भारत

महिलाओं के श्रम का सम्मान और उनकी आज़ादी का ख़्वाब कब पूरा होगा?

महिलाएं आज हर क्षेत्र में काम करने के लिए आगे आ रही हैं और बहुत सी महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र भी हैं. पर क्या उनकी आर्थिक आज़ादी उन्हें सही मायने में आज़ाद कर पा रही है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

हर साल अंतरराष्ट्रीय ‘श्रमजीवी’ महिला दिवस को कॉरपोरेट, सरकारी दफ़्तर व विभिन्न ग़ैर सरकारी संगठन महिलाओं को मात्र एक दिन का सम्मान, फूल व तोहफ़े देकर मनाते हैं, इस दिन को अब सिर्फ़ महिला दिवस कहा जाने लगा है.

महिलाओं के लिए अधिकारों पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता व शिक्षक बार-बार इस इस दिन के इतिहास को बताते हुए इस बात पर ज़ोर देते आएं हैं कि अंतरराष्ट्रीय श्रमजीवी महिला दिवस से ‘श्रमजीवी’ शब्द हटाना मज़दूर महिलाओं के संघर्ष और इस दिन के इतिहास के महत्व को कम करता है.

सड़कों, टीवी और सोशाल मीडिया पर कॉरपोरेट जगत की बड़ी-बड़ी कंपनियां विज्ञापन देकर महिलाओं को एक दिन का सम्मान देने के लिए विभिन्न सामानों पर भारी छूट देकर महिला दिवस मना रही हैं.

कोई महिलाओं को गाड़ी की सर्विसिंग मुफ़्त दे रहा है तो कहीं ज्वेलरी, कपड़ों और बैग पर सेल है, कई ब्यूटी पार्लर महिलों को अपनी सर्विसेस में भारी छूट दे रहे हैं. लेकिन समझने वाली बात यह है कि इन पार्लर या इन कंपनियों में काम करने वाली कर्मचारी भी महिलाएं ही हैं जिन्हें कंपनी की योजना के कारण दबाव में अधिक घंटे काम करना पड़ रहा है.

अंतरराष्ट्रीय श्रमजीवी महिला दिवस के इतिहास को देखा जाए तो 100 साल पहले मज़दूर महिलाएं काम के घंटे कम करवाने, बराबर वेतन पाने और वोट डालने के अधिकार को लेकर लड़ाई लड़ रही थीं पर आज जिस तरह से महिला दिवस मनाया जा रहा है वो उसके उलट है क्योंकि आज कंपनियां मुनाफ़ा कमाने के लिए मज़दूर महिलाओं (वर्किंग क्लास वीमेन) से तय समय से ज़्यादा घंटे काम करवा रही हैं.

घर संभालने वाली महिलाओं को आज भी उनके काम के लिए न कोई सम्मान मिलता है और न ही कोई वेतन. उनके काम को उनकी और सिर्फ़ उनकी ज़िम्मेदारी और कर्तव्य बताया जाता है और कभी भी महिलाओं को मज़दूर का दर्जा नहीं मिलता है.

महिलाएं आज हर क्षेत्र में काम करने के लिए आगे आ रही हैं और बहुत सी महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र भी हैं. पर क्या उनकी आर्थिक आज़ादी उन्हें सही मायने में आज़ाद कर पा रही है.

इसके साथ बीते कुछ सालों में महिलाएं गैर-पारंपरिक आजीविका के क्षेत्रों में भी जुड़ने लगी हैं. बहुत बड़ी संख्या में तो नहीं लेकिन फिर भी महिलाओं का निर्माण कार्य, इलेक्ट्रिशियन, मोटर मैकेनिक, पशु चिकित्सक और कैब ड्राइवर जैसे पुरुष वर्चस्व वाले व्यवसायों में आना ही श्रम को जेंडर के आधार पर बांटने की सोच को तोड़ रहा है लेकिन असली लड़ाई यह है कि काम को जेंडर के आधार पर न बांटा जाए.

मतलब अगर महिलाएं बाहर आकर काम कर रहीं है तो घर के काम में पुरुषों को बराबर हिस्सेदारी निभाना होगा वरना महिलाओं पर घर और बाहर के काम का दोहरा बोझ पड़ता है.

इस बोझ को कम करने के लिए अक्सर महिलाएं घर में कामगार रखती हैं और घरों में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति और वेतन दोनों के बारे में हम सभी वाक़िफ़ हैं. यानी पुरुषों के घर के काम में हाथ न बंटाने से या तो उस काम का बोझ उस घर की महिलाओं पर आता है या तो उस महिला पर जिसे बहुत ही कम वेतन पर घर का काम करने के लिए नौकरी पर रखा जाता है.

Dalit women

(फोटो. साभार: Flickr/Paul Ancheta CC 2.0)

हाल ही में आयी ऑक्सफैम की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर की महिलाएं साल भर में 710 लाख करोड़ रुपये (10 लाख करोड़ डॉलर) के मेहनताने के बराबर ऐसे काम करती हैं जिनका उन्हें भुगतान नहीं मिलता. रिपोर्ट के मुताबिक भारत की महिलाएं घर और बच्चों की देखभाल जैसे बिना भुगतान वाले जो काम करती हैं, उसका मूल्य देश की जीडीपी के 3.1% के बराबर है.

भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के वेतन में भी काफी अंतर है. यह एक वजह है जिसके चलते महिलाओं की आय पर निर्भर परिवार आर्थिक रूप से पिछड़ जाते हैं. देश में महिला-पुरुष के वेतन के बीच का यह फ़र्क़ 34 प्रतिशत का है. रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि धर्म, जाति, वर्ग, उम्र और लिंग जैसे कारक भी महिलाओं के प्रति असमानता को प्रभावित करते हैं.

साथ ही इस रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के शीर्ष नौ अमीरों की संपत्ति पचास प्रतिशत गरीब आबादी की संपत्ति के बराबर है. देश के 119 सदस्यीय अरबपतियों में सिर्फ 9 महिलाएं हैं.

जो महिलाएं घर में रहती हैं और घर का कामकाज करती हैं अक्सर उनको कामकाजी महिलाओं की श्रेणी से बाहर रखा जाता है लेकिन असल में वो महिला भी काम कर रही है बस उसका वेतन उसे नहीं मिलता. नोटबंदी के बाद इन महिलाओं की जमा पूंजी भी सबके सामने आने से यह वर्ग भी बहुत प्रभावित हुआ.

नोटबंदी, जीएसटी और बेरोज़गारी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या में नौकरियां ख़त्म हुई हैं और असंगठित क्षेत्र की महिलाएं आज सबसे अधिक प्रभावित हैं.

सिर्फ कॉरपोरेट जगत ही नहीं बल्कि सरकार और उसके विभाग भी आज के दिन महिला दिवस मना रहे हैं भले ही महिलाओं की असल में स्थिति कुछ और कहती हो.

बीते साल संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव केवल लैंगिक नहीं बल्कि जाति और आर्थिक स्थिति पर भी आधारित है.

‘टर्निंग प्रॉमिसेस इन टू एक्शन- जेंडर इक्वॉलिटी इन द 2030’ एजेंडा नाम की इस रिपोर्ट के अनुसार, एक सवर्ण महिला की तुलना में एक दलित महिला करीब 14.6 साल कम जीती है.

अब इस दिन पर महिलाओं को माताओं, बहनों, बेटियों और पत्नियों के दर्जे तक सीमित कर उनसे अच्छी तरह से व्यवहार करने की सीख सिखाई जाती है.

न्याय की लड़ाई को महिलाओं को एक दिन के लिए ‘पूजनीय’ और ‘सम्मान’ देने तक सीमित कर दिया गया है. यह न केवल महिलाओं के संघर्षों के महत्व और इतिहास को ख़त्म करता है बल्कि उन्हें उनकी स्वतंत्र पहचान से भी वंचित करता है.

हाल में आए फ़ैसलों व आंदोलनों को नारीवाद के लेंस से कैसे देखा जा सकता है

इस साल ऐसे कई फ़ैसले आए जिन्हें नारीवाद के लेंस से देखा जा सकता है और समझा जा सकता है कि कैसे परिवार, हॉस्टल, समाज, न्यायपालिका, धर्म मिलकर पितृसत्ता को मज़बूत बनाते हैं और महिलाओं पर नियंत्रण बढ़ाते हैं.

पिछले साल सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर एक एतिहासिक फ़ैसला आया और सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयुवर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देने का आदेश दिया था.

कोर्ट ने कहा कि महिलाओं को मंदिर में घुसने की इजाजत न देना संविधान के अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है. लिंग के आधार पर भक्ति (पूजा-पाठ) में भेदभाव नहीं किया जा सकता है.

बता दें कि इस प्राचीन मंदिर में 10 साल से लेकर 50 साल तक की उम्र की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था. ऐसा माना जाता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं और चूंकि इस उम्र की महिलाओं को मासिक धर्म होता है, जिससे मंदिर की पवित्रता बनी नहीं रह सकेगी.

Sabarimala: Melsanthi Unnikrishnan Nampoothiri opens the Sabarimala temple for the five-day monthly pooja in the Malayalam month of ‘Thulam’, Sabarimala, Wednesday, Oct. 17, 2018. Tension was witnessed outside Sabarimala temple that was opened for the first time for women between the age of 10 and 50 on Wednesday following the Supreme Court verdict, turning over the age-old custom of not admitting them. (PTI Photo) (PTI10_17_2018_000155B)

सबरीमला मंदिर. (फाइल फोटो: पीटीआई)

जिस देश के ग्रामीण क्षेत्र में माहवारी के समय महिलाओं को होने वाली समस्या और सैनिटरी पैड की अनुपलब्धता को लेकर बनी एक शॉर्ट फिल्म ‘पीरियड: एंड ऑफ सेंटेंस’ को ‘डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट’ श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कार मिला है उसी देश में यह मुद्दा आज भी महिलाओं के लिए इस क़दर चुनौती बना हुआ है कि उन्हें अशुद्ध समझा जाता है.

सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद भी महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का बहुत विरोध हुआ और जब दो महिलाओं के प्रवेश की ख़बर सामने आयी तब ‘शुद्धिकरण’ समारोह के लिए मंदिर के गर्भ गृह को बंद करने का फैसला किया है.

बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 को असंवैधानिक ठहराया है, जिसके तहत व्यभिचार (एडल्ट्री) आपराधिक था. फैसले में कहा कि यह महिलाओं की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाता है और इस प्रावधान ने महिलाओं को ‘पतियों की संपत्ति’ बना दिया था.

फैसला देते हुए कोर्ट ने कहा था, धारा 497 महिलाओं को अपनी पसंद से वंचित करती है और पति, पत्नी का मालिक नहीं होता है.

देखा जाए तो समाज में कन्यादान जैसी परंपरा जीवित है जिसमें महिलाओं को संपत्ति की तरह पिता के हाथों से पति को सौंपा जाता है और उसके बाद उस वयस्क महिला के सारे निर्णय लेने का अधिकार पिता से पति को चला जाता है.

ख़ैर, इस साल दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों में मनमाने नियम और कर्फ़्यू टाइम के ख़िलाफ़ शुरू हुआ पिंजरा तोड़ आंदोलन देश के दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पहुंचा.

बीते साल भुवनेश्वर, भोपाल, अजमेर, रायपुर, पटियाला और कोट्टायम जैसे शहरों में भी इस अभियान ने ज़ोर पकड़ा. यहां पढ़ने वाली छात्राओं ने कहा कि सुरक्षा के नाम पर उनकी आज़ादी नहीं छीनी जा सकती. अगर उन्हें वोट देने का अधिकार है तो अपने निर्णय लेने का भी अधिकार होना चाहिए.

केरल के कोट्टायम ज़िले की अखिला अशोकन ने धर्म परिवर्तन के बाद हादिया जहां के रूप में शफीन जहां से निकाह किया था. इस मामले को हादिया के पिता अशोकन ने लव जिहाद का नाम देते हुए केरल उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसने यह शादी रद्द कर दी थी, लेकिन बीते 8 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया था.

इस मामले में सुनवाई के दौरान केरल हाईकोर्ट ने एक वयस्क महिला (हादिया) की कस्टडी उसके पिता को दे दी जो संविधान के ख़िलाफ़ है और यहीं नहीं उस महिला की सहमति को दरकिनार करते हुए उसे उसके निर्णय लेने के अधिकारों से वंचित रखा.

हादिया जहां और उनके शफीन जहां.

हादिया जहां और उनके शफीन जहां.

विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं मीटू मुहिम के तहत अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के अनुभव सोशल मीडिया पर साझा किए. महिलाओं ने उन पुरुषों के नाम भी खुलकर लिखे जिनके कारण उनको शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुज़रना पड़ा और कई बार तो नौकरी भी छोड़नी पड़ी.

इस आंदोलन में देखा गया कि जब कभी भी बलात्कार, यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आती हैं तो समाज अक्सर महिला को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराता है. इस पर ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ और ‘विक्टिम शेमिंग’ की जाती है.

क़ानून होने के बावजूद भी समाज में क्या हक़ीक़त होती है यह इस पूरे आंदोलन के ज़रिये देखा जा सकता था. विशाखा गाइडलाइन आने के बाद भी बहुत से विश्वविद्यालयों और कार्यस्थलों में आंतरिक शिकायत समिति (इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी यानी ईसीसी) का गठन नहीं हुआ है. कार्यस्थल पर महिलाओं के सम्मान की सुरक्षा के लिए वर्कप्लेस बिल होते हुए भी अभी भी समस्या बहुत ज़्यादा दिखती है.

मीटू आंदोलन के साथ बहुत सारे सवाल भी खड़े हुए लोग इसके महत्व, दायरे, इतिहास और तरीके पर बहस कर रहे थे. कुछ ने इसे एलीट वीमेन का आंदोलन भी कहा लेकिन कुछ का कहना था कि यह ‘एलीट वीमेन’ अपनी जाति और वर्ग के कारण यौन उत्पीड़न से मुक्त नहीं हो जातीं.

कुछ लोगों का कहना था कि गोपनीयता रखते हुए मामले की जांच आंतरिक शिकायत समिति में होनी चाहिए और नेम एंड शेम का तरीका सही नहीं है लेकिन दूसरे पक्ष का कहना था कि पारदर्शिता की कमी के कारण महिलाओं के पास मीटू अभियान में शामिल होने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.

इसी तरह से एक विवाद तब हुआ जब ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी की एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें वो एक पोस्टर पकड़े नज़र आ रहे हैं. इस पोस्टर पर लिखा था, ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को तोड़ दो.’ लोगों ने इस पर आपत्ति जताई और ट्विटर सीईओ की बहुत आलोचना हुई.

अगर इस पोस्टर पर लिखे दोनों शब्दों को देखें तो कोई भी प्रोग्रेसिव समाज इस पर नाराज़ नहीं होगा. आसान भाषा में समझें तो ब्राह्मणवाद- मतलब वो व्यवस्था जो समाज में जातिवाद को बनाए रखे और पितृसत्ता- मतलब, महिलाओं पर अपना अधिकार जमाए रखना.

जानी-मानी नारिवादी और इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने साल 1993 में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने इस शब्द का मतलब बताते हुए लिखा, ‘महिलाओं पर प्रभावी सेक्सुअल नियंत्रण के लिए सिर्फ़ पितृसत्ता ही नहीं, बल्कि जातिवाद बनाए रखने की भी ज़रूरत होती है.’

पोस्टर के साथ ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी. (फोटो साभार: ट्विटर)

पोस्टर के साथ ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी. (फोटो साभार: ट्विटर)

इसी तरह से पिछले साल आंगनबाड़ी और आशा वर्कर का आंदोलन भी ज़ोरों से चला. आंगनबाड़ी में महिलाओं को न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता और बहुत अधिक काम कराया जाता है.

इतना ही नहीं इन महिलाओं को कर्मचारी की श्रेणी में नहीं रखा जाता है. सैलरी नहीं मानदेय मिलता है. यही हाल बहुत सारी महिला सफाईकर्मियों का भी है. हालत यह है कि स्वच्छता के काम में लगीं महिला सफाईकर्मियों को अपने घर में शौचालय तक नसीब नहीं हैं.

विकास और शांति के नारों के बीच कश्मीर, बस्तर, नॉर्थ ईस्ट जैसे अशांत राज्यों में महिलाओं को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है उसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है.

बीते साल बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में एक बालिका गृह में बच्चियों के साथ यौन शोषण का मामला सामने आया था. कुछ बच्चियों के गर्भवती होने की भी पुष्टि हुई थी.

इसी साल दो नारीवादियों की गिरफ़्तारी भी हुई. मानवाधिकार कार्यकर्ता व ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज व प्रोफेसर शोमा सेन को भीमा-कोरेगांव हिंसा व माओवादियों से कथित संबंध के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है. दोनों ही एक प्रतिबद्ध नारीवादी हैं जो न सिर्फ़ पितृसत्ता पर बल्कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति पर आवाज़ उठाती रहीं हैं.

अंतरराष्ट्रीय श्रमजीवी महिला दिवस महिलाओं के प्रति असमानता, शोषण, उत्पीड़न, हिंसा, ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़तीं महिलाओं की कहानी बयां करता है.

महिलाओं को सिर्फ़ एक दिन का ‘सम्मान’ देना, कॉरपोरेट क्षेत्र में महिलाओं का किसी वस्तु की तरह इस्तेमाल करना और उसे माता, बहन या बेटी की पहचान तक सीमित रखना, हर वर्ग और जाति की महिला के लिए नारीवाद की परिभाषा बदल रहा है. इस दिन की असली जीत तब है जब समाज की हर महिला को इंसाफ़, बराबरी और सम्मान मिलेगा.