‘यदि न्यायपालिका को कोई नहीं बचा सकता तो देश को कौन बचाएगा?’

‘जज लोया के मामले में आरोप न्यायपालिका के लिए बहुत ही ख़तरनाक हैं. क़ानून और व्यवस्था के रखवाले ही अगर ये करते हैं तो हम कहां जाएंगे?’

//

‘जज लोया के मामले में आरोप न्यायपालिका के लिए बहुत ही ख़तरनाक हैं. क़ानून और व्यवस्था के रखवाले ही अगर ये करते हैं तो हम कहां जाएंगे?’

justice kolse on justice Loya (1)
फोटो साभार: द कारवां/odishasuntimes.com

(सीबीआई जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की मौत और न्यायपालिका पर उनके परिवार द्वारा उठाए गए सवालों पर बॉम्बे हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल का नज़रिया.)

आजकल देश में हमारे जैसे कार्यकर्ता कहते हैं कि न्यायपालिका हमें बचा सकती है, लेकिन हमारा तो हिट लिस्ट में नाम है. वे कब मार देंगे, ये भी नहीं पता. हम सोचते थे कि न्यायपालिका हमारी है और ये हमें बचा लेगी लेकिन आज न्यायपालिका को बचाने के लिए कोई नहीं बचा है. तो यदि न्यायपालिका को कोई नहीं बचा सकता तो देश को कौन बचा सकता है?

एक तो अब ये साबित हुआ है कि जिनको न्याय देने का काम करना है और जो न्याय से काम करना चाहते हैं, वे तो बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं. कई सवाल उठते हैं. ये जज लोया को ले जाने वाले कौन थे, उनके दोस्त और उनके साथ मौजूद रहे लोग…? इसकी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में होनी चाहिए.

मैं तो मोदी को 2002 से देख रहा हूं. गोधरा कांड में पुलिस की पहली रिपोर्ट थी कि ये आईएसआई का काम है. लेकिन आडवाणी और मोदी ने पुलिस को कहा कि ये एंगल नहीं चाहिए, लोकल एंगल चाहिए. ये मैं नहीं कह रहा, ये आरबी श्रीकुमार (जो उस समय गुजरात के डीजीपी थे) की किताब ‘गुजरात बिहाइंड द कर्टेन’ में लिखा है.

तो गोधरा किसने किया? फिर उसके बाद क्या हुआ, गोधरा से शवों को लेकर अहमदाबाद गए. इससे ज़्यादा नीच काम क्या हो सकता है. इन दोनों की पहले से साजिश है.

जब सुप्रीम कोर्ट कहता है कि निष्पक्ष फैसले के लिए इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर की जाएगी, इसे महाराष्ट्र लेकर आया जाता है और यहां से अमित शाह आरोपों से बरी हो जाते हैं और सीबीआई इसके ख़िलाफ़ अपील भी नहीं करती.

हमारा जो अभ्यास है, जैसा हम चाहते हैं कि न्यायपालिका ईश्वर बने, वह किसी न सुने, बस न्याय करे. लेकिन ऐसा होता नहीं है.

हम कहेंगे कि आप ईश्वर हैं तो वो कहेंगे हम ईश्वर नहीं, हमें नहीं बनना ईश्वर. उन्हें अपने बच्चों की चिंता है, रिटायरमेंट के बाद पद की चिंता है. किसी को बच्चे को विदेश भेजना है, किसी को फ्लैट देना है, ये क्या है!

न्यायमूर्ति पद इतना अच्छा है कि कोई इसे हाथ भी नहीं लगा सकता. किसी जज पर अभियोग लगाने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत चाहिए होता है. अगर नियुक्ति के बाद भी यह बात सामने आती है कि मैं किसी हत्या के प्रयास में लिप्त रहा, तब भी आपको संसद में जाकर हमारे ख़िलाफ़ अभियोग चलवाना पड़ेगा.

तो न्यायपालिका हम सबको बचा सकती है, लेकिन उनको ये बचा नहीं सकते, मारते हैं. मैंने निरंजन टाकले की रिपोर्ट पढ़ी. मैं सहमत हूं कि ये सब गड़बड़ियां हुई होंगी.

इतना अच्छा, इतना बड़ा जज वीआईपी होता है लेकिन क्या एक वीआईपी को आप छोटे से अस्पताल में ले जाते हैं? फिर मरने के बाद दूसरे अस्पताल में ले जाते हैं? फिर पोस्टमार्टम करवाना भी ठीक नहीं है.

मैं मांग करता हूं कि इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सुप्रीम कोर्ट के जज द्वारा ही होनी चाहिए. यह देश के हित में होगा. यह मोदी और शाह के भी हित में होगा.

जहां तक जज लोया के परिवार द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मोहित शाह के अनुकूल फैसले के लिए दबाव बनाने और 100 करोड़ रुपये की पेशकश की बात है, ऐसे आरोप न्यायपालिका के लिए बहुत ही खतरनाक हैं.

मैं जब खुद जज था, तबसे मैं बोल रहा हूं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है. मैं हमेशा यही कहता रहा कि जजों को इन सबसे ऊपर उठना चाहिए क्योंकि उनके पद की बहुत प्रतिष्ठा होती है. और हमारे यहां तो दुनिया के किसी भी देश से बेहतर सुविधा है, सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जज पूरी तरह सुरक्षित हैं.

ऐसी स्थिति में तो हमारे साथ के लोगों को इस देश और दुनिया को दिखाना चाहिए कि ईश्वर के (न्याय के) बाद हम ही हैं. अगर मोहित शाह ने यह किया है तो इससे बुरी बात क्या हो सकती है. और अगर उन्होंने यह नहीं किया तो उन्हें बेदाग सामने आना चाहिए.

मैं जस्टिस एपी शाह की बात से बिल्कुल इत्तेफाक रखता हूं कि अगर इस तरह के आरोपों की जांच नहीं की जाती तो यह न्यायपालिका के निचले कैडर के लिए बेहद गलत इशारा होगा. निचले कैडर के अलावा जो भी लोग क़ानूनी तौर पर ज़िंदगी जीना चाहते हैं, उनके ऊपर भी असर होगा. क़ानून और व्यवस्था का रखवाला ही अगर ये करता है तो हम कहां जाएंगे?

ऐसे में न सिर्फ़ न्यायपालिका के निचले कैडर बल्कि पूरे समाज को कोई संरक्षण रहा ही नहीं. यदि किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ऐसा करेंगे तो कैसे होगा! प्रशांत भूषण ने तो कई चीफ जस्टिसों के ख़िलाफ़ इल्ज़ाम लगाए. और हमें भी मालूम है कि कई लोग 100 करोड़ से भी ज़्यादा रिश्वत लेते हैं. तो क्या करेंगे?

इतने सब के बावजूद मैं जजों से यही विनती करना चाहूंगा कि आप हमारे संरक्षक हैं, हमारे ईश्वर के समान हैं तो कृपया उसके जैसे बनिए.

(मीनाक्षी तिवारी से बातचीत पर आधारित)