को तोड़ते हुए गुजरात चुनाव की तारीखों की घोषणा को टाल दिया जिससे गुजरात में आदर्श आचार संहिता को लागू करने में देरी हुई.

आचार संहिता का मकसद सत्ताधारी दल, जो इस मामले में भाजपा है और उसके प्रतिद्वंद्वियों को बराबरी का मौका देना होता है. इस कदम की विपक्ष के साथ-साथ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों द्वारा भी आलोचना की गई है.

जोती, 1975 बैच के गुजरात कैडर के आइएएस अधिकारी हैं, जो उद्योग सचिव, राजस्व सचिव, जल-आपूर्ति सचिव, प्रधान सचिव (वित्त) समेत राज्य के कई शीर्ष पदों को संभाल चुके हैं. उन्होंने कांदला पोर्ट ट्रस्ट के चेयरमैन के तौर पर भी काम किया और आखिरकार 31 अक्टूबर, 2013 को गुजरात के मुख्य सचिव के तौर पर सेवानिवृत्त हुए.

उसके बाद वे राज्य के विजिलेंस कमीशन में विजिलेंस कमिश्नर बनाए गये. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें 13 मई, 2015 को भारत के चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया. उन्होंने 6 जुलाई, 2017 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला.

संवैधानिक पद है चुनाव आयुक्त

जोती साल 2015 से एक संवैधानिक पद पर हैं. उनके इस पद पर आने से पहले गुजरात सरकार ने उन्हें जो आवास आवंटित किया था, उसे अपने पास रखना और बाद में राज्य सरकार से विशेष कृपा का आग्रह करना, मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों को स्वतंत्रतापूर्वक निभा सकने की उनकी क्षमता को लेकर सवाल खड़े करता है.

कैट, गुवाहाटी में, सतीश चंद्र वर्मा, आईपीएस बनाम गुजरात राज्य मामले की केस फाइल के मुताबिक,

‘(आवास पर) अवैध कब्जे के मामले में सबसे ज्यादा ध्यान देनेवाला मामला एके जोती, भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का है… राज्य के विजिलेंस कमीशन में विजिलेंस कमिश्नर के उनके कार्यकाल के समाप्त होने से पहले ही उन्हें भारत के चुनाव आयोग, नई दिल्ली, में चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त कर दिया गया. उन्होंने वहां मई, 2015 में पदभार संभाला. लेकिन, उन्होंने अहमदाबाद में आवंटित अपने बंगले को खाली नहीं किया, न ही कोई अभ्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) दिया और अवैध कब्जे को बनाए रखा.’

यह मामला, आईपीएस अधिकारी सतीश चंद्र वर्मा से संबंधित है, जिन्हें गुजरात से मेघालय तबादला होने पर तत्काल अपने सरकारी आवास को छोड़ने का आदेश दिया गया था. वर्मा, उस विशेष जांच दल के सदस्य थे, जिसने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की तहकीकात की थी, जिसके परिणामस्वपरूप गुजरात के कई पुलिस अधिकारियों को चार्जशीट किया गया. उनका कहना है कि इस कारण से राज्य सरकार उनके खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है.

अपने बचाव में उन्होंने आरटीआई दस्तावेजों का हवाला दिया है, जो दिखाते हैं कि उनके घर को खाली कराने का फैसला गुजरात सरकार के अधीन अकोमेडेशन अलॉटमेंट कमेटी द्वार किया गया, जबकि ‘कई ऐसे अधिकारी थे, जो अपने आवासों पर अवैध कब्जा जमाए हुए थे.’

वर्मा ने दावा किया कि उन्हें ‘विशेष उल्लेख, सोच-विचार, आवास से बाहर निकालने के फैसले और बाजार भाव से किराया वसूल करने के लिए जानबूझ कर चुना गया.’

गुजरात विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा को टालने के कारण जोती पर पहले ही भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के साथ समझौता करने का आरोप लगा है, जिसका वे कोई ठोस जवाब नहीं दे पाए हैं. अब वर्मा ने यह खुलासा किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त, आवास के मामले में गुजरात सरकार के कृपापात्र रहे हैं. ऐसे में (उनके इस कदम के) औचित्य और हितों के टकराव को लेकर सवाल उठना लाजिमी है.

अदालती दस्तावेजों में वर्मा का यह कहना है कि ‘गुजरात सरकार इस बारे में (जोती द्वारा बंगला अपने पास रखने के) सबसे ज्यादा कृपालु रही है.’

जून, 2016 में जोती द्वारा कृपा की गुहार

दस्तावेजों से यह बात सामने निकलकर आती है कि गुजरात सरकार के शीर्ष अधिकारियों को जोती के अनाधिकृत तौर पर उनके आवास में बने रहने का इल्म था. राज्य स्तरीय इंजीनियरों के अलावा दो अधिकारियों को भेजे गए एक आदेश की प्रति से पता लगता है कि जोती आवंटित बंगले के लिए (कम से कम) 30 जून, 2016 तक सिर्फ पूर्ववर्ती सामान्य दर (फ्लैट रेट) से किराया दे रहे थे.

2 अप्रैल, 2016 की एक चिट्ठी, जिस पर सुपरिटेंडिंग इंजीनियर, चीफ इंजीनियर और अतिरिक्त सचिव (एडिशनल सेक्रेटरी) (आरएंडबी) के दस्तखत हैं, और जो केस के दस्तावेजों में संलग्न है, के मुताबिक,

‘12/05/2015 से जोती ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (?) के तौर पर पदभार संभाल लिया है. और वे ऊपर वर्णित बंगले (सं. 26, शाहीबॉग, दफनाला) में बगैर किसी अभ्यावेदन (रिप्रेजेंटेशन) दिए रह रहे हैं. इसलिए इसे (इस मामले को) को अकोमेडेशन अलॉटमेंट कमेटी के सामने प्रस्तुत किया जाए, ताकि यह फैसला लिया जा सके कि श्री जोती से 12/05/2015 से किस दर से किराया लिया जाए.’

इसी से जुड़ी हुई एक और चिट्ठी, जिस पर अतिरिक्त मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट) और अतिरिक्त मुख्य सचिव, वित्त विभाग, गुजरात सरकार के दस्तखत हैं, के मुताबिक,

‘20/05/2016 को एकोमेडेशन अलॉटमेंट कमेटी द्वारा लिए गए एक फैसले के तहत 03/06/2016 को श्री जोती को बंगला खाली करने के लिए एक नोटिस भेजा गया है. श्री जोती ने आवंटित बंगले के लिए 30/06/2016 तक सामान्य दर (फ्लैट रेट) से किराया चुकाया है.’

इस चिट्ठी में आगे कहा गया है कि श्री जोती ने वास्तव में इस घर को न छोड़ने को लेकर जून, 2016 में, जब वे दिल्ली में तीन चुनाव आयुक्तों में से एक के तौर पर काम कर रहे थे, अपना तर्क दिया था. इस चिट्ठी में कहा गया है:

‘09/06/2016 को उनके द्वारा दिए गए अभ्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) के मुताबिक उनकी पत्नी के दोनों घुटने का ऑपरेशन हुआ है और इसलिए चेकअप के लिए बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है. इसलिए उन्होंने आवंटित बंगला संख्या. 26 में अक्टूबर, 2016 तक रहने की इजाजत मांगी है.’

दांव पर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता

बंगले की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी हासिल नहीं की जा सकी है-  द वायर  ने जोती को जो सवाल भेजे थे, उनका अब तक जवाब नहीं मिला है, लेकिन, 15 दिसंबर, 2016 को कैट में वर्मा द्वारा जमा कराए गए दस्तावेजों के मुताबिक, ऐसा मालूम पड़ता है कि जोती ने दिल्ली में चुनाव आयुक्त के तौर पर काम करते हुए भी (कम से कम उस समय तक) अहमदाबाद का बंगला नहीं छोड़ा था.

गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी सतीश वर्मा (फाइल फोटो)

गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी सतीश वर्मा (फाइल फोटो)

वर्मा ने यह तर्क दिया है कि वे भी अपने सरकारी आवास के लिए किराया चुका रहे थे, जिनकी उन्हें न टाले जा सकनेवाले पारिवारिक कारणों से जरूरत थी और वे भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र मे तबादला कर दिए जाने के बाद गुजरात में भी विभिन्न पदों पर बीच-बीच में अपनी सेवाएं दे रहे थे.

वर्मा का मामला चाहे जो भी हो, जोती द्वारा गुजरात सरकार की सुविधाओं का इस्तेमाल जारी रखना काफी महत्व रखता है, क्योंकि वे पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं और फिलहाल एक संवैधानिक पद पर काम कर रहे हैं, जहां यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी भी मामले में केंद्र या राज्य की किसी सरकार की कृपा के तलबगार नहीं रहेंगे.

पिछले सप्ताह, भारत के चुनाव आयोग ने अब तक की परंपरा को तोड़ते हुए हिमाचल प्रदेश के चुनावों की तारीखों के साथ गुजरात विधानसभा चुनावों की तारीखें घोषित नहीं की. इसके कारण, इसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और विपक्षी दलों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.

2002 के बाद से दोनों राज्यों के चुनावों की तारीखों की घोषणा एक साथ होती रही है. जबकि इस बार भी दोनों राज्यों में एक साथ मतगणना 18 दिसंबर को होगी.

जोती का जवाब

जोती ने द वायर  के सवालों का तो जवाब नहीं दिया है, लेकिन, उन्होंने इस मामले पर टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत की. रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने गुजरात सरकार से किसी किस्म की अनुचित कृपा का आग्रह करने से इनकार किया है. जोती ने हालांकि, यह स्वीकार किया कि उन्होंने चुनाव आयोग में अपनी नियुक्ति के बाद अहमदाबाद के बंगले को अपने पास रखने की इजाजत मांगी थी.

टाइम्स ऑफ इंडिया  से उन्होंने कहा,

‘मुझे दिल्ली में घर चुनाव आयोग में मेरी नियुक्ति के एक साल बाद आवंटित किया गया. मैंने गुजरात सरकार से अहमदाबाद के दफनाला इलाके में मिले घर में बने रहने देने की गुजारिश की, क्योंकि मैं दिल्ली के गुजरात भवन में अपनी पत्नी के साथ एक साल नहीं रह सकता था. मैंने गुजरात सरकार के नियमों के मुताबिक किराया चुकाया है.’

ये बात उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया  से कही, और यह स्पष्ट किया कि चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने के बाद वे नई दिल्ली के गुजरात भवन में एक साल तक रहे.

उन्होंने यह दावा भी किया कि उन्होंने, ‘तत्काल, अक्टूबर, 2016 में बंगला खाली कर दिया था’ और यह भी कि ये सारी बातें रिकॉर्ड में दर्ज हैं.

इन स्पष्टीकरणों के बावजूद जिस तरह से गुजरात सरकार द्वारा पक्षपात करते हुए जोती को अपने आवंटित घर में बने रहने दिया गया, लेकिन आईपीएस अधिकारी वर्मा को उनका तबादला हो जाने के बाद आवंटित घर छोड़ने के लिए कहा गया, वह कई और सवाल खड़े कर सकता है.

जोती की चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति मई 2015 में हुई थी और ऊपर दिए गए उनके बयान से यह पता लगता है कि उन्होंने उसके बाद ही गुजरात सरकार से उचित किराये के भुगतान के बाद बंगले में बने रहने का आवेदन कर अनुमति ली थी.

हालांकि उन्होंने किस तारीख को और किस विभाग में आवेदन किया, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. जो पता है वो ये कि उनकी अर्जी सड़क और भवन विभाग में नहीं पहुंची, जो लगभग एक साल तक ऐसे मामलों को देख रहा था.

द वायर के पास मौजूद आधिकारिक दस्तावेज यह साफ दिखाते हैं कि अप्रैल 2016 यानी चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त होने के करीब 11 महीने बाद तक जोती की ओर से अहमदाबाद के घर को रखने की औपचारिक अनुमति नहीं मांगी थी और इस दौरान उन्होंने जो भी किराया दिया, वो आधिकारिक मानकों से कहीं कम था क्योंकि सड़क व भवन विभाग द्वारा इस पर ‘रिकवरी’ का निर्णय लिया गया था.

1 अप्रैल 2016 की तारीख में राज्य सरकार के अधिकारियों ने एक पत्र में लिखा है कि जोती दफनाला के बंगले में करीब एक साल तक रहे और ‘वे बिना को अभ्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) दिए इस बंगले में बने रहे.’ साथ ही, आवास आवंटन समिति को यह फैसला भी करना पड़ा कि ‘12/05/2015 की तारीख से श्री जोती से किस दर पर किराये की वसूली की जाये.’

जैसा कि पहले भी बताया गया है कि गुजरात सरकार के सड़क व भवन विभाग के दो पत्रों, साथ ही, सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल की गुवाहाटी बेंच में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सतीश चंद्र वर्मा की भवन से जुड़े मामले में की गई अपील से भी यही संकेत मिलता है कि गुजरात में जो विभाग आधिकारिक आवास के मामले देखता है, की जानकारी के अनुसार तो जोती ने राज्य सरकार से इस घर में बने रहने की अनुमति लेने के लिए पहला ‘रिप्रजेंटेशन’ 9 जून 2016 को दिया था. तब तक चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त हुए उन्हें एक साल से ऊपर हो चुका था.

उन्होंने ऐसा तब ही किया जब गुजरात विजिलेंस कमीशन के एक पत्र- जिसके बारे में द वायर को जानकारी नहीं है, की पड़ताल करते हुए गुजरात सरकार के इंजीनियरों ने सड़क व भवन विभाग के उच्च अधिकारियों को इस बात की जानकारी दी कि वे बिना अनुमति के इस घर में रह रहे हैं.

जोती द्वारा इस रिपोर्ट के अंग्रेज़ी में प्रकाशन से पहले भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया गया. प्रकाशन के बाद जोती के टाइम्स ऑफ इंडिया को बंगला रखने से जुड़े स्पष्टीकरण देने के बाद उन्हें कुछ और सवाल भेजे गए थे:

  1. दफनाला के बंगले में बने रहने की अनुमति लेने के लिए आपने कब और किस विभाग/अधिकारी को अर्जी भेजी थी? क्या हमें उसे उस पत्र की कॉपी मिल सकती है?
  2. आपने कितनी अवधि तक के लिए इस बंगले में रहने की अनुमति मांगी थी?
  3. क्या आपको चुनाव आयोग या किसी अन्य विभाग/मंत्रालय या दिल्ली के किसी कार्यालय द्वारा यह बताया गया था कि चुनाव आयुक्त के बतौर आपको एक साल तक आवास उपलब्ध नहीं हो सकेगा. यदि हां, तो कब और किसके द्वारा?
  4. मई 2015 से अक्टूबर 2016 तक सड़क व भवन विभाग द्वारा आपसे किस दर पर किराया लिया गया? क्या आपके जून 2016 में रिप्रजेंटेशन देने के बाद क्या इस विभाग द्वारा मई 2015 से जून 2016 की अवधि के लिए कोई अतिरिक्त एरियर लिया गया?
  5. अप्रैल 2016 में नोटिस मिलने से पहले आपको ऐसा क्यों नहीं लगा कि इस बंगले में रहने के लिए गुजरात सरकार से अनुमति लेना ज़रूरी है?

इस रिपोर्ट के प्रकाशन के समय तक जोती की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया था. हालांकि उनके सचिव ने इन सवालों का ईमेल मिल जाने की पुष्टि की है. जोती का जवाब मिलने के बाद इस रिपोर्ट को अपडेट किया जायेगा.

इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें