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जिन क्रांतिकारियों के सहारे संघ गांधी पर निशाना साधता है, वे आरएसएस कैंप से नहीं आये थे

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफ़ीनामे सामने आ जाते हैं.

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(फोटो साभार: dandimemorial.in)

एक बार अमर्त्य सेन ने एक बड़े पते की बात कही थी, ‘जब मैं किसी एक चीज के बारे में बात कर रहा होता हूं तो उस वक्त दूसरी चीजों के बारे में बात नहीं कर रहा होता.’

यानी अगर कोई किसी गीत में गांधीजी के बारे में बात कर रहा है तो जाहिर है वो उस समय क्रांतिकारियों के बारे में बात नहीं कर रहा. संभव है वही व्यक्ति जब क्रांतिकारियों के बारे में बात कर रहा हो तो उस समय गांधी की बात न करे.

यह बात समझने में उन लोगों को दिक्कत होती है जिनके पास तर्कों की कमी है और कुतर्क ही जिनका सहारा हैं.

बात-बात में पूछने वाले कि ‘आप तब कहां थे’ या ‘आप उनके बारे में क्यों नहीं बोलते’ एक खास बौद्धिक फैक्ट्री के उत्पाद हैं. ये वो लोग हैं जो बौद्धिक विमर्श की अपनी दरिद्रता को छुपाने के लिए विमर्श को भटकाने की रणनीति अपनाते हैं.

उनकी स्थिति तब और दयनीय हो जाती है जब उनका अपना इतिहास किसी को बताने लायक नहीं होता.

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफीनामे सामने आ जाते हैं.

अगर किसी को गांधी की हत्या ‘वध’ न लगती हो तो वो भी सावरकर पर लानत ही भेजेगा. भले ही अपनी जिंदगी के पहले कुछ साल तक वो वीर रहे हों, बाद के सालों में उन्होंने भीरुता और गद्दारी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

तो इस तरह आरएसएस की राजनीति के महानायक ‘वीर’ सावरकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान क्रांतिकारियों के सामने महज अंग्रेजों के चाटुकार-भर रह जाते हैं.

फांसी की सजा का इंतजार करते हुए फख्र से जिन शहीदों का वजन बढ़ जाता हो, उनके सामने उस व्यक्ति की क्या बिसात जो महज जेल जाने से इस कदर टूट गया कि अंग्रेजों का पिट्ठू बन बैठा. हिंदू महासभा से उधार लिए इन्हीं सावरकर के अलावा आरएसएस के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसे वो ‘अपना’ कह सकें.

कई बार लोग आपत्ति करते हैं कि आज़ादी की लड़ाई की विरासत पर सबका बराबर का अधिकार है. लेकिन क्या उनका भी उतना ही अधिकार है जो 1925 से संगठन चलाते हुए 22 साल तक लोगों को समझाते रहे कि अंग्रेज नहीं मुसलमान, कम्युनिस्ट और ईसाई उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं?

बहरहाल, अगर हरियाणा के मंत्री अनिल विज और कैलाश विजयवर्गीज सरीखे लोगों को लगता है कि कवि प्रदीप ने ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’ लिखकर क्रांतिकारियों का अपमान किया था तो लगे हाथ हम भी पूछ सकते हैं कि जब क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे चूम रहे थे, तब आप कहां थे?

रह-रहकर क्रांतिकारियों और हिंसा के प्रति उमड़ रहे इनके प्रेम की पड़ताल बहुत जरूरी है.

भगत सिंह क्रांतिकारी परंपरा के सबसे प्रबुद्ध चिंतक हैं. वो शायद नेहरू के अलावा दूसरे ऐसे स्वाधीनता सेनानी थे जो सांप्रदायिकता को वैज्ञानिक ढंग से समझने की कोशिश कर रहे थे. भले ही आरएसएस भगत सिंह को सरदार बनाकर उन्हें अपनाने की लाख कोशिश कर ले, भगत सिंह के विचार उसके धुर विरोधी हैं.

भगत सिंह गांधीजी की भारतीय राजनीति में सकारात्मक भूमिकाओं को पहचानते हुए उनकी बौद्धिक आलोचना करते थे. लेकिन वो यह कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि कोई गांधी हत्या की बात तक जुबान पर लाये.

यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि लाला लाजपतराय के साथ अपने लाख मतभेदों के बावजूद भगत सिंह और उनके साथी उनके ऊपर हुए बर्बर लाठीचार्ज का बदला लेने निकल पड़े थे.

उन्होंने ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ नामक लेख में साफ लिखा है कि लोगों को आपस में बांटने वाले संकीर्ण सांप्रदायिक विचार से बचाना और उसकी जगह साझा राष्ट्रवाद की भावना को बल देना जरूरी है.

सनद रहे कि भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में धर्म और ईश्वर की सत्ता को सिरे से ही नकार दिया था. जबकि दूसरी तरफ आरएसएस चाहता है कि आज़ादी की लड़ाई से निकले साझा राष्ट्रवाद की जगह सांप्रदायिक हिंदुत्व ही भारतीय राष्ट्र का एकमात्र दर्शन बन जाए.

हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सुप्रीम कमांडर चंद्रशेखर आज़ाद को तो एक बार सावरकर ने संदेश भिजवाया था कि क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लड़ना बंद करके जिन्ना और मुसलमानों की हत्या करनी चाहिए.

यशपाल ने अपनी किताब ‘सिंहावलोकन’ में लिखा है कि इस पर आज़ाद ने उनके दिए पचास हजार रुपये यह कहकर ठुकरा दिए थे कि ‘यह हम लोगों को भाड़े का हत्यारा समझता है. अंग्रेजों से मिला हुआ है. हमारी लड़ाई अंग्रेजों से है… मुसलमानों को हम क्यों मारेंगे? मना कर दो… नहीं चाहिए इसका पैसा’.

आज़ाद ने अपने एक कनिष्ठ साथी, जो कि हिंदू राष्ट्र के जुमलों से थोड़ा प्रभावित हो गया था, से स्पष्ट शब्दों में कहा था-

‘हे भगत! तेरी ये हिंदू राजतंत्र की कल्पना देश को बहुत बड़े खतरे में डालने वाली है… कुछ मुसलमान भी ऐसा ही स्वप्न देखते हैं. लेकिन यह तो पुराने शाही घरानों के हिंदुओं और मुसलमानों की खब्त है. हमें तो फ्रंटियर से लेकर बर्मा तक और नेपाल से लेकर कराची तक के हर हिंदुस्तानी को साथ लेकर एक तगड़ी सरकार बनानी है.’

पृथ्वीसिंह आज़ाद क्रांतिकारी गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक थे. उनके साहस और वीरता के किस्से देश भर में मशहूर थे. हिंसा और क्रांतिकारी साधनों में पूरे यकीन के बावजूद पृथ्वीसिंह गांधीजी को पितातुल्य मानते थे. एक बार उन्हें जानकारी मिली कि दो रजाकार गांधीजी की हत्या करने के उद्देश्य से भेजे गए हैं तो वो उन्हें बचाने आ गए.

लेकिन जब गांधीजी को इस बात का पता चला तो पृथ्वीसिंह बोले कि उनके रहते कोई गांधीजी का बाल भी बांका नहीं कर सकता. लेकिन गांधीजी ने जब पलटकर सवाल किया कि उनके रहते अगर पृथ्वीसिंह को कुछ हो गया तो वो क्या जवाब देंगे. यह सवाल सुनकर पृथ्वीसिंह सहित सभी आश्रमवासी निरुत्तर हो गए.

‘मुसलमानों को फुफकारते यवन सांप’ मानने की विचारधारा के लोग तो रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान के आपसी रिश्तों को समझ ही नहीं सकते. एक बार अशफाक बीमार पड़े तो अचेतन अवस्था में राम-राम कहकर कराहने लगे.

उनके परिवार वालों को यह समझ ही नहीं आया कि पांच समय का नमाजी राम-राम क्यों रट रहा है. बाद में पता चला कि वो रामप्रसाद बिस्मिल को पुकार रहे थे.

तो इस तरह क्रांतिकारी आंदोलन का पूरा नेतृत्व सांप्रदायिकता के खतरे को भली-भांति पहचानता था. बल्कि न सिर्फ पहचानता था, उससे लड़ने की प्रतिबद्धता भी रखता था.

भूलने नहीं देना है कि गुलाम भारत में इस सांप्रदायिक धारा की सबसे बड़ी प्रतिनिधि मुस्लिम लीग थी और दूसरी तरफ से उसका साथ देने के लिए हिंदू महासभा और आरएसएस मौजूद थे.

इस तरह ये तो साफ है कि जिन क्रांतिकारियों का सहारा लेकर आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोग बार-बार गांधीजी पर निशाना साधते हैं, वो कोई आरएसएस के ओटीसी कैंप से निकलकर नहीं आये थे.

आरएसएस तो उस समय अपने प्रशिक्षण शिविरों में भविष्य में मुसलमानों के खिलाफ होने वाले किसी संभावित गृहयुद्ध की तैयारियों में लगी थी.

अपने विचारधारा के भीतर छिपी हिंसा को सही ठहराने के लिए वो क्रांतिकारियों की हिंसा को जायज ठहराते हैं तो इसी बहाने गांधी की अहिंसा को कायरता बताते हैं. अगर सिर्फ हिंसा की बात करें तो भी हिंसा-हिंसा में फर्क होता है. अंग्रेजी राज के दमन और शोषण से ऊबकर जिन क्रांतिकारियों ने हिंसा का सहारा लिया उनके दिल में मानवता के प्रति एक तड़प थी.

सांडर्स की हत्या के बाद लाहौर की गलियों में क्रांतिकारियों द्वारा लगाये गए पोस्टर याद करिए. उनकी हिंसा के भीतर छिपा गहन मानवतावाद साफ दिखता था.

कोई सोच सकता है कि चंद्रशेखर आज़ाद ने कई दिन प्रयास करने के बावजूद एक मंदिर में सिर्फ इसलिए डकैती नहीं डाली क्योंकि उसमें बेवजह का खून-खराबा हो सकता था. या कि बहरे कानों को सुनाने के लिए असेम्बली में बम सिर्फ उस जगह फेंका गया जहां कोई व्यक्ति मौजूद न हो.

याद रखना चाहिए कि भगत सिंह सहित सभी क्रांतिकारी अपने जीवन के बहुत शुरूआती दिनों में व्यक्तिगत हिंसक कार्यवाहियों में यकीन करते थे. लेकिन परिपक्व होने के साथ ही उन्होंने इस तरीके की सीमाएं भी समझ ली थीं जो कि ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम के मसौदे’ से एकदम स्पष्ट हो जाता है.

ये क्रांतिकारी नौजवान पकी दाढ़ी की उम्र में एक निहत्थे अहिंसक बूढ़े की हत्या के लिए हिंसा को उकसाने वाले फिलॉसफर नहीं थे. हिंसा उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम हो सकता था, निर्दोषों और निहत्थों की हत्या का साधन नहीं.

यह सब छोड़ भी दें तो क्या कोई तथाकथित संघ विचारक क्रांतिकारी साहित्य से कोई एक छोटा पुर्जा भी दिखा सकता है जिसमें गांधीजी की हत्या की योजना शामिल हो?

अगर नहीं तो 1930 के दशक से ही वो कौन लोग थे जो गांधीजी की हत्या को ही राष्ट्र की सबसे बड़ी सेवा मान बैठे थे?

यह तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है जो भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु और सुखदेव आदि लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए अपनी जान न्योछावर कर देते हैं, वो गांधीजी की हत्या होने पर क्या करते?

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)