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नए वित्त मंत्री पीयूष गोयल ‘बैड बैंक’ की स्थापना क्यों चाह रहे हैं?

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा फरवरी 2018 में जारी एक सर्कुलर उसके और नरेंद्र मोदी सरकार के बीच तकरार की वजह बन गया है. जिसमें कहा गया है कि सभी बड़े कॉरपोरेट समूह, जो बैंकों से लिए गए ऋण की पुनअर्दायगी करने में नाकाम रहते हैं, उन्हें 1 अक्टूबर, 2018 से दिवालिया घोषित किए जाने की प्रक्रिया में शामिल होना पड़ेगा.

New Delhi: Union Minister for Railways, Coal and Finance Piyush Goyal addresses a press conference after the Cabinet meeting in New Delhi on Wednesday, June 13, 2018. (PTI Photo/Vijay Verma) (PTI6_13_2018_000147B)

केंद्रीय वित्त और रेल मंत्री पीयूष गोयल (फोटो: पीटीआई)

हाल ही में वित्त मंत्री बनाए गये पीयूष गोयल चाहते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक फरवरी, 2018 में जारी अपने एक सर्कुलर में नरमी लाए. नरेंद्र मोदी सरकार और भारत के केंद्रीय बैंक के बीच तकरार की वजह बन गए इस सर्कुलर में खासतौर पर यह कहा गया है कि सभी बड़े कॉरपोरेट समूह, जो बैंकों से लिए गए ऋण की पुनअर्दायगी करने में नाकाम रहते हैं, उन्हें 1 अक्टूबर, 2018 से दिवालिया घोषित किए जाने की प्रक्रिया में शामिल होना पड़ेगा.

स्पष्ट है कि इन कंपनियों को बैंकों के साथ पुनर्भुगतान संबंधी मसलों को सुलझाने के लिए 1 मार्च, 2018 से छह महीने का वक्त दिया गया है, जिसमें नाकाम रहने पर उनके संबंधित खातों को दिवालिया घोषित किए जाने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए बाध्य किया जा सकेगा.

इस सर्कुलर ने एक खास तबके को बेचैन कर दिया है, क्योंकि राजनीतिक रूप से शक्तिशाली कई कारोबारी समूहों के सामने, जो अभी तक दिवाला अदालतों (बैंकरप्सी कोर्टों) से बचते रहे हैं, इस अंजाम से बचने की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही. बड़े समूहों के लिए दिवाला प्रक्रिया में शामिल होने की संभावना भी न निगलने लायक गोली के समान है-इससे उनकी प्रतिष्ठा और बाजार में उनकी क्रेडिट रेंटिंग को नुकसान पहुंचता है.

इनमें से अडानी जैसे कुछ राजनीतिक तौर पर रसूखदार कॉरपोरेट घरानों ने सार्वजनिक तौर पर यह दावा किया है कि उनकी कंपनियों की माली सेहत काफी मजबूत है और उनके खातों में ऋणों की पुनअर्दायगी को लेकर किसी तरह का कोई दिक्कत नहीं है. जाहिर तौर पर आरबीआई का सर्कुलर ऐसे कई दावों की कलई खोल देता है.

एक खासतौर पर विवाद का बिंदु यह है कि कई बड़े कॉरपोरेट घरानों को करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये के न चुकाए गये बिजली क्षेत्र के ऋणों का समाधान करने के लिए बैंकरप्सी कोर्ट में जाना होगा. मोदी सरकार के लिए यह सबसे बड़ी चिंता है.

राजनीतिक तौर पर यह काफी महत्वपूर्ण है कि आरबीआई की तरफ से एक सख्त रुख अपनाया गया है, जिसने केंद्र को काफी असहज स्थिति में ला दिया है.

आरबीआई ने एक तरह से केंद्र की आत्मप्रशंसा को चुनौती देते हुए ऋण अदा न करने वाले डिफॉल्टरों के लिए बेहद सख्त प्रावधान लगा दिए हैं. स्थिति ऐसी है कि न तो प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री सार्वजनिक तौर पर रिजर्व बैंक के इस कदम को लेकर कोई शिकायत कर सकते हैं, क्योंकि उनकी सरकार की राजनीतिक जुमलेबाजी बड़े डिफॉल्टरों पर कठोर कार्रवाई करने की बात करती है, जो उसके मुताबिक ‘यूपीए शासनकाल की देन हैं.’

रिजर्व बैंक ने और कुछ नहीं, बस इस मजबूत राजनीतिक जुमले को जमीन पर वास्तविक कार्रवाई का रूप दे दिया है. ऐसा लगता है कि चुनाव से पहले के साल में एनडीए सरकार ने ऐसे कठोर झटके की उम्मीद नहीं की होगी.

इस हफ्ते केंद्रीय बैंक के प्रतिनिधियों के साथ बैठक में गोयल ने इस संभावना पर चर्चा की क्या एनपीए (गैर-निष्पादन परिसंपत्तियों) संबंधी दिशा-निर्देशों को नरम करने की कोई गुंजाइश है? ऐसी किसी नरमी का अर्थ डिफॉल्टिंग कंपनियों को अपने न चुकाए गए कर्जों का समाधान करने के लिए ज्यादा वक्त देना ही हो सकता है.

बंद कमरों में वित्त मंत्री ने काफी चालाकी से अपनी दलीलों को बिजली क्षेत्र में गंभीर नीतिगत समस्याओं के इर्द-गिर्द खड़ा किया जिनके कारण निजी क्षेत्र के बिजली कारखानों के प्रदर्शन पर नकारात्मक असर पड़ा होगा.

लेकिन जानकारी के मुताबिक रिजर्व बैंक अपने फैसले पर कायम रहा और इसने साफ कर दिया कि 12 फरवरी के सर्कुलर को सिर्फ बिजली क्षेत्र की कंपनियों को अपवाद स्वरूप रियायत देने के लिए कमजोर नहीं किया जा सकता. क्योंकि ऐसा करना, उन लोगों की तरफ से कानूनी दावों को जन्म दे सकता है, जो इसे अपने साथ भेदभाव किए जाने के तौर पर देखेंगे.

ऐसा मुमकिन है कि बिजली क्षेत्र के विशालकाय एनपीए और बैंकिंग प्रणाली की इससे निपटने में अक्षमता ने गोयल को एक बार फिर नए सिरे से ‘बैड बैंक’ की स्थापना करने के विचार के लिए प्रेरित किया हो, जिस पर चर्चा तो अक्सर होती है, मगर इसे कभी वास्तविकता के धरातल पर उतारा नहीं जा सका है.

इसका सबसे हालिया उदाहरण तब देखने को मिला था, जब अरुण जेटली ने भी इस विचार पर चर्चा की थी, लेकिन बाद में इसे किनारे रख दिया.

उद्योग जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर प्रस्तावित ‘बैड बैंक’ के विचार को जमीन पर उतारा जाता है, तो बिजली क्षेत्र की विशालकाय गैर-निष्पादन परिसंपत्तियों (एनपीए) का ही इसमें बोलबाला होगा.

अवधारणा की कसौटी पर बात करें, तो एक बैड बैंक, सरकारी पूंजी द्वारा समर्थित नेशनल असेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी की ही तरह है, जिसका इस्तेमाल बैंकिंग प्रणाली के एनपीए को अलग करने के लिए किया जाता है.

इसके बाद यह कंपनी पेशेवरों की मदद से इन परिसंपत्तियों का प्रबंधन करने या उन्हें बेचने की केशिश करती है. इस बोझ को बैड बैंक के सिर पर डालने के पीछे का विचार यह है कि इससे बाकी की बैंकिंग प्रणाली एनपीए के बोझ से मुक्त रहकर आसानी से काम कर सके.

तकनीकी तौर पर कहा जाए, तो एक बैड बैंक बिजली क्षेत्र के एनपीए की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार को थोड़ी जगह मुहैया कराएगा और वह इन पर अपने विवेक से फैसला कर सकेगी.

कंपनियों को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में जाने के लिए मजबूर किए जाने की सूरत में उसके पास कम विवेकाधिकार बचते हैं, क्योंकि यहां तय प्रक्रियाओं का पालन करना होता है.

यहां यह डर भी नजर आ रहा है कि एनसीएलटी में भेजे जाने के बाद हो सकता है कि इन कर्ज में डूबी बिजली उत्पादक कंपनियों का कोई खरीददार न मिले. जबकि दूसरी तरफ एक बैड बैंक, सीधे तौर पर कंपनियों से, उदाहरण के लिए मानें, एनटीपीसी या किसी नए निवेशक से समस्या का जल्दी समाधान करने के लिए सौदेबाजी कर सकता है. लेकिन, यह सब एनसीएलटी की तुलना में कम पारदर्शी होगा.

वास्तव में अगर बिजली क्षेत्र के एनपीए को आने वाले कुछ महीनों में किसी बैड बैंक को हस्तांतरित कर दिया जाता है, तो इन कंपनियों के प्रमोटरों को 1 अक्टूबर से बैंकरप्सी कोर्टों में जाने की जगह सिर्फ सरकार से बातचीत करने की जरूरत रह जाएगी.

मुसीबत में पड़ी बिजली कंपनियों के प्रमोटर इस समाधान को तरजीह दे सकते हैं-दिवाला प्रक्रिया काफी सार्वजनिक और शर्मिंदगी भरी होती है- लेकिन यह मोदी सरकार के लिए आसान नहीं होगा.

वित्त मंत्री को बिजली परियोजनाओं (जिनमें से ज्यादातर कार्यरत नहीं हैं) के भुगतान न किए जा रहे 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के बकाये की समस्या का समाधान खोजना होगा. और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ऐसा समाधान राजनीतिक विवादों से मुक्त होगा.

और ऐसा कोई विवाद इस तथ्य की रोशनी में और गहरा हो जाएगा कि इस परियोजना को गोयल आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्हें चुनाव से पहले के साल में भाजपा के अघोषित कोषाध्यक्ष के तौर पर देखा जाता है.

आखिर भारत के सियासी तौर पर रसूखदार कॉरपोरेट समूह ही बिजली क्षेत्र की इन समस्याग्रस्त परिसंपत्तियों के मालिक हैं और इनमें से कुछ मोदी सरकार के काफी करीबी माने जाते हैं.

यह गड़बड़झाला इस तथ्य के कारण और ज्यादा उलझ गया है बिजली क्षेत्र के उपकरणों के आयात में बड़े पैमाने पर की गयी ओवर-इनवॉयसिंग के आरोपों को लेकर इनमें से कुछ कॉरपोरेट समूहों की जांच गोयल के मंत्रालय द्वारा ही की जा रही है.

अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो मुमकिन है कि इन कंपनियों को ‘जानबूझकर कर्ज न चुकानेवालों’ की श्रेणी में रखा जा सकता है, जो ज्यादा कठोर सजा को निमंत्रण देगा.

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