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किसानों की क़र्ज़ माफ़ी पर हंगामा, बैंकों को एक लाख करोड़ देने पर चुप्पी

सरकार सरकारी बैंकों में एक लाख करोड़ रुपये क्यों डाल रही है? किसान का लोन माफ़ करने पर कहा जाता है कि फिर कोई लोन नहीं चुकाएगा. यही बात उद्योगपतियों के लिए क्यों नहीं कही जाती?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली (फोटो: पीटीआई)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली (फोटो: पीटीआई)

क्या आपको पता है कि बैंकों को फिर से 410 अरब रुपये दिए जा रहे हैं? वित्त मंत्री जेटली ने संसद से इसके लिए अनुमति मांगी है. यही नहीं सरकार ने बैंकों को देने के लिए बजट में 650 अरब रुपये का प्रावधान रखा था. बैंकों की भाषा में इसे कैपिटल इन्फ्लो कहा जाता है.

सरकार बैंकों को एक साल में 1 लाख करोड़ रुपये क्यों देना चाहती है? आप किसी भी विश्लेषण को पढ़िए, यही जवाब मिलेगा कि बैंकों ने पहले जो लोन दिए थे वो चुकता नहीं किए गए. फिर से लोन देने के लिए पैसे नहीं हैं. इसलिए सरकार अपनी तरफ से बैंकों को पैसे दे रही है ताकि बाज़ार में लोन के लिए पैसे उपलब्ध हो सके.

किसने लोन लेकर नहीं चुकाए हैं और किसे नया लोन देना है, इन दो सवालों के जवाब से सब कुछ साफ हो जाएगा. क्या यह कैपिटल इन्फ्लो के नाम पर कर्ज़ माफ़ी नहीं है?

भारतीय रिज़र्व बैंक ने 11 सरकारी बैंकों को प्रांप्ट करेक्टिव एक्शन की सूची में डाल दिया था. इन सभी से कहा गया था कि वे एनपीए खातों की पहचान करें, लोन को वसूलें, जो लोन न दे उस कंपनी को बेच दें और नया लोन देना बंद कर दें.

बैंकों का एनपीए जब खास सीमा से ज़्यादा हो गया तब यह रोक लगाई गई क्योंकि बैंक डूब सकते थे. अब हंगामा हुआ कि जब बैंक लोन नहीं देंगे तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार रुक जाएगी. पर ये उद्योगपति सरकारी बैंकों से ही क्यों लोन मांग रहे हैं, प्राइवेट से क्यों नहीं लेते?

इनके लिए सरकार सरकारी बैंकों में एक लाख करोड़ रुपये क्यों डाल रही है? किसान का लोन माफ करने पर कहा जाता है कि फिर कोई लोन नहीं चुकाएगा. यही बात इन उद्योगपतियों से क्यों नहीं कही जाती है?

सितंबर 2018 में बैंकों का नॉन परफार्मिंग असेट 8 लाख 69 हज़ार करोड़ रुपये का हो गया है. जून 2018 की तुलना में कुछ घटा है क्योंकि तब एनपीए 8 लाख 74 हज़ार करोड़ रुपये था. लेकिन सितंबर 2017 में बैंकों का एनपीए 7 लाख 34 हज़ार करोड़ रुपये था.

बैंकों का ज़्यादातर एनपीए इन्हीं उद्योगपतियों के लोन न चुकाने के कारण होता है. क्या वाकई रिज़र्व बैंक की सख़्ती के कारण बैंकों ने लोन देना बंद कर दिया है?

बिजनेस स्टैंडर्ड में तमल बंधोपाध्याय का संपादकीय लेख छपा है. उन्होंने लिखा है कि बैंक सेक्टर के क़र्ज़ देने की रफ्तार बढ़ी है. 15 प्रतिशत हो गया है. जीडीपी की रफ़्तार से डबल. फिर सरकार को क्यों लगता है कि यह काफी नहीं है. बैंकों को और अधिक क़र्ज़ देना चाहिए.

1 लाख करोड़ रुपये जब सरकारी बैंकों को मिलेगा तब वे रिज़र्व बैंक की निगरानी से मुक्त हो जाएंगे. लोन देने के लिए उनके हाथ फिर से खुल जाएंगे.

सरकार बैंकों को 1986 से पैसे देते रही है, लेकिन उसके बाद भी बैंक कभी पूंजी संकट से बाहर नहीं आ सके. 1986 से 2017 के बीच एक लाख करोड़ रुपये बैंकों में दिए गए हैं. 11 साल में एक लाख करोड़ से अधिक की राशि दी जाती है. अब इतनी ही राशि एक साल के भीतर बैंकों को दी जाएगी.

बिजनेस स्टैंडर्ड के एक और लेख में देबाशीष बसु ने लिखा है कि यह सीधा-सीधा दान था. इसका बैंकों के प्रदर्शन में सुधार से कोई लेना-देना नहीं था. दस लाख करोड़ का एनपीए हो गया, इसके लिए न तो कोई नेता दोषी ठहराया गया और न बैंक के शीर्ष अधिकारी.

नेता हमेशा चाहते हैं कि बैंकों के पास पैसे रहें ताकि दबाव डालकर अपने चहेतों को लोन दिलवाया जा सके, जो कभी वापस ही न हो.

देबाशीष बासु ने मोदी सरकार के शुरूआती फ़ैसलों में से एक की ओर ध्यान दिलाया है. चार राज्यों में 23 ज़िला सहकारिता बैंकों को पुनर्जीवित करना था. इन सभी के पास लाइसेंस नहीं थे. 23 में से 16 बैंक यूपी में थे.

नियमों के अनुसार इन सबको बंद कर दिया जाना था मगर सरकार ने इन्हें चलाने की अनुमति दी. बसु ने लिखा है कि सरकार इस विवादास्पद फ़ैसले से क्या संकेत देना चाहती थी?

देबाशीष बसु ने इसके बारे में विस्तार से नहीं लिखा है मगर इस सूचना को और विस्तार देने की ज़रूरत है. बिना लाइसेंस के सहकारिता बैंक खुलवा देने का खेल क्या है, इसे मैं भी समझने का प्रयास करूंगा.

तमल बंधोपाध्याय ने लिखा है कि क्या बैंकों को क़र्ज़ देना आता है? शायद नहीं. अगर पता होता तो वे इस संकट में नहीं होते. अर्थव्यवस्था की हालत पर दोष मढ़ना सही नहीं है क्योंकि इसी माहौल में प्राइवेट बैंक भी काम करते हैं. उनके एनपीए की हालत इतनी बुरी क्यों नहीं है?

उन्होंने लिखा है कि सरकार बैंकों को जो लाख-लाख करोड़ देती है वह किसानों की क़र्ज़ माफ़ी से कोई अलग नहीं है. अगर सरकार इसी तरह से बैंकों में पूंजी ठेलती रही तो क्या उद्योगपतियों पर कर्ज़ चुकाने का दबाव हल्का नहीं होगा, वैसे ही जैसे किसान कर्ज़ नहीं देंगे.

बिजनेस स्टैंडर्ड की एक और रिपोर्ट पर ग़ौर करने की ज़रूरत है. अभिषेक वाघमरे और संजीब मुखर्जी की रिपोर्ट है कि यूपी चुनाव में किसानों की कर्ज़ माफ़ी के वादे के बाद से अब तक सात राज्यों में करीब पौने दो लाख करोड़ रुपये से अधिक कर्ज़ माफ़ी का ऐलान हो चुका है. लेकिन महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब और कर्नाटक में 40 प्रतिशत किसानों का ही लोन माफ हुआ है. दो राज्य भाजपा के हैं और दो कांग्रेस के.

उत्तर प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों के एक लाख तक के कर्ज़ माफ होने थे. अप्रैल 2017 में फैसले का ऐलान हो गया. दावा किया गया था कि 86 लाख किसानों को लाभ होगा. इस पर 364 अरब रुपये ख़र्च होंगे.

लेकिन 21 महीने बीच जाने के बाद मात्र 44 लाख किसानों की ही कर्ज़ माफी हुई है. यही नहीं कर्ज़ माफ़ी के बाद से इन चार राज्यों में खेती पर दिया जाने वाला कर्ज़ भी कम हो जाता है. इस रिपोर्ट को पढ़िए तो काफी कुछ समझ आएगा.

हिन्दी के पाठकों के लिए ज़रूरी है कि वे मुद्दों को समझने के लिए अलग-अलग और कई प्रकार के सोर्स का सहारा लें. तभी समझ आएगा कि दस लाख करोड़ का लोन नहीं चुकाने वाले चंद मुट्ठी भर लोग मौज कर रहे हैं. उन्हें और लोन मिले इसके लिए सरकार 1 लाख करोड़ रुपये सरकारी बैंकों को दे रही है.

किसानों के लोन माफ़ होते हैं, कभी पूरे नहीं होते हैं, होते भी हैं तो उन्हें कर्ज़ मिलने से रोका जाने लगता है. उद्योगपतियों को लोन देने में दिक्कत नहीं है, दिक्कत है लोन नहीं चुकाने और उसके बाद भी नया लोन देने के लिए सरकारों के बिछ जाने से.

फिर क्यों किसानों की बात आती है तो मिडिल क्लास लतीफ़े बनाने लगता है. अच्छा है अलग-अलग सोर्स से दस-पांच लेख पढ़ ले, बहस की गुणवत्ता लतीफ़ों से बेहतर हो जाएगी.

(यह लेख मूल रूप से रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा पर प्रकाशित हुआ है.)