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लोकसभा में तीन तलाक़ विधेयक पास, कांग्रेस समेत कई पार्टियों ने किया वॉकआउट

विपक्षी दलों ने विधेयक के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई और उन्हें असंवैधानिक बताया और दावा किया कि इसका वास्तविक उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं करना है बल्कि मुस्लिम पुरुषों को दंडित करना है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मुस्लिम समाज में एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाए गए ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक’ को लोकसभा में पास कर दिया गया है. इस विधेयक को एक साल से भी कम समय में दूसरी बार लोकसभा से मंजूरी मिल गई, जिसमें मुस्लिम पुरुषों द्वारा महिलाओं को तुरंत तलाक दिए जाने को अपराधिक कृत्य बनाने का प्रावधान है.

बीते गुरुवार को लोकसभा में जोरदार बहस के बाद इसे पारित कर दिया गया. सरकार इसे मुस्लिम महिलाओं के लिए ‘इंसानियत और इंसाफ’ बता रही है और इस तर्क को खारिज कर रही है कि यह विधेयक किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाने के लिए है.

कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने इसके कई प्रावधानों पर आपत्तियां जताई और उन्हें ‘असंवैधानिक’ बताया और दावा किया कि इसका वास्तविक उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं करना है बल्कि मुस्लिम पुरुषों को दंडित करना है.

विपक्ष ने कहा कि संशोधित विधेयक को संसद की संयुक्त प्रवर समिति के पास भेजा जाए ताकि विस्तार से इसकी जांच-परख हो सके.

हालांकि केंद्र की मोदी सरकार ने इन मांगों को खारिज कर दिया. इसके बाद विधेयक पर वोटिंग कराई गई और पांच घंटे से ज्यादा चली बहस के बाद इसे पारित किया गया. इसमें 245 सदस्यों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया वहीं 11 ने इसके विरोध में वोट दिया. बहस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद नहीं थे.

सदन ने एनके प्रेमचंद्रन के सांविधिक संकल्प एवं कुछ सदस्यों के संशोधनों को नामंजूर करते हुए मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी.

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के विधेयक पर चर्चा के जवाब के बाद कांग्रेस, सपा, राजद, राकांपा, तृणमूल कांग्रेस, तेदेपा, अन्नाद्रमुक, टीआरएस, एआईयूडीएफ ने सदन से वाकआउट किया.

विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इसे राजनीति के तराजू पर तौलने की बजाय इंसाफ के तराजू पर तौलने की जरूरत है. सरकार के लिए महिलाओं का सशक्तिकरण वोट बैंक का विषय नहीं है. उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि महिलाओं का सम्मान होना चाहिए.

विधेयक पिछले साल 28 दिसम्बर को लोकसभा में पारित हो गया था लेकिन राज्यसभा में विपक्षी दलों के विरोध के कारण यह फंस गया था. उस समय सरकार ने कुछ संशोधनों को मंजूरी दे दी थी जिसमें जमानत देने का प्रावधान शामिल था.

बहरहाल, विधेयक का राज्यसभा में विरोध जारी है. सरकार ने सितंबर में अध्यादेश जारी कर संशोधन को इसमें शामिल किया था.

लोकसभा में गुरुवार को रविशंकर प्रसाद ने विधेयक को संयुक्त प्रवर समिति को भेजने की विपक्ष मांग को खारिज किया. उन्होंने कहा कि इसे प्रवर समिति को भेजे जाने की मांग के पीछे एक ही कारण है कि इसे आपराधिक क्यों बनाया गया.

उन्होंने कहा कि संसद ने 12 वर्ष से कम उम्र की बालिका से बलात्कार के मामले में फांसी की सजा संबंधी कानून बनाया. क्या किसी ने पूछा कि उसके परिवार को कौन देखेगा. दहेज प्रथा के खिलाफ कानून में पति, सास आदि को गिरफ्तार करने का प्रावधान है. जो दहेज ले रहे हैं, उन्हें पांच साल की सजा और जो इसे प्रात्साहित करते हैं, उनके लिए भी सजा है. इतने कानून बने, इन पर तो सवाल नहीं उठाया गया.

विधि मंत्री ने कहा कि तीन तलाक के मामले में सवाल उठाया जा रहा है, उसके पीछे वोट बैंक की राजनीति है. यह मसला वास्तव में वोट बैंक से जुड़ा है.

कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि शाहबानो मामले में जब संसद में बहस हुई तब डेढ़ दिनों तक कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ थी लेकिन बाद में वह बदल गई.

विधेयक पर चर्चा के बाद सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि यह विधेयक संविधान के कई अनुच्छेदों के खिलाफ है और इसे संयुक्त प्रवर समिति के पास भेजा जाना चाहिए. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों के सदन से वॉकआउट करने की घोषणा की.

इससे पहले विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस विधेयक को चर्चा एवं पारित कराने के लिए लोकसभा में रखा. इस पर कांग्रेस, अन्नाद्रमुक, वाम दलों, तृणमूल कांग्रेस, राजद, राकांपा, सपा जैसे दलों ने विधेयक पर व्यापक चर्चा के लिए इसे संसद की संयुक्त प्रवर समिति के समक्ष भेजने की मांग की.

प्रसाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक असंवैधानिक घोषित करने की पृष्ठभूमि में यह विधेयक लाया गया है. जनवरी 2017 के बाद से तीन तलाक के 417 वाकये सामने आए हैं.

उन्होंने कहा कि पत्नी ने काली रोटी बना दी, पत्नी मोटी हो, ऐसे मामलों में भी तीन तलाक दिए गए हैं.

प्रसाद ने कहा कि 20 से अधिक इस्लामी मुल्कों में तीन तलाक नहीं है. हमने पिछले विधेयक में सुधार किया है और अब मजिस्ट्रेट जमानत दे सकता है. उन्होंने कहा कि इस बारे में कोई सुझाव है तो बताएं, लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक कारणों से तील तलाक पीड़ित महिलाओं को न्याय नहीं मिलेगा.’

उन्होंने कहा कि यह नारी सम्मान एवं न्याय से जुड़ा है और संसद को एक स्वर में इसे पारित करना चाहिए.

विपक्षी सदस्यों द्वारा इस विधेयक को प्रवर समिति को भेजने की मांग पर स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कहा कि यह महत्वपूर्ण विधेयक है और सदन को इस पर चर्चा करनी चाहिए.

उल्लेखनीय है कि मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक पहले भी लोकसभा में पारित हो गया था लेकिन राज्यसभा में यह पारित नहीं हो सका.

विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने शायरा बानो बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले तथा अन्य संबद्ध मामलों में 22 अगस्त 2017 को 3:2 के बहुमत से तलाक ए बिद्दत (एक साथ और एक समय तलाक की तीन घोषणाएं) की प्रथा को समाप्त कर दिया था.

पहले भी संसद में और संसद से बाहर लंबित विधेयक के उपबंधों के विषय में चिंता व्यक्त की गई थी. इन चिंताओं को देखते हुए अगर कोई विवाहित मुस्लिम महिला या बेहद सगा (ब्लड रिलेशन) व्यक्ति तीन तलाक के संबंध में पुलिस थाने के प्रभारी को अपराध के बारे में सूचना देता है तो इस अपराध को संज्ञेय बनाने का निर्णय किया गया है.

इसमें कहा गया कि ऐसे में जब विधेयक राज्यसभा में लंबित था और तीन तलाक द्वारा विवाह विच्छेद की प्रथा जारी थी, तब कानून में कठोर उपबंध करके ऐसी प्रथा को रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत थी. उस समय संसद के दोनों सदन सत्र में नहीं थे. ऐसे में 19 सितंबर 2018 को मुस्लिम विवाह अधिकार संरक्षण अध्यादेश 2018 लागू किया गया.

राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है भाजपा: आप

लोकसभा में तीन तलाक विधेयक पारित होने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने गुरुवार को आरोप लगाया कि भाजपा खुद को मुस्लिम महिलाओं की हिमायती के तौर पर पेश कर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है.

राज्यसभा के सदस्य सिंह ने कहा कि यह समझ से परे है कि भाजपा तीन तलाक पर दंडात्मक प्रावधान के लिए क्यों तुली हुई है, जब उच्चतम न्यायालय इस प्रावधान को पहले ही अवैध बता चुका है.

सिंह ने कहा, ‘भाजपा इस विधेयक के जरिए खुद को मुस्लिम महिलाओं के हिमायती के तौर पर पेश कर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है. उन हिंदू महिलाओं का क्या जो देश भर में दुष्कर्म, हत्या और दहेज हत्या का सामना करती हैं.’

उन्होंने कहा कि यह विधेयक एक टूटे हुए परिवार के फिर से जोड़ने की सभी संभावनाओं को खत्म कर देगा क्योंकि तीन तलाक के जरिए पत्नी को तलाक देने वाला व्यक्ति जेल भेज दिया जाएगा और कभी अपनी पत्नी के पास वापस नहीं जा पाएगा.

तीन तलाक विधेयक पर मुस्लिम संगठन बंटे

तीन तलाक विधेयक के पारित होने के बाद मुस्लिम संगठनों ने गुरुवार को इस पर मिलीजुली प्रतिक्रिया व्यक्त की है. कुछ ने इसे ‘बेहद खतरनाक’ करार दिया तो अन्य ने इसका स्वागत किया है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) की कार्य समिति के सदस्य एसक्यूआर इलियास ने कहा कि इस विधेयक की कोई जरूरत नहीं थी और इसे आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लाया गया है.

उन्होंने कहा, ‘यह बेहद खतरनाक विधेयक है जो दीवानी मामले को फौजदारी अपराध बना देगा. एक बार पति जेल चला जाएगा तो पत्नियों और बच्चों की देखभाल कौन करेगा.’

इलियास ने कहा कि लैंगिक न्याय के बजाय यह विधेयक समुदाय के पुरुषों और महिलाओं के लिए ‘सजा’ साबित होगा.

उन्होंने सरकार से सवाल पूछा, ‘चार करोड़ महिलाओं ने याचिका पर हस्ताक्षर कर कहा कि वे विधेयक नहीं चाहतीं, तब ये कौन मुस्लिम महिलाएं हैं जो इसे चाहती हैं.’

एआईएमपीएलबी की कार्यकारी सदस्य असमा जेहरा ने कहा कि तीन तलाक विधेयक को पारित किए जाने का कदम ‘असंवैधानिक’ है और यह मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप है.

उन्होंने कहा, ‘कानून मंत्री (रविशंकर प्रसाद) बहस में विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे थे. वे घरेलू हिंसा अधिनियम का उदाहरण दे रहे थे लेकिन यह सभी धर्मों पर लागू होता है. सिर्फ मुस्लिमों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है.’

उन्होंने कहा कि इस कदम से परिवार बर्बाद होंगे और दावा किया कि यही सरकार का उद्देश्य है.

अखिल भारतीय उलेमा काउंसिल के महासचिव मौलाना महमूद दरयाबादी ने कहा कि जब सरकार ने तीन तलाक को रद्द कर दिया तब इस पर यहां चर्चा क्यों की जा रही है.

उन्होंने कहा, ‘सरकार को मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के लिए कोष पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिनके पास अपने पति के जेल जाने के बाद आय का कोई स्रोत नहीं रहेगा.’

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सदस्य जाकिया सोमन ने विधेयक का स्वागत किया और हिंदू विवाह अधिनियम की तर्ज पर मुस्लिम विवाह अधिनियम की मांग की जो बहुविवाह और बच्चों के संरक्षण जैसे मुद्दों से निपटेगा.