राजनीति

मैंने भाजपा से इस्तीफ़ा दिया क्योंकि…

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव की टीम का हिस्सा रहे शिवम शंकर सिंह कहते हैं, ‘मैं 2013 से भाजपा का समर्थक था क्योंकि नरेंद्र मोदी देश के लिए उम्मीद की किरण की तरह लगते थे और मुझे उनके विकास के नारे पर विश्वास था. अब वो नारा और उम्मीद दोनों जा चुके हैं.’

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भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव के साथ शिवम शंकर सिंह. (फोटो साभार: फेसबुक)

मेरे जीवन काल के हिसाब से कहूं तो देश में इस समय राजनीतिक विचार-विमर्श अपने सबसे निचले स्तर पर है. ऐसा भेदभाव है कि आप यकीन नहीं कर पाएंगे. लोग अपने पक्ष को समर्थन देते रहेंगे भले ही उन्हें कितने ही प्रमाण दे दीजिये.

जब यह प्रमाणित भी हो जाए कि वे फेक न्यूज फैला रहे हैं, तब भी किसी तरह का पछतावा देखने को नहीं मिलता. यह एक ऐसा पहलू है जिसके लिए सभी-राजनीतिक दल, वोटर्स, समर्थक सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने बेहद असरकारक प्रोपेगेंडा के साथ कुछ विशेष तरह के संदेश फैलाने का काम बखूबी किया है और यही वह वजह है जिसके चलते मैं पार्टी का समर्थन नहीं कर सकता. लेकिन हम इस बारे में बात शुरू करें उससे पहले मैं सबको यह बताना चाहता हूं कि कोई भी पार्टी सिर्फ बुरी या सिर्फ अच्छी नहीं होती. हर सरकार कुछ न कुछ अच्छा करती है, तो कहीं गलतियां भी होती हैं. यह सरकार भी इससे अलग नहीं है.

अच्छाइयां

  •  सड़क निर्माण पहले की अपेक्षा तेजी से हुआ है. हालांकि सड़कों की लंबाई मापने के तरीके में थोड़े बदलाव हुए हैं, लेकिन बावजूद इसके सड़क निर्माण में तेजी देखी गई है.
  •  बिजली के कनेक्शन बढ़े हैं- सभी गांवों तक बिजली पहुंची है और लोगों को अब अधिक समय के लिए बिजली मिल रही है. (कांग्रेस ने भी 5 लाख से ज्यादा गांवों तक बिजली पहुंचाई थी और मोदी ने लगभग 18 हजार गांवों तक बिजली पहुंचाई है. इसे आप जिस तरह देखना चाहें, देख सकते हैं. ऐसे ही आजादी के बाद से लोगों को जितने घंटे बिजली मिलती थी, उसमें वृद्धि तो हुई है, लेकिन हम देखें तो भाजपा के शासनकाल के दौरान ज्यादा बढ़त देखने को मिलती है.)
  •  उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार घटा है- मंत्रालयी स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया है (ऐसा यूपीए-1 के समय में भी हुआ था) लेकिन निचले स्तर पर स्थिति वैसी ही है और मामले बढ़े ही हैं. थानेदार, पटवारी आदि पर किसी का नियंत्रण ही नहीं है.
  •  स्वच्छ भारत मिशन निश्चित रूप से कामयाब हुआ है- पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा शौचालयों का निर्माण हुआ है, लोगों के मन में स्वच्छता को लेकर जागरूकता आई है.
  •  उज्ज्वला योजना एक अच्छा प्रयास है, हालांकि ये देखना बाकी है कि कितने लोगों ने दूसरा सिलिंडर खरीदा. पहला सिलिंडर और चूल्हा मुफ्त दिया गया था, लेकिन अब इसका दाम देना होगा. सिलिंडर की कीमत सरकार बदलने के बाद से दोगुनी हो गई है, अब एक सिलिंडर 800 रुपये से ज्यादा का मिल रहा है.
  •  उत्तर-पूर्व से कनेक्टिविटी बढ़ी है. रेल, सड़क, हवाई सभी माध्यमों में बढ़ोतरी हुई है. और सबसे महत्वपूर्ण है कि अब मुख्यधारा के समाचार चैनलों पर इस क्षेत्र की बात होती है.
  •  कानून और व्यवस्था की स्थिति क्षेत्रीय दलों के शासन से बेहतर हुई है.

इस सूची में आप, जिसे इस सरकार की उपलब्धि मानते हैं, उसे नीचे कमेंट में लिखाकर जोड़ सकते हैं. वैसे उपलब्धियां हमेशा विरोधाभासी होती है और असफलताएं वास्तविक होती हैं.

बुराइयां

किसी देश और व्यवस्था को बनने में दशक लगते हैं और मुझे लगता है कि भाजपा की सबसे बड़ी विफलता यही रही कि उसने कई बहुत अच्छी बातों बेहद हल्के और कमजोर आधार पर खत्म कर दिया.

  • चुनावी बॉन्ड- यह मूल रूप से भ्रष्टाचार को वैध बनाता है और कॉरपोरेट और विदेशी ताकतों को हमारे राजनीतिक दलों को खरीदने की गुंजाइश पैदा करता है. ये बॉन्ड अनाम हैं, यानी मान लीजिये कोई कॉरपोरेट या मैं ही कहूं कि फलां पॉलिसी लाइए, मैं 1000 करोड़ रुपये का चुनावी बॉन्ड दूंगा, तो इसके लिए कोई सजा नहीं है. यहां किसी अनाम माध्यम पर सवाल उठाने का कोई रास्ता ही नहीं है. इससे यह भी साफ होता है कि मंत्रालय स्तर पर भ्रष्टाचार क्यों घटा है- अब यहां किसी फाइल या आदेश के बारे में सौदा नहीं होता, यह अमेरिका की तरह है- सीधे नीति बनाने के स्तर पर बात हो रही है.
  • योजना आयोग रिपोर्ट- यह डेटा का सबसे बड़ा स्रोत हुआ करती थीं. वे सरकारी योजनाओं को ऑडिट करते थे और बताते थे कि कहां क्या चल रहा है. इसके जाने से आपके पास कोई विकल्प नहीं बचा है सिवाय इसके कि सरकार जो भी डेटा आपको दे, आप उस पर विश्वास करें. (कैग ऑडिट काफी समय बाद आते हैं.) नीति आयोग में ऐसा कुछ नहीं होता. यह मूल रूप से एक थिंक टैंक और पीआर एजेंसी की तरह काम करता है. योजना बनाने या न बनाने का नियम बिना योजना आयोग को भंग किए हुए भी बनाया जा सकता था.
  • सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग: जहां तक मैंने देखा है इन संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों से किया जाता रहा है, लेकिन अगर ऐसा नहीं भी है, तब भी ये डर कि अगर मोदी/शाह के खिलाफ कुछ बोलना सीबीआई और ईडी को अपने पीछे बुलाने की दावत देने जैसा है, सच है. यह किसी भी प्रतिरोध को कुचलने के लिए काफी है- प्रतिरोध, जो लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है.
  • नोटबंदी- यह नाकामयाब रही, लेकिन इससे भी बुरा भाजपा का यह स्वीकार न करना रहा कि यह कदम विफल हुआ है. इसके चलते टेरर फंडिंग घटने, कैश का कम उपयोग होने, भ्रष्टाचार खत्म होने जैसा प्रचार बेतुका था. इससे कितने ही कारोबार खत्म हो गए.
  • जीएसटी का अमल- यह बहुत जल्दी में लागू की गई और इससे कारोबार को नुकसान हुआ. इसके जटिल स्वरूप, विभिन्न वस्तुओं पर अलग-अलग दरें, फाइलिंग की कठिन प्रक्रिया… उम्मीद है कि वक्त के साथ ये ठीक हो जाएंगी, लेकिन इससे नुकसान तो हुआ है. भाजपा का इस विफलता को न मानना केवल उनका दंभ दिखाता है.
  • गड़बड़ विदेश नीति लेकिन दिखावा पूरा- चीन का श्रीलंका में बंदरगाह है, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी उसकी दिलचस्पी है- भारत इससे घिरा हुआ है, मालदीव की विफलता (भारत की असफल विदेश नीति के चलते वहां अब भारतीय मजदूरों को वीजा नहीं मिल रहा है) और इन सबके बीच मोदी जी विदेशी दौरों पर हैं और कहते रहते हैं कि 2014 से पहले दुनिया में भारतीयों की कोई इज्जत नहीं थी और अब उनका बेहद सम्मान हो रहा है. (ये बकवास है. भारतीयों को विदेशों में मिल रही इज्जत बढ़ती अर्थव्यवस्था और आईटी सेक्टर का परिणाम है. ये मोदी की वजह से तो बिल्कुल भी नहीं बढ़ी है. हालांकि बीफ के चलते हुई लिंचिंग, पत्रकारों को मिल रही धमकियों आदि के चलते कम जरूर हुई हो सकती है.)
  • असफल हुई योजनाएं/असफलता न स्वीकारना/सुधार न करना- सांसद आदर्श ग्राम योजना, मेक इन इंडिया, कौशल विकास, फसल बीमा (भरपाई के आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने केवल बीमा कंपनियों की जेबें भरी हैं).बेरोजगारी और कृषि संकट से न निपट पाना- हर असल समस्या को विपक्ष का स्टंट बताना.
  • पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम- कांग्रेस के कार्यकाल में मोदी और भाजपा के सभी मंत्री एक सुर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों के लिए सरकार की आलोचना करते नजर आते थे, लेकिन अब जब वे खुद सत्ता में हैं तब वे इन बढ़ती कीमतों को न्यायसंगत ठहरा रहे हैं, वो भी तब जब क्रूड ऑइल का दाम कांग्रेस सरकार की तुलना में कम है. यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है.
  • महत्वपूर्ण मूल मुद्दों की अनदेखी- शिक्षा और स्वास्थ्य. शिक्षा के क्षेत्र में कुछ भी नहीं हुआ है, जो इस देश की विफलता है. एएसईआर की रिपोर्ट के मुताबिक देश में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता गिर रही है और इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बीते 4 सालों में कोई खास काम नहीं हुआ है, उस समय आयुष्मान भारत की घोषणा हुई थी- ऐसी योजना जो मुझे ‘कुछ नहीं हुआ के डर’ से ज्यादा डरावनी लगती है. बीमा योजनाओं का बुरा हाल है और हम बिल्कुल अमेरिका के रस्ते पर हैं, जो हेल्थकेयर के लिए बदनाम है. (माइकल मूर की सिको देखें)

आप अपनी समझ के आधार पर इसमें से कुछ जोड़-घटा सकते हैं, लेकिन मेरी समझ ये कहती है. चुनावी बॉन्ड का मुद्दा बेहद गंभीर है और मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इसे खारिज कर देगा. हालांकि हर सरकार की कुछ नाकामयाबियां होती हैं, कुछ गलत फैसले होते हैं, लेकिन मेरे लिए किसी भी बात से बड़ा मुद्दा नैतिकता का है.

यह भी पढ़ें: मोदी द्वारा ज़ोर-शोर से शुरू की गईं विभिन्न योजनाओं की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है?

खौफनाक चेहरा

इस सरकार की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसने राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली बहसों और विमर्श को एक सुनियोजित रणनीति के तहत बर्बाद किया है. यह विफलता नहीं है- यह सोची-समझी योजना है.

  •  इसने मीडिया की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है, इसलिए पत्रकारों द्वारा की जा रही किसी भी आलोचना को यह कहकर खारिज कर दिया जाता है कि उसे भाजपा से पैसा नहीं मिला या वो कांग्रेस की नौकरी पर है. मैं कई ऐसे पत्रकारों को जानता हूं, जिनके बारे में ये आरोप बिल्कुल गलत हैं, लेकिन यहां किसी आरोप या शिकायत पर गौर नहीं किया जाता- जिस व्यक्ति ने मुद्दा उठाया उसको निशाना बना दिया जाता है और मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है.
  • इस बात को जनता के मन में बिठा दिया गया कि 70 साल में कुछ नहीं हुआ. ये स्पष्ट तौर पर झूठ है और इससे तैयार हुई मानसिकता देश के लिए ही नुकसानदायक होगी. इस सरकार ने टैक्सपेयर का 4,000 करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च किया है और अब यह ट्रेंड बन जाएगा. काम कम, प्रचार ज्यादा. मोदी पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिसने सड़कें बनवाई हैं- कुछ सबसे अच्छी सडकें जिन पर मैंने सफर किया है, वो मायावती या अखिलेश यादव ने बनवाई थीं. भारत में आईटी क्षेत्र 1990 के दशक से ही विकसित होने लगा था. आज के हालात के आधार पर अतीत में किए गए कामों को मापना और पुराने नेताओं को कमतर साबित करना आसान है. मसलन, कोई पूछेगा, ‘क्यों कांग्रेस 70 सालों में शौचालय नहीं बना पाई? इतना भी नहीं कर सके वो.’ ये बात तर्कसंगत लगती है और मैं भी तब तक इस पर यकीन करता था, जब तक मैंने भारत का इतिहास पढ़ना शुरू नहीं किया था. 1947 में जब आजादी मिली, तब हम बेहद गरीब देश थे. हमारे पास देश का आधारभूत ढांचा तैयार करने के लिए न संसाधन थे, न पैसा. इसी समस्या से निपटने के लिए नेहरू ने समाजवाद का रास्ता चुना और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) शुरू किए. हमारे पास स्टील बनाने की क्षमता ही नहीं थी, इसलिए रूस की मदद से रांची में हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन स्थापित किया गया, जिससे भारत में स्टील बनाने की मशीनें बनना शुरू हुईं. यानी बिना इसके हमारे पास स्टील नहीं होता, यानी कोई आधारभूत ढांचा नहीं. यानी एजेंडा यह था कि आधारभूत उद्योग और इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाये. उस समय लगातार अकाल पड़ते थे, साल दो साल में ऐसा होता कि बड़ी संख्या में लोग भूखों मर जाते. उस समय प्राथमिकता लोगों के लिए भोजन उपलब्ध कराना था, शौचालय किसी लक्जरी की तरह था, जिसकी किसी को परवाह नहीं थी. इसके बाद हरित क्रांति हुई और 1990 के दशक तक अन्न की कमी लगभग खत्म ही हो गयी- अब तो हालत यह है कि इसकी अधिकता से समस्या खड़ी है. तो शौचालय वाली बात इस तरह है कि आज से 25 साल बाद आप कहें कि मोदी देश के सब घरों में एयरकंडीशनर क्यों नहीं लगवा सकते थे. आज की तारीख में यह लक्जरी लगता है, ठीक ऐसे ही उस समय शौचालय लक्जरी थे. हो सकता है कि ऐसा करीब 10-12 साल पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन यह कहना कि 70 साल में कुछ नहीं हुआ, सरासर झूठ है.
  • फेक न्यूज का प्रचार और इस पर भरोसा- यहां भाजपा विरोधी फेक न्यूज भी शामिल है, लेकिन भाजपा के पक्ष और विपक्ष के विरोध में चल रही फर्जी खबरें इसके अनुपात में कहीं ज्यादा है और इसकी पहुंच भी अधिक है. इसमें से कुछ समर्थकों द्वारा चलाई जाती हैं, लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा पार्टी के अंदर से ही आ रहा है. यह कभी-कभी द्वेषपूर्ण होती हैं, तो कभी ध्रुवीकरण करने वाली, जो इसे और खराब बना देता है. हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि सरकार द्वारा समर्थित ऑनलाइन न्यूज पोर्टल समाज को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं.
  • हिंदू खतरे में है- उन्होंने लोगों के दिमाग में यह बात बैठा दी है कि हिंदुओं और हिंदू धर्म को खतरा है और खुद को बचाने के लिए केवल मोदी ही एकमात्र विकल्प है. सच्चाई यह है कि इस सरकार के आ जाने से हिंदुओं के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है, सिवाय इसके कि लोगों की मानसिकता बदल गई है. क्या हम हिंदू 2007 में खतरे में थे? कम से कम मैं तो तब रोज इस बारे में नहीं सुनता था और तबसे अब तक हिंदुओं की स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आया है, बस डर फैलाना और नफरत बढ़ गये हैं.
  • सरकार के खिलाफ बोला और आप देशद्रोही हैं और हाल ही में शुरू हुए नए प्रोपेगेंडा के हिसाब से एंटी-हिंदू यानी हिंदू विरोधी भी. इस तरह के नामकरणों और लेबल देने से सरकार की वैध आलोचना भी बंद हो जाती है. अपना देशप्रेम साबित करना है, हर जगह वंदेमातरम गाइए (भले ही भाजपा के नेता खुद इसके बोल न जानते हों, लेकिन वो आपको ये गाने के लिए मजबूर करेंगे). मुझे अपने राष्ट्रवादी होने पर गर्व है और मेरा राष्ट्रवाद मुझे किसी के कहने पर अपने को देशभक्त साबित करने की इजाजत नहीं देता. जब भी मौका होगा, या मेरा मन होगा मैं गर्व से अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत गाऊंगा लेकिन मैं किसी की मर्जी के मुताबिक इसे नहीं गाऊंगा.
  •  भाजपा नेताओं द्वारा चलाये जा रहे समाचार चैनलों का एकमात्र काम हिंदू-मुस्लिम, नेशनल-एंटी-नेशनल, भारत-पाकिस्तान पर बहस करते हुए जरूरी मुद्दों पर तर्कपूर्ण विमर्श को दरकिनार कर ध्रुवीकरण करना है. आप सभी उन्हें जानते हैं कि ये कौन हैं और किस बहसबाज को जहरीला प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए इनाम मिल रहा है.
  • ध्रुवीकरण- विकास गायब हो चुका है. अगले चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति ध्रुवीकरण और छद्म-राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना है. मोदी जी खुद अपने भाषणों में ये कह चुके हैं- जिन्ना, नेहरू, भगत सिंह से जेल में नहीं मिले थे कांग्रेस नेता (ये फर्जी खबर थी, जो प्रधानमंत्री खुद फैला रहे थे), मोदी को गुजरात में हराने के लिए कांग्रेस नेता पाकिस्तानी नेताओं से मिले थे, योगी जी का भाषण जहां उन्होंने महाराणा प्रताप को अकबर से ज्यादा महान बताया, जेएनयू के विद्यार्थी एंटी-नेशनल हैं जो भारत को #टुकड़ेटुकड़ेचूरचूर कर देंगे- ये सारा प्रोपेगेंडा एक विशेष उद्देश्य से बनाया जा रहा है, बांटो और चुनाव जीतो. यह ऐसी बातें नहीं हैं जो मैं अपने नेता से सुनना चाहता हूं और मैं ऐसे किसी नेता का समर्थन नहीं करता जो राजनीतिक फायदे के लिए देश को दंगों की आग में जलने दे.

ये महज कुछ उदाहरण हैं कि कैसे भाजपा राष्ट्रीय विमर्श को किनारे कर रही है. यह वो नहीं है जिसके लिए मैं यहां आया था, वह तो बिल्कुल नहीं, जिसका मैं समर्थन करता हूं. इसलिए मैं भाजपा से इस्तीफा दे रहा हूं.

पुनश्च: मैं 2013 से भाजपा का समर्थन करता था क्योंकि नरेंद्र मोदी देश के लिए उम्मीद की किरण की तरह लगते थे और मुझे उनके विकास के नारे पर विश्वास था. अब वो नारा और उम्मीद दोनों जा चुके हैं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नकारात्मकता अब मेरी सकारात्मकता से ज्यादा हो गई है, लेकिन यह फैसला हर वोटर को खुद करना चाहिए. यह जान लीजिए कि इतिहास और सच्चाई जटिल हैं. साधारण से प्रोपेगेंडा पर यकीन कर लेना और बिना कोई सवाल किए भरोसा करते जाना बेहद गलत है- यह इस देश और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

चुनाव आ रहे हैं और आप सभी को फैसला करना है. उसके लिए शुभकामनाएं. मैं सिर्फ यही उम्मीद करता हूं कि हम सभी साथ में सौहार्दपूर्ण तरह से रहेंगे और काम करेंगे- और इस देश को बेहतर, ताकतवर, गरीबी मुक्त और विकसित भारत बनाने में अपना योगदान देंगे. हमेशा याद रखिए, दोनों ही ओर अच्छे लोग है, एक वोटर को उनका साथ देना होता है और उन्हें एकदूसरे का, भले ही वे अलग-अलग राजनीतिक दलों का हिस्सा ही क्यों न हों.

(शिवम शंकर सिंह ने कई पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के चुनावी अभियान में काम किया है. वह भाजपा के वरिष्ठ नेता राम माधव की टीम का हिस्सा रहे हैं.)

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