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‘यूपी का चुनाव परिणाम सामाजिक न्याय के नेताओं की राजनीति की हार है’

लोकतंत्र में हर पल अपने समाज और वोटरों के बारे में सोचते रहना पड़ता है, लेकिन दुखद यह है कि उत्तर भारत के सामाजिक न्याय के सभी बड़े नेता सिर्फ अपने परिवार और रिश्तेदार के बारे में सोचते हैं, उन जनता के बारे में नहीं जिनके वोट से ये मसीहा बने थे.

Mayawati akhilesh

कहा जाता है कि इतिहास सबसे क्रूर होता है. कुछ लोग इसे सुधार कर कहते हैं कि इतिहास आपको एक बार सुधरने का अवसर देता है और अगर आप नहीं सुधरते हैं तो वह क्रूरतम रूप में आपके सामने आता है.

2014 के लोकसभा चुनाव में जब बिहार में नीतीश और लालू को मोदी ने धूल में मिला दिया था तो इतिहास ने उन्हें सुधरने का एक मौका भी दिया था जो 2015 के राज्य विधानसभा चुनाव परिणाम में दिखा भी.

2014 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा की वही गत हुई थी लेकिन अखिलेश और मायावती ने इतिहास से सीखने की कोई कोशिश नहीं की और आज दूसरी बार मोदी ने उन्हें नेस्तनाबूद कर दिया.

देश में सामाजिक न्याय की लड़ाई की एक कड़ी मंडल आयोग को लागू करके पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अगस्त 1990 में जोड़ी थी, उसके बिखरने में बस चंद वर्ष ही लगे थे.

लेकिन दूसरी कड़ी उत्तर प्रदेश में जब कांशीराम ने 1993 में मुलायम सिंह को अपने साथ लाकर जोड़ी थी तो उसे बिखरने में कुछ महीने ही लगे थे. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही इतिहास ने एक बार फिर करवट बदली और बिहार के दोनों पिछड़े नेता लालू और नीतीश ठीक 24 साल बाद कुछ ही महीनों के बाद एकजुट होकर मंच पर विराजमान हुए.

इसी तरह जब 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी तो उस समय इससे भी बड़ी गोलबंदी उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच हुई थी. वह गोलबंदी इतनी कारगर थी कि दोनों दलों ने मिलकर न सिर्फ भाजपा को जमींदोज कर दिया था बल्कि मुलायम सिंह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री भी बने थे.

लेकिन अहं का टकराव और ‘दूरदृष्टि की कमी’ की वजह से सरकार ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाई और भाजपा फिर से सत्ता में लौट आई. लेकिन मुलायम-मायावती के बीच आई कड़वाहट भारतीय राजनीति में गिने-चुने कुछ गंदे राजनीतिक उदाहरण हैं.

हालांकि इस चुनाव परिणाम ने फिर से कुछ सवाल छोड़े हैं जिसका जवाब सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेताओं से पूछना लाज़मी हो जाता है. थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि जिस तरह लालू-नीतीश गठबंधन को 2015 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिल गया था उसी तरह यूपी में अखिलेश यादव या मायावती को पूर्ण बहुमत मिल जाता तो राज्य की जनता, खासकर उनके करोड़ों वोटरों को क्या मिलता?

आख़िर तथाकथित समाजिक न्याय का नारा गरीबी-भुखमरी-बेरोज़गारी और विकास रहित जाति व्यवस्था से पीड़ित अवाम को कुछ मिलने के आसार थे क्या? जिस रूप में बीजेपी ने सामाजिक ताने-बाने को क्षत-विक्षत किया है उसे पाटने का सामाजिक न्याय के इन तथाकथित पुरोधाओं के पास कुछ था क्या?

पिछले 25-26 वर्षों से जिस रूप में इन नेताओं को जनता समर्थन देती आती रही थी और जितनी राजनीति उससे प्रभावित हुई थी, सामाजिक न्याय के ‘चैंपियनों’ ने सिर्फ़ उसका दुरुपयोग किया है. उनके कार्यकलापों को देखने से लगता है कि सामाजिक न्याय का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ नेताओं, उनके बाल-बच्चों और रिश्तेदारों की सत्ता और प्रतिष्ठान में भागीदारी व राजकीय ख़जाने की लूट में हिस्सेदारी ही रह गया है जिसके दायरे में कम से कम आम जनता तो कतई नहीं आती है.

बिहार और उत्तर प्रदेश में लगभग 26 वर्षों से अधिक समय से ‘सामाजिक न्याय’ की सरकार है जिसका नेतृत्व पूरी तरह पिछड़ों और दलितों के हाथ में ही है भले ही किसी भी पार्टी की सरकार हो (यूपी में राजनाथ सिंह के छोटे कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो).

बिहार में लालू-राबड़ी लगभग 15 वर्षों तक सत्ता में रहे जबकि पिछले 10 वर्षों से नीतीश कुमार वहां काबिज़ हैं (लोकसभा चुनाव में भीषण हार के बाद नीतीश ने महादलित जीतनराम मांझी को थोड़े दिनों के लिए मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया था) और परिणाम आने तक अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में काबिज़ हैं.

Patna: Bihar Chief Minister Nitish Kumar greeting RJD chief Lalu Prasad on his 68th birthday in Patna on Thursday. PTI Photo (PTI6_11_2015_000047A)

फोटो : पीटीआई

लेकिन जिन जातियों और सामाजिक गठबंधन के वोट से लालू-राबड़ी,नीतीश, मुलायम, मायावती और अखिलेश मुख्यमंत्री बने वे मुख्य रूप से पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय से आते थे.

उनके पास न शिक्षा थी, न रोजगार था और न ही संसाधन थे. हां, जातीय व्यवस्था से वे इतने बदहाल थे कि वे ठीक से उस सामाजिक ताने-बाने में सांस भी नहीं ले पाते थे. लालू-मुलायम और मायावती ने 1990 के दशक के शुरुआती सालों में सत्ता संभालने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उसी जाति व्यवस्था को दी जिससे दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक त्रस्त थे.

कुछ सीमित अर्थों में कहा जाए तो इन नेताओं ने सामाजिक जड़ता को जबरदस्त झटका दिया था. लालू-राबड़ी ने अपने 15 साल के शासनकाल में सांप्रदायिक ताकतों को कड़ी चुनौती दी थी, जिसके चलते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कई कोशिशों के बावजूद राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की अपवादों को छोड़ दें तो, कोई बड़ी घटना नहीं घटी थी.

इसके अलावा लालू-राबड़ी के शासनकाल में ऐसा कोई काम नहीं हुआ जिससे उनके मतदाता वर्ग को आर्थिक लाभ पहुंचा हो. इसी तरह मुलायम सिंह यादव का पहला कार्यकाल सांप्रदायिकता को ज़ोरदार चुनौती देने वाला था.

उन्होंने संविधान की रक्षा के लिए कारसेवकों के ऊपर गोली चलवाई और जब सत्ता से बाहर हुए तो मायावती के साथ मिलकर फिर से उग्र सांप्रदायिक हिंदुवादियों से लोहा लिया. बसपा के साथ आने से राजनीतिक स्तर पर भले ही दलितों और पिछड़ों के बीच समीकरण बने लेकिन कुछ ही दिनों के बाद दोनों नेताओं के बीच के अलगाव ने जमीनी स्तर पर दोनों के बीच बन रहे बेहतर सामाजिक समीकरण को बनने नहीं दिया.

नेता चाहे लालू रहे हों या मायावती या फिर मुलायम रहे हों- थोड़ा बहुत अंतर के साथ सभी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक (नीतीश व अखिलेश को छोड़कर) रूप से एक जैसे थे.

उन नेताओं को सत्ता पर काबिज़ कराने वाली जनता गरीबी, बेरोज़गारी और अशिक्षा से जूझ रही थी. उनके लिए ‘नई सोच या विज़न’ के साथ स्कूल खोले जाने की जरूरत थी, उन पुराने सरकारी स्कूलों को बचाए रखने की जरूरत थी जिसकी बदौलत वे भविष्य में बेहतर रोज़गार पा सकते थे.

इसके अलावा किसी नई योजना के तहत उनके लिए शिक्षा के बेहतर अवसर भी मुहैया कराए जाने की ज़रूरत थी लेकिन वैसा कुछ नहीं किया गया और कुल मिलाकर शिक्षा व्यवस्था में आ रही गिरावट के चलते शिक्षा पूरी तरह नष्ट हो गई.

यही हाल स्वास्थ्य क्षेत्र का रहा. सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य व्यवस्था ख़त्म हो गई और सरकारी अस्पताल के डॉक्टर अस्पतालों के अहाते में ही निजी क्लीनिक चलाने लगे. नतीजा ये हुआ कि आम लोगों और गरीबों को स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा मिलनी बंद हो गई.

अगर दोनों राज्य सरकारों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि पिछले दो-ढाई दशक में सरकारी अस्पतालों और सरकारी स्कूलों से ज़्यादा निजी अस्पताल और स्कूल खुले हैं. जबकि बिहार-उत्तर प्रदेश के सामाजिक न्याय के जितने भी पुरोधा हैं (अखिलेश को छोड़कर) लालू, नीतीश, मुलायम और मायावती, (रामविलास भी)- जब वे पैदा हुए होंगे तो पहली बार इलाज के लिए सरकारी अस्पताल गए होंगे.

ठीक उसी तरह जब वे पढ़ने के लिए स्लेट लेकर निकले होंगे तो सरकारी स्कूल ही गए होंगे लेकिन जिस रूप में इन लोगों ने आम जनता से सीधे तौर पर जुड़ी इन दोनों संस्थानों को नष्ट किया है या होने दिया है. इसका उदाहरण लोकत्रांतिक इतिहास में आसानी से दिखाई नहीं देगा.

सामाजिक न्याय की पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं को प्राथमिकता के आधार पर सबसे पहले स्कूलों और अस्पतालों को बचाना था क्योंकि वहीं ये दोनों संस्थाएं हैं जिनसे दलित-आदिवासी-पिछड़े, अल्पसंख्यक और हर तरह से पिछड़े लोगों का भविष्य निर्माण होता है.

हालांकि उन नेताओं की प्राथमिकता में ये दोनों ही चीज़ें कभी नहीं रहीं. सामाजिक न्याय के इन तथाकथित कर्णधारों की सबसे बड़ी परेशानी यह भी है कि वे हमेशा सवर्ण सत्ताधारी नेताओं की नकल आंख मूंदकर करते हैं.

चूंकि सामाजिक न्याय से इतर के नेतृत्व ने सरकारी स्कूल और सरकारी अस्पताल के समानांतर निजी स्कूलों और अस्पतालों का जाल खड़ा कर दिया है और इसका लाभ कोई भी अमीर ले सकता है, इसलिए उनके लिए अब इन सरकारी संस्थानों का कोई मायने ही नहीं रह गया है. लेकिन जिन वर्गों या जातियों का प्रतिनिधित्व सामाजिक न्याय के वे नेतागण करते हैं उनके लिए सरकारी संस्थानों के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही अब तक तैयार नहीं हुआ है.

पिछले 25 वर्षों के कृषि विकास को देखने से पता चलता है कि कहीं-कहीं पैदावार में बढ़ोतरी भले ही हुई है लेकिन अधिकतर किसानों ने खेती करना छोड़ दिया है जिसके चलते कृषि पर निर्भर रहने वाले लोगों को अब रोज़गार की तलाश में बाहर पलायन करना पड़ रहा है.

दोनों ही राज्यों के नेताओं को इस क्षेत्र पर सबसे अधिक ध्यान देने की ज़रूरत थी क्योंकि उनके समर्थक किसान भी थे और मजदूर भी, लेकिन कृषि क्षेत्र की तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया.

सामाजिक न्याय के एक भी महारथी ने कभी भी अपने मतदाता वर्ग को स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जोड़ने का काम नहीं किया. फलस्वरूप जो मतदाता उनको वोट देते रहे, उनकी ज़िंदगी में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया.

अगर लगातार 25 वर्षों तक वोट देने के बाद भी किसी की ज़िंदगी में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आए तो वह मतदाता कितने दिनों तक पुराने नारे पर वोट डालता रहेगा? उन मतदाताओं को जब कोई दूसरा नारा आकर्षक लगेगा वह उधर वोट दे देगा! और यही उत्तर प्रदेश में इस बार हुआ है.

जब 1997 में लालू यादव ने राष्ट्रीय जनता दल बनाया था और राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया था तो पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने बिना किसी का नाम लिए कहा था,‘लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा ख़तरा परिवारवाद है, क्योंकि जब लगता है कि लोकतंत्र ठीक से चल रहा है तो तंत्र पर परिवार का कोई सदस्य आकर बैठ जाता है और लोकतंत्र कमजोर हो जाता है.’

निश्चित रूप में वीपी सिंह के दिमाग में उस समय की वही घटना ताज़ा रही होगी, लेकिन सामाजिक न्याय के योद्धाओं ने येन-केन प्रकारेण सिर्फ़ अपने परिवार को स्थापित करने के लिए ही काम किया है.

बिहार और उत्तर प्रदेश के सामाजिक न्याय के नेताओं को देख लीजिए, ‘लोकतंत्र को बचाने में’ लालू-मुलायम, रामविलास के परिवार के सभी लोग जी-जान से जुटे हुए हैं. नहीं तो लालू या मुलायम, रामविलास को यह कैसे लगा जब तक उनके परिवार के सदस्य चुनाव नहीं लड़ेंगे, लोकतंत्र नहीं बचेगा!

दुखद यह है कि इन नेताओं के लिए सामाजिक न्याय का मतलब इनका परिवार, इनके रिश्तेदार और अगर उन नेताओं में से किसी के पास ‘परोपकार’ जैसे शब्द बचे हैं तो अपनी जाति के मलाईदार तबके तक जाकर ख़त्म हो जाती है.

नीतीश इस मामले में अकेले व्यक्ति हैं जो परिवारवाद से मुक्त हैं, लेकिन विज़न की कमी उनको भी लालू-मुलायम और मायावती की श्रेणी में खड़ा कर देता है. आख़िर इन नेताओं को यह बात समझ में क्यों नहीं आई कि सरकारी स्कूल और सरकारी अस्पताल का बचना उनके अपने ही मतदाताओं के लिए सबसे ज़रूरी और मज़बूती का उपाय है.

अगर ये दोनों संस्थाएं बची रहेंगी तो उनके मतदाता सजग रहेंगे और आगे चलकर उनके कट्टर समर्थक और वोटर भी बनेंगे, लेकिन इन लोगों ने दूरदृष्टि के अभाव में अपने मतदाता को सबसे ज्यादा छला है और उन्हें नुकसान भी पहुंचाया है.

जब कर्पूरी ठाकुर पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो सातवीं तक की शिक्षा मुफ्त कर दी थी और दूसरी बार जब वे मुख्यमंत्री बने तो मैट्रिक तक की शिक्षा मुफ्त की. इतना ही नहीं उन्होंने मैट्रिक परीक्षा में अंग्रेजी में फेल होने वाले परीक्षार्थियों को पास होने का कानून बना दिया, जिसे आज भी कर्पूरी डिवीज़न (पीडब्ल्यूई) कहा जाता है.

कर्पूरी ठाकुर के इस फैसले से हजारों दलितों और पिछड़े को नौकरी मिली थी और वही आज भी लालू-नितीश के सबसे बड़े समर्थक हैं.

अखिलेश यादव न किसी आंदोलन की पैदाइश हैं और न ही उन्होंने पिछड़ों और दलितों के सामाजिक संघर्ष को देखा है. यही कारण है कि उन्होंने सबसे पहले दलितों को प्रमोशन में मिलने वाले आरक्षण को ख़त्म करने का समर्थन कर दिया.

यही कारण था कि जब आरएसएस के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य ने आरक्षण ख़त्म करने की बात कही थी तो अखिलेश चुप्पी साध गए थे. वे मुगालते में थे कि आरक्षण पर चुप्पी साधकर और ‘विकास’ की बात करके सर्वणों का वोट पाया जा सकता है (जो मिथ साबित हुआ).

लोकतंत्र में हर पल अपने समाज और वोटरों के बारे में सोचते रहना पड़ता है, लेकिन दुखद यह है कि उत्तर भारत के सामाजिक न्याय के सभी बड़े नेता सिर्फ अपने परिवार और रिश्तेदार के बारे में सोचते हैं, उन जनता के बारे में नहीं जिनके वोट से ये मसीहा बने थे.

यही कारण है कि किसी भी पार्टी में परिवार से बाहर का दूसरे लेयर की लीडरशिप तैयार नहीं हुई है. सामाजिक न्याय के इन मसीहाओं को देखकर पता नहीं बरबस प्रेमचंद के उपन्यास ‘गबन’ का एक पात्र याद या जाता है जिसमें वह ट्रेन में जाते समय पूछता है, ‘मान लो, सुराज आ जाता है तो क्या होगा? यही न कि मिस्टर जॉन की जगह पर श्रीमान जगदीश आ जाएंगे, लेकिन इससे हमारी ज़िंदगी में कोई तब्दीली तो नहीं आएगी.’

फिलहाल सामाजिक न्याय की अपेक्षा रखने वाली जनता के लिए तो यह महज़ दूसरा सुराज है जिसमें जनता किसी दूसरे बहेलिये के जाल में फंस गई है जिसने नारे के रूप में बेहतर चारा फेंका है. अब मायावती और अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे कैसे अपने खिसके हुए जनाधार को वापस पाएंगे जिनके पास कोई ‘विज़न’ ही नहीं है.