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रामकथा: जगबीती बन चली एक आपबीती

रामकथा का रिश्ता लोकमानस से है, उसके सुख-दुःख, आस-निरास से है ऐसे में ‘रामकथा क्या है’ जैसे प्रश्न का उत्तर किताबों से ज्यादा लोक व्यवहारों में खोजा जाना चाहिए.

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प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई

रामकथा क्या है? शुरुआत इस बुनियादी सवाल से करें. उत्तर के लिए उन रामकथाओं को पढ़ने की ज़रूरत नहीं जिनकी संख्या गिनाते समय- ‘रामायण शतकोटि अपारा’ या फिर ‘हरि अनंत हरिकथा अनंता’ जैसी समझावनों का सहारा लिया जाता है.

रामकथा का रिश्ता लोकमानस से है, उसके सुख-दुःख, आस-निरास से है तो ‘रामकथा क्या है’ जैसे प्रश्न का उत्तर किताबों से ज्यादा लोक व्यवहारों में खोजा जाना चाहिए.

ज़्यादा दिन नहीं हुए इस देश में लोग एक-दूसरे का अभिवादन, ‘प्रणाम’ और ‘नमस्कार’ की जगह ‘राम-रामजी’ या ‘जै रामजी की’ कहकर किया करते थे. एक-दूसरे से भेंट-मुलाकात होने पर कुशल-क्षेम के नाम पर दो जन अपनी-अपनी ‘रामकहानी’ सुनाने में जुट जाते थे.

अभिवादन में जै रामजी और कुशल-क्षेम के रूप में अपनी-अपनी रामकहानी कहने के इन दो व्यवहारों से एक अर्थ झांकता है. एक तो यह कि राम स्मरणीय हैं, इस हद तक कि दो जन आपस में मिलें तो मुलाकात की शुरुआत रामनाम के उच्चारण से हो.

दूसरा अर्थ है, राम की कोई कहानी है- ऐसी कहानी जिससे व्यक्ति की आपबीती का कोई रिश्ता है. ऐसा रिश्ता कि राम की कहानी कहने का मतलब किसी से अपनी आपबीती कहना हो जाता है.

अपनी आपबीती को कुछ इस अंदाज़ में कहना कि क्या जैसे राम या फिर रामकथा से जुड़े किसी अन्य पात्र ने सहा वैसा मैं भी सह रहा हूं और यह तौलते हुए कहना कि क्या जैसे राम या उस कथा के किसी और पात्र ने रिश्ते को निभाया उसी तरह मैं भी निभा रहा हूं? रामकथा में आपबीती होने की क्षमता है, वह इसी क्षमता के कारण लोककथा बनती और बन सकती है.

ऐसा क्या है रामकथा में जो उसे आपबीती बनाकर लोककथा बनने की क्षमता देता है? यह प्रश्न यों भी पूछा जा सकता है- राम की आपबीती में ऐसा क्या है कि वह जगबीती बन जाती है?

एक बार फिर से लोक व्यवहारों का सहारा लें तो इस प्रश्न का सहज ही उत्तर मिल जाएगा. भोजपुरी-भाषी इलाकों में कोई भोजन बनाने चले या भोजन करने बैठे तो अक्सर कुछ ना-नुकुर या कुछ कहा-सुनी हो ही जाती है.

ऐसे समय में कोई माता सरीखी महिला अब भी सीख के तौर पर दोहरा देती है-

राम बनके जेवनार
सीता बनके रसोई

यानी भोजन करना तभी सार्थक होता है जब राम-भाव से किया जाए, रसोई बनाना तभी सार्थक है जब सीता-भाव से बनाई जाए. यहां रसोई और जेवनार (भोजन करना) परस्पर पूरक शब्द हैं और इस पारस्परिकता को ध्यान में रखकर राम-भाव और सीता-भाव का अर्थ होगा घर-गृहस्थी चलाना.

रामकथा घर-गृहस्थी चलाने की कथा है. घर एक से नहीं बनता, वह दो (स्त्री-पुरुष) से भी नहीं बनता, घर बनता है एक से अनेक बनने में. ‘एक’ के इस ‘अनेक’ में तब्दील होने के बड़े संकट हैं.

किसी एक का स्वार्थ इतना बड़ा हो सकता है कि वह बाकियों के हित पर भारी पड़ जाए, बाकियों का साझा स्वार्थ इतना भारी हो सकता है कि घर के किसी एक के हित की बलि ले ले.

और, इस अर्थ में देखें तो रामकथा एक और अनेक के स्वहित के आपसी टकराव की ही कथा है. इस टकराव के भीतर घर-गृहस्थी को आन घेरने वाले संकटों की कथा, उन संकटों से निकलने के लिए जुगत या कह लें मॉडल तलाशने की कथा है.

मिसाल के तौर पर रामचरितमानस के अयोध्या कांड के प्रसंग का लें. राम को चौदह वर्ष का वनवास होता है- यह एक तथ्य है. इस तथ्य से कितने संकट जुड़े हैं? एक संकट तो बड़ा निजी किस्म का है कि दशरथ के अतिशय प्यारे राम आज उन्हीं के हाथों वनवास के योग्य क्यों समझ लिए गए.

सवाल उठ खड़ा होता है,

करहु राम पर सहज सनेहू 
केहिं अपराध आजु बनु देहू.

लेकिन इस संकट से कहीं ज्यादा बड़ा है गृहस्थी का संकट. राम के वनवास का तथ्य मानो अयोध्या में जीवन के पूरे गणित को उलट देने के लिए काफी है. दशरथ के घर और नगर दोनों जगह एक यक्ष प्रश्न चक्कर काट रहा है.

यानी राम को वनवास हुआ है तो क्या सीता राम का साथ छोड़ने को तैयार होंगी? लक्ष्मण क्या राम को छोड़कर अयोध्या में रहने को तैयार होंगे? भरत क्या राम के बिना राज चला पाएंगे और क्या दशरथ ही राम के बिना जीवित बचेंगे?

सीय कि पिय संगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम
राजु कि भूंजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम.

और, अगर ऐसा नहीं होता तो फिर न दशरथ बचेंगे, न ही उनका घर और नगर. राम का वनवास संपूर्ण ध्वंस की सूचना के तौर पर उपस्थित होता है, तुलसी की रामकथा में.

गौर यह भी करना चाहिए कि इस संकट को कथा के पात्र कैसे झेल रहे हैं, क्या है उनकी मनोदशा? इस मनोदशा को जानने से वह कुंजी मिल जाएगी जो रामकथा को आपबीती और जगबीती दोनों बनाती है.

राम के वनवास के फैसले के बाद उनकी ‘महतारी’ (मां) के मन में भावों का घनघोर संग्राम चल रहा है, क्या करुं-कहां जाऊं, का सवाल कर्तव्य-अकर्तव्य की चेतना को कुंद कर रहा है.

कुछ ऐसा है जिसे कहा भी नहीं जा रहा और सहा भी नहीं जा रहा-

राखि न सकइ न कहि सक जाहू
दुहूं भांति उर दारुन दाहू.

मन दो विपरीत ध्रुवों के तनाव में टूट रहा है कि कर्तव्य निभाऊं या पुत्र से स्नेह-

धरम सनेह उभयं मति घेरी
भइ गति सांप छुछुंदरि केरी.

अगर पुत्र को अयोध्या में रखने का निर्णय करूं तो भरत को अयाचित सौभाग्य जाएगा, भाई-भाई में विरोध बढ़ेगा, ऊपर से राजधर्म की हानि होगी सो अलग-

राखउं सुतहि करउं अनुरोधू
धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू.

और जो बेटे को वन में भेजने पर राज़ी होऊं तो फिर मुझ माता का सारा संसार ही जाता है-

कहउं जान बन तौ बड़ि हानी
संकट सोच बिबस भइ रानी.

लेकिन ‘सरल सुभाउ राम महतारी’ को फैसला लेना था और उन्होंने ‘धीर धरी भारी’ फैसला लिया-

तात जाउं बलि कीन्हेहु नीका
पितु आयसु सब धरमक टीका.

फैसला कोई भी हो, सबके हितों को संतुष्ट नहीं कर सकता. सबके हितों को संतुष्ट समझौता करता है. और समझौते में भी सबके के समग्र हित कहां सधते हैं, सबको कुछ ना कुछ छोड़ना पड़ता है, तभी तो उसका नाम समझौता है.

फैसला सबको करना होता है, तो क्या इस फैसले से अपना हित साधा जाए, क्या सबका हित साधा जाए या फिर उसे समझौते की शक्ल दी जाए.

रामकथा का उत्तर है, फैसला लेना होगा. फैसले में अपने हित पर दूसरे के हित की बरतरी होनी चाहिए. रामकथा अपने हित और दूसरे के हित के तनाव की भी कथा है और उसके समाधान की भी. इसी अर्थ में राम की आपबीती जगबीती बनने की क्षमता रखती है.

रामकथा चूंकि फैसले की बात कहती है, अपने हित पर दूसरे के हित के बरतरी की बात करती है, इसलिए उसके बारे में हमेशा सवाल उठेगा कि फैसले सही लिए गए कि नहीं. जिनके हित का बलिदान हुआ उनकी तरफ से सवाल उठे, वैकल्पिक रामकथाएं गढ़ी गईं.

वाल्मिकी के रामायण में शंबूक का वध एक अपराधी के रूप में होता है, उसकी गर्दन झटके में उतार ली जाती है. शंबूक की जान भवभूति के उत्तर रामचरित में भी जाती है लेकिन एक अपराधी के रूप में नहीं.

वह प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है और उसे दंड देते समय राम का बायां हाथ कांपता है. रामचरित मानस में सीता की नहीं उनकी छाया की अग्निपरीक्षा होती है, क्या यह वाल्मिकी रामायण में सीता के साथ हुए अन्याय को अपनी तरफ से दुरुस्त करने के लिए नई कथा-उद्भावना की कोशिश नहीं है?

जैन-परंपरा के पऊम चरिऊ, बौद्ध-परंपरा के दशरथजातक और उन सबसे अलग थाईलैंड की रामकथा- रामकीर्ति- जैसी सहस्त्रों रामकथाओं में नए प्रसंगों की उद्भावना की गई हैं तो इसलिए कि रामकथा से निकलने वाला मर्यादा का पाठ कोई अंतिम पाठ नहीं है, उसे बार-बार रचा जाना है. इसी अर्थ में राम एक होकर अनेक हैं, रामकथा एक होकर भी अनंत है.

हालांकि राजनीतिक तौर पर उसका एक ही पाठ गढ़ने की कोशिश की जा रही है.

(लेखक सीएसडीएस में सीनियर एसोसिएट फेलो हैं.)