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सांसदों/विधायकों पर 4,000 से ज़्यादा मुक़दमे, बिहार-केरल में विशेष अदालतें गठित करने का निर्देश

उच्चतम न्यायालय ने इन विशेष अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई का क्रम निर्धारित करते हुए कहा कि वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों के ख़िलाफ़ लंबित ऐसे दंडनीय अपराधों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनमें उम्रक़ैद या मौत की सज़ा का प्रावधान है.

New Delhi: A view of the Supreme Court of India in New Delhi, Monday, Nov 12, 2018. (PTI Photo/ Manvender Vashist) (PTI11_12_2018_000066B)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: वर्तमान एवं पूर्व सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ लंबित आपराधिक मुक़दमों की तेज़ी से सुनवाई सुनिश्चित करने के लिये उच्चतम न्यायालय ने बिहार और केरल के हर ज़िले में विशेष अदालतें गठित करने का निर्देश दिया.

शीर्ष अदालत को सूचित किया गया कि वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों के ख़िलाफ़ 4,122 आपराधिक मुक़दमे लंबित हैं. इनमें से कुछ मुकदमे तो तीस साल से भी अधिक पुराने हैं.

न्यायालय ने इन विशेष अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई का क्रम निर्धारित करते हुए कहा कि वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों के ख़िलाफ़ लंबित ऐसे दंडनीय अपराधों के मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनमें उम्र कैद या मौत की सजा का प्रावधान है.

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने कहा कि एक विशेष अदालत में वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों की संलिप्तता वाले सारे मामलों को भेजने की बजाय प्रत्येक ज़िले में विशेष अदालतें स्थापित करना अधिक कारगर होगा.

पीठ ने इन जनप्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ लंबित मामलों के आंकड़ों के अवलोकन के बाद अपने आदेश में कहा, ‘प्रत्येक ज़िले में एक सत्र अदालत और एक मजिस्ट्रेट अदालत मनोनीत करने की बजाय हम प्रत्येक उच्च न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों की संलिप्तता वाले मामले उतनी सत्र अदालतों और मजिस्ट्रेट अदालतों को आबंटित करे जितना वह उचित और आवश्यक समझें.’

इन दोनों राज्यों के प्रत्येक ज़िले में विशेष अदालतों के गठन का निर्देश देने के साथ ही 14 दिसंबर तक पटना तथा केरल उच्च न्यायालयों से इस पर अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी है.

न्यायालय में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार, 4,122 मामलों में से 2,324 तो वर्तमान सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ हैं जबकि 1,675 मुक़दमे पूर्व सांसदों और विधायकों से संबंधित हैं.

उच्चतम न्यायालय को यह भी बताया गया कि इन 4,122 मुक़दमों में से 1,991 मामलों में आरोप तय नहीं किए गए और उच्च अदालतों की रोक के कारण कई मामले (264) लंबित हैं.

इस मामले में वकील स्नेहा कालिता के साथ न्यायमित्र के तौर पर न्यायालय की मदद कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने एक रिपोर्ट में यह बात कही गई.

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पढ़ी गई रिपोर्ट में बताया गया है कि ये मामले देश में कुल 724 ज़िलों में से 440 ज़िलों में लंबित हैं.

वरिष्ठ अधिवक्ता हंसारिया ने कहा, ‘505 मामले सत्र अदालतों में और 1,928 मामले मजिस्ट्रेट अदालतों में जबकि 33 विशेष अदालतों में लंबित है. 1,650 मुक़दमे मौजदा मामले में इस अदालत के निर्देशों के तहत सांसदों/विधायकों के लिए गठित विशेष अदालतों में स्थानांतरित किए गए.’

मुकदमों का राज्यवार ब्योरा देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि उत्तर प्रदेश में सभी 992 मुकदमे इलाहाबाद में सांसदों और विधायकों के लिए गठित विशेष अदालत के पास भेज दिए गए.

हंसारिया ने कहा, ‘उत्तर प्रदेश में सभी 992 मामले और मध्य प्रदेश में सभी 168 मामले क्रमश: इलाहाबाद और भोपाल में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता वाली विशेष अदालत को स्थानांतरित कर दिए गए हैं जिनमें सत्र अदालतों, मजिस्ट्रेट अदालतों में लंबित मामले भी शामिल हैं.’

उन्होंने कहा, ‘आंध्र प्रदेश में कुल 109 मामलों में से 38, तेलंगाना में 99 मामलों में से 66 को विशेष अदालतों में स्थानांतरित कर दिया गया है. महाराष्ट्र में मुंबई के 31 मुक़दमों को विशेष अदालतों में स्थानांतरित कर दिया गया है.’

उन्होंने बताया कि दिल्ली में 38 मामले एडीजी रैंक और 86 मामले मजिस्ट्रेट रैंक के विशेष न्यायाधीशों के पास भेज दिए गए हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में 992 में से 395 मामलों में आरोप तय नहीं किए गए हैं और उच्च न्यायालय में 14 मामलों पर रोक लगा दी है.

इसमें कहा गया है कि 22 प्राथमिकियां समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद अतीक अहमद के खिलाफ दर्ज हैं जिनमें से 10 उन अपराधों के लिए दर्ज हैं जिनमें उम्रक़ैद या मौत की सज़ा का प्रावधान हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, 12 प्राथमिकियां 1989 और 2017 के बीच पूर्व विधायक पवन कुमार पांडेय के ख़िलाफ़ दर्ज है जिनमें से तीन इन अपराधों के लिए दर्ज हैं जिसमें उम्रक़ैद या मौत की सज़ा का प्रावधान है.

इसमें कहा गया है कि छह प्राथमिकियां साल 2003 और 2011 के बीच पूर्व विधायक ख़ालिद अज़ीम के ख़िलाफ़ दर्ज है जिनमें से पांच में उम्रक़ैद या मौत की सज़ा सुनाई जा सकती है.

उच्चतम न्यायालय में सारणीबद्ध रूप में सौंपी रिपोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि साल 1982 के एक मामले में केरल के विधायक एमएम मणि के खिलाफ मुक़दमे की सुनवाई अब भी शुरू नहीं हो पाई है और 18 नवंबर 2015 को आरोप पत्र दायर होने के बावजूद आरोप तय नहीं किए गए हैं.

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के एक मामले में अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं. यह मामला 2007 से लंबित है.

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बीएस येदयुरप्पा के ख़िलाफ़ दर्ज 18 मामलों में से 14 में उम्रक़ैद की सजा का प्रावधान है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात से मौजूदा राकांपा विधायक केएस जडेजा के ख़िलाफ़ टाडा के तीन मामलों में आरोप तय नहीं किए गए हैं.

ओडिशा में चार मौजूदा और पूर्व विधायकों के ख़िलाफ़ 100 से अधिक आपराधिक मुक़दमे लंबित हैं.

उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक ज़िले में विशेष अदालतों को सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुक़दमों की दैनिक आधार पर ,विशेष रूप से जिनमें अपराध के लिये उम्र कैद/मौत की सजा हो सकती है, सुनवाई करनी चाहिए.

पीठ ने हंसारिया के सुझाव में संशोधन करते हुए कहा कि मनोनीत अदालतों को मौजूदा और पूर्व सांसदों/विधायकों के खिलाफ उम्रक़ैद और मृत्युदंड की सज़ा वाले लंबित अपराध के मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई करनी चाहिए.

पीठ ने कहा कि इस समय उसके निर्देश बिहार और केरल के वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों की संलिप्तता वाले मुक़दमों पर लागू होंगे.

अदालत, अधिवक्ता हंसारिया एवं भाजपा नेता अश्चिनी उपाध्याय की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध नेताओं पर ताउम्र प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी. याचिका में निर्वाचित प्रतिनिधियों से जुड़े इस तरह के मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का भी अनुरोध किया गया है.

शीर्ष अदालत ने वर्तमान और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के ख़िलाफ़ लंबित आपराधिक मामलों का राज्यों और विभिन्न उच्च न्यायालयों से विवरण मांगा था ताकि ऐसे मुक़दमों की सुनवाई के लिए पर्याप्त संख्या में विशेष अदालतें गठित की जा सकें.

इन आंकड़ों के अनुसार, 264 मामलों की सुनवाई पर उच्च न्यायालयों ने रोक लगा रखी है. इसी तरह अनेक ऐसे मामले भी हैं जो 1991 से लंबित हैं लेकिन इनमें अभी तक आरोप भी निधारित नहीं हुये हैं.

इससे पहले की तारीख पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रत्येक जिले में सत्र और मजिस्ट्रेट स्तर की अदालतों को चिह्नित करने और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था.

 

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