समाज

‘कथाओं से भरे इस देश में… मैं भी एक कथा हूं’

हिंदी साहित्य के संसार में केदारनाथ सिंह की कविता अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है. वे अपनी कविताओं में किसी क्रांति या आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में दिखते हैं.

Kedarnath Singh Final

केदारनाथ सिंह (जन्म: 7 जुलाई 1934, अवसान: 19 मार्च 2018) (फोटो साभार: लोकसभा टीवी/यू ट्यूब)

समकालीन भारतीय कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह का 19 मार्च 2018 को निधन हो गया. उन्हें 1989 में साहित्य अकादमी और 2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नवंबर 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में जन्मे केदारनाथ सिंह ने अपना शैक्षिक करियर पडरौना के एक कॉलेज से शुरू किया था. बाद में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय चले गए. वे एक उम्दा कवि और अध्यापक के रूप में वहां मशहूर थे.

उनसे जुड़ी एक बात याद आती है. वे इलाहाबाद में 20 और 21 जून 2015 को ‘उजास- हमारे समय मे कविता’ नामक एक आयोजन में बोलने आए थे. सबसे पहले उन्हें ही बोलना था लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजक ने कार्यक्रम का परिचय देने में बहुत समय ले लिया और श्रोताओं को घनघोर तरीके से उबा दिया.

जब कवि केदारनाथ सिंह बोलने आए तो उन्होंने अपने कुरते की जेब से एक पुर्जी निकाली और एक तिब्बती कवि की कविता का अनुवाद पढ़ा और मुकुटधर पाण्डेय की तीन-चार लाइनें कहकर अपनी सीट पर बैठ गए. यह एक कवि का दूसरे कवि के प्रति सम्मान भाव था, उससे ज्यादा एक निर्वासित समुदाय के कवि की पीड़ा को वह ‘हमारे समय में कविता’ के मंच पर उपस्थित सभी कवियों की साझा चिंता बना रहा था.

बीसवीं शताब्दी की रूसी कविताओं का एक अनुवाद साहित्य अकादमी ने ‘तनी हुई प्रत्यंचा’ के नाम से प्रकाशित किया है. इसे रूसी भाषा के जानकार वरयाम सिंह ने अनूदित किया था और संपादन केदारनाथ सिंह ने किया था. अपने एक संक्षिप्त संपादकीय में उन्होंने त्स्वेतायेवाकी की लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य निचोड़ लेने की क्षमता और मंदेल्स्ताम के चट्टान जैसे काव्य शिल्प की सराहना की थी. यह बात कमोबेश उनके लिए भी सही है.

उन्होंने अपनी कविता यात्रा में अपने मानकों में कोई ढील नहीं दी. लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य उनकी कविताओं लगातार व्याप्त है. अपनी कविताओं में किसी क्रांति या परिवर्तनकामी आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए वे मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में खड़े हो जाते हैं.

उनकी कविता हिंदी साहित्य के संसार में अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ अपने पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है,

जैसे चींटियां लौटती हैं

बिलों में

कठफोड़वा लौटता है

काठ के पास

वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक

लाल आसमान में डैने पसारे हुए

हवाई-अड्डे की ओर

 

ओ मेरी भाषा

मैं लौटता हूं तुम में

जब चुप रहते-रहते

अकड़ जाती है मेरी जीभ

दुखने लगती है

मेरी आत्मा

जैसे दुनिया के तमाम दानिशवर और कवि होते हैं, वैसे ही केदारनाथ सिंह भी थे- उन्हें भाषा पर भरोसा था. यह भी कि लोग बोलेंगे ही , वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा.

प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों को वे जितनी आसानी से कविता में कह जाते थे, वह किसी उस्ताद के बस की ही बात थी. उनकी मृत्यु के बाद उनकी ढेर सारी कविताएं साइबर संसार में आसमान के नीले रंग की भांति फैल गयी हैं लेकिन उनकी एक कविता तो हिंदी संसार में विदा गीत का रूप ले चुकी है,

साभार: ख्वाब तनहा कलेक्टिव

साभार: ख्वाब तनहा कलेक्टिव

मैं जा रही हूं – उसने कहा
जाओ – मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि

जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है.

विदा की तरह उनकी कविता का यह बिंब उतना मार्मिक, विस्तीर्ण और सहज है,

उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.

उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वह दुनिया को बनाने का एक उष्मीय इरादा रखती थी.

मृत्यु बोध, बनारस और केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह की कविताओं में मृत्यु को लेकर एक विकल संवेदना सदैव व्याप्त रहती है. उन्होंने मनुष्य के ‘होने’ पर जितनी गहराई से सोचा-समझा और लिखा उतना ही उसके न होने पर लिखा,

यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में

कुछ नहीं था
सिर्फ़ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी.

उनका बनारस जितना जीवन का शहर है, उतना ही मृत्यु का भी.

यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता

और खाली होता है यह शहर

इसी तरह रोज-रोज एक अनंत शव

ले जाते हैं कंधे

अंधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरफ

इस शहर में धूल

धीरे-धीरे उड़ती है

एक भिन्न संदर्भ में ए. अरविंदाक्षन, जिसे कविता की मिट्टी कहते हैं, केदारनाथ सिंह की कविता की वह मिट्टी पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गंवई और सहज ज्ञानी कवि की है,

सिर्फ

कुत्तों की आंखों में

जहर की चमक

सिर्फ भैंसों के थनों में दूध का तनाव

वह आदमी के सर उठाने की यातना है

आदमी का बुखार

आदमी की कुल्हाड़ी

जिसे वह कंधे पर रखता है

और जंगल की ओर चल देता है

उनकी कविता पशुओं के बुखार, बढ़ई और चिड़िया, जाड़ों के शुरू में आलू पर जितनी सहजता से बात करती है उतनी ही शिद्दत से मडुआडीह की तरफ से आने वाले बसंत की.

उनकी कविता को ध्यान से पढ़ने-गुनने पर बनारस एक बिंब के रूप में आता है. जिन सारी चीजों से यह शहर बनता है, वह उनकी कविता की बुनावट में चला आता है- चाहे वह कबीर के ऊपर लिखी कविताएं हों या धागों के बारे में,

दरियों में दबे हुए धागो उठो
उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा
उठो मेरे टूटे हुए धागो
और मेरे उलझे हुए धागो उठो

बाघ और केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह एक उम्दा कवि होने के साथ-साथ बेहतरीन शोधकर्ता रहे हैं. हिंदी कविता के बिंब विधान पर जब उनका काम आया था तो उसने आलोचकों और विद्यार्थियों का ध्यान खींचा था. वे विंब की ताकत जानते थे.

वे जानते थे कि मनुष्य अपने कल्पना लोक में कितना उर्वर, राजनीतिक और फितनागर हो सकता है. उन्होंने भारतीय साहित्य में बाघ की उपस्थिति पर सोचा और बाघ जैसी कालजयी कविता लिखी.

इस कविता के बारे में उन्होंने खुद ही कहा है कि बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने साथ हमारे अपने होने का भवितव्य जुड़ा हुआ है.

इस प्राकृतिक बाघ के साथ उसकी सारी दुर्लबता के बावजूद-मनुष्य का एक ज्यादा गहरा रिश्ता है, जो अपने भौतिक रूप में जितना आदिम है, मिथकीय रूप में उतना ही समकालीन. बाघ इसी समकालीनता को हिंदी कविता के पाठक के सामने रखती है,

कथाओं से भरे इस देश में

मैं भी एक कथा हूं

एक कथा है बाघ भी

इसलिए कई बार

जब उसे छिपने को नहीं मिलती

कोई ठीक-ठाक जगह

तो वह धीरे से उठता है

और जाकर बैठ जाता है

किसी कथा की ओट में

कथाओं के इस देश में केदारनाथ सिंह अपने पाठक के पास एक सादे पन्ने के बचे रहने की उम्मीद रखते थे,

कविता यही करती है

यही सीधा मगर जोखिम भरा काम

कि सारे शब्दों के बाद भी

आदमी के पास हमेशा बचा रहे एक पन्ना

(रमाशंकर सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में फेलो हैं.)

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