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असहिष्णुता को लेकर बतौर राष्ट्रपति चंद नसीहत भरे भाषण के अलावा प्रणब ने क्या किया था?

अगर देश के संविधान का मूल स्तंभ सहिष्णुता और धर्म-निरपेक्षता है, तो फिर मोदी सरकार के शुरुआती तीन साल तक संविधान के मुखिया के पद पर बैठकर प्रणब मुखर्जी ने क्या किया?

Nagpur: Former president Pranab Mukherjee with Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) chief Mohan Bhagwat at the closing ceremony of ‘Tritiya Varsha Sangh Shiksha Varg’, an (RSS) event to mark the conclusion of a three-year training camp for Swayamsevaks, in Nagpur on Thursday, June 07, 2018. (PTI Photo)(PTI6_7_2018_000165B)

नागपुर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी व अन्य. (फोटो: पीटीआई)

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी संघ के स्वयं सेवकों के तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह के कार्यक्रम में भाग लेने नागपुर गए. प्रणब दा ने संविधान के सबसे बड़े रक्षक के तौर पर यानी देश के सर्वोच्च पद- राष्ट्रपति के रूप में पूरे कार्यकाल का बड़ा हिस्सा- तीन साल दो महीने मोदी सरकार के वक्त में गुजारे हैं.

और यह वो दौर था, जब देश में धर्म और जाति के आधार पर सिर्फ लोगों के भोजन में क्या है और वो किस चीज का व्यापार करते है, इस आधार पर सरेआम सड़कों पर और घरों में घुसकर कत्लेआम हुआ. लेकिन, इस पूरे दौर में प्रणब दा एक आध मौके पर कुछ नसीहत भरा भाषण देने के अलावा इस बढ़ती असहिष्णुता, या यूं कहें बेहतर होगा कि योजनाबद्ध असहिष्णुता के मौन समर्थक बने रहे.

मैं मौन समर्थक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अगर वो यह मानते हैं कि देश के संविधान का मूल स्तंभ सहिष्णुता और धर्म-निरपेक्षता है, तो फिर तीन साल तक संविधान के मुखिया के पद पर बैठकर उन्होंने क्या किया?

जब वो बहुत कुछ कर सकते थे, तब वो एक बुत बनकर बैठे रहे और आज जब उनके हाथ में घिसापिटा भाषण देने से ज्यादा कोई संवैधानिक ताकत नहीं बची है, तब इस सबके लिए जिम्मेदार संघ के मुख्यालय, नागपुर के दरवाजे पहुंच गए.

कुल मिलाकर प्रणब दा के सामने से सांप निकल गया तब कुछ नहीं किया और अब उसकी लकीर पीटने नागपुर गए. अब प्रणब दा और संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषणों की बात करें.

जैसा सभी धर्मनिरपेक्ष समूहों से सबंध रखने वालों और आरएसएस तक को भी उम्मीद होगी, प्रणब दा ने कहा- भारत की संस्कृति का विकास बहुलतावाद की परंपरा पर हुआ है और असहिष्णुता से हमारी राष्ट्रीयता कमजोर होती है, राष्ट्रवाद किसी धर्म या भाषा में नहीं बटा है, जैसी कई नसीहतें दे डाली.

मगर जो संगठन अपनी विचारधारा पर पिछले लगभग 90 सालों से कट्टरता से अडिग है, या यूं कहें तो बेहतर होगा कि जिसकी स्थापना ही किसी विशेष सोच, विचारधारा और एजेंडे के तहत हुई हो उससे यह उम्मीद करना कि वो अपने कैडर को उस मार्ग से दूर जाने वाला कुछ और सिखाएगा नादानी ही होगी.

वैसे भी प्रणब दा के भाषण में ऐसी कोई नई बात नहीं थी या ऐसा कोई छिपा रहस्य जैसा कुछ भी नहीं था, जो इन स्वयंसेवको को नहीं मालूम होगा. कम से कम मैं तो ऐसा मानने का खतरा मोल नहीं ले सकता.

बल्कि, जो सब प्रणब मुखर्जी ने कहा वो सब वो कार्यकर्ता अपनी स्कूल की किताबों में और अन्य बहसों और नेताओं के भाषणों में सुनता आया होगा और असल में उसे वो सब सीखा हुए भुलाने और उससे दूर ले जाकर अपने एजेंडे के हिसाब से तैयार करने के लिए तो संघ तीन वर्ष तक राष्ट्रवाद, संस्कृति और धर्म की अपनी सोच घोट कर पिलाता है.

और जिसने अपने तीन वर्ष की शिक्षा के दौरान कभी किसी इन मुद्दों पर संघ की सोच से भिन्न विचार रखने वाले विचारक को ना तो सुना हो और ना पढ़ा हो, वो प्रणब दा के अंग्रेजी में एक प्रोफेसर की तरह सामान्य रूप से दिए गए इस नीरस भाषण से अपनी सोच बदलेगा यह संघ की शिक्षा और उस कार्यकर्त्ता की अपने संगठन के विचारों की कट्टरता के प्रति समर्पण पर शक करने जैसा होगा

यहां मैं अपने आपको प्रसिद्ध व्यंग्यकार दिवंगत हरिशंकर परसाई की संघ की शिक्षा वर्ग पर कही एक टिप्पणी पेश करने से नहीं रोक पा रहा हूं:

‘फासिस्ट संगठन की विशेषता होती है कि दिमाग सिर्फ नेता के पास होता है, बाकी सब कार्यकर्ताओं के पास सिर्फ शरीर होता है. अपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी ऐसा ही है. स्वयंसेवक के पास भी अगर बुद्धि रह गई तो संगठन टूट जाएगा. इसलिए संघ में लगातार ‘बुद्धिनाश’ का कार्यक्रम चलता रहता है , जिसे भाषा में- ‘बौद्धिक वर्ग’ कहते हैं. नेता के पास खबर आती है कि स्वयंसेवकों में बुद्धि की घुसपैठ हो रही है, तो नेता हुक्म देता है कि जल्दी जल्दी बौद्धिक लो और उन्हें जड़बुद्धि बना दो. सुना है, संघ के नेता कुछ वरिष्ठ सर्जनों से सलाह कर रहे है कि ऑपरेशन करके सोचने की मशीन ही निकाल दी जाय.’

अगर हम प्रणब दा के पहले संघ के संचालक मोहन भागवत के भाषण को ध्यान से देखें तो वो ऐसा ही कुछ कहते नजर आते हैं. उन्होंने सबसे पहले कहा- प्रणब मुखर्जी के यहां आने से संघ नहीं बदलेगा, संघ, संघ ही रहेगा. यानी प्रणब दा को बता दिया आपके भाषण से कुछ नहीं बदलेगा और आपको इसके लिए नहीं बुलाया है.

उन्हें यह भी मालूम था कि प्रणब दा अपने भाषण में विविधता की बातें करेंगे इसलिए उन्होंने पहले ही अपने कार्यकर्ताओं और देश को उसके संघ वाले मायने समझा दिए.

उन्होंने कहा, समाज में सारे व्यक्ति विचार करके नहीं चलते, समाज तो जैसा वातावरण बनेगा उस वातावरण के अनुसार चलता है और वातावरण बनाने वाले ग्रुप है, हम! यानी उन्होंने साफ बता दिया कि संघ की हैसियत और कैफियत क्या है और किसी के भाषण और नसीहत से व्यापक समाज पर फर्क नहीं पड़ता अगर उसके अनुसार वातावरण तैयार करने वाला संगठन नहीं है जो कि संघ है.

दूसरा, उन्होंने यह बता दिया कि उपर से दिखने वाली यह सारी विविधता सुंदरता की बात जरूर है लेकिन यह दिखने वाली सारी विविधता एक ही एकता से उपजी है और इस बात का भान रखकर हम सब एक हैं इसका भी दर्शन समय-समय पर होता रहना जरूरी है.

नागपुर में संघ मुख्यालय पर आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी. (फोटो: रॉयटर्स)

नागपुर में संघ मुख्यालय पर आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी. (फोटो: रॉयटर्स)

हम अलग-अलग हैं- इसे मन से निकालना होगा और एक भाव की तरफ बढ़ना होगा. यानी उन्होंने एक तरह से विविधता को ही एक तरह से भेदभाव का कारण बताते हुए यूनिफॉर्मिटी की तरफ बढ़ने की बात कह डाली.

इतना ही नहीं, प्रणब दा की उपस्थिति में ना सिर्फ अपना भगवा ध्वज फहराया, बल्कि शाखा की लाठी और मार्शल आर्ट की कला और ताकत का प्रदर्शन कर यह भी जता दिया कि अपने विचार का भारत बनाने में उन्हें इस ताकत का उपयोग करने में कोई गुरेज नहीं है, या ऐसा कहें तो बेहतर होगा कि वो इसे संघ के प्रशिक्षण का जरूरी हिस्सा मानते हैं.

अगर वाकई में संघ ने प्रणब दा को एक अलग विचार समझने और एक संवाद की प्रक्रिया शुरू करने के लिए बुलाया था और यह एक अच्छी शुरुआत है, जैसा मीडिया का एक समूह और संघ यह दिखाने की झूठी कोशिश कर रहा था, तो इस विषय में उनके साथ, कम से कम बंद कमरे में सही, एक वार्ता तो करना था कि किस तरह से संघ को अपनी भूमिका पर दोबारा विचार की जरूरत है लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ. कम से कम ऐसे मीडिया में तो कोई खबर नहीं है.

अपने भाषण में भी प्रणब दा उन्हें सीधे-सीधे नहीं कह पाए कि संघ के इन विचारों की कट्टरता ने गांधी हत्या को अंजाम दिया था और आज भी वही हो रहा है, जिसमें संघ की भूमिका है. यह छोडिए, वो यह तक नहीं कह पाए कि संघ देश के संविधान को मानने की शपथ अपने स्वयंसेवक को दे.

खैर, संघ का काम हो गया- आगंतुक रजिस्टर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे प्रणब ने यह लिख दिया- हेडगेवार भारत के महान सपूत थे और उनके सामने भगवा ध्वज को नाजी सलामी देने के साथ-साथ शाखा की सारी शक्ति प्रदर्शन की ड्रिल हुई.

और फिर बाकी काम अन्य समूहों ने शुरू कर दिया, जैसाकि उनकी अपनी लडकी और कांग्रेस की नेता शर्मिष्ठा ने आशंका जताई थी: भाषण लोग भूल जाएंगे, चित्र रह जाएंगे.

प्रणब दा को संघी काली टोपी में भगवा ध्वज को सलामी देते फर्जी फोटो आ गया. अब आप सारी बहस बाजू में छोड़कर लग जाइए उसकी सच्चाई बताने, जिसे आधी जनता सुनने को तैयार नहीं होगी.

अंत में इतना कहना चाहूंगा, मेरे विचार में यह नरेंद्र मोदी के लिए भी संघ का संदेश था- जो वो नहीं कर सकते, या आजतक नहीं कर सके, वो संघ ने कर दिखाया.

प्रणब दा जैसे कांग्रेस के खंबे को अपनी इमारत के साए में ला खड़ा कर दिया, उन्हें संघ की छाया में, भले ही कुछ देर के लिए लेकिन आना पड़ा. तो भाजपा अछूती हो सकती है, संघ नहीं. और बड़े रणनीतिकार अमित शाह नहीं मोहन भागवत हैं. क्योंकि उनके पास अपनी सोच के अनुसार वातावरण निर्माण करने वाला कट्टर और कर्मठ समूह है.

(लेखक समाजवादी जन परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं और मध्य प्रदेश के बैतूल शहर में रहते हैं.)

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