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भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन के ख़िलाफ़ झारखंड बंद, सड़क पर उतरे लोग

झारखंड में भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन के ख़िलाफ़ आदिवासी संगठनों, विपक्षी दलों तथा जनता का गुस्सा फूट पड़ा है. आरोप है कि कॉरपोरेट घराने तथा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रदेश की भाजपा सरकार ने यह क़दम उठाया है.

झारखंड बंद के दौरान प्रदर्शन करते आदिवासी संगठन. (फोटो: नीरज सिन्हा/द वायर)

झारखंड बंद के दौरान प्रदर्शन करते आदिवासी संगठन. (फोटो: नीरज सिन्हा/द वायर)

रांची: ज़मीन की सुरक्षा के सवाल पर झारखंड एक बार फिर आंदोलन की आंच में तपने लगा है. गुस्सा भाजपा की रघुबर दास सरकार के ख़िलाफ़ है और गांव से लेकर शहर तक है.

कई आदिवासी संगठनों ने सोमवार को झारखंड बंद बुलाया है. जगह-जगह आदिवासी– मूलवासी राज्य सरकार सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर रहे हैं.

इस बीच राज्य में प्रमुख विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने सरकार के इस फैसले के ख़िलाफ़ आंदोलन की रणनीति तय करने के लिए साथी दलों की बैठक बुलाई है. झामुमो के साथ विरोधी दलों और जन संगठनों ने पांच जुलाई को राज्य में महाबंद का ऐलान कर दिया है. इससे पहले  28 जून को राजभवन के सामने महाधरना तथा 19 जून को सभी जिलों में सरकार का पुतला जलाया जाएगा.

तब भाजपा के नेता तथा मंत्री सरकार के फैसले पर सफाई दे रहे हैं कि भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन से किसी पूंजीपति, उद्योगपति या कॉरपोरेट घरानों को लाभ नहीं पहुंचाया जाना है. यह क़दम सिर्फ राज्यहित में होगा.

गौरतलब है कि पिछले साल 12 अगस्त को झारखंड विधानसभा में विपक्ष के भारी विरोध के बीच भूमि अर्जन पुनर्वासन एवं पुनस्थार्पना में उचित प्रतिकार पारदर्शिता का अधिकार, झारखंड संशोधन विधेयक पारित हुआ था.

इसमें सामाजिक प्रभाव के अध्ययन के प्रावधान को ख़त्म किया गया था. साथ ही स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, अस्पताल, पंचायत भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, रेल परियोजना, पाइपलाइन, जल मार्ग समेत अन्य कआ आधारभूत संरचना कार्य के लिए किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण में सामाजिक प्रभाव के सर्वे की बात नहीं की गई है.

विपक्षी दलों तथा जनसंगठनों को सरकार के इस रवैये पर विरोध है. दरअसल ब्रिटिश जमाने में बने इस कानून में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान साल 2013 में इसमें संशोधन कर जमीन अधिग्रहण के लिए जनता से रायशुमारी कराने का प्रस्ताव रखा गया.

इस बीच राज्य के भूमि सुधार राजस्व मंत्री अमर बाउरी ने मीडिया से कहा है कि सरकार ने संशोधन विधेयक में स्पष्ट किया है कि आधारभूत संरचना तथा परियोजनाओं पर तेज़ी से काम के लिए ज़मीन अधिग्रहण की बात है. इसका मक़सद जनहित में होगा न कि किसी व्यक्ति या कंपनी विशेष को लाभ पहुंचाया जाएगा.

दरअसल हाल ही में मीडिया में भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को मंज़ूरी मिलने से संबंधित ख़बर आने के बाद से विभिन्न दलों-संगठनों में विरोध शुरू हो गया था.

इस बीच विरोध की आवाज तेज़ होने के बाद रविवार को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन आदिवासी, मूलवासी, जनता के अधिकारों की रक्षा करेगा.

उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष जनता को गुमराह करने में जुटा है, जबकि क़ानून में संशोधन से परियोजनाओं के काम में तेज़ी आएगी.

भाजपा सरकार का क़दम आदिवासियों के लिए डेथ वारंट है

पूर्व सांसद तथा आदिवासी सेंगेल अभियान और झारखंड दिशोम पार्टी के अध्यक्ष सालखन मुर्मू ने सरकार की इस कोशिश को झारखंड के आदिवासी-मूलवासी समाज के लिए डेथ वारंट क़रार दिया है. सोमवार को उनकी पार्टी के लोग झारखंड बंद कराने सड़कों पर उतरे हैं.

इधर आदिवासी पीपुल्स फ्रंट, आदिवासी जन परिषद, केंद्रीय सरना समिति, आदिवासी संघर्ष मोर्चा सरीखे संगठनों ने बंद का समर्थन करते हुए अलग से आंदोलन छेड़ दिया है.

आदिवासी संघर्ष मोर्चा के मुख्य संयोजक डॉ. करमा उरांव ने सरकार के इस रुख़ के ख़िलाफ़ ट्राइबल एडवाइज़री कांउसिल के सदस्यों से तत्काल इस्तीफा देने को कहा है.

उनका कहना है कि काउंसिल में शामिल आदिवासी विधायकों ने आदिवासियों-मूलवासियों के मौलिक हितों ज़मीन और जीवन की सुरक्षा के साथ धोखा किया है.

जबकि रविवार की शाम राजधानी रांची में आदिवासी जन परिषद ने विरोध मार्च निकाला, सड़क पर सरकार का पुतला फूंका.

परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रेमशाही मुंडा कहते हैं, ‘बीजेपी सरकार आदिवासियों-मूलवासियों की कृषि योग्य ज़मीन को समाप्त करने पर आमदा है. इसके विरोध में गांव- गांव में बैठक चल रही है.

केंद्रीय सरना समिति के अजय तिर्की का कहना है कि बीजेपी की सरकार ग्रामसभाओं की ताक़त को ख़त्म करना चाहती है.

जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता तथा आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की संयोजक दयामनी बारला कहती हैं कि दो साल पहले छोटानागपुर काश्तकारी तथा संताल परगना काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी- एसपीटी एक्ट) में सरकार ने संशोधन की कोशिश की थी. ब्रिटिश काल में बने ये दोनों क़ानून आदिवासियों की ज़मीन की सुरक्षा को लेकर कवच माना जाता रहा है.

दयामनी कहती हैं कि ग़ौर कीजिए सरकार की नीति और सोच पर. चौतरफा विरोध के बाद सरकार को छोटानागपुर-संताल परगना काश्तकारी अधिनियम में संशोधन की कोशिश से वापस होना पड़ा, लेकिन इसके बाद उसने (सरकार) दूसरा रास्ता तय किया, जो सीएनटी- एसपीटी एक्ट की सख़्तियों को बिल्कुल कमज़ोर करने जैसा है.

इस बीच विस्थापन विरोधी आंदोलन कोल्हान प्रमंडल के कुमार चंद्र मार्डी ने क़ानून को लेकर सरकार की नीति और नीयत पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आदिवासी की ज़मीन पर ख़तरे की यह घंटी है. सच पूछिए तो किसानों की ज़मीन लूट का सीधा रास्ता प्रशस्त किया जा रहा है.

उठते सवाल

इस बीच सरकार के समर्थन में उतरे बीजेपी नेताओं के पक्ष पर तंज़ कसते हुए आदिवासी सरना प्रार्थना समाज के लक्ष्मी नायारण मुंडा ने कहा है कि सरकार और बीजेपी के नेताओं को यह भी बताना चाहिए कि रांची ज़िले के तमाड़ के परासी, चाईबासा के मनोहरपुर, गोड्डा के मोतिया गांव में ज़मीन अधिग्रहण कर बड़ी कंपनियों को देने की तैयारी का किसान-जनता क्यों विरोध कर रहे हैं. सरकार को यह भी बताना चाहिए कि आदिवासी हितों से जुड़ी कितनी योजनाएं ज़मीन के अभाव में लंबित पड़ी हैं.

मुंडा कहते हैं कि जल, जंगल, ज़मीन पर ग्रामसभा की शक्तियों को सरकार समूल नष्ट करने में जुटी है. इसलिए आदिवासी बड़े दायरे की गोलबंदी में लगे हैं.

इधर, झारखंड मुक्ति मोर्चा विधायक दल के नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सरकार से इस मसले पर 24 घंटे में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है. उन्होंने कहा है कि सीएनटी- एसपीटी एक्ट में संशोधन को लेकर जिस तरह से सड़क से लेकर सदन तक विरोध किया गया, उसे अब नए तेवर के साथ आगे बढ़ाया जाएगा.

हेमंत का कहना है कि इसी मुद्दे पर झामुमो नेताओं का एक दल राष्ट्रपति से मिलकर विरोध जता चुका है. अब सरकार इस संशोधन विधेयक को वापस नहीं लेती है, तो विरोध का सामना करने के लिए तैयार रहे.

इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि वे सरकार में आए तो कैबिनेट की पहली बैठक में इस संशोधन को निरस्त करेंगे. इन दलों के अलावा कांग्रेस, राजद, और वामदल आदि सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए साझा आंदोलन की तैयारी में जुटे हैं.

चुनावों पर असर

इस मामले में दिलचस्प यह कि बीजेपी का घटक दल और सरकार में शामिल आजसू पार्टी ने भी फैसले का विरोध किया है. पूर्व मंत्री तथा आजसू पार्टी के महासचिव उमाकांत रजक ने कहा है कि बीजेपी सरकार की नीति से झारखंडी भावना आहत है तथा किसानों-जनता की ज़मीन पर ख़तरे बढ़े हैं.

गौरतलब है कि आजसू पार्टी की टीस समय-समय पर उभरती रही है कि बीजेपी सरकार की नीतियों का ख़ामियाजा सरकार का घटक दल होने के नाते उसे भी भुगतना पड़ा है.

पिछले महीने राज्य की दो विधानसभा उपचुनावों में भी विपक्ष ने ज़मीन से जुड़े मामले को प्रमुख तौर पर उछाला था.

गोमिया तथा सिल्ली सीट पर हुए उपचुनावों में झारखंड मुक्ति मोर्चा की जीत हुई थी. जबकि गोमिया में बीजेपी, आजसू और सिल्ली में आजसू के उम्मीदवार हार गए थे.

अगले चुनावों में भी बीजेपी के विरोधी इसे प्रमुख मुद्दा बनाएंगे इससे इनकार नहीं किया जा सकता. हाल ही में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तथा बीजेपी के वरिष्ठ नेता अर्जुन मुंडा ने भी एक अखबार को दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि ज़मीन के मसले पर आदिवासियों में असंतोष है. इसे सरकार को समझना चाहिए. राजनीतिक-सामाजिक हलके में मुंडा के इस बोल के मायने निकाले जा रहे हैं.

हालात और बदली परिस्थितियों पर गौर करें तो पिछले तीन सालों से झारखंड में ज़मीन की सुरक्षा का मसला आंदोलन और राजनीति के केंद्र में रहा है, जबकि विस्थापन के सवाल पर अलग-अलग जगहों पर आंदोलन करते लोगों पर पुलिस की फायरिंग में कम से कम सात लोगों की जान गई है.

आदिवासी बहुल खूंटी ज़िले में ज़मीन के सवाल पर वैसे भी आदिवासी समुदाय लगातार सरकार का विरोध कर रहे हैं.

झारखंड में लगभग डेढ़ लाख परिवार विस्थापन का दर्द सालों से सह रहे हैं तथा पुनर्वास- रोज़गार की आस में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं.

जबकि केंद्र और राज्य की सरकारों ने झारखंड में कई बड़ी परियोजनाओं पर काम शुरू करने का फैसला लिया है. पूंजीनिवेश के लिए बड़े पैमाने पर बड़ीं कपनियों के साथ क़रार भी किया गया है.

लिहाज़ा झारखंड के किसानों और जनता को इसका डर है कि उनकी खेती की ज़मीन अधिग्रहित कर ली जाएगी. वैसे भी सरकार के भूमि बैंक को लेकर आदिवासी पहले से विरोध जताते रहे हैं.

आदिवासी विषयों के जानकार तथा ट्राइबल एडवाइज़री काउंसिल के सदस्य रतन तिर्की कहते हैं कि झारखंडी जनमानस ज़मीन संबंधी मुद्दे अगर गंभीर है, तो यह अच्छा संकेत है क्योंकि पहले ही कल-कारखाने तथा सिंचाई परियोजनाओं को लेकर यहां बड़े पैमाने पर लोगों ने दर्द सहे हैं. आदिवासी इलाकों में परंपरागत व्यवस्थाएं हैं. तब आदिवासियों-मूलवासिय़ों को ये लगता है कि उनकी परपंरागत व्यवस्था संकट में है.

तिर्की का कहना है कि जमीन अधिग्रहण में सोशल इंपैक्ट असेसमेंट और इन्वायरमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट का अनुपालन बेहद ज़रूरी है तथा पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में ग्रामसभाओं की भूमिका भी अहम है. और जब इन बातों को भूमि अधिग्रहण कानून से हटाया जाएगा तो असंतोष बढ़ना ज़ाहिर है.

इस बीच विस्थापन की लड़ाई लड़ रहे जन संघर्ष समिति के जरोम जेराल्ड कुजुर का मानना है कि सरकार लोगों को विश्वास में लिए बिना और ज़मीनी हक़ीक़त को समझे बिना इस तरह का क़दम उठाने पर तुली है. तब जगह-जगह विरोध और गुस्सा देखा जा सकता है. सरकार को यह समझना होगा कि झारखंडी भावना बड़ी परियोजनाओं के एकदम ख़िलाफ़ है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और झारखंड में रहते हैं.)

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