भारत

धुंध में डूबे एक शहर के नाम…

अंग्रेज़ी के कवि पीबी शैली की एक कविता में उनका नायक मरने के बाद जब नर्क पहुंचता है तो पाता है कि नर्क तो बिल्कुल लंदन जैसा है. जो कुछ भी लंदन में मिल सकता है वह सब वहां है. उसकी पहचान, उसकी बेतहाशा आबादी और धुआं… राजधानी है इसलिए वहां राजा है, न्यायालय है और जैसा कि राजधानियों में होता है ख़याली पुलाव के रूप में क्रांति की बातें हैं. एक सदी पहले लिखी गई इस कविता का यह शहर अब हमारे देश की राजधानी में तब्दील हो गया है.

फोटो: रॉयटर्स

फोटो: रॉयटर्स

सत्रहवीं सदी के मध्यवर्ती चरण में भारत में कई दशक बिताने के बाद पेशे से चिकित्सक फ्रांसीसी यात्री फ्रैंकोइस बर्नयिर अपनी यात्रा ख़त्म करने की हड़बड़ी में थे. अपनी चिकित्सकीय दक्षता के चलते उन्हें हिंदुस्तान में मुग़ल राजकुमार दारा शिकोह का निजी चिकित्सक बनने और कुछ दिन मुग़लों की दरबारी राजनीति को समझने का मौक़ा मिला था.

उन्होंने हिंदुस्तान में ख़ुद हज़ारों मील के सफ़र तय किए थे लेकिन वतन-वापसी के आख़िरी सफ़र में जो दुर्लभ प्राकृतिक दृश्य देखे, उसे वह अपनी डायरी ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ (Travels in the Mogul Empire) में लिखना नहीं भूले. पूरी यात्रा जल मार्ग से की जानी थी. उड़ीसा के पीपली पत्तन के आगे के सफ़र को याद करते हुए बर्नियर ने लिखा-

‘The day following we arrived, at rather a late hour, among the islands; and having chosen a spot that appeared free from tigers, we landed and lighted a fire. There would have been danger in loosing our way in the dark… and therefore we retired out of a main channel in search of a snug creek, where we passed the night; the boat being fastened to a thick branch of a tree, at a prudent distance from the shore.

While keeping watch, I witnessed a Phenomenon of Nature such as I had twice observed at Dehli. I beheld a lunar Rainbow, and awoke the whole of my company, who all expressed much surprise, especially two Portuguese pilots whom I had received into the boat at the request of a friend.’

(देखें: पेज 332, Travels in The Mogul Empire AD 1656-1668, Atlantic publication Second Edition By Vincent A. Smith)

बर्नियर और उनकी कंपनी ने प्रकृति की जो अद्भुत परिघटना देखी थी वह चंद्रधनुष था. महत्वपूर्ण बात ये कि स्वयं बर्नियर ने ये चंद्रधनुष प्रथम बार नहीं देखा था. वह बताते हैं कि पीपली के सागर तट पर प्रकृति के इस फिनोमिना को देखने से पूर्व वह दिल्ली में दो बार चंद्रधनुष देख चुके थे.

आज जब दिल्ली के चारों सिम्त लिपटी हुई धुंध में आप समग्र आसमान में एक तारे को भी उंगली उठाकर साफ-साफ नहीं बता सकते वह ठीक-ठीक किस जगह जड़ा गया है, यह सोचना कितना रोमांचक है कि तब की दिल्ली में आसमान की स्वच्छता का प्रतिमान क्या रहा होगा?

गणितीय स्केल पर हवाओं की निर्विषता और उजलेपन का गुणांक क्या रहा होगा? यह दावा बिल्कुल नहीं किया जा सकता कि उस दौर का समय मनुष्य के लिए कष्टों और आपदाओं का समय नहीं था. एक साधारण आदमी के लिए जीवन जीना इतिहास के किसी भी चरण में सरल नहीं था.

इसी दिल्ली के बारे में, जो ग़ालिब को बेहद अज़ीज़ थी, एक मित्र नवाब अनवरदौला ‘सफ़क’ को 1860 में एक ख़त लिखते हुए मिर्ज़ा ग़ालिब फ़रमाते हैं कि-

‘शहर पर (दिल्ली) पै दर पै (एक के बाद एक) पांच लश्करों का हमला हुआ. पहला बाग़ियों का (1857 के विद्रोह का संदर्भ), दूसरा लश्कर खाकियों का (अंग्रेज़ों की दमनात्मक कार्यवाही की ओर इशारा) … तीसरा अकाल का जिसमें हज़ारहा आदमी भूख से मर गए.

चौथा लश्कर हैज़े का, उसमें बहुत से पेट भरे लोग मरे. पांचवा लश्कर तप (बुखार) का, उसमें ताब-ओ-ताक़त अमूमन लुट गयी. मरे आदमी कम लेकिन जिसको तप आयी उसने फिर आजां में ताक़त न पायी’

(देखें: p.191, खण्ड-एक, ग़ालिब के पत्र, द्वितीय संस्करण हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद 2010)

मैं सोचता हूं कि यदि ग़ालिब अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कर पाते तो धूल और धुएं के गर्द में लिपटी हुई अपनी दिल्ली के लिए उनकी वह प्रतिक्रिया कैसी होती? तब क्या वह इस धुंध और प्रदूषण की गिनती दिल्ली पर हमला करने वाले छठे लश्कर के रूप में करते?

तब क्या उन्हें ‘शहर की इकामत’(निवास) गवारा होती जिसके बारे में वह अक्सर कहते थे कि क्या करूं यहां सख़्त ग़मज़दा और मलूल (उदास) रहता हूं? क्या यह धुआं उन्हें इसी तरह बेचैन कर देता जैसे वह ‘फ़ीलखाना, फ़लक पैरा और लाल डिग्गी के सामने बने मकानात’ और ‘निसार खान छत्ते को’ गिराए जाने से हुए थे.

‘बुलाकी बेगम के कूचे’ की क़िस्मत तय हो रही थी और ग़ालिब की सांस अटकी हुई थी. अपने एक परिचित हुसैन मिर्ज़ा को वह लिख रहे थे कि ‘अहले फ़ौज ढहाना चाहती है, अहले क़लम बचाते हैं’

शहरों की घुटन का अपना इतिहास है. वहां ग़मज़दा और मलूल हो जाने की सबकी अपनी अपनी वजहें हैं. शहरयार ने जब यह ग़ज़ल लिखी कि- सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है- तब उनका आशय असंदिग्ध रूप से आदमी के कुछ विशिष्ट जज़्बातों से था.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

यह कवि की एक ख़ास मनोदशा से पैदा हुई रचना थी. यह ख़ास मनोदशा शहरीकरण से उत्पन्न ऊब, एकांतिकता या ऐसी किसी भी अनुभूति से पैदा हुई होगी, जिसे एक क्षण विशेष में महसूस करके कवि ने एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल के रूप में क़लमबद्ध कर दिया.

लेकिन यह दावे से कहा जा सकता है कि शहरयार को इस सुंदर रचना को रचने के लिए कम से कम वायु प्रदूषण से कोई प्रेरणा नहीं मिली होगी!

शायर के ‘सीने में जलन’ होने में कार्बन डाई ऑक्साइड कोई वजह नहीं रही होगी. उसकी आंखों का तूफान आंखों में धूल के सस्पेंडेड पार्टीकल्स के घुस जाने का नतीजा नहीं रहा होगा.

शायर परेशान ज़रूर रहा होगा. उसकी परेशानी खुली हवा में सांस न ले सकने के कारण नहीं थी. वह हवाओं के नहीं, संवेदनाओं के ‘बेहिस-ओ-बेज़ान’ हो जाने से परेशान हुआ होगा. वह शहर की वायु से नहीं शहर की भीड़ के बीच क़ायम हुए बियाबान से ज़रूर आजिज़ हो गया था.

शहरयार के शहर में जज़्बातों का संकट था, हवाओं का नहीं. शहरों में हवाओं के घुटन के संकट की सबसे पहली पहचान अंग्रेज़ी के रोमांटिक साहित्य में घटित होती है. शहरों से पलायन की कामना एक प्रवृत्ति बन जाती है.

तीन लेखकों की एक तिकड़ी (विलियम वर्ड्सवर्थ, सैमुएल टेलर कॉलरिज और रॉबर्ट साउदी) को ‘लेक पोयट्स’ ही कहा जाने लगता है. औद्योगिक क्रांतियां होती हैं. रासायनिक धुआं पहली बार आदमी की ज़िंदगी का हिस्सा बनता है. आदमी पहली बार ज़मीन के ऊपर के वायुमंडल को अपनी दिनचर्या के अपशिष्ट से भर देता है.

पीबी शैली की व्यंग कविता ‘पीटर बैल द थर्ड’ (Peter Bell The third) का नायक जब मृत्योपरांत नर्क में पहुंचता है तो पाता है कि नर्क तो बिलकुल लंदन जैसा है.

‘Hell is city much like London-
A populous and a smoky city

जो कुछ भी लंदन में मिल सकता है वह सब वहां उपलब्ध है. लेकिन उसकी सबसे बड़ी पहचान उसकी बेतहाशा आबादी और धुआं है. वह राजधानी है इसलिए स्वाभाविक रूप से वहां राजा है, न्यायालय है और जैसा कि राजधानियों में होता है ख़याली पुलाव के रूप में क्रांति की बातें हैं.

वहां लंदन की ही तरह सिपाही हैं, तानाशाह हैं. वकील हैं, बिशप हैं, जज हैं. छोटे और बड़े हर तरह के चोर हैं. शैली का लंदन कविता में पहला आधुनिक लंदन है जहां –

There are all sorts of people undone
And there is little or no fun done
Small justice shown and still less pity

… A manufacturing mob; a set
Of thieves who by themselves are sent
Similar thieves to repreasent

Thrusting, toiling wailing, moiling
Frowning, preaching -Such a riot!
Each with never-ceasing labour
Whilst he thinks he cheats his neighbour
Cheating his own heart of quiet’

शैली का यह ‘स्मोकी’ लंदन लगभग एक सदी पहले की बात थी. आज के भारत में एक ख़बर के अनुसार, 2016 में पांच वर्ष से कम आयु के लगभग सवा लाख बच्चे वायु के अति प्रदूषित होने के कारण काल के मुंह में चले गए. पीएम 2.5 जो प्रदूषण का सर्वाधिक ख़तरनाक घटक है और औद्योगिक इकाइयों तथा वाहनों के धुएं के उत्सर्जन से पैदा होता है और अकेले लगभग 61,000 बच्चों की मौत का कारण बना है.

सुदूर देहात के अंचल और छोटे क़स्बे भी अब निरापद नहीं रहे हैं. प्रख्यात जर्मन समाजशास्त्री उलरिक बेक का यही व्यंगपूर्ण तर्क था कि ‘स्मॉग सबको लोकतांत्रिक बना देगा.’ कुछ भी शेष नहीं रहेगा जो स्मॉग की व्याप्ति से बचने का दावा कर सके.

‘विकास’ की नासमझ अवधारणाएं, सभ्यताएं पोषित करने का दावा करने वाले शहर और उनके परिवेश को इतना गंदला कर चुकी हैं कि यदि आज से उनको साफ करने का आयोजन शुरू हो, तो वांछित परिणाम आने में ही वर्षों लगेंगे.

Children March against alarming-levels-of-pollution-in Delhi PTI

क्या हम अपनी नदियों, अपनी गलियों, अपने शहरों को इस बेक़दरी से गंदा होते रहने देंगे कि वो एक अंजुली भर पानी लेने या रहने लायक़ ही न रहें? क्या हम सच में यह क़ीमत चुकाने को तैयार हैं कि अपने बच्चों को सांस भरने के लिए न्यूनतम ज़रूरी साफ हवा भी न उपलब्ध करा सकें. (फोटो: पीटीआई)

एक देश के रूप में हम सदा गर्व से अपने लोकतांत्रिक होने का आह्वान करते हैं लेकिन एक समाज के रूप में पर्यावरणीय मूल्यों के स्तर पर हमारी सोच में ऐसा आलस्य और उथलापन मौजूद है जिसे हम स्वीकार करने में भी संकोच करते हैं.

क्या गंदगी हमारा जीवन मूल्य बन चुकी है? क्या हम अपनी नदियों, अपनी गलियों, अपने शहरों को इस बेक़दरी से गंदा होते रहने देंगे कि वो एक अंजुली भर पानी लेने या रहने लायक़ ही न रहें?

क्या हम सच में इस क़दर ‘अपने’ में खोए रहने की क़ीमत चुकाने को तैयार हैं कि अपने बच्चों को सांस भरने के लिए न्यूनतम ज़रूरी साफ हवा भी न उपलब्ध करा सकें.

बड़ी अर्थव्यवस्था के दावों के बीच क्या हम प्रकृति के सामने इतने दरिद्र साबित होने वाले हैं. उस हवा को, जो अपने मौलिक रूप में हमें साफ सुथरी, ग़ैर-रासायनिक प्राप्त हुई थी उसे हमने अपने शहरों में ग़ैर ज़िम्मेदारी और नासमझी से एक ज़हर में बदल डाला गया है.

रोमांटिक युग के प्रखर चित्रकार और कवि विलियम ब्लेक की कविता ‘जेरूसलम’ में शहरों की परिकल्पना में सर्वत्र मानवीकरण था. सभी कुछ तो आदमी जैसा था. शहर… नदियां… पर्वत… सभी कुछ.

Cities ….
Are men, fathers of multitudes, and Rivers and Mountains are also Men
Everything is Human, Mighty Sublime !

क्या हमें अपने शहरों और उनकी हर शै का मानवीकरण करने की ज़रूरत नहीं है जहां हवाओं में रसायन न हों, अम्ल न हो ! क्या ऐसे शहरों का निर्माण संभव है जहां हम सभी सामूहिक उत्तरदायित्व से एक साफ आसमान और उजली हवाओं का बहना सुनिश्चित कर सकें?

(लेखक भारतीय पुलिस सेवा में उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं.)

Comments